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Saturday, November 3, 2012

घी के दिए नहीं मशाल जलाने का है समय


घी के दिए नहीं मशाल जलाने का है समय 
चट्टान के मुहानों पर घास काटती महिला कब तक देती रहेगी पहाड़ों को अपना बलिदान 
उत्तराखंड के बारह साल के इतिहास में पहली बार गैरसैंण में कैबिनेट की बैठक हुई। जहां उत्तराखंड की जनता कभी राजधानी बनने का ख्वाब देखा करती थी। टीवी चैनल रिपीट कर कर के बार बार कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज का बयान दिखा रहे हैं जिसमें वह पहाड़ की जनता से कहते हैं कि राम अयोध्या से लौट आए हैं वह घी के दिए जलाकर दीवाली मनाए,खुशियां मनाए। गैरसैंण मंत्रीमंडल की बैठक में व देहरादून कांग्रेस भवन में जश्न का माहौल है पटाखे छोड़े जा रहे हैं। वहीं टीवी चैनल के  नीचे क्रासर में खबर चल रही है कि उत्तरकाशी में घास काटते हुए महिला की चट्टान से गिरकर मौत।
 एकाएक पहाड़ का वह पूरा मंजर आंखों में हो आया है, जब खुद अपनी मां, काकी व भौजी को खतरनाक पहाड़ी के मुहानों पर घास काटते हुए देख अपनी सांसे थाम लिया करते थे। थोड़ा पैर फिसला या हाथ से पकड़ी घास की मूंठ उपड़(उखड़) गई तो सीधे खाई में गिरकर चिथड़े चिथड़े होने के सिवा कोई विकल्प न था। और वह महिला ऐसी मुश्किल चट्टान पर उस लहराती हुई घास को काटने जाती है जिस तक किसी जानवर तक की पहुंच नहीं हुई रहती। पूरे जंगल की खाक छानने व दिन भर जंगल में भटकने फिरने के बजाय  यह महिलाएं जान हथेली पर लेकर ऐसी चट्टानों में किसी सर्कस वाली की भांति चले जाया करती थी। मुझे याद है पूरी याददाश्त के साथ याद है कि गांव की वही बहू ऐसी चट्टानों की घास को काट लाने का साहस रखती थी जिसके घर में सास से बहुत कलह रहता था। जिसके घर में पेट भर के मोटे अनाज की रोटी तक नहीं मिलती थी।  अच्छी लहराती हुई घास लेकर जंगल से जल्दी घर लौट जाऊं ताकि पेट भर खाना मिल सके व छोटे बच्चे को वक्त पे दूध पिला सके इसी गरज से यह गांव की काकी भौजी ऐसी जानलेवा चट्टानों का रुख किया करती थी। कई बार ऐसी चट्टानों में ही बकरियों के लिए पत्ते वाली घास (झाड़ी)उगा  करती थी जिसे हमारे गांव की लछिम काकी व प्रेमा काकी ही ला पाते थे। पूरा गांव उन्हें रूख्याव (चट्टानों की एक्सपर्ट) नाम से नवाजते थे।
एक वाकिया और सुनाना चाहूंगी, ताकि पहाड़ के हालातों को आप सब भी महसूस कर सकें, कैबिनेट तक पहुंची हमारी महिला नेत्री महसूस सकें जिन्होंने कभी पहाड़ के जीवन को जिया व महसूसा ही नहीं और बन गई महिला सशक्तिकरण मंत्री। वाकिया यूं है कि पिछले दिनों राजधानी स्थित एफआरआई भवन के शानदार एसी कमरे में जब  भ्रूण हत्या पर हुई कार्यशााला चल रही थी जिसमें  दूर दराज के गांवों से दो दिन व एक रात की लंबी बस की यात्रा कर काकी भौजियों को एनजीओ के नेताओं द्वारा पहुंचाया गया था। गद्दीदार कुर्सियों में जो स्वर्ग सरीखी नींद में डूबी थी । मैने पूछा कि कैसा लग रहा है राजधानी में। तो मासूम बच्चे सी मासूमियत लिए तपाक से बोल उठीं कि अहो.. .. .. ..  