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Wednesday, October 27, 2010

बीमार अस्पताल बेहाल मरीज

खास् के लिया तमाम सुविधा आम के लिए सिर्फ दुविधा

डाक्टरी पेशा व्यापार बन चुका है यहां भी अब 'पैसा दो और इलाज कराओ की स्थिति आ गई है। यह बात हर किसी की जुबान से सरेआम सुनी जा सकती है। लेकिन व्यापार के भी कुछ कायदे कानून होते हैं, गुणवत्ता का पैमाना होता है, उपभोग की वस्तुओं के निश्चित दाम होते हैं लेकिन चिकित्सा जगत में सब कुछ अनिश्चितताओं से भरा है। मरीज जो कि सिर्फ एक ग्राहक बन गए हैं, उनको किसी एक उपचार के लिए 3000 फीस देनी होगी या 30 हजार इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। डॉक्टर कोई भी कीमत मांग सकता है। भगवान का दूसरा रूप कहा जाने वाला डॉक्टर अब कसाई बन चुका है। चिकित्सा का व्यापार इतना रहस्यमय, अनिश्चित व खतरों भरा है कि इसके शर्मनाक ढंग से ठगे जाने के बावजूद भी उपभोक्ता शिकायत करने तक कि हिम्मत नहीं कर पाता। चिकित्सा के खुले बाजार में आम आदमी असहाय लाचार व बेबस हो चुका है। आज चिकित्सा क्षेत्र पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण से मुक्त होकर बाजार की तरफ बढ़ रहा है। व्यवस्था के रूप में सरकार और जिम्मेदारी के रूप में डाक्टर अपनी जिम्मेदारियों से हाथ पीछे खींच रहे हैं। पिछले कुछ सालों में सार्वजनिक चिकित्सा क्षेत्र का तेजी से पतन हुआ है। जिसे कुंद करने में चिकित्सकों का ही हाथ है। सच्चाई ये है कि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सक सिर्फ अपनी मार्केटिंग करने आते हैं। बल्कि असली प्रैक्टिस वे अपने निजी क्लीनिकों या फिर किसी प्राईवेट अस्पताल में कर रहे हैं। आदमी की जिंदगी से जुड़े इस पेशे को लोभ और संवेदनहीनता ने बुरी तरह जकड़ लिया है। 'तंदुरूस्ती हजार नियामतÓ यही आम आदमी की मजबूरी है, जिसे डॅाक्टर भुना कर खा रहे हैं कोर्ई आदमी नहीं चाहता कि वह अपने परिजन की जान की कीमत पर पैसे को तवज्जो दे। यहां तक कि लोग लोन लेते हैं, कर्ज उठाते हैं, जेवर बेच देते हैं, इनकी वर्षों की कमाई खातों से रीत जाती है, लेकिन एक डॉक्टर के लिए यह नितांत पेशेवर मामला है। पूरे प्रदेश के जिला, बेस व महिला अस्पतालों का अगर जायजा लें तो यही बात समझ में आ रही है कि यह अस्पताल मरीजों के लिए नर्क बन चुके हैं। पेश है एक रपट राज्य के सबसे बड़े अस्पताल देहरादून की। यहां बात प्रदेश के सुदूर क्षेत्रों में स्थित प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों की नहीं है, जहां डॉक्टर, दवाई, भवन, आधारभूत ढांचा या किसी न किसी चीज का अभाव है ही। बल्कि राजधानी देहरादून की है जहां 70 विधायकों वाली विधानसभा है, जहां मुख्यमंत्री, राज्यपाल व पुलिस के आला अधिकारी बैठते हैं। जहां स्वास्थ्य निदेशालय है। जहां स्वास्थ्य के नाम पर बड़ी बड़ी घोषणाएं होती हैं। जहां जनकल्याणकारी नीतियों के आदमकद होर्डिंग लगे हैं। जहां स्वास्थ्य मंत्री हर दूसरे दिन प्रेस वार्ताएं करते हैं, जहां डाक्टरों का सबसे बड़ा कुनबा है। जहां स्वास्थ्य पर काम करने वाली सैकड़ों स्वयंसेवी संस्थाएं खा-कमा रही हैं और जहां सबसे अधिक मेडीकल कॉलेज हैं।

