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Saturday, October 16, 2010

फिदाईन बनने को मजबूर शिक्षा आचार्य

अब टावर चढ़ा बेरोजगारी का बुखार

दरअसल शिक्षा आचार्य, शिक्षा अनुदेशक, शिक्षा बंधु, शिक्षा मित्र जैसे मनमाने प्रयोग कर सरकार ने शिक्षा के परंपरागत स्वरूप को तो क्षतिग्रस्त किया ही, अब खुद उसकी दी गई व्यवस्था उसके लिए भस्मासुरी साबित होने जा रही है। समीक्षा उन परियोजनाओं की भी होनी चाहिए जो विश्व बैंक के धन से शुरू तो हो जाती हैं, लेकिन किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाती।

प्रदेश की भाजपा सरकार जिस समय अपने चहेतों को लाल बत्तियां परोस रही थी, लगभग उसी समय एक बेरोजगार विधान सभा के सामने स्थित प्रसार भारती के टावर पर खुद पर पैट्रोल छिड़कने को मजबूर था। उसका यह टावर में पांचवा दिन था। चूंकि, गणतंत्र की सालगिरह भी आ रही थी इसलिए पुलिस के एक अधिकारी ने हिम्मत दिखाते हुए इस बेरोजगार को जबरन नीचे का उतारने का करतब किया, जिसमें वह झुलस भी गया। जैसे-तैसे दोनों को नीचे उतारकर अस्पताल ले जाया गया। लेकिन, मेहरबानी उत्तराखंड सरकार की कि पुलिस के अधिकारी को तो गैलेण्ट्री अवार्ड से नवाजा गया, लेकिन युवक पर भारतीय दंड संहिता की कठोर धाराएं ठोंक दी गईं। यही नहीं अंधे गणतंत्र की भव्यता पर खलल न पहुंचे इसके लिए विरोध कर रहे युवक के साथियों को जबरन उठाकर सींखचों के पीछे भेज दिया गया। ये वो युवक हैं, जिन्हें प्रदेश की पहली भाजपानीत सरकार ने पिछड़े पर्वतीय गांवों में कांट्रेक्ट टीचर के बतौर तैनात किया था, तथा सात साल बाद भाजपा के शासन में ही उन्हें नौकरी से हटा दिया गया। शिक्षा आचार्य व शिक्षा अनुदेशक कहे जाने वाले ये युवक पिछले 730 दिन से अपने लिए रोजगार की मांग विधान सभा के समक्ष बैठकर कर रहे थे। इन युवकों को यहीं कहना है जब उन्होंने अपनी जवानी के सबसे ऊर्जावान वर्ष पिछड़े स्कूलों में मामूली तनख्वाह में गुजार दिए तो अब अधेड़ उम्र में वे किस सरकार को अपना दुखड़ा सुनाएं। बताना जरूरी होगा पुलिस की नौकरी में बतौर एसआई भर्ती हुआ, टावर में जांबाजी दिखाने पहुंचा परमेन्द्र डोबाल भी कभी इन आचार्यों की तरह उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए निकलने वाली रैलियों में उत्तराखंड जिंदाबाद के नारे लगाता था। पर आज राज्य सरकार को पुलिस प्यारी है, लेकिन बेराजगारों को रोजगार देना अंतिम वरीयता है। यही सबक है नौ साला उत्तराखंड राज्य का, जो बेरोजगारों के खूंन से सींचकर बड़ी हसरतों से लिया गया था। इन नौ सालों में सरकार बेरोजगारों को आत्महंता बनने के लिए ही उकसाया है। किसी आदमी की जिंदगी के सबसे ऊर्जावान वर्ष एक टेंट में धरना प्रदर्शन करते हुए बीत जाएं इससे बड़ी कुनीति क्या हो सकती है। इससे पूर्व भी एक शिक्षा आचार्य सरकार की असंवेदनशीलता के कारण अपने सर्टिफिकेट सहित नदी में कूदकर जान दे चुका है। दूर दराज क्षेत्रों से राजधानी में अपनी पीड़ा कहने आए इन शिक्षा आचार्यों का कहना है कि आंदोलन के अलावा अब उनके पास कोई चारा नहीं है। दो साल से अपना घर बार छोड़कर हम यहां