शहर में ले कति नख लागुंछे (शहर में भी क्या कहीं बुरा लगता  है)। उसकी सौ फीसदी नकार के जवाब ने उसकी उस पीड़ा को खोल के रख दिया जिसे वह पहाड़ से पहाड़ी जीवन  में रोजबरोज झेलती है। उसकी नजरों में शहर इसीलिए कभी बुरा नहीं हो सकता था क्योंकि शहर में लोग बैठे रहते थे। उसकी नजर में शहर में रहने वाली औरत का खाना बनाने के सिवा काम ही क्या था, जिसे वह कभी काम के श्रेणी में नहीं रखती थी। यह इसलिए क्योंकि सुबह पौ फटने से उस महिला के काम की शुरूआत हो जाती है और दिन डूबने तक वह अनथक काम में लगी रहती है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या राज्य बनने के इस बारह साल के अरसे में क्या वाकई भाजपा कांग्रेस दोनों की सरकारें बनवास पर गई हुईं थी, क्या वाकई अब पहाड़ के भाग जागने वाले हैं, क्या वाकई पहाड़ की चट्टानों से गिरने को मजबूर इन महिलाओं के भाग अब संवर जाएंगे। सतपाल महाराज व उनकी  महारानी जिन्होंने पिछले हफ्ते हुई अपने  बेटे की शादी में एक रात में ही दो करोड़ की बिजली फूक दी, जिनके बेटे की शादी किसी अद्र्धकुंभ से कम नहीं थी क्या अब वह बताएंगे पहाड़ की गरीब जनता को कि राम अयोध्या आ गए घी के दिए जलाओ। महिला सशक्तिकरण विभाग की कमान संभाले उनकी महारानी पत्नि क्या पहाड़  की इस औरत को घास व चारे के संकट से मुक्ति दिला पाएगी। वहीं दूसरी ओर दूसरी महिला कैबिनेट मंत्री इंदिरा ह्दयेश जिसे हल्द्वानी में  मध्यम वर्ग की शहरी महिलाओं के तीज व करवा चौथ के उत्सवों में जाने से फुरसत नहीं क्या  वह पहाड़ की महिला को उसकी इन जानलेवा चट्टानों से मुक्त कर पाएंगी। हम संसद विधानसभा में किन महिलाओं के आरक्षण व सशक्तिकरण की बात  करते हैं। जो यहां पहुंचकर महिला हितों को भूल जाती हैं,या फिर जिन्हें महिला के जीवन काक ख ग तक  मालूम नहीं।
ं अपनी राजनीति चमकाने या मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का अपने अंक बढ़वाने जिस भी गरज से गैरसैंण में कैबिनेट की यह बैठक हुई है महिलाओं के संदर्भ में कई कई सवाल छोड़ गई है, कि जो राज्य यहां की महिलाओं  की ही लुटी हुई अस्मत पर बना हो, जिस राज्य के लिए यहां की महिला ने अपने नौजवान बेटों की बलि दी हो वहां की महिला को बारह सालों में यहां की सरकार ने क्या यही कम्पनसिएशन दिया कि वह चट्टान से गिरने को विवश हो। वह शराबी पति की मार से प्रताडि़त हो, वह बेरोजगार बेटे का दुख सीने में लेकर चले, वह वहशी दरिंदों के हाथों अपनी  बेटियों की अस्मत लुटते हुए देखे। घी के दिए जला दीवाली मनाने की सलाह देने वाली सरकार जरा माथे पर बिना बल डाले भी सोचे तो जवाब उसके सामने होगा कि आखिर दिया क्या है उसने इन बारह सालों में पहाड़ की महिला को। क्या अपना राजस्व बढ़ाने की कीमत पर गांव मुह्ल्लों में कच्ची शराब की दुकानें, या फिर अस्मत लूटने वाले अनंत कुमार व बुआ सिंह जैसे दरिंदों को प्रमोशन व सम्मान। पहाड़ की जनता यह घी के दिए नहीं   मशाल जलाने का समय है। जागो इन लुटेरे नेता मंत्री व नौकरशाहों को पहचानो।