बीपीएल कार्ड धारक मरीजों के लिए भी राहत

बीपीएल मरीजों के प्रति डॉक्टरों व नर्सों में घनघोर उपेक्षा का भाव है। जब कोई मरीज बताता है कि वह बीपीएल कैटेगरी का है तो डाक्टर मुंह बिचका देते हैं। कई बीपीएल कार्डधारी मरीज तो अपनी पहचान तक छुपा रहे हैं। इसके एवज में उन्हें सरकार द्वारा दी जाने वाली मुफ्त सुविधाएं त्यागनी पड़ती है। किसी तरह मरीज ठीक हो जाए तथा डॉक्टर उनकी उपेक्षा ना करें इसीलिए वे सामान्य मरीज के रूप में भर्ती हो रहे हैं। बात वही है कि गरीब व्यक्ति भी अपने सही ईलाज का आश्वासन चाहता है। सरकारी योजनाओं पर उसका भरोसा नहीं है। जिन बीपीएल मरीजों का उपचार चल रहा है उन्हें नहीं पता कि उनको देखने डॉक्टर साहब फिर कब आएंगे। ये मरीज एक अंधविश्वास या मजबूरी के शिकार हैं और इनके पास सरकारी अस्पताल के अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं है। भर्ती होने के बाद लंबा समय अस्पताल में गुजार लेने के बाद भी न तो उन्हें उनकी बिमारी बतायी जाती है और ना ही ऑपरेशन की कोई डेट दी जाती है और यह भी निश्चित नहीं होता कि दवाईयां सरकार से मिलेंगी या खरीदनी होंगी। सरकार अपनी योजनाओं में बीपीएल मरीजों के लिए मुफ्त चिकित्सा सुविधा की बात कितनी ही करते रहें पर व्यवहार में अपनी जान बचाने के लिए इन मरीजों को रत्ती-रत्ती निचोड़ कर रकम अदा करनी पड़ रही है। न तो इन्हें अस्पताल से दवाईयां मिल रही हैं और न ही ऑपरेशन संबंधी उपकरण। डॉक्टर मरीजों व सरकार को खुले आम अंगूठा दिखा रहे हैं। दून में वीआईपी को छोड़कर जो भी मरीज आते हैं वह उस तबके से होते हैं जो प्राइवेट क्लीनिकों में इलाज कराने में अक्षम होते हैं। वो बात अलग है कि उनमें से कईयों के पास बीपीएल कार्ड नहीं होता। यह तो इस व्यवस्था की खासियत ही है कि जरूरतमंदों का हिस्सा और लोग डकार जाते हैं।

दवा कंपनियों व पैथोलॉजी से है डाक्टरों की गहरी सांठगांठ

शहर के बड़े बड़े मेडिकल स्टोर व पैथोलाजी सेंटर आज डॉक्टरों की ऊपरी कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन गए है। अलग-अलग बहानों से डॉक्टर मरीज को पैथोलॉजी व मेडिकल स्टोरों तक भेजते हैं, जिसके एवज में मेडिकल स्टोर या वह पैथोलॉजी क्लीनिक पूरी ईमानदारी से पूरे दिन भर का कमीशन शाम को उस डाक्टर के घर पहुंचा जाते हैं। यानी की बेईमानी का यह पूरा खेल बड़ी ही ईमानदारी से खेला जाता है। मरीज की नजर में अच्छा बनने के लिए डॉक्टर के पास बीसियों बहाने होते हैं। खुद डॉक्टर सरकारी अस्पतालों की लापरवाहियों की दलील देते हुए उन्हें प्राईवेट में जाने के लिए सलाह देते दिखाई देते हैं फिर सेकेंडरी ओपिनियन लेने के बहाने उन्हें प्राईवेट पैथोलॉजी में भेजते हंै। जिस अस्पताल में तीन-तीन रेडियोलॉजिस्ट हों, 3-3 पैथोलॉजिस्ट हों, वहां सेकेंडरी ओपिनियन के लिए मरीजों को प्राईवेट में भेजना कितना सही है, इस कमीशन के लालच से अगर डॉक्टर दूर हो जाएं तो वह सेकेंडरी क्या अपने ही अस्पताल के तीन तीन पैथोलाजी रेडियोलाजी एक्सपर्टस् से एक्सरे, अल्ट्रासाउंड या फिर किसी भी टेस्ट की जांच कराकर उसकी बिमारी को पुख्ता कर सकते हैं। पहले तो डॉक्टर मरीजों के लिए अनावश्यक टेस्ट लिखते हैं। जो टेस्ट दून अस्पताल में मौजूद हैं उन्हें भी बाहर से कराने के लिए भेज दिया जाता है। एमरजेंसी में आने वाले अधिकांश मरीजों को बाहर ही टेस्ट के लिए भेजा जाता है। डाक्टरों को केवल जेनेरिक दवाईयां ही लिखने का प्रावधान होता है पर खुले आम मरीजों की पर्चियों में एथिकल दवाईयां लिखी देखी जा सकती हैं, या फिर किसी कंपनी विशेष की दवा सुझाने पर डॉक्टरों को अब आकर्षक गिफ्ट मिल रहे हैं। दून में एमआरआई मशीन का अभी संचालन न होने से डॉक्टर एमआरआई टेस्ट को रेफर करके मोटा कमीशन कमाते हैं।

