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Tuesday, October 12, 2010

सबसे ठीक नदी का रास्ता...

सबसे ठीक नदी का रास्ता

रचना प्रक्रिया में 'लाउडनेस ठीक नहीं मानी जाती लेकिन अगर लाउडनेस से बचना किसी सच्चाई से बचने का उपक्रम बन जाए तो मैं लाउड होने का जोखिम उठाउंगा। यह विचार हैं 'सबसे ठीक नदी का रास्ता काव्य संग्रह के रचनाकार विजय गौड़ का। संग्रह फरवरी माह में देहरादून में लोकार्पित हुआ। गौड़ का यह पहला काव्य संग्रह 1988 से अब तक की रचना यात्रा का प्रतिबिंब है। समालोचक दिनेश जोशी उन्हें हायर एल्टीट्यूड का कवि इसीलिए कहते हैं क्योंकि उनकी कविताओं में पहाड़, झरने, नदी, बुग्याल, झील, दर्रे, ग्लेशियर, आदि के बिंब बहुतायत में मिलते हैं। कई बार इसीलिए कि वह यात्राएं बहुत करते हैं, और कई बार इसीलिए कि संवेदना की यात्रा के छोर उन्हें वहां तक ले जाते हैं। 'मेरे पूर्वज बधांण पट्टी के थे, शिव की बारात में भी गण रहे होंगे, यह मैंने पिता से नहीं इतिहास से जाना॥ मेरे पूर्वज की ये पंक्तियां व्यक्ति के चेतन होने की कहानी है। जब व्यक्ति एक पिता का बेटा या किसी विरासत को ढ़ोने का पुर्जा नहीं बल्कि मनुष्य की समूची यात्रा का एक जीवित पिंड होता है। 'बांज की जड़ों का पानी जिनके हाथों को ठीक करता रहा, नमक की इच्छा जिन्हें तिब्बत के पहाड़ों से बांधती रही, पेट की आग ने जिन्हें, खेतों को सीढ़ीदार बनाना सीखाया।
गौड़ की कविता मनुष्य की अंतरात्मा उसके दायित्वबोध और उसके अंह को ललकारने की चेष्टा करती है। वह मनुष्य में बेचैनी व छटपटाहट की मांग करते हैं। 'जीने का सबसे अच्छा ढंग वही जानते हैं जो समय को रोग की तरह झेल पाते हैं, पांव से सिर तक तन पाते हैं एक सख्त पेड़ की तरह॥समाज की विसंगतियां कवि की नसों में बारूद बनकर फूटती है। 'बंदूक की नाल को किसी भ्रष्ट अर्थशास्त्री के सिर पर तानो या रूपयों के बदले फैसला सुनाते किसी न्यायाधीश की पसली में घुसा दो चापड़॥
विजय गौड़ सड़ी गली व्यवस्था में विस्फोट चाहते हैं। लाउड कहे जाने के खतरों के बावजूद वे खतरों से खेलते हैं। 'बेशक सट्टे बाजार के इर्द-गिर्द घूमते हुए हम पूजींवाद का विरोध करते रहे पर जंगल से दूर रहकर जंगलराज पर कब तक मारते रहेंगे ठप्पे॥ इसी कसमसाहट को बंया करती एक कविता का अंश है।
'यह एक ही जगह पर खड़े होकर कदम ताल करने का वक्त है ही नहीं, ना ही वक्त है खुद को समाधिस्थ कर योग करते हुए चेहरे पर तेज बिखेरने का। इनकी कविताओं में पहाड़ बार-बार प्रकट होता है। जब वह पहाड़ से दूर जाते हैं तो पहाड़ और मुखरित होकर गूंजने लगता है। जैसे
'भूल जाए कोई,अपनी भूमि और जड़ इस बाजारू दुनिया में रख दे गिरवी अपनी भुजाएं, टांगे और धड़ ऐसे में ,रसूल हमजातोव का दागिस्तान कैसे होगा जिंदा॥ तनाव उनकी कविता का मूल तत्व है जो कि स्प्रिंग की तरह खिंचता और दबता रहता है। 'मैंने कितनी बार चाहा दुनिया की तमाम इच्छाएं अपने भीतर रोप सकूं, कितनी बार चाहा है मैंने दुनिया की तंग गलियों में बिजली के तारों सा खिंच जाऊं॥
भेड़ चरवाहे गौड़ के काव्य यात्रा की परिपक्वता का परिचय देती है। इसमें विचार भी है, विस्तार भी है, बेचैनी भी है और दिशा भी। प्रगतिशील सौंदर्यबोध के मानदंड़ों पर भी इसे बेहतर कविता माना जा सकता है। 'लकड़ी चिरान हो या भेड़ चुगान कहीं भी जा सकता है डोडा का अनवर। पेट की आग रोहणू के राजू को भी वैसे ही सताती है जैसे बगौरी के थालग्या दौरजे को॥ वह देवभूमि को मनुष्य भूमि के रूप में देखने का आग्रह करते हैं। उन कठोर ऊंचाइयों पर जीवन का स्पंदन देने के लिए चरवाहे मौजूद हैं। अगर देवता कहना है तो इन्हीं चरवाहों को कहें। 'ऊंचे पहाड़ों पर देवता नहीं चरवाहे रहते हैं भेड़ों में डूबी उनकी आत्माएं खतरनाक ढ़लानों पर घास चुगती है।
कविताई में डूबते उतराते गौड़ चोटियों के उपर ही नहीं बल्कि उनके भीतर से रिस रही बूंद-बंूद का अनुभव करते हैं। पिघलती चोटियों का रस उनके भीतर रक्त बनकर दौड़ता है। बुग्यालों के बाहर की आक्रांत दुनिया से आगाह कवि कहता है कि 'ये जानते हुए भी कि रूतबेदार जगहों पर बैठे रूतबेदार लोग उन्हें वहां से बेदखल करने पर आमादा हैं वे नए से नए रास्ते बनाते चले जाते हैं॥

काव्य संग्रह-सबसे ठीक नदी का रास्ता
मूल्य-50 रूपये
रचनाकार-विजय गौड़
प्रकाशक-धाद प्रकाशन


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