Friday, February 4, 2011

क्या हिंदी मैं लिखा जा सकता है एक प्रयोग

Saturday, October 30, 2010

ब्लाग्स ने किया हिंदी का कायाकल्प

हिंदी दिवस आने पर हिंदी से आसक्ति रखने वाले कई लोग इसके भविष्य की चिंता करने लगते हैं, हालांकि यह चिंता एक उबाऊ तरीके से और एक बहुत अल्प समय तक रहती है फिर भी इस चिंता को कहीं न कहीं हिंदी के बारे में विचार करने का श्रेय भी जाता है कुछ कहते हैं हिन्दी का जीवन समाप्ती की ओर है तो कुछ देववाणी की संस्कृत भाषा के कभी न मर सकने की हामी भरते हैं। बहरहाल हिन्दी का कहीं व्यवहार में भला होता नजर आ रहा है तो वह है नयी तकनीकि जन्य इंटरनेट के हिन्दी ब्लाग्स । हिंदी ब्लाग्स के माध्यम से हिंदी भाषा व साहित्य की दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति हो रही है। आए दिन दर्जनों की संख्या में दर्जनों ब्लाग्स हिन्दी में बनते हैं जिन्हें हिन्दी का वह पाठक वर्ग पढ़ता है जिसने हिन्दी पत्रिका तो दूर उनके बारे में सुना तक नहीं होता। यानि हिन्दी का एक नया संस्करण और एक नया पाठक वर्ग। भला इससे अच्छी उपलब्धि हिन्दी के लिए और क्या हो सकती है। वैसे बाजार की अंधाधुंध जरुरतों तेजी से बढ़ती साक्षरता दर ने हिन्दी अखबारों के कई नये संस्करणों को जन्म दिया है। व ढ़ेरों पत्रिकाएं हिंदी में निकल रही हैं। इससे हिंदी के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगाने वालों का मुहं बंद होता है। यह भी एक तथ्य है कि आने वाले समय की हिन्दी विशुद्ध संस्कारों वाली हिंदी नहीं होगी, व्यापार , विज्ञान, व भूमण्लीकृत हो चुके समाज में उसका एक नया ही रूप देखने को मिलेगा इस हिंदी में अंग्रेजी , पंजाबी व विज्ञान के ढ़ेरों शब्द आम बोलचाल के शब्द हो जाएंगे। हिंदी की शुद्धता का आग्रह करना भी ठीक नहीं । इस हिंदी को अशुद्ध कहने के बजाय यह नजरिया रखना ज्यादा बेहतर होगा कि तमाम भाषाओं से शब्द लेकर हिंदी ने खुद को समृद्ध व प्रगतिशील बनाया है। पिछले दस पन्द्रह सालों में अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व के बाबजूद हिंदी के लिए कोई खतरा नहीं है,आज की जरुरतों के हिसाब से लोग अंतराष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी समझना जरुरी समझते हैं। लेकिन हिंदी को सरल व आधुनिक रुप में बनाये रखना भी उनके लिए अनिवार्य है। अगर बाजार इतना निर्भय होता और अपनी ही मर्जी से चीजों को चलाने में सक्षम होता तो आज बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापन हिंदी में नहीं आते और रुपर्ट मर्डोक को स्टार न्यूज को हिंदी में नहीं देना पड़ता । बाजार के दबाव दो प्रकार के होते हैं उपभोक्ता के अनुसार ही व्यापारी को बदलना होगा। इलाहाबाद बैंक के गुमान सिंह रावत जी से हिंदी पखवाड़ा मनाने पर हमने पूछा कि कितने सार्थक होते हैं ये हिंदी पखवाड़े जवाब के रुप में रावत