नॉन प्रैक्टिस का पैसा लेते हैं और प्रैक्टिस भी करते हैं

।डॉक्टर सरकारी अस्पतालों में पूरे मनोयोग से मरीजों का इलाज करें इसके लिए उन्हें खाली समय में नॉन प्रैक्टिस के लिए अतिरिक्त भत्ता देने का प्रावधान किया गया लेकिन अधिकांश डॉक्टर चित भी मेरी पट भी मेरी का नियम बनाए हुए हैं। प्रत्येक चिकित्सक को वरिष्ठता के आधार पर 2400 से 5400 तक नॉन प्रैक्टिस अलाउंस मिलता है डॉक्टर इसे तो ले ही लेते हैं साथ में घर में सरकारी आवास में क्लीनिकों व निजी चिकित्सालयों में भी अपनी सेवाएं बेचते हैं। जहां से उन्हें प्रतिमाह हजारों की आमदनी होती है। निजी प्रैक्टिस का नुकसान यह होता है कि कि ये अन्तत: सरकारी अस्पताल के सामान्य मरीजों की अनदेखी करते हैं तथा उपचार में लापरवाही बरतते हैं। चिकित्सकों को 30 हजार से लेकर डेढ़ लाख तक का सैलरी पैकेज मिलता है। इसके अलावा आवासीय सुविधा, यात्रा, स्वंय की चिकित्सा, दवाओं आदि का पूरा लाभ सरकार देती है। बावजूद इसके आधे से ज्यादा चिकित्सक निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं। उन्हें अगर दून अस्पताल में ढूंढे तो वह वहां तो नहीं पर सीएमआई, महंत इन्द्रेश से लेकर शहर के नामी प्राईवेट संस्थानों में पाए जाएंगे। कुछ चिकित्सक 2 लाख से अधिक प्रतिमाह आमद कर रहे हैं। एक बार हाथ में आया पैसा उन्हें और पैसा कमाने को लालायित करता है। इस होड़ में डॉक्टर इस पेशे की मूल आत्मा से भटककर सिर्फ पैसों तक सिमट गए हैं। अब डॉक्टरी की डिग्री लेने वाले डॉक्टर पैसे कमाने के मकसद से ही डॉक्टरी कर रहे हैं। आज से दस साल पहले जब कोई युवा डॉक्टर बनने की चाह से प्रशिक्षण लेता था तो उसके अंदर ढेरों आदर्श होते थे। वह सोचता था कि यह पेशा मानव जाति की सेवा का सबसे अच्छा तरीका है। आज इसीलिए इस पेशे में कोई आता है क्योंकि आम आदमी के लिए अज्ञानता से भरे इस पेशे में खूब मोटी कमाई है। आज वह धीरे धीरे पैसों की अंधी दौड़ में शामिल होता जा रहा है। अधिक से अधिक कमाना ही उसकी फितरत हो गयी है। मरीज के चेहरे मोहरे को देखकर उसकी भाषा बनती है। अधिक कमाने की होड़ में वह व्यक्तिवादी व संवेदनहीन होता जा रहा है। अपने थोड़े से लाभ के लिए दवा कंपनियों को प्रोत्साहन देता है जो उसे खूबसूरत गिफ्ट देते हैं ।आज के अधिकांश डाक्टरों की आंखों पर ऐसी पट्टी बंध चुकी है कि वह एक रोबोट की तरह मशीनीकृत हो चुके हैं। नगरों में अधिकांश ऐसे डाक्टर हैं जो प्राइवेट क्लीनिक में गर्भ की जांच से लेकर भ्रूण हत्या तक के मामलों में सक्रिय रूप से लिप्त हैं। बीमारी की पड़ताल कर इलाज सुझाना अब डाक्टरों का काम नहीं रह गया है। खोखले साबित हो रहे हैं सरकारी दावेक्षेत्रीय अस्पतालों को मजबूत करने का सरकार का दावा भी दून में लगातार बढ़ रही भीड़ को देखकर दम तोड़ता दिखाई दे रहा है। प्रदेश का सबसे बड़ा अस्पताल किस मायने में बड़ा है यह समझ नहीं आता, क्योंकि यहां पर मात्र पथरी से लेकर हार्निया ऐपेंडिक्स(आंत का बढ़ जाना) जैसे छोटे-छोटे आपरेशन ही होते हैं बड़ी बीमारियों के लिए यहां से भी दिल्ली या फिर कहीं अन्य शहरों में ही रेफर किया जाता है। अगर मरीजों की संख्या की बात करें तो गढ़वाल, हरिद्वार व आसपास के क्षेत्रों के वह मरीज यहां आते हैं जिन्हें अपने अपने स्थानों पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती है। पहाड़ से भी अधिकंाश लोग इसी उम्मीद से आते हैं कि दून में अच्छा इलाज मिलेगा। ऐसे में दून अस्पताल की जिम्मेदारी एक बहुत बड़े क्षेत्र के लिए बन जाती है। लेकिन दून अस्पताल का बड़प्पन मरीजों को निराश करने वाला है। बड़ा होने का मतलब अधिक चिकित्सक, सस्ती सुविधाएं, पर्याप्त बैड, व गंभीर बीमारियों के इलाज व ऑपरेशन की सुविधाओं से होता तो कितना सुखद होता। अस्पताल प्रशासन से मरीजों को निजी में अन्यत्र चिकित्सालयों में रेफर करने का उत्पीड़क जवाब होता है। दूर दराज से आने वाले मरीजों के तीमारदारों के लिए अस्पताल में ठहरने की कोई सुविधा नहीं है। गरीब लोगों को या तो धर्मशालाओं या फिर होटलों की खाक छाननी पड़ती है अन्यथा अस्पताल के फर्श में ही आसियाना तलाशना पड़ता है। सरकार तर्क देती है कि परिजनों को मरीज के साथ रहने की जरूरत नहीं है हमारी नर्सें हैं उसके लिए। लेकिन क्या काम के अत्यधिक बोझ के मारे संवेदनहीन सी हो गई इन नर्सों के भरोसे गंभीर मरीजों को छोड़ा जा सकता है? जो प्रत्येक मरीज की सभी छोटी-बड़ी दिक्कतों पर ध्यान देने के लिए कतई नाकाफी हैं। इसलिए वह अपनी जिम्मेदारी डॉक्टर द्वारा लिख दिए ट्रीटमेंट को मशीनी अंदाज में पूरा करना देना भर समझती हैं। प्रावधान है कि 10 मरीजों पर 1 नर्स का होना आवश्यक है पर यहां तो 40-40 मरीजों तक का जिम्मा 2 नर्सों पर टिका है। अब तो नर्सों के भी उतने ही दर्शन होते हैं जितना कि डाक्टरों के।
सुपर स्पेस्लिस्ट सुपर फ्लॉप दून की चिकित्सा सुविधा को बेहतर बनाने के लिए, सरकार ने अस्पताल में डाक्टरों के अलावा 9 सुपर स्पेस्लिस्ट डॉक्टर तैनात किए हैं। अनुभवी चिकित्सकों को कॉनट्रेक्ट बेस पर भारी पैकेज दिया जा रहा है। इन्हें अस्पताल में आए जटिल केसों को निपटाने के लिए रखा गया है पर व्यवहार में ये सुपर स्पेस्लिस्ट अस्पताल के बजट की मलाई तो चाट ही रहे हैं, साथ ही उन्होंने इसे अपनी अतिरिक्त कमाई का शानदार जरिया बना रखा है। यहां से वह मरीजों को बड़े पैमाने पर टेस्टों और पूरे ईलाज के लिए बाहर रेफर कर रहे हैं। अस्पताल की सेवाओं में इनका काम नगण्य है। मोटी रकम लेनेे के बावजूद इनके उदासीन होने के एक कारण यह भी है कि अस्पताल में उस श्रेणी की तकनीक व आपरेशन थिएटर उपलब्ध ही नहीं है, जो इनका फील्ड है।
एमरजेंसी सुविधाओं का नितांत अभाव स्टाफ की कमी से जूझ रहे दून अस्पताल का सबसे बुरा प्रभाव एमरजेंसी व्यवस्था पर पड़ रहा है। मरीजों की संख्या के हिसाब से जहां पर चार आकस्मिक चिकित्सा अधिकारी होने चाहिए थे वहां पर मात्र एक है, और उसी अनुपात में नर्स व वार्ड ब्वाय। जिसका सारा खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ता है। दून अस्पताल में हमेशा ही एमरजेंसी मरीजों का तांता लगा रहता है। बैडों के अभाव में मरीजों के साथ बुरा सलूक किया जाता है उनकी एडमिट पर्ची काट दी जाती है और परिजनों से कहा जाता है कि देख के आओ कोई बैड खाली होगा तो देखेंगे। जो मरीज भरती भी होते हैं वह डॉक्टर व स्टाफ की कमी के कारण लंबे समय तक ईलाज से वंचित रहते हैं ऐेसेे कई केस हैं जिनमें सुबह 8बजे से भरती मरीज को शाम के 2 बजे तक कोई प्राथमिक उपचार ही नहीं मिलता। इससे साफ जाहिर है कि एमरजेंसी के नाम पर आप मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
कितने बेवश हैं मरीज

