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Saturday, October 16, 2010

आध मुनस्यार की आवाज बनी मलिका

किसी के अंदर मानवता है तो यह बात बेमानी हो जाती हैं कि फलां व्यक्ति किस देश, जाति धर्म का है। सरला बहन ने ये बात साबित करके दिखाई। यहां से हजारों मील दूर यूरोपीय देश में जन्मी पर जब कुछ करने का निर्णय लिया तो कुमांऊ की पहाडिय़ों में आकर सेवा आश्रम स्थापित किया। यही बात लोहाघाट में मायावती आश्रम स्थापित करने वाले स्वामी विवेकानंद पर भी लागू होती है।सुदूर मुनस्यारी के गांवों में सशक्त लेकिन मूक शुरूआत करने वाली मलिका विर्दी की भावना भी कुछ ऐसी ही थी। दिल्ली के एक सिक्ख परिवार में जन्मी और वहीं पली बढ़ी शिक्षा देश के कई हिस्सों में हासिल की। सिक्ख दंगों व भोपाल गैस त्रादसी ने स्वयं में उलझी रहने वाली मलिका को झकझोर कर रख दिया। तब तक मलिका आदर्शवादी सोच रखती थी। कहीं ना कहीं संभ्रांत वर्ग का भाव था। लेकिन इस महत्वपूर्ण मोड़ ने उनकी जिंदगी को बदल कर रख दिया। सामाजिक भूमिका के कई प्रयोगों के बाद अन्तत: उन्होंने निर्णय लिया कि शुरूआत एक ठोस बिंदु से होनी चाहिए। और यह बिंदु बना सुदूर मुनस्यारी गांव। जिसे शायद ही कोई सरकारी मुलाजिम या कोई फंड खाऊ एनजीओ अपना केन्द्र बनाना चाहते। आज तक की हर योजना में मुनस्यारी हमेशा अंत में ही आता रहा है। यहां सरकारी मास्टर, एसडीएम, पटवारी सबसे अंत में आते हैं, जब कोई विकल्प नहीं बचता। चीन की सीमा से लगे होने के कारण यहां आईटीबीपी की बटालियनें जरूर हैं, लेकिन समाज से उसका वास्ता दूर-दूर तक नहीं है। मुनस्यारी के बारे में एक कहावत भी है आध मुनस्यार आध संसार। यहां के भोले-भाले लोग बाहरी दुनिया से अपरिचित होने के कारण यही मानकर चलते हैं कि आधे तो हम हैं बाकि आधी दुनिया है।दिल्ली में आवाजें बड़ी हैं काम छोटे, यही सोचकर मलिका ने देश का एक सबसे पिछड़ा इलाका अपने काम के लिए चुना। शायद यही सोच कर कि लोगों के जीवन में छोटे-छोटे परिवर्तन लाकर और परिवर्तन के मॉडल तैयार कर एक बड़े परिवर्तन का आधार तैयार हो सकता है। किसी भी सफलता का पहला चरण है अपने से शुरूआत। चुनौती बड़ी है लेकिन उसका समाधान ढूंढने के लिए किसी को तो पहल करनी ही होगी। मलिका ने मुनस्यारी आकर पहले लोगों को उनके हालातों व देश की समसामयिक चीजों के बारे में बताया। फिर उन्हें सपने दिखाए, कि उनकी भी तकदीर बदल सकती है, कि वे हमेशा उपेक्षित व अलग-थलग रहने के लिए नहीं बने हैं, कि उनको अपनी तकदीर बदलने के लिए खुद ही पहल करनी होगी। एक तरफ चेतना सम्पन्न होना है उसके लिए सामाजिक राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदार बनना है तो दूसरी तरफ सरकार का मुंह न ताककर अपनी आजीविका का जिम्मा खुद लेना है। मलिका ने लोगों को पारंपरिक रूप से उगाई जाने वाली राजमा की खेती को व्यवसायिक रूप में अपनाकर बाजार से जोडऩे का काम किया। परिणास्वरूप आज मुनस्यारी की राजमा देश दुनिया में अपना सिक्का जमा चुकी है। और यह काम लोग खुद करने लगे हैं। जिससे उनकी आजीविका में भी वृद्धि हुई है। मलिका कहती है कि लोगों के हाथ में बैसाखी देने की जरूरत नहीं है उन्हें उनके पैरों पर खड़ा होने के लिए कहना है। लोग किसी तरह खड़े हों इसी में प्रयोग व परियोजना की सफलता है। लोगों के स्नेह, विश्वास व अपनेपन के कारण मलिका ने पांच साल तक मुनस्यारी गांव की वन सरपंच होना स्वीकार किया। 1992 में मुनस्यारी पहुंची । मलिका 17 साल से पर्यावरणीय पंचायती राज व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण व महिला सशक्तीकरण को लेकर काम कर रही है। उनके काम में कोई बहुत बड़ी क्रांति तो नहीं हुई लेकिन शांत क्लंात मुनस्यारी में इतनी हलचल जरूर हुई है कि लोग अपनी पहचान व हक हकूक की बात सोचने लगे हैं। महिलाएं सामाजिक मुद्दों को लेकर आगे आई हैं। व लोग दिल्ली देहरादून में पाई जाने वाली सरकार से विकास का एक टुकड़ा मुनस्यारी के लिए भी मांगने लगे हैं। इसमें मलिका द्वारा विकेन्द्रीकृत सत्ता की चेतना का योगदान उल्लेखनीय है। आज वह माटी संगठन के माध्यम से क्षेत्र के 50 गांवों में काम कर रही है। नेवी ऑफिसर तेज सिंह विर्दी व मां जसराज कौर की बेटी मलिका की प्राईमरी शिक्षा उनके ननिहाल देहरादून में व बाद की दिल्ली में हुई। यूं तो सामाजिक सक्रियता में भागीदारी बचपन से ही शुरू हो गई थी लेकिन पर्वतारोहण के शौक ने जगह-जगह जाने की भूख जगाई। 1997 में पूरब से पश्चिम तक फैले पूरे हिमालय की चोटियों का अभियान लिया। इसमें बछेन्द्री पाल व अन्यों के साथ अरूणाचल के बामडिला से शुरू होकर नेपाल तक की साढ़े छ: महीने की यात्रा की। मलिका के जीवन पर 84 के दंगों का गहरा प्रभाव पड़ा। तब तक वह नारीवादी सोच तक सीमित थीं। कहती हैं दंगों ने मुझे समाज के पूरे ताने-बाने पर विचार करने के लिए मजबूर किया। इसी दौरान बस्तियों व रिलीफ कैंपों में काम करते हुए यह अहसास भी हुआ कि मध्यवर्ग के रूझान, रूचियां आम समाज के लिए काम करने में किस तरह से बाधक हैं। इसी दौरान निर्णय लिया कि यदि काम करना है तो सच्चे मन से मैदान में कूदना होगा। 1988 में दक्षिण भारतीय मूल के व्यक्ति से विवाह करने के बाद 1992 से मुनस्यारी को अपनी कर्मस्थली घोषित कर दिया। इस समपर्ण के फल आज मुनस्यारी के गांव में साफ तौर पर देखे जा सकते हैं।

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