जी बोले कि हम जन भाषा में जन सेवा चाहते हैं हमारे व्यवसाय की जरुरत है हिंदी। भाषा तो बहता नीर है भाषा को बांधा नहीं जा सकता। हिंदी के ग्राहक ज्यादा हैं तो हम चाहेंगे कि हम अधिकांशत हिंदी का प्रयोग करें। हिंदी में नये प्रयोग अगर भाषायी मर्यादा में हैं तो वह ठीक हैं। हमें जनप्रचलित शब्दों का इस्तेमाल ही करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर वो बताते हैं कि बिल को अगर हम विपत्र,व ड्राफ्ट को धनादेश कहेंगें तो लोग समझ नहीं पायेगें। हिंदी भाषा में कई भाषाओं के समावेश होने व इन नये प्रयोगों से हिंदी को खतरा तो नहीं है? इस सवाल के जवाब में हिंदी के प्रसिद्ध कहानीकार ड़ा लक्ष्मण सिंह बटरोही कहते हैं कि जब भी कोई नयी शैली आती है तो लोगों को संकट लगने लगता है। मुसलवान आये थे तो अरबी फारसी का संकट सताने लगा था।भाषा को भाषा वैज्ञानिक नहीं बनायेंगे भाषा को तो आम जनता ही बनायेगी और वो ही आज हो रहा है। लेखन व बोलचाल की भाषा हमेशा अलग होती है। हिंदी आज बाजार की भाषा के रुप में विकसित हो रही है पाणिनी ने भाषा को संस्कृत बनाया तो लोगों ने पाली व अपभ्रशं अपना ली ,इसीलिए भाषा कभी भी व्याकरण से संचालित नहीं हो सकती। इसीलिए नये प्रयोगों को अधकचरापन कहना गलत है। कहीं हिंदी खत्म तो नहीं हो रही है इस सवाल के जवाब में जाने माने साहित्यकार लीलाधर जगूड़ी कहते हैं कि हिंदी को लेकर कई लोग शोक मुद्रा में बैठे हुए हैं और ये वो लोग हैं जो हिंदी को को स्थानीय भाषा के लिए खतरा मानते हैं। स्थानीय भाषा में अगर दम होता है तो वह स्वत ही फल फूल जाती है। हर देश व भूगोल को एक कॉमन भाषा की जरुरत होती है। हिंदी को आज सामाजिक जीवन व बाजार फैला रहे हैं सरकार कुछ नहीं कर रही है इसके लिए। दुनिया के सारे देश अपनी अपनी भाषा में रोटियां खा रहे हैं पर एक भारत है जो अभी भी अंग्रेजी मानसिकता से नहीं उबर पाया है। उनको लगता है कि अंग्रेजी ही उनको रोटी दिला सकती है। हिंदी कभी मर नहीं सकती जितनी भी हिंदी की दुर्दशा हुयी है तो वह सरकारी सैट अप के कारण हुआ है।
उत्तराखण्ड के लोकप्रिय ब्लागर अशोक पाण्डे हल्द्वानी का ब्लाग कबाडख़ाना हिन्दुस्तान में शुरुआती ब्लाग्स में से एक है। बेहतर लोक व फिल्मी संगीत की जानकारी व दुर्लभ फोटो व पेंटिग्स से इस ब्लाग को काफी रीडरशिप मिली है। भाषा को रचनात्मक बनाने का यह एक बेहतरीन प्रयास है। नैनिताल के कवि प्राध्यापक शिरीष मौर्य का ब्लाग अनुनाद कविता व आलोचना को समर्पित है, जिसमें हिन्दी की चर्चित कविताओं व उन पर टिप्पणियों को प्रासंगिक रुप में लाया गया है। देहरादून के विजय गौड़ का ब्लाग लिखो यहां वहां को अपनी छोटी छोटी टिप्पणियों व यात्रा वृतातों के लिए देखा जाता है।देहरादून के शिव जोशी के ब्लाग हिलवाणी में उत्तराखंड के समुग्र समाचारों के साथ साहित्य का भी रोचक कलेक्सन मिल जाएगा।

