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Tuesday, October 12, 2010

उत्सवधर्मी व रस्म अदायगी भर रहा महिला दिवस का 100 वां वर्ष



गायब हुए लाल झंडे, हाथों में आई मेंहदी

पिछले एक दशक पहले तक भी महिला दिवस के दिन महिलाओं के हाथों में लाल झंडे हुआ करते थे लेकिन आज हाथों में मेंहदी आ गई है। आज हाथ रंगोली बना रहे हैं। नाच गाना कर रहे हैं। क्योंकि अब महिला दिवस की लोकप्रियता ज्यादा बढ़ गई है। इसे स्वीकार्यता जो मिल गई है। एनजीओ ने गांव-गांव तक बता दिया है। बाकि की कसर राजनीतिक दलों के महिला प्रकोष्ठों ने पूरी कर दी है। पंचायतों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण मिल गया है। विधानसभा व संसद में 33 फीसदी की तैयारी चल रही है। पूरा वातावरण महिलामय हो रखा है। इसीलिए हाथ के संघर्ष की मशाल अब बुझने लगी है क्योंकि अब महिलाओं की चिंता सरकारें जो करने लगी हैं। मशाल का रूप अब मेंहदी की कीप में बदल चुका है। बाजार ने भी महिला को आजाद कर दिया है कि जाओ जितनी मर्जी उतने कपड़े पहनो। सुंदर बनो अपने हर अंग को सुंदर बनाओ और फिर हमारा माल बेचो। गैर सरकारी संस्थाओं ने गांव-गांव में अपनी पैठ बनाकर महिला को पुरूष के खिलाफ लड़ाने में कामयाबी हासिल की कि यही तुम्हारा दुश्मन है।
अब लाल झंडे वालों की बातें न कोई नहीं सुनता है, कि विरासत में ढो रहे पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ लडऩा है। शासक वर्ग के खिलाफ लडऩा है और न ही वह ही लोगों को यह बताने में कामयाब रहे हैं।
चलिए आपको देहरादून में महिला दिवस की 100 वीं जयंती का सीधा प्रसारण दिखाते हैं। धाद नामक एक संस्था ने राज्य विज्ञान एंव प्रौद्योगिकी परिषद ( यूकॉस्ट)व पीपुल्स एसोसिएशन ऑफ हिल एरिया लांचर्स (पहल) के साथ मिलकर एक मैदान में टैंट लगाकर महिलाओं को पालीथीन उन्मूलन के लिए एक-एक हरे बैग बांटे। एक दिनीं कार्यशाला का विषय रखा गया महिलाओं में वैज्ञानिक साक्षरता की प्रासंगिकता। उच्च संभ्रांत वर्ग की महिलाओं के साथ कुछ मध्यवर्गीय महिलाओं व स्कूली बच्चियां भी वहां दिखी। मुख्य अतिथि के रूप में महिला सशक्तीकरण मंत्र विजया बडथ्वाल थी। सभी ने महिला को वैज्ञानिक तरीके से काम करने की सलाह दी। एक महिला ने तो बैसाखी के दिन होने वाले अपनी साहित्यकार मां के जन्मदिन पर सभी महिलाओं को आमंत्रित कर यह भी चेतावनी दी कि सभी महिलाएं सज धज के आएं पूरे श्रृगांर में आएं हमें मेधा पाटेकर नहीं बनना है। महिलाएं गहनों में ही खूबसूरत लगती हैं। इस तरह से यूकॉस्ट व पहल ने अपना पता नहीं कितना बजट यहां खपा दिया। और धाद की कुछ महिला नेत्रियों को लोकप्रियता भी मिल गई।
शहर के एक आलीशान होटल में उमा नामक ट्रस्ट ने भी कुछ महिलाओं को सम्मानित किया। जिसमें एक-आध को छोड़कर वह महिलाएं थी जो कि वल्र्ड बैंक सरीखी संस्थाओं से पैसा लेकर अपने घरों में एक-एक संस्था खोलकर बैठी हैं।
भाजपा के महिला मोर्चे द्वारा राजधानी के नगर निगम प्रेक्षागृह में महिला दिवस का कार्यक्रम रखा गया। पूरा हाल महिलाओं से ठसाठस भरा हुआ था। देहरादून के सभी ब्लाकों से महिलाओं को इकठ्ठा किया था। जो कि नेताओं के न समझ में आने वाले भाषण को कम और एक दिन घर से बाहर निकलने व कुछ खा-पी लेने के उद्देश्य से ज्यादा आईथी। वहीं कांग्रेस की महिलाओं ने मेंहदी प्रतियोगिता कराकर महिला दिवस मनाया। उक्रांद की गिनी चुनी महिलाओं द्वारा भी इस बार महिला दिवस अपने कार्यालय में मनाया गया। इसके अलावा कौशिल्या डबराल संघर्ष समिति द्वारा भी कचहरी शहीद स्मारक में महिला दिवस मनाया गया। सुबह से ही महिलाएं एकत्र होने लगी। और समिति की अध्यक्षा बाल विकास व महिला सशक्तीकरण मंत्री विजया बड़थ्वाल के आतिथ्य में सुबह से ही पलकें बिछाए रही और जब वह वयस्तता के कारण वहीं पहुच पाई तो समिति की अध्यक्षा के आंसू तक निकल गए। उन्हें लगा कि बड़ी मंत्री महोदया आएंगे तो हमारा कार्यक्रम हिट होगा। लेकिन उनके मना करने पर अध्यक्षा जी के स्वाभिमान को चोट पहुंच गई। जिस कारण उनका आयोजन फीका रहा। बाकि की महिलाएं जो खुशी-खुशी घर से आई थी उनको तो मंत्री महोदया से कोई मतलब नहीं था। लेकिन उनके न आने का खामियाजा उन्हें भी भुगतना पड़ा।