सरकारी अस्पतालों में मरीज खुद को कितना असहाय व बेवश पाता है इसकी कुछ बानगी दून अस्पताल में देखिए। और यह भी अनुमान लगाइए कि अगर प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल में यह स्थिति है, तो शेष जनपद के अस्पतालों के क्या हाल होंगे?चमोली से आई बीपीएल कार्ड धारक 50 वर्षीय उमा नेगी को चट्टान से गिरने के कारण पैर में दिक्कत आ गई। श्रीनगर में इलाज चला, पर डाक्टर की लापरवाही से आपरेशन बिगड़ गया। तब भी 17,500 की रॉड व सारी दवाईयां बाहर से ही मंगाई थी। यहां दून में आने पर पता लगा कि हड्डी गल चुकी है दुबारा आपरेशन होगा। दूसरी बार 10,000 की रॉड सहित सारी दवाइयाों के लिए बाहर ही जाना पड़ा। कहती हैं यहां व्यवस्थाएं बहुत बुरी हैं। तीन दिन से टॉयलेट साफ नहीं किया है। हड्डी फैक्चर वाले जितने भी मरीज हैं उनको बहुत दिक्कत हो रही है। इतनी गदंगी है कि लोग पैसा देकर प्राइवेट में जा रहे हैं। जीएमएस रोड निवासी रहमान के पैर से मांस गायब है उसके पैर की सर्जरी होनी है पर डॉक्टर महाशय ने 15 दिन से उसकी कोई सुध नहीं ली है। और न ही उसे सर्जरी के डेट दी जा रही है। पिछले डेढ़ महीने से वह यहां पर एडमिट हैं। कहते हैं कि हड्डी वाले मरीजों को बहुत समस्याओं का सामना करना पडता है। अधिकांश के पैर फैक्चर होने के कारण टायलेट में बैठने में दिक्कत होती है। उनके लिए वेस्टर्न टायलट होना चाहिए। नवादा देहरादून से आए बीपीएल कार्डधारक युसूफ का पांव फैक्चर हो गया था। आपरेशन हुआ रॉड डाली गई। 350 डाक्टरीफीस लगी व बाकी के 5500 रूपये लगे। भटवाड़ी उत्तरकाशी से आया 12 वर्षीय शिवम भी अब डाक्टरों की चालाकी समझ चुका है। कहता है कि डाक्टर ने एडमिट किया और कहा कि आठवें दिन आपरेशन होगा लेकिन आठवें दिन असमर्थता जताते हुए हमें कहीं और चले जाने को कहा। तब पापा ने दूसरे डॉक्टरों की खुशामद की। उन्होंने 5000 रूपये मांगे अभी हमने 3000 ही दिए हैं अब कल को मेरे हाथ का आपरेशन होना है। नेपाली मूल का एक मजदूर 3 साल पहले लगी रॉड खुलवाने दून आया तो डॉक्टरों ने उसे एडमिट किया चीर फाड़ की 2200 रूपये का खर्चा आया और अंत में यह कह दिया कि प्लेटें निकल नहीं रही हैं निकल लो यहां से कहीं और से करवा लो। हरिद्वार में दर्जी का काम करने वाले नसीम को फेफड़ों में पानी भरने की शिकायत है। इसी बीमारी से संबंिधत डॉक्टर महाशय ने दून में मौजूद छोटे-छोटे 13 टेस्टों के लिए गांधी रोड स्थित डा. रेनू गोयल के वहां रेफर कर दिया जिसमें कि उस मरीज के 1750 रूपय लगे। चमोली से आई कुसुम देवी जो कि बीपीएल कार्ड धारक हैं का यूटरस का आपरेशन हुआ। एक एक्सरे के अलावा सारे टेस्ट प्राईवेट में शालिनी शूरी के वहां को रेफर कर दिए गए। कुसुम देवी से जब डाक्टर के बताए पैथॉलाजी लैब तक चला न गया तो उनके पति ने रास्ते में पडऩे वाले अशोक एक्सरे कलर लैब से ही वो टेस्ट करा लिए। तब यूटरस का आपरेशन करने वाले डॉ. महाशय ने उन्हें खूब लताड़ा । मरीज के कहने पर कि साहब पता नहीं चला कि वह लैब कहां पर है तब डाक्टर महाशय उन्हें जवाब देते हैं कि शराब की दुकान तो बड़ी जल्दी पता चल जाती है। दरअसल शालिनी शूरी के वहां से मिलने वाले उस मोटे कमीशन से हाथ धो लेनेे के कारण डा. साहब की यह मनोदशा हो गई थी। कमीशन खाने के कई तरीके डॉक्टरों ने ईजाद किए हैं। एक डॉक्टर के छुट्टी में चले जाने से दूसरे डॉक्टर द्वारा मरीज से दोबारा सारे टेस्ट कराए जाते हैं। टॉयलट भी पीपीपी मोड मेंटॉयलेट जैसे जरूरतमंद प्रसाधन भी सरकार देने में आज सक्षम नहीं है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है दून अस्पताल के अंदर टॉयलट को पीपीपी(पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप) मोड़ में देना। जिससे ठेकेदार सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर से लाभ कमा रहे हैं और मरीज अपने इस लोकतंात्रित देश में पैदा होने का रोना रो रहे हैं। सरकारी अस्पताल का कथित शौचालय तो हमेशा ऐसी हालत में रहता है कि मरीज ज्यादा बीमार हो जाए। सवाल ये है कि शौचालय जैसी जरूरी सेवाएं भी सरकारी नियंत्रण में क्यों नहीं चल सकती। कुछ साल पहले पीपीपी मोड जैसी बात नहीं थी सरकारी व्यवस्था में लापरवाही होने पर लोग उसकी शिकायत कर सकते थे लेकिन सरकार ने सेवाएं दुरस्त करने के बजाय उस क्षेत्र को ठेके में देने का विकल्प चुन लिया है।
क्यों चिड़चिड़ी हैं नर्सें