जश्ने आजादी की पूर्व संध्या पर मुशायरा सम्मेलन

जब बटी म्यर गौंक एक आदिम मंत्री बण तब बटी म्यर गौं गौं नी रेगे विधान सभा हैगे। जश्ने आजादी की पूर्व सन्ध्या पर गायी गयी ये पंक्तियाँ गढ़वाल के सुप्रसिद्ध हास्य कवि गणेश खुगशाल की हैं। संस्कृति विभाग द्वारा आजादी की पूर्व सन्ध्या पर कवि सम्मेलन व मुशायरे का आयोजन किया गया जिसमें देश भर से आये कवियों ने अपनी अपनी कविता के माध्यम से आजादी, राजनीति व रिश्तों के बदलते स्वरुप को व्यक्त किया। दिन के उजेरे में ना करो कोई ऐसा काम कि नीदं जो न आये तुम्हें रात के अंधेरे में। इस तरह के व्यग्यों से सबको हँसाने वाले दिल्ली से आये जाने माने कलाकार अशोक च्रकधर ने कवि सम्मेलन का संचालन किया। भोपाल से आयी र्उदू की मशहूर शायरा नुसरत मेहदी साहिबा ने क्यों मेरा दर्द लिया सहा करते हो कुछ पुराना लिया दिया है क्या नज्म गाकर अपनी मधुर आवाज से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं मंजर भोपाली ने प्रेम का संदेश देते हुए जो भी आया उसे सीने से लगाया हमने हम तो सबसे मिलते रहे गंगा के समान । व तुम भी पिओ हम भी पिएं रब की मेहरबानी प्यार के कटोरे में गंगा का पानी। व राजनीति पे व्यग्ंय करते हुए कहा कि खुद अपने आप ही सुधर जाईये तो बेहतर है ये मत समझिए कि दुनिया सुधरने वाली है। कलकत्ता से आये मुनव्वर राणा ने अपनी कविताओं से सभा को गमनीन कर दिया। घर में रहते हुए गैरों की तरह होती हैं बेटियाँ धान के पौधौं की तरह होती है उड़ के इक रोज ये बहुत दूर चली जाती है घर की शाखों में ये चिडिय़ों की तरह होती है। व आज फिर कूड़ेदान में एक बच्ची मिल गयी। कल अपने आप को देखा था माँ की आखों में ये आइना हमें बूढ़ा नहीं बताता है। पलायन पे मुनव्वर की वाणी कुछ इस तरह बोल उठी ना जाने कौन सी मजबूरियां शहर लायी उसे वो जितनी देर भी जिन्दा रहा घर याद करता रहा। वहीं लखनऊ से आयी सीमा सागर के काव्य छन्द में लिखे आधे घण्टे के उत्तराखण्ड के परिचय से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। नैनीताल से आये उत्तराखण्ड के जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा ने लोगों से जागने का आह्वान आज हिमालय तुमनकें धतुयछ जागो जागो ओ म्यारा लाल से किया तो वहीं से आये मशहूर शायर व युगमंच नाट्य अकादमी के जहूर आलम ने भी देश में छाए सन्नाटे को तोडऩे की बात कही। ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के गाने के मशहूर कवि व दुष्यंत की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले बल्ली सिहं चीमा ने हिन्दुस्तान की असलियत निम्न पंक्तियों से बयान की। खुश है रहबर फाइलों में देखकर खुशहालियां असली हिन्दुस्तान में तो अब भी गुरबत है तो है। सैणी बैग बच्चा बूढ़ा हम जां ले रूंलौ रे अपण अपण बाट देश क छजूलौ रे इन पंक्तियों के माध्यम से देश को सजाने की बात की कुँमाऊनी के मशहूर हास्य कलाकार शेर दा अनपढ़ ने । देहरादून के ही कवि सोमवारी लाल उनियाल ने आज के मौसम के माध्यम से मत्रिंयों पर व्यंग्य करते हुए कहा कि इस बार भी किसी मंत्री की तरह आया बसंत और हाथ हिलाकर चला गया। कार्यक्रम के अन्त में सुरेन्द्र शर्मा ने काफी देर तक दर्शकों को अपने हास्य व्यग्यों से बाँधे रखा। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राज्यपाल बीएल जोशी थे व अध्यक्षता मुख्यमत्रंी जी ने करते हुए शहीदों को याद किया। योगेश पन्त व प्रकाश पन्त के सहयोग से कार्यक्रम सफल रहा।