धरने में लगे हैं। यहां तक कि हमारा एक साथी अपने पिता की अर्थी को कंधा तक देने तक को नहीं जा पाया। दरअसल शिक्षा आचार्य, शिक्षा अनुदेशक, शिक्षा बंधु, शिक्षा मित्र जैसे मनमाने प्रयोग कर सरकार ने शिक्षा के परंपरागत स्वरूप को तो क्षतिग्रस्त किया ही, अब खुद उसकी दी गई व्यवस्था उसके लिए भस्मासुरी साबित होने जा रही है। सरकार को सोचना चाहिए वह जिस भी योग्यता के युवकों-युवतियों को कामचलाऊ रोजगार दे रही है, कल वह उन्हें घर बैठ जाने के लिए कैसे कह सकती है। समीक्षा उन परियोजनाओं की भी होनी चाहिए जो विश्व बैंक के धन से शुरू तो हो जाती हैं, लेकिन किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाती। जिन स्कूलविहीन क्षेत्रों में शिक्षा आचार्यों व अनुदेशकों को तैनात किया गया था, उन्हें हटाने से वहां फिर वीरानी है। यह गरीब बच्चों के साथ खिलवाड़ है।ज्ञात हो कि केन्द्र सरकार ने बल्र्ड बैंक पोषित सर्व शिक्षा अभियान के तहत 2001 में दुरूह क्षेत्रों में आचार्य तैनात करने की व्यवस्था दी। एक आचार्य के स्कूल में न्यूनतम 20 बच्चे होने चाहिए थे। इससे अधिक बच्चे होने पर वहां जूनियर हाईस्कूल खोलकर उसमें दो शिक्षा अनुदेशक रखे जाने का प्रावधान रखा गया। इस तरह से 2001 में पूरे उत्तराखंड में 2595 शिक्षा आचार्य व अनुदेशक रखे गए। शर्त यह थी कि अगर बच्चों की संख्या बढ़ती है तो उस स्कूल को अपग्रेड करके उस आचार्य को शिक्षा मित्र के रूप में वहीं तैनात कर दिया जाएगा। इनको केन्द्र द्वारा 1000 रुपये का मानदेय दिया जाएगा। अक्टूबर 2006 से राज्य सरकार ने इनके काम को देखते हुए 1500 रूपये इन्हें राज्य के कोटे से देने शुरू किए। हर साल शिक्षा मित्रों की तरह इनका भी डाइट में प्रशिक्षण होता था। टिहरी विस्थापन के समय कुछ स्कूल डूब क्षेत्र में आ गए थे व कुछ अपग्रेड हो गए थे, इसलिए 2007 में 127 शिक्षा आचार्य व अनुदेशकों को शिक्षा मित्र के रूप में नियुक्ति दे दी गई। इसके अलावा 2006 में 400 शिक्षा आचार्यों को स्कूल अपग्रेड होने के कारण शिक्षा मित्र में समायोजित कर दिया गया। अब बचे हुए 1745 शिक्षा आचार्य भी धीरे-धीरे अपनी 7 सालों की सेवा के बाद अपने-अपने स्कूलों के भी अपग्रेड होने की आस लगाए हुए थे। बच्चों की संख्या भी स्कूलों में लगातार बढ़ रही थी। और अपने-अपने इलाकों में ही स्कूल होने के कारण भी यह बड़ी लगन से बच्चों को पढ़ा रहे थे पर सरकार ने अचानक 7 जनवरी 2008 को यह फरमान सुनाया कि सारे प्राईमरी व जूनियर स्कूलों को बंद कर दिया जाय व उनके बच्चों को समीप के प्राईमरी स्कूलों में समायोजित करने के लिए कहा दिया।तभी से आचार्य आंदोलनरत हैं कि उन्हें शिक्षा मित्र बनाकर समायोजित किया जाय। उत्तराखंड के कोने-कोने से आकर ये लोग कैसे इन दो सालों में अपना खर्चा चला रहे है,ं कैसे मूसलाधार बारिश व ठंड का सामना टैंट में ठिठुरकर किया इसका सुधलेवा कोई नहीं है। कभी इन्हें आचार संहिता ने रूलाया तो कभी नेताओं के अंदरूनी झगड़ों ने। पिछले साल केबिनेट मंत्री प्रकाश पंत की अध्यक्षता में बनी समिति ने कहा कि स्नातक डिग्रीधारी आचार्यों को शिक्षा मित्र में समायोजित किया जाना चाहिए। जो आचार्य स्नातक नहीं हुए हैं उन्हें तीन साल का समय दिए जाने की बात भी कही गई।