एक नर्स मदर टेरेसा थी जो अपने जीवन का सब कुछ निकृष्टम माने जाने वाले रोगियों को समर्पित कर चुकी थी। यह टेरेसा का आंतरिक समर्पण व विश्वास था कि उसे जीवन की संतुष्टि इसी सेवा भाव से मिल सकती थी। लेकिन दून अस्पताल की चिडचिड़ी नर्सें सेवा के लिए नहीं नौकरी के लिए आई हैं। हालांकि ट्रेनिंग के दौरान नर्सों को मरीजों के साथ संवेदनशीलता व भावना के साथ पेश आने की शिक्षा दी जाती है। लेकिन सरकारी नौकरी हाथ लगते ही सारी शिक्षा उनके जेहन से रफू हो जाती है। इस अस्पताल की 70 नसों में से शायद ही एक आध मिले जिनके बारे में मरीज कह सकें कि इस नर्स का व्यवहार अच्छा हैं। डाक्टरों की देखादेखी नर्सें भी सरकारी तनख्वाह के अलावा एकस्ट्रा आमद चाहती हैं। कुछ नर्सों के हाथ में नोट चेप दो तो उस मरीज की अच्छी खासी मेजबानी हो जाएगी। नर्सों को बीपीएल मरीज तो फूटी आंख नहीं सुहाते। क्योंकि उन्हें लगता है कि इन फटेहाल लोगों से कुछ नहीं निकलेगा। हालांकि सिक्के का दूसरा पहलू भी है जो नर्सों को चिड़चिड़ापन व भ्रष्ट बनाने में मददगार है वह है इनकी संख्या। दरअसल 300 बैडों वाले इस अस्पताल में मात्र 20 सिस्टर व 50 नर्सें हैं। जिस कारण 2-3 नर्सों पर ही 40 बैड़ों से भरे हुए एक वार्ड का जिम्मा होता है। इसीलिए नर्सों ने भी अपनी टैक्टिस ईजाद की और कोई मरीज कितना ही दर्द से क्यों न कराह रहा हो नर्स को चिल्ला चिल्ला कर बुला रहा हो उनके कानों में जूं नहीं रेंगती। उन्होंने अपने कानों को उस आवाज का अभ्यस्त बना लिया है। वो बैठी रहती हैं गप्पे मारती हैं, और रात की ड्यूटी में कुडां लगाकर अंदर सोई रहती हैं। मरीजों के लिए उनका फिक्स सिड्यूल होता है कि पूरे दिन के तीन वक्त जाकर किसी मरीज को सुई लगानी है या फिर किसी को ग्लूकोज चढ़ाना है।
राजस्व वसूलने की मंशा है स्वास्थ्य से भी

