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Saturday, October 30, 2010

ब्लाग्स ने किया हिंदी का कायाकल्प

हिंदी दिवस आने पर हिंदी से आसक्ति रखने वाले कई लोग इसके भविष्य की चिंता करने लगते हैं, हालांकि यह चिंता एक उबाऊ तरीके से और एक बहुत अल्प समय तक रहती है फिर भी इस चिंता को कहीं न कहीं हिंदी के बारे में विचार करने का श्रेय भी जाता है कुछ कहते हैं हिन्दी का जीवन समाप्ती की ओर है तो कुछ देववाणी की संस्कृत भाषा के कभी न मर सकने की हामी भरते हैं। बहरहाल हिन्दी का कहीं व्यवहार में भला होता नजर आ रहा है तो वह है नयी तकनीकि जन्य इंटरनेट के हिन्दी ब्लाग्स । हिंदी ब्लाग्स के माध्यम से हिंदी भाषा व साहित्य की दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति हो रही है। आए दिन दर्जनों की संख्या में दर्जनों ब्लाग्स हिन्दी में बनते हैं जिन्हें हिन्दी का वह पाठक वर्ग पढ़ता है जिसने हिन्दी पत्रिका तो दूर उनके बारे में सुना तक नहीं होता। यानि हिन्दी का एक नया संस्करण और एक नया पाठक वर्ग। भला इससे अच्छी उपलब्धि हिन्दी के लिए और क्या हो सकती है। वैसे बाजार की अंधाधुंध जरुरतों तेजी से बढ़ती साक्षरता दर ने हिन्दी अखबारों के कई नये संस्करणों को जन्म दिया है। व ढ़ेरों पत्रिकाएं हिंदी में निकल रही हैं। इससे हिंदी के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगाने वालों का मुहं बंद होता है। यह भी एक तथ्य है कि आने वाले समय की हिन्दी विशुद्ध संस्कारों वाली हिंदी नहीं होगी, व्यापार , विज्ञान, व भूमण्लीकृत हो चुके समाज में उसका एक नया ही रूप देखने को मिलेगा इस हिंदी में अंग्रेजी , पंजाबी व विज्ञान के ढ़ेरों शब्द आम बोलचाल के शब्द हो जाएंगे। हिंदी की शुद्धता का आग्रह करना भी ठीक नहीं । इस हिंदी को अशुद्ध कहने के बजाय यह नजरिया रखना ज्यादा बेहतर होगा कि तमाम भाषाओं से शब्द लेकर हिंदी ने खुद को समृद्ध व प्रगतिशील बनाया है। पिछले दस पन्द्रह सालों में अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व के बाबजूद हिंदी के लिए कोई खतरा नहीं है,आज की जरुरतों के हिसाब से लोग अंतराष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी समझना जरुरी समझते हैं। लेकिन हिंदी को सरल व आधुनिक रुप में बनाये रखना भी उनके लिए अनिवार्य है। अगर बाजार इतना निर्भय होता और अपनी ही मर्जी से चीजों को चलाने में सक्षम होता तो आज बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापन हिंदी में नहीं आते और रुपर्ट मर्डोक को स्टार न्यूज को हिंदी में नहीं देना पड़ता । बाजार के दबाव दो प्रकार के होते हैं उपभोक्ता के अनुसार ही व्यापारी को बदलना होगा। इलाहाबाद बैंक के गुमान सिंह रावत जी से हिंदी पखवाड़ा मनाने पर हमने पूछा कि कितने सार्थक होते हैं ये हिंदी पखवाड़े जवाब के रुप में रावत जी बोले कि हम जन भाषा में जन सेवा चाहते हैं हमारे व्यवसाय की जरुरत है हिंदी। भाषा तो बहता नीर है भाषा को बांधा नहीं