राजभवन में महामहिम राज्यपाल मारग्रेट अल्वा द्वारा महिला दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किया गया था। जिसमें सभी पार्टियों की कददावार महिलाओं से लेकर अन्य संभ्रांत घरों की महिलाएं मौजूद थी। राजभवन में कार्यक्रम रखा गया था। जहां पिछले कुछ सालों से दिए जाने वाले तीलू रौतेली पुरूस्कार भी महिलाओं को दिए गए। जिन 12 महिलाओं को तीलू रौतेली पुरुस्कार से सम्मानित किया गया मालूम चला कि उनमें से एक आध को छोड़ दें तो बाकि सभी महिलाएं भाजपा से जुड़ी हुई महिलाएं थी। कोई तो ऐसी थी जो लाल बत्ती की दौड़ में थी वह न मिल पाने से उन्हें तीलू रौतेली पुरुस्कार देकर संतुंष्ट किया गया। और कुछ महिलाएं ऐसी भी थी जिनको जिस कार्य के लिए यह सम्मान दिया गया पता लगा कि उन्होंने वह काम कभी किया ही नहीं। एक नेत्री को रक्त दान करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने पर यह सम्मान दिया गया और उन्होंने कभी अपनी जिंदगी में रक्तदान ही नहीं किया है। तो इस तरह से राजभवन में तीलू रौतेली पुरुस्कार वितरण हुए। इसके अलावा राज्य भर से आई आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को भी पुरूस्कार भी दिए गए। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता दूर दराज से बड़े उत्साह से आई थी लेकिन उन्हें सम्मान भी सम्मानजनक तरीके से नहीं दिया। काम चलाऊ अंदाज में जल्दी-जल्दी निपटा दिया गया। उन एलीट क्लास की महिलाओं द्वारा जो बातें की गई उनसे ऐसा प्रतीत हुआ कि हमें महिला सत्ता समाज काबिज करना है। पुरूष हमारे घोर विरोधी हैं।
इसके अलावा कई सारे लाल झंडे वालों ने भी महिला दिवस मनाया। किसी ने मंहगाई पर विरोध कर विधानसभा पर हल्ला बोला तो किसी ने संयुक्त मोर्चा बनाकर गांधी पार्क में महिला दिवस मनाया। पर दूसरे दिन अखबार की एक कॉलम की खबर बनकर रह गए।
इस तरीके से महिला दिवस के 100 साल सम्पन्न हो गए।
क्या इस सब से किसी आम महिला को कोई फायदा पहुंचा। किसी महिला को राजनीतिक रूप से मजबूती मिली। सवाल यह भी है कि कौन देगा राजनीतिक समझदारी। जिस पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर एक महिला संचालित कर रही हो उसकी पार्टी के लोग महिला दिवस को मेंहदी प्रतियोगिता कराएं इससे बड़ी समझदारी की कमी और क्या हो सकती है। दरअसल पार्टियों के भीतर ऐसी संस्कृति ही नहीं है कि महिला दिवस के दिन महिला मुद्दों पर चर्चा की जाय। सरकारी योजनाओं की जो महिलाओं को दी जा रही हैं उनकी समीक्षा की जाय। ऐसा कोई एजेंडा मुख्यधारा की पार्टियों के पास नहीं है क्योंकि वह चाहते ही नहीं हैं कि महिलाओं में ऐसी समझदारी विकसित हो।
लगभग एक दशक पहले जब महिला दिवस मनता था तो संघर्ष उत्पीडऩ की बातें मुख्य स्वर होते थे लेकिन कुछ सालों से मन रहे महिला दिवस उत्सवधर्मी हो गए हैं। मानो व महिला उत्पीडऩ की बात न करते हों बल्कि कोई त्यौहार मना रहे हों। जब यह तय हो गया है कि महिलाओं को समाजिक व राजनीतिक जीवन में प्रवेश से रोका नहीं जा सकता। आज जब पंचायतों में 50 फीसदी आरक्षण के बाद राज्य सभा में 33 फीसदी आरक्षण तय हो गया है तो ऐसे में तो उनकी ऊर्जा को निरर्थक कामों में लगाया जा रहा है। उन्हें बस एक बुत के तौर पर आगे लिया जा रहा है। सबसे अधिक महिला आंदोलन को सवार्धिक नुकसान एनजीओ ने पहुंचाया है।
महिला संघर्षों की अगर हम बात करें तो आज से सालों पहले भारत में जब महिलाएं घरों से बाहर चौखट लांघने का अधिकार तक नहीं था वह परंपराओं की बेडिय़ों में जकड़ी थी तब कुछ पश्चिमी देशों की साहसी महिलाओं ने उन अमानवीय परिस्थितयों के खिलाफ मशाल उठाई थी। इसी संघर्ष को जर्मनी की समाजवादी महिला क्लारा जेटकिन ने प्रस्ताव रख एक दिन को महिला दिवस मनाने का निर्णय लिया था।
भारत की महिलाएं भी इन संघर्षों से अझूती नहीं थी। जिनमें गार्गी अपाला जैसी महिलाएं भी हुई जिन्होंने सांमती शोषण के घृणित रूप को चुनौती दी। सावित्रीबाई फूले, आनंदी बाई व पंडिता रमाबाई ने पितृसत्तात्मक मूल्यों को चुनौती दी। क्रूर जमींदारों के खिलाफ चला चेलंगाना व तेभागा आंदोलन तो महिलाओं के सशक्त व सशस्त्र संघर्षों के लिए ही जाना जाता है।









































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