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Tuesday, October 12, 2010

एक स्कूल जहाँ घसियारिन भी हो सकती है टीचर


क्या आप ऐसे स्कूल की कल्पना कर सकते हैं जहां धसियारिन भी टीचर बन सकती है। जहां जीवनयापन के तमाम माध्यमों को सम्ता है। हल जोतने, घास काटने की विधियां विज्ञान मानी जाती हैं, और उस विज्ञान को बच्चों को सीखाने के लिए ऐसे ही लोगों को स्कूल में आमंत्रिक किया जाता है। जी हां ऐसा ही एख स्कूल है। यह किसी राजधानी या शहर में नहीं बल्कि टिहरी के सुदूर चमियाला गांव में है। इस स्कूल के बच्चों को पता है कि उनके गांव में कितनी सब्जियां, दालें, अनाज और जड़ी बूटियां पाई जाती हैं। स्कूल के बच्चे सर्वे करते हैं कि साल भर में गांव सरकार कितना लाभ कम रही है औ्र एवज में गांव को कितना देती है। उनके सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि सरकार साल भर में गांव को 4 लाख रुपये देती है तो बदले में गांव से लीसा, लकड़ी बिजली, रोड टैक्स बिजली टै्सऔर लोन कुल मिलाकर लगभग 40 लाख रूपये तक ले जाती है। स्कूल के बच्चे पास में चल रही मनेरी भाली परियोजना से विस्थापित होने वाले गांव व उनी पुर्नवास नीति के बारे में पूरी जानकारी रखते हैं। यह एख ऐसे स्कूल है जिसमें मम्मी को बोई कहने में कोई अपराध महसूस नहीं होता। बल्कि बच्चे को प्रोत्साहित किया जाता है कि वह अधिक से अधिक स्थानीय भाषा को तवज्जो दे। आप सोच सकते हैं कि स्कूल के संस्थापकों ने इसका उद्घाटन किसी मंत्री अधिकारी से न कराकर लोक कलाकार नरेन्द्र सिंह नेगी से कराय। निश्चित रूप से स्कूल की परिकल्पना है कि वास्तविक व उपयोगी शिक्षा वह है जो हमारे आसपास है जो हमें स्थानीय लोक जीवन व प्रकृति से अनुराग सीखाती है। स्कूल उस शिक्षा को नकारता है जिसे पढ़कर बच्चे अपने को ही हीनताबोध से देखने लगते हैं। स्कूल के संचालक त्रेपन सिंह चौहान कहते हैं पहाड़ के गांव में शिक्षा तीन तरह की चुनौतियों का सामना कर रही है। पहली यह कि सरकारी स्कूल दुरुस्त नहीं हैं। अभिभावक यहां से अपने बच्चे बाहर निकाल रहे हैं। दूसरी आरएसएस संचालित शिशु मंदिरों का जाल गांव-गांव फैल रहा है। जो कि क्रिश्चन मिशनरी की तर्ज पर ग्रामीण क्षेत्र में अपनी निश्चित संस्कृति को प्रचारित कर रही है। जो संस्कार आरएसएस गांव के बच्चों को दे रहा है वो पहाड़ के संस्कार नहीं हैं। बल्कि यह आरएसएस की घोशित राजनीति है जो घनसाली जैसे सुदूर क्षेत्र के लोगों को मुस्लिमों के प्रति घृणा सिखा रही है।
आरएसएस की इस राजनीति में स्थानीय लोगों के जल जंगल व जमीन के हक हकूकों की बात कहीं नहीं होती। बल्कि एक ऐसे अंधराष्ट्रवाद की वकालत होती है जो लोगों के हितों का नहीं बल्कि हिटलरशाही का समर्थन करता है। चौहान कहते हैं हम बच्चों को उनके गांव, मिट्टी, भाषा व जंगलों के प्रति संवेदनशील बनाते हैं। उनमें उनके प्रति प्रेम जागृत करते हां तथा उनके कल्याण के लिए उनको प्रेरित करते हैं। और यही सच्चा राष्ट्रवाद है।