जा सकता। हिंदी के ग्राहक ज्यादा हैं तो हम चाहेंगे कि हम अधिकांशत हिंदी का प्रयोग करें। हिंदी में नये प्रयोग अगर भाषायी मर्यादा में हैं तो वह ठीक हैं। हमें जनप्रचलित शब्दों का इस्तेमाल ही करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर वो बताते हैं कि बिल को अगर हम विपत्र,व ड्राफ्ट को धनादेश कहेंगें तो लोग समझ नहीं पायेगें। हिंदी भाषा में कई भाषाओं के समावेश होने व इन नये प्रयोगों से हिंदी को खतरा तो नहीं है? इस सवाल के जवाब में हिंदी के प्रसिद्ध कहानीकार ड़ा लक्ष्मण सिंह बटरोही कहते हैं कि जब भी कोई नयी शैली आती है तो लोगों को संकट लगने लगता है। मुसलवान आये थे तो अरबी फारसी का संकट सताने लगा था।भाषा को भाषा वैज्ञानिक नहीं बनायेंगे भाषा को तो आम जनता ही बनायेगी और वो ही आज हो रहा है। लेखन व बोलचाल की भाषा हमेशा अलग होती है। हिंदी आज बाजार की भाषा के रुप में विकसित हो रही है पाणिनी ने भाषा को संस्कृत बनाया तो लोगों ने पाली व अपभ्रशं अपना ली ,इसीलिए भाषा कभी भी व्याकरण से संचालित नहीं हो सकती। इसीलिए नये प्रयोगों को अधकचरापन कहना गलत है। कहीं हिंदी खत्म तो नहीं हो रही है इस सवाल के जवाब में जाने माने साहित्यकार लीलाधर जगूड़ी कहते हैं कि हिंदी को लेकर कई लोग शोक मुद्रा में बैठे हुए हैं और ये वो लोग हैं जो हिंदी को को स्थानीय भाषा के लिए खतरा मानते हैं। स्थानीय भाषा में अगर दम होता है तो वह स्वत ही फल फूल जाती है। हर देश व भूगोल को एक कॉमन भाषा की जरुरत होती है। हिंदी को आज सामाजिक जीवन व बाजार फैला रहे हैं सरकार कुछ नहीं कर रही है इसके लिए। दुनिया के सारे देश अपनी अपनी भाषा में रोटियां खा रहे हैं पर एक भारत है जो अभी भी अंग्रेजी मानसिकता से नहीं उबर पाया है। उनको लगता है कि अंग्रेजी ही उनको रोटी दिला सकती है। हिंदी कभी मर नहीं सकती जितनी भी हिंदी की दुर्दशा हुयी है तो वह सरकारी सैट अप के कारण हुआ है।
उत्तराखण्ड के लोकप्रिय ब्लागर अशोक पाण्डे हल्द्वानी का ब्लाग कबाडख़ाना हिन्दुस्तान में शुरुआती ब्लाग्स में से एक है। बेहतर लोक व फिल्मी संगीत की जानकारी व दुर्लभ फोटो व पेंटिग्स से इस ब्लाग को काफी रीडरशिप मिली है। भाषा को रचनात्मक बनाने का यह एक बेहतरीन प्रयास है। नैनिताल के कवि प्राध्यापक शिरीष मौर्य का ब्लाग अनुनाद कविता व आलोचना को समर्पित है, जिसमें हिन्दी की चर्चित कविताओं व उन पर टिप्पणियों को प्रासंगिक रुप में लाया गया है। देहरादून के विजय गौड़ का ब्लाग लिखो यहां वहां को अपनी छोटी छोटी टिप्पणियों व यात्रा वृतातों के लिए देखा जाता है।देहरादून के शिव जोशी के ब्लाग हिलवाणी में उत्तराखंड के समुग्र समाचारों के साथ साहित्य का भी रोचक कलेक्सन मिल जाएगा।

3 comments:

तीसरी आंख said...

very nice

Sachin Malhotra said...

ब्लोग्स के जरिये हिंदी भाषा को एक नयी पहचान मिली है !
मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - अज्ञान

संजीव said...

हैप्‍पी ब्‍लॉगिंग