बिना दरवाजों का समय

थकती नहीं कविता, अब तो सड़कों पर आओ व नदी तू बहती रहना काव्य संग्रह के बाद 'बिना दरवाजों का समय डा. अतुल शर्मा का नया काव्य संग्रह है। डा. शर्मा मूलत: गीत लिखते रहे हैं। गीत ने ही उनको पहचान दी, लेकिन जब-तब अतुुकांत में भी प्रकट होने से स्वंय को रोक नहीं पाते। लेकिन इनमें भी गेय तत्व का लेप साफ दिखाई देता है। काव्य संग्रह 'बिना दरवाजों का समयÓ इसी खिलदड़पने का परिचायक है। संग्रह में 53 कविताएं संकलित हैं। पहली कविता का शीर्षक 'मालिकÓहै। 'साठ साल से रहते हुए/इस किराए के मकान में/हमारा एक घर है/इसके हर कोने में।Ó इसके अलावा अव्यवहारिक शिक्षा पद्यति पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं लोकतंत्र में नौकरी की अराजकता स्कूल के दरवाजों से शुरू होती है। अतुल शर्मा अलग ही मिजाज के कवि हैं। लेखकीय मंचों से उनकी तटस्थता जग जाहिर है। लेकिन दूसरी तरफ अपनी आंतरिक छटपटाहट को किसी न किसी मंच से प्रकट भी करते रहे हैं। कविता का टाइटिल 'बिना दरवाजों का समयÓ एक असुरक्षित सभ्यता की गवाही है। 'सब कुछ कितना असुरक्षित होगा/जब बने होंगे दरवाजे।Ó दरवाजे डर की सभ्यता के परिचायक हैं। दरवाजे संर्कीणता के परिचायक हैं। दरवाजे पाप की कमाई को छुपाने का माध्यम हैं। 'घरों में बहुत दिन तक-दरवाजे नहीं थे/ये होते थे बड़े लोगों के खजाने के लिए।Ó डर मनुष्य के जीवन की विडंबना है। डर हमारे जीने की प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह है और डर को पनाह देता है दरवाजा। 'स्कूल का दरवाजा बच्चों को बंद रखता है/जेल का दरवाजा कैदियों को/दफ्तरों का दरवाजा कर्मचारियों को/दरवाजे जरूरी हो चुके हैं/ यह इस समय की सबसे बड़ी दुर्घटना है।Ó लोकप्रिय मुहावरों की बुनियाद पर खड़ी डा. शर्मा की कविताएं आसानी से दिल में उतर जाती हैं। टोपियां इसी तथ्य की परिचायक हैं। 'पैरों में ढकने के लिए जुराब/और हथेलियों को ढकने के लिए दस्ताने/सिर के लिए टोपियां।Ó बढ़ती हुई दुनिया, लिफाफे, शिकायत पेटी, सचिवालय आदि संग्रह की आकर्षक कविताएं हैं। कविता की पाठशाला में अपने ही शिष्य पवननारायण से संग्रह का परिचय लिखवाना डा. शर्मा जैसे जनकवि का अपना बड़प्पन हो सकता है। काव्य संग्रह-'बिना दरवाजों का समयÓलेखक-अतुल शर्मा, मूल्य-100 रूपये ,रमा प्रकाशन देहरादून।पुस्तक परिचय