तीसरा खतरा उन अधकचरे अंग्रेजी पब्लिक स्कूलों से बताते हैं जो बच्चों में स्थानीय चीजों के प्रति अलगाव पैदा करती है। जिसमें बच्चों में खंडित व्यक्त्तिव का निर्माण होता है। इनके स्कूलों की जड़ ही इस बात से शुरू होती है कि हमारे पास कुछ नहीं हैं हमें शहरों से सीखना है। इन तीनों खतरों से लोगों को आगाह करते हुए चौहान ने गांव के लोगों से एख ऐसा स्कूल बनाने का आह्वान किया है जहां अंग्रेजी पढ़ाई जाएगी लेकिन अंग्रेजियत नहीं। जहां संस्कार तो दिए जाएंगे लेकिन वो रुढिग़त, पुरातनपंथी संस्कार नहीं जो दूसरी कौन के प्रति नफरत सीखाए। जहां बच्चा बराक ओबामा की बात भई करेगा तो वहीं घनश्याम सैलानी की भी। जहां बच्चा देश के वित्तीय संकट को भई जानेगा तो वहीं उत्तराखंड में बढ़ते ाफिया को भी। लोगों ने खुशू-खुशी प्रस्ताव किया और स्कूल के लिए जमीन दान में दे दी। परिणआमस्वरूप स्कूल में एलकेजी से लेकर एक तक में 60 बच्चे व एक से पांचवी में 40 बच्चे पढ़ रहे हैं। शहरों में मामूली सी नौकरी के लिए भटकते शिक्षित युवाओं की योज्यता को इस स्कूल ने पहचाना और उन्हें आमंित्रत किया पढ़ाने के लिए। चैहान कहते हैं कि यदि सरकार कम फीस में ऐसी शिक्षा बच्चों को दे पाती तो यह देश का सौभआज्य होता।
चेतना आंदोलन के स्कूल को देखने आए भआरत के प्रथम पंक्ति के लोगों में गिने जाने वाले शिक्षाविद व कई पाठ्यक्रमनिर्माण समितियों में रह चुके अनिल सदगोपाल का मानना है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय व्यापक वर्ग की गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा से बचने का उपाय है। जरूरत पहले से मौजूद विश्वविद्यालयों की शिक्षा में गुणवत्ता लाने की है। न कि नए केन्दरीय विश्वविद्यालय बनाकर 250 से अधिक विश्वविद्यालयों को ठेंगा दिखाने की। प्रो. सदगोपाल इसे लार्ड मैकाले की शिक्षआ व्यवस्था को आगे बढ़ाने की नीति मानते हैं। जिसके अनुसार मेधावी छात्रों की क्रीम छानकर उन्हें पूंजीवादी व्यवस्था की जरूरतें पूरी करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। 12 लाख स्कूलों के देश में 6000 नए मॉडल स्कूल तेजी से उभरते मध्यवर्ग की आकांक्षआ को पूरा करने की कवायद है। क्योंकि यही स्कूल जब संसाधनों के लिए मुंह ताक रहे थे तो मॉडल स्कूल अलग से निर्मित क्यों? उन्होंने मडि डे मील योजना पे कुठाराघात करते हुए कहा कि इस योजना से ड्राप आउट्स (बीच में स्कूल छोड़ देने वाले बच्चे)की संख्या में कोई कमी नहीं आई है। 96-97 में नरसिंहाराव द्वारा यह योजना तमिलनाडू से शुरू की गई। आज पूरे देश भर में यह योजना धड़ल्ले से लागू हो रही है। पर इसके पीछे के तीनों तर्क धराशाई हैं। खाने के कारण न तो स्कूलों में छात्रों की संख्या में इजाफा हुआ है ना कुपोषण खत्म हुआ और सरकार का तीसरा तर्क जिसमें की कुछ दम लगता था (कि बच्चे साथ खाएंगे तो जाति पाति की संरचना ध्वस्त होगी) वह भई वैसे ही धराशई हो गया यह आप गांव की घोर सवर्ण मानसिकता देखकर जान सकते हैं। दूसरी तरफ एख ही कमरे में खाना बनाने औ्र राशन रखने जैसी तमाम दिक्कतों ने प्राथमिक स्कूल की अवधारणा( जिसमें बच्चों के आसपास पढ़ाई के उपकरण होंगे) को ही खत्म कर दिया है।

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