भारत में कई लोगों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र सरकारी माल कूड़े में डाल जैसा निवेश है यहां खर्च ही खर्च होता है वापस कुछ नहीं मिलता। इस बात को 1991 में शुरू हुई आर्थिक उदारीकरण की नीतियों ने और हवा दी है। जिसके तहत स्वास्थ्य जैसी जरूरी जरूरत भी भारत में कुछ लोगों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र सरकारी माल कूड़े में डाल जैसा निवेश है यहां खर्च ही खर्च होता है वापस कुछ नहीं मिलता। इस बात को 1991 में शुरू हुई आर्थिक उदारीकरण की नीतियों ने और हवा दी है। लेकिन यदि समाजवाद के संस्कारों वाले चीन व रूस की उत्कृष्ट चिकित्सा सेवाओं को छोड़ भी दें तो पूंजीवाद के धुर समर्थक अमेरिका का उदाहरण आंख खोलने वाला है। भारत के स्वास्थ्य बजट की तुलना में अमेरिका का बजट कहीं अधिक है इससे यह प्रमाणित होता है कि चिकित्सा जैसा क्षेत्र किसी भी अर्थव्यवस्था से परे है। सरकार किसी भी विचारधारा की हो, स्वास्थ्य क्षेत्र में जरूरत के अनुरूप निवेश करना उसका कर्तव्य बनता है। पंचवर्षीय योजनाओं के जनकल्याणकारी आदर्श के दिनों में अस्पताल मरीज तक खुद जाते थे। उस समय लोगों को अस्पताल आने की आदत नहीं थी, लेकिन आज हालत यह है कि अस्पताल कम पड़ रहे हैं और मरीज ज्यादा हो गए हैं। सरकार को इस कल्याणकारी जरूरतमंद क्षेत्र में जितना खर्च करने की जरूरत थी वह भी वह नहीं कर रही है। केवल रस्म अदायगी के लिए होते हैं निरिक्षण

