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Monday, October 11, 2010

गुमनामी के अँधेरे मैं पहली गढवाली फिल्म का गायक

गुमनामी के अंधेरे में पहली गढ़वाली फिल्म का गायक


कुछ भूला सा कुछ धुंधला सा, ये मेरी खामोश जिंदगी राज भी है और राज नहीं ...बाबा फिल्म का यह टाइटिल सांग लिखने व गाने वाले सतेन्द्र पर ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं। सत्येन्द्र पंडरियाल ऐसा नाम है जिसे पहली गढ़वाली फिल्म जग्वाल का गीतकार व गायक होने का श्रेय जाता है। वह दूसरी गढ़वाली फिल्म घरजवैं के भी गायक रहे। लेकिन परिस्थिति की आंधी में वह ऐसे गुम हुए कि आज उन्हें कोई पहचानने वाला नहीं है। सतेन्द्र ने अपनी पूरी जिंदगी लोक कला को समझने व साधने में लगा दी। उनके जीवन की कठिन तपस्या में नये लोगों के लिए सीखने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन मंचों व जुगाड़बाजियों से दूर एक सच्चे कलाकार की योग्यता की सुध कौन लेता है। बुर्जुग सी काया औसत कद काठी के साथ लगभग अपनी आवाज को ही अपना परिचय बनाते हुए जब एक दिन शाम के समय मीलों पैदल यात्रा से सतेन्द्र जनपक्ष आजकल के कार्यालय पहुंचे तो हमारे लिए वह अमूमन लोगों की तरह ही सामान्य इंसान थे, पर जब धीरे-धीरे उनके जीवन की परतें खुली तब तक हम उनके कायल हो चुके थे। जिंदगी की कठोरता ने जरूर उन्हें फटेहाल बना दिया होगा पर अपनी कला को वे निरंतर संवारते रहे। मध्यकालीन सूफी गायकों के अंदाज में वह जीवन का सार कला के माध्यम से गाते हैं तो सुनते ही जाने का मन होता है। कला पर महारत का आत्मविश्वास उनके माथे पर हमेशा गालिब रहता है। एक चलते फिरते स्कूल के अंदाज में जब वह यह बता रहे होते हैं कि छपेली, न्योली, बारहमासा आदि की उत्पति कैसे हुई तो लोक कला में डूब जाने का मन होता है। कला में जीवन और जीवन में कला। लोक कला की अमुक धुन तेज क्यों है इस पर सतेन्द्र कहते हैं कि पहाड़ में पूरी अर्थव्यवस्था स्त्री द्वारा चलाई जाती है। इसीलिए सारे लोक गीत स्त्रियों की देन हैं उसमें उन्हीं की वेदना मिलेगी। सुबह की बासी रोटी(कलेव) खाकर जब स्त्रियां जंगल को जाती है तो पक्षियों, मौसम को अपना साथी मानकर अलग-अलग धारों में लकड़ी काटते हुए लंबी आवाज में अपनी संगिनियों को गानों से संदेश भी देती हैं। काम के बोझ को कम करने के लिए ही लंबी धुनों का निर्माण हुआ। चरवाहे जब दूर जानवरों को चरवाने के लिए ले जाते तो सवाल जवाब वाले गाने गाते हैं। ओ सुवा मुरुली बजूंल त्यर गौं की डांड्यों मां, ओ नौना मि घास काटूंल त्यर गौं कि बणौं मां। प्रेम के इजहार की यह पंक्तियां सुनाते हुए सतेन्द्र कहते हैं कि आज तो प्यार करने व इजहार के तरीके ही बदल गये हैं। रिश्ते टिकाऊ भी नहीं रहे। हिमालय की विभिन्न परतों को वे ओ दरी हिमाला दरी से व्यक्त करते हैं। प्रथम विश्व युद्ध के समय का एक गाना सुनाते हुए (सात समुंदर पार छ जाणू मां) वह भावनात्मक हो जाते हैं जब लड़ाई पर जाने वाला एक सैनिक अपनी मां से विदा होता है। कहते हैं संवेदनाएं सदैव जन्मदात्री पर ही जाती हैं।
