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Wednesday, October 27, 2010

लोक ह्रदय को स्वर देती बसंती बिष्ट



जागर गाकर पुरुषों के एकाधिकार को किया समाप्त

रीच संस्था द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला विरासत सांस्कृतिक महोत्सव, दून घाटी की पहचान बन चुका है। लगातार सोलहवें वर्ष आयोजित हो रहे विरासत के पखवाड़े भर के कार्यक्रम का शुभारंभ इस बार जागर साम्राज्ञी बसंती बिष्ट के हाथों हुआ। जिस कार्यक्रम में बिरजू महाराज जैसे मूर्धन्य कलाकार शिरकत कर रहे हों, उसमें बसंती बिष्ट को सर्वोपरि रखना महज एक संयोग नहीं है। लोक गीत मुक्त हृदय की अभिव्यक्ति हैं। इसकी महत्वपूर्ण विधा जागर दैवीय शक्तियों के जागरण का विधान है। न्योली, चांचरी, भगनौल, छपेली, प्रेमगीतों के साथ ही जागर विधा को नईऊंचाईयों तक ले जाने का काम चमोली के ल्वाणी गांव की बसंती बिष्ट ने किया है। गढ़-कुमाऊं की इस जीवंत संस्कृति को विकसित करने में बसंती ने पूरा जीवन समर्पित कर दिया। महिला होते हुए भी पुरुषों के क्षेत्र की कला में उन्होंने वह महारत हासिल की जिसके फनकार अब कम ही रह गए हैं। कुमांऊ व गढ़वाल के हृदयस्थल चमोली में रूपपकुंड के समीप ही जन्मी बसंती को जन्म से ही संगीत का माहौल मिला। कहती हैं, मां सुलाते समय लोरी के रूप में जो धुनें गाती, वो मेरे खून में घुलते गए। मां की ऋणी हूं इस संगीत के लिए। मां पिताजी के रिश्ते बहुत अच्छे थे। मां कोई गाना गाती तो पिताजी उसे और बेहतर करते। उसकी धुन बनाते, और साथ में गाते भी। मैं केवल पांचवी ही पढ़ी हूं। पर लगता है कि ऐसा कुछ नहीं जो नहीं पढ़ा, क्योंकि उस समय पढ़ाई का ढांचा कहीं बेहतर था। बाद में फौजी से शादी हुई। शादी के बाद चंडीगढ़ संगीत विश्वविद्यालय से शास्त्रीय संगीत सीखा। बेतकल्लुप हो कहती हैं, विशारद तो नहीं कर पाई। परिवार की देखभाल में वक्त कहां बचता अपने लिए। बाद में गांव आई तो प्रधानी का जिम्मा मिला। हर पांच साल में होने वाले नंदा राजजात की यात्राओं में रही जो कि चमोली के नौटी गांव से शुरू होकर हिमालय की जड़ बधाण तक 18 पड़ावों से होकर गुजरती है। बसंती जितनी सहजता से बताती हैं, उनकी कला साधना का सफर इतना आसान नहीं था। जागर गाने पर उनके लिए कई फब्तियां कसी गई। कई व्यंग्य हुए। कहती हैं कि समाज की प्रताडऩा से कई बार छोड़ देने का मन किया, पर फिर लगा कि मैं दो पीढिय़ों के साथ अन्याय कर रही हूं। हमारे पूर्वजों ने जिस गरीबी में कंदराओं, जंगलों व पशु पक्षियों के संरक्षण में इन गीतों-धुनों को जिंदा रखा-पाला- पोषित किया, उन धुनों को अगली पीढ़ी तक पहुचांने का ऋण है मेरे ऊपर है। इसीलिए मैंने सारी वर्जनाओं को तोड़ा। यही बात मुझे जीने को बल व गाने को साहस देते हंै। खेतों, जंगलों, गाड़, गदेरों व घरों के अंदर गाने वाली बसंती जब पहली बार 2002 में सार्वजनिक रूप से मंच पर आई तो निश्चय ही कला की दुनिया में एक नया आकर्षण बनीं। उसने कला के बड़े-बड़े मर्मज्ञों को दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर दिया। आजीविका का दबाव न होने के कारण वह कला को बाजारू रूप देने के दबाव से मुक्त रख सकी। उन्हें इस काम में परिवार व पति का जरूर समर्थन हासिल रहा। स्वयं उनके पति रणजीत सिंह अनेक गानों को हुड़के की थाप से संगत देते रहे। जागर के संबंध में वह कहती हैं कि जागर शरणागत होकर गाई जाती है। ये नहीं देखा जाता कि कितने लोग देखने वाले हैं। मैंने कभी पैसा नहीं देखा। दर्शक मेरे लिए हमेशा देवता के समान रहे। जिस भी सभा में गाऊं मुझे लगता है मैं देवसभा में गा रही हूं। गाते समय आंखों के सामने जन्म के समय की भौगोलिक स्थितियां आ जाती हैं। जागर आत्मा को पोषित करता है। शीतल करता है। एक महासागर है जिसके हर आयाम को पकड़ पाना मुश्किल है। मेरी मां बिरमा देवी 80 साल की हो चुकी हैं। गांव में रहती हैं अकेले। जब भी मां के पास जाने का मौका लगता है कुछ नया सीख के आती हूं उससे। इस बार जब गई थी तो पण्डवानी सिखाई मां ने। मैं जब जागर गाती हूं तो हमेशा परंपरागत वेश-भूषा में ही गाती हूं। गीत गाने आसान होते हैं पर जागर में बहुत मेहनत लगती है। गांव में तो जागर गाने से पहले अभी भी एक सेर घी पिलाया जाता है। अभी तक बरेली, रामनगर, जोशीमठ, पौड़ी व चमोली सहित दर्जनों नगरों व मेलों में जागर का जादू बिखेर चुकी बसंती अब रूपकुंड सांस्कृतिक धरोहर संस्था बनाकर अपने जैसी कलाकार महिलाओं को उससे जोडऩे के काम में लगी हैं। ताकि पुरखों की संस्कृति उनकी आंखों के सामने ही गायब न हो जाए। साथ ही वह वेदी, कर्मकांड, यज्ञोपवीत, धूनी रमाने जैसे महिला वर्जित कार्यो को भी चुनौती देने का काम कर रही है। बसंती बिष्ट जैसे उदाहरण आज कम ही मिलते हैं। लेकिन, कला की गहराई, उसको प्रचारित करने की गंभीरता व समर्पण के कारण इन दुर्लभ कलाओं के बारे में आश्वस्त रहा जा सकता है। निश्चय ही इन प्रयासों से उननए कलाकारों को प्रोत्साहन मिलेगा जो अपनी संस्कृति से अनुराग रखते हैं। अपनी कला को लोहा मनवा चुकी बसंती की कला की याद अब गढ़वाल विवि को भी आई है। उनकी कला को विवि संग्रहीत कर रहा है। यदि राज्य सरकार चाहे तो बसंती को वही सम्मान मिल सकता है जो मध्य प्रदेश सरकार ने तीजन बाई को दिया। बसंती बिष्ट को जितनी महारत गढ़वाल की संस्कृति में हासिल है, उतनी ही कुमाऊं की संस्कृति में भी। वह दोनों क्षेत्रों के बीच पुल का काम करती हैं। यह संयोग उत्तराखंड की समन्वित संस्कृति को पोसने में निश्चत रूप से सहायक होगा। ठीक उसी प्रकार जैसे एफआरआई, आईएमए, भारतीय वन्यजीव संस्थान व ओएनजीसी, दून के परिचय से अलग नहीं किए जा सकते।

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