सरकारी अस्पतालों में अधिकारियों द्वारा निरीक्षण के प्रावधान की खुले आम धज्जियां उड़ रही हैं। सीएमएस द्वारा सप्ताह में दो बार निरीक्षण तो होता है सफाई कर्मचारियों से न नर्सों से न ही चिकित्सकों में सीएमएस का कोई डर है। दूसरी तरफ सीएमएस भी इसे एक खानापूर्ति मानकर दौरा करते हैं। उनके आने से मरीजों व व्यवस्थाओं में तिल भर का परिवर्तन नहीं होता। सीएमओ द्वारा भी माह में एक बार भ्रमण किया जाता है लेकिन कोई भी सीएमओ अपने अधीन अस्पतालों से भला क्यों खोट निकालेगा। सरकारी निर्देश हैं इसीलिए जिलाधिकारी भी समय समय पर अस्पतालों का दौरा करते हैं। डीएम के यह दौरे पूर्व निर्धारित होते हैं। जिसके लिए बाकायदा सूचना जारी की जाती है। इस बीच जो डॉक्टर ड्यूटी से नदारद होते हैं उनकी उपस्थिति भर दी जाती है। जिसका डीएम निरीक्षण करते हैं। ऐसा कम ही देखने में आया है कि कोई डीएम मरीजों के पास जाकर उसकी खैरख्वाह पूछता हो। स्वास्थ्य सचिव या मंत्री तब तक ही अस्पतालों का दौरा करते हैं जब कोई बड़ा मामला हो जाए।