लंबे समय तक निर्णय नहीं निकला तो आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई।उससे पता चला कि कोई रिपोर्ट बनी ही नहीं है। यानि कि मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। बार-बार शिक्षा मंत्री व सरकार द्वारा इन्हें आश्वासन मिलते रहे कि हां कुछ कर रहे हैं। पिछले विधान सभा सत्र में इन सब दावों व आश्वासनों की पोल खुली जब शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह बिष्ट से पूछा गया कि आप इन आचार्यों का क्या कर रहे हैं ? जवाब मिला कि हम इन्हें कहीं समायोजित नहीं कर सकते। मंत्री के इस बयान से निराश शिक्षा आचार्यों ने ठान लिया कि अब कोई गांधीवादी तरीका नहीं चलेगा। वह करो या मरो की स्थिति में आ गए। संगठन के अध्यक्ष पूर्ण सिंह राणा कहते हैं कि उत्तराखंड राज्य की लड़ाई में हमने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था, लेकिन 9 साल बाद पता चला कि यह राज्य तो हमारा है ही नहीं। रोजगार तो यहां उन 70 लोगों व उनके चमचों को ही मिला है जो जनता के प्रतिनिधि होने का ढोंग करते हैं। युवाओं ने तो सिर्फ धोखा खाया है। अगर जनप्रतिनिधियों की मंशा होती तो जिस तरह से अपनी विधायक निधि के पैसे को बढ़ाने को लेकर एकजुट हो रहे हैं तो क्या सरकार पर दबाव बनाकर यह काम नहीं कर सकते थे। सरकार अपने चहेतों को लाल बत्तियां बांट सकती है, उनके वेतन भत्ते बढ़ा सकती है लेकिन हमें रोजगार नहीं दे सकते। घटनाक्रम 17 जनवरी की रात पूर्ण सिंह राणा धरना स्थल के निकट प्रसार भारती के 60 मीटर ऊंचे टावर पर चढ़ गए।18 जनवरी को प्रशासन को सूचना मिली तो एसडीएम उन्हें मनाने पहुंचे।19 जनवरी को जिला शिक्षा अधिकारी मनाने पहुंचे। 20 को एसपी सिटी व सिटी मजिस्ट्रेट व शिक्षा विभाग के अधिकारी उन्हें मनाने पहुंचे। इस बीच उनके अन्य साथी विधानसभा पर लगातर प्रदर्शन करते रहे। 21 जनवरी को भी सिटी मजिस्ट्रेट मनाने पहुंचे तो पर्चा फेंककर दी आत्मदाह की धमकी। 22 जनवरी को राणा की पत्नी व पिता को पुलिस उत्तरकाशी से देहरादून ले आई। देर रात सीओ अपवी टीम सहित राणा को टावर से उतारने के लिए गए। टावर पर सीओ को चढ़कता देख राणा ने खुद पर पैट्रोल छिड़ककर आग लगा ली। राणा को बचाने में सीओ प्रमेंन्द्र डोबाल भी झुलस गए। राणा को नीचे उतार कर अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसके बाद पुलिस ने राणा के ऊपर आत्मदाह के प्रयास, जानलेवा हमले का प्रयास व लोक सेवक को गंभीर क्षति पहुंचाने के मामले में धाराएं लगा दी। और शासन द्वारा परमेन्द्र डोबाल को गैलेन्ट्री अवार्ड व दो लाख व राणा को नीचे उतारने के एवज में पूरी टीम को तीन लाख रूपये के पुरस्कार की घोषणा की गई।और अब गणतंज्ञ दिवस पर कुछ गड़बड़ न कर दें इसी आशंका के चलते सारे आचार्य अनुदेशकों को जेल में डाल दिया गया है। आचार्यों ने जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया है।

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