सतेन्द्र जब अपने जीवन के फ्लैश बैक में रोशनी डालते गये तो हम चौंकते गये। शास्त्रीय संगीत के मर्म को लेकर चलने व उसे लोक जीवन के श्रम से जोड़ कर देखने वाले कलाकार के मधुर कंठ में जीवन का सारा राग है। वह बताते हैं कि लोक गीत वह है जो लोगों को श्रम करने में मदद करे चाहे खेत में गुड़ाई हो या जंगल से घास काटना। पीड़ा, हर्ष, विषाद, भय व रोमांच से भरपूर गीत ही मानव के अपने हो सकते हैं।
मूलत: पौड़ी के नैनीडंाडा में रहने वाले सतेन्द्र का जन्म दिल्ली में हुआ। पढ़ाई किदवई स्कूल दिल्ली से की। उसी दौरान उनके अंग्रेजी के अध्यापक अलखनाथ उप्रेती ने कला व पहाड़ी भाषा के प्रति रूझान बढ़ाया व पर्वतीय कला मंच के मोहन उप्रेती से मिलाया। मोहन उप्रेती से मिलना जिंदगी का एक महत्वपूर्ण मोड़ रहा। तब शुरू हुआ इनकी गायकी का सफर। नजीबाबाद रेडियो से कृषि दर्शन में कई बार इनके गानों की रिकार्डिंग हुई। जागर व हुड़के में महारत हासिल करने के बाद गुमान सिंह से ठेठ कुमांऊनी गाने सीखे। दिल्ली सरकार की नौकरी से बिना बताये मुंबई की मायानगरी में पहुंच गये। वहां कई फिल्मों में गाने गाये कुछ फिल्में रिलीज नहीं हो पाई। हम पंछी एक डाल के, झिलमिल सितारों का आंगन व दो राहें जैसे धारावाहिकों के लिए टाइटिल सांग गाये। दो राहें का टाइटिल सांग गा के सुनाते हैं जिंदगी एक दो राहा समझ ही ना पाये।
संगीत प्रेम में वो तय ही नहीं कर पाए कि किस राह पर चला जाए। सतेन्द्र, सोनू निगम, कविता कृष्णामूर्ति, उदित नारायण, विनोद राठौर व बाबुल सुप्रियो के साथ भी गा चुके हैं। वो बताते हैं कि हिंदी फिल्मों की अधिकांश धुनें मोहन उप्रेती के गानों व पुराने पहाड़ी गानों से ली गई हैं। आगे कहते हैं कि मैंने जो भी गाने गाये उनमें नये नये प्रयोग किये। कई बार गढ़वाली व कुमांऊनी को मिलाकर एक नयी भाषा बनायी ताकि दोनों के समझ में आ सके, नहीं तो भाषा का बड़ा अंतर हो जाता है। जिस मायानगरी के लिए मैंनेे नौकरी छोड़ दी वो कितनी निर्मम है वहीं जाकर पता लगा। किसी म्यूजिक डायरेक्टर को अगर आपने कोई अच्छी धुन सुना दी तो आप बाहर और आपकी धुन उनके किसी गाने में। आज तो धुनें चोरी होने लगी हैं। एक्टर तक गाने लग गए हैं। मेरा अनुभव कहता है कि अगर आपकी पृष्ठभूमि कमजोर है तो आप वहां कभी मत जाएं वरना दर दर की ठोकरें खानी पड़ेंगी। वहां की हर गाडी़ से ट्रेन से रोज 100 आदमी फिल्मों में गायक, अभिनेता बनने के लिए उतरते हैं। पहले का जैसा समय भी नहीं रहा कि चने खाकर फुटपाथ पर सो लेंगे अब तो सरकार आंतकवादी करार दे देगी। मार्मिक गानों से लेकर रूमानियत भरे गानों तक का सफर तय करने वाले सतेन्द्र आज बीमारी से जूझ रहे हैं। पास में ढेला तक नहीं। सवाल उठता है कि जो कलाकार स्वंय को कला में ही झोंके रहे। जिन्होंने जीवन यापन के लिए दूसरे जुगत नहीं किये या जिन्हें कला को साधने के लिए उसकी फुर्सत ही नही रही, क्या समाज व सरकार का दायित्व उनको संरक्षण देने का नहीं होना चाहिए। सरकार व कला प्रेमी की भूमिका ऐसे कलाकारों को प्रशिक्षक की भूमिका दिला सकते हैं ताकि पहाड़ी सीडीयों में मुंबईया स्टाइल व रिमिक्स की जगह पहाड़ की सुरीली धुन व माटी से जुड़े गाने आ सकें । दो रोटी का जुगाड़ हो जाए तो सतेन्द्र 52 वर्ष की उम्र में आज भी पहाड़ की लोक कला को नयी ऊंचाईयों तक ले जाने को आतुर हैं।

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