दलित समाज के दर्द को सामने लाने का प्रयास

अपनी आत्मकथा जूठन से चर्चा में आये ओम प्रकाश बाल्मिकी ने अपनी कृति सफाई देवता में समाज की सामाजिक स्थिति को समझाने का प्रयास किया है। पुस्तक के माध्यम से वह उस मनोवृति को भी रेखांकित करने की कोशिश करते हैं, जिसमें दलित चिंतकों का यह प्रयास रहता है कि वे भी मूलत स्वर्ण थे, और यदि इतिहास को पुर्न परिभाषित किया जाय तो कई जगह उनकी जातीय श्रेष्ठता के उदाहरण मौजूद हैं। स्ंवय दलितों के मसीहा ड़ा. अम्बेडकर में भी यह हीन ग्रन्थि मौजूद थी। वह दलितों को मनुष्यों के रुप में स्थापित करने की कोशिश करते हुए कहते हैं कि यदि स्वर्णों दवारा लिखित वेद व पुराणों में उनका इतिहास नहीं भी उपलब्ध है तब भी वे किसी से कमतर नहीं हैं। एक कदम और आगे जाते हुए वह कहते हैं कि सवाल आज सामाजिक राजनीतिक हालात में दलितों के सही विकास की पड़ताल करने से होना चाहिए। इसके लिए वे सफाई देवता यानि बाल्मिकी समाज के लोगों को प्रमुख रुप से सामने लाते हैं। पुस्तक सफाई देवता मुख्यत बाल्मिकी समाज पर केंद्रित है, लेकिन यह संपूर्ण समाज के ऐतिहासिक शोषण उत्पीडऩ, दमन का विश्लेषण तमाम विवरणों से करते हैं। खासकर दलित साहित्य को साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा के रुप में स्थापित करने वाले बाल्मिकी के प्रयास का सामाजिक दायरे में स्वागत होगा, ऐसी आशा की जानी चाहिए। बाल्मिकी साहसपूर्वक अपनी पुस्तक में उस रुढि़वादी व्यवस्था को चुनौती देते हैं जो जानबूझकर यह स्थापित करने का प्रयास करती है कि वर्ण व्यवस्था हिन्दू धर्म की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था है। जातीय श्रेष्ठता के दर्प में चूर रुढि़वादियों के राष्टवाद को कटघरे में रखते हुए वह कहते हौं कि इस व्यवस्था के कारण शूद्र और दलित हजारों सालों से विकास से अवरुद्ध है। इस वर्ण व्यवस्था ने समूचे राष्ट को हानि पहुँचायी है। विभिन्न पुस्तकों व पत्र पत्रिकाओं की मदद लेते हुए उन्होंने सबसे कठिन श्रम करने समाज को हीन घोषित करने वाले ग्रन्थों व पुराणों को अमानवीय करार दिया। वे कहते हैं कि ऐसे साहित्य जिसमें मनु स्मृति जैसे घनघोर मनुष्य विरोधी ग्रन्थ शामिल हों,को लोकतान्त्रिक व सभ्य समाज द्वारा सिरे से नकार देना चाहिए। वह कहते हैं कि मनुष्य की बौद्धिक सृजनता को खांचों में नहीं ढ़ाला जा सकता। सृजनता किसी खास दिमाग की उपज होती तो बाल्मिकी रामायण नहीं लिख पाते। तमाम अवरोधों के बाबजूद अंतराष्टीय ख्याति प्राप्त के संगीतकार ,अभिनेता, गायक, वैज्ञानिक व लेखक इस समाज से निकले है। ड़ा अम्बेडकर को सवर्ण समाज ने एक बौद्धिक के रुप में विकसित होने में कई बाधाएं डाली, मगर वो उनके लेखन को निखारने में सहायक ही सिद्व हुयी। लेकिन वर्तमान संर्दभ में सवाल अधिक चुनौतीपूर्ण इसीलिए हो गया है क्योंकि दलित समाज का अगड़ा तबका सवर्ण समाज में विलीनीकरण की तीव्र इच्छा रखे हुए है। थोड़ा प्रगति कर लेने पर वह वर्गीय आधार पर अपने मूल समाज से थोड़ा कट गया है और उन ढ़कोसलों को धारण करने जा रहा है जिन्हें खुद स्वर्ण समाज छोड़ चुका है।