बजट 6 करोड़, नहीं मिलती चिलमची

लगभग 6 करोड़ का बजट प्रतिवर्ष पाने वाले दून अस्पताल में सुविधाओं के नाम पर मरीजों के लिए एक चिलमची तक मौजूद नहीं है। हर महीने इस बजट से 3 लाख रूपये सफाई और साढ़े चार लाख रूपये खाने का बजट ठेकेदार को दे दिया जाता है। अस्पताल सामने पडऩे वाले हिस्से में तो झाडू-पोछा लगता दिखाई देता है, लेकिन अस्पताल की सफाई की कलई खोलते हैं बदबू और गंदगी से भभकते टायलेट, जो हफ्तों तक साफ नहीं होते। बाजार से 100-100 रूपये की चिलमची और पेशाब करने का डब्बा मरीजों से बाकायदा मंगाया जाता है। खाने के लिए मिलने वाला बजट हालांकि अपर्याप्त है लेकिन उसे भी सही से इस्तेमाल करने के बजाए कमीशन बनाने का जरिया बना दिया गया है। लिहाजा नाममात्र का खाना मरीजों को दिया जा रहा है। खाना देने की बस औपचारिकता पूरी हो रही है। एक बच्चे से लेकर बड़े तक को एक जैसा खाना मिलता है। डायटीसियन ऋचा कुकरेती कहती हैं कि मैं अभी नई आई हूं। फिर भी मेरा प्रयास है कि मरीजों तक गर्म खाना तय डाइट के अनुसार मिल सके। दूध सहित सभी खाद्यों की गुणवत्ता भी जांची जा सके इसके लिए भी मैं प्रयासरत हूं।
एमआरआई मशीन भी पीपीपी मोड मेंडेढ़ साल पहले दून अस्पताल में आई एमआरआई मशीन अभी तक मरीजों के लिए उपलब्ध नहीं हो पाई है। जबकि दून के डॉक्टरों द्वारा प्रतिदिन कई मरीज शहर के कई प्राईवेट क्लीनिकों में रेफर किए जा रहे हैं। जहां उनसे मनमानी फीस ली जाती है। और उसका 30 से 40 फीसदी कमीशन लिया जाता है उस पैथोलॉजी में रेफर करने वाले डॉक्टरों द्वारा। मरीजों के लिए आई मशीन अस्पताल प्रशासन की दलीलों के नीचे दबी पड़ी हैं। प्रशासन का कहना है कि हमारे पास एमआरआई मशीन का एक्सपर्ट मौजूद नहीं है। ये बड़ी बेतुकी सी बात लगती है जब पावरफुल पद पर बैठने वाले लोग स्टाफ की कमी का रोना रोते हैं। क्या पहले से ही मौजूद 3-3 रेजियोलॉजिस्टों को अतिरिक्त ट्रेनिंग देकर या फिर नया स्टाफ रखकर एमआरआई मशीन का काम शुरू नहीं किया जा सकता। सोचने की बात है कि जिसके प्रयासों से 7 करोड़ की मशीन मंगवाई जा सकती है, डेढ़ साल से प्रतिमाह डेढ़ दो लाख उसका मेंटिनेंस का खर्चा अदा किया जा सकता है, तो क्या एक छोटा सा तकनीकी स्टाफ नहीं उपलब्ध कराया जा सकता। सीएमओ से लेकर स्वास्थ्य मंत्री तक अगर ये सब देखकर मूक बने हैं तो फिर उसके भी कुछ अर्थ जरूर होंगे। दरअसल आपको अपनी पगड़ी मिल ही रही है। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार सच्चाई यह है कि सरकार लंबे समय से इस मशीन को प्राइवेट सेक्टर को देने के मूड़ में थी। और अभी कुछ शर्तों के साथ दिल्ली की किसी महाजन कंपनी को इसका ठेका दे दिया है जिसके तहत सुबह 8बजे से 2 बजे तक यह सरकारी तौर पर चलेगी जिसके एम्स के रेट के बराबर होंगेे। कितनी शर्मनाक बात है कि बाहर का कोई ठेकेदार आकर सरकार से कमा जाता है और आप अपने राजस्व के चक्कर में मरीजों को निशुल्क या कम कीमत पर इलाज मुहैया नहीं करा सकते।
जधानी में पिछले दिनों एतिहासिक कोरेनेशन हास्पिटल का जीर्णोंदार किया गया। शायद नया होने व शहर से अधिक संपर्क में न होने के कारण यह मरीजों की पहुंच से बाहर है। अस्पताल में आधुनिक जांच सुविधाएं, पर्याप्त बैड हैं जिससे कम मरीज आने से डॉक्टर भी उनके मर्ज की गहराई में जाते हैं। लेकिन अविश्वास से ग्रस्त मरीज यहां आने की बजाय प्राईवेट हास्पिटलों का रुख कर रहे हैं। अंग्रेजों द्वारा कलकत्ता से राष्ट्रीय राजधानी को जब दिल्ली लाया गया तभी 1912 में कोरेनेशन हास्पिटल की नींव पड़ी। शुरूआत में इसमें केवल ब्रिटिशों को ही इलाज कराने की अनुमति थी। वीआईपी स्टेटस वाली यह स्थिति 1964 तक बनी रही। 1964 में यूपी सरकार द्वारा लिए जाने के बाद इसे आम लोगों के लिए भी खोल दिया गया। 2008में भाजपा सरकार द्वारा प। दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर अस्पताल के पुनर्लोकार्पण के बाद इसमें 120 बैडों की व्यवस्था की गई। जिसमें 100 जरनल व 20 बैड नेफ्रोडाइलिसिस(गुर्दे खराब के ट्रीटमेंट की मशीन व मरीजों के लिए) के लिए रखे गए। जिनमें से 40 बैड अभी नहीं चल रहे हैं। वर्तमान में यहां पर 24 घंटे की आपातकाल सुविधाओं से लेकर परिवार कल्याण सेवाएं, महिला पुरूष संबंधी सारे आपरेशन, डाट्स का इलाज, हर माह लगने वाले टीके, कानूनी चिकित्सा परीक्षण, मोतियाबिंद का आपरेशन,हड्डी संबंधी सारे इलाज यहां पर उपलब्ध हैं। अस्पताल के सुपरिडेंटेंट ए.एस.रावत कहते हैं अस्पताल में थाइराइड, आंख व छाती के अल्ट्रासांउड की व्यवस्था है जो कि एकमात्र यहीं पर है। इसके अलावा कलर डाप्लर के परीक्षण व आपरेशन के लिए भी अस्पताल विशेषज्ञता रखता है। अस्पताल में स्त्री व रोग बाल रोग के अनुभवी चिकित्सक मौजूद हैं। प्रतिदिन यहां लगभग 400 मरीज आ रहे हैं। भविष्य में सरकार की इस अस्पताल को पब्लिक प्राइवेट पाटर्नरशिप के आधार पर चलाने की योजना है। सरकार व दून प्रशासन अगर मरीजों के प्रति थोड़ा बहुत भी संजीदा होते तो दून में एमरजेंसी में आने वाले मरीजों को यहां जगह खाली नहीं है यह कहकर धमकाने के बजाय कोरेनेशन में सिफ्ट करने की योजना बनाते।

कहां गए स्वास्थ्य मंत्री के औचक दौरे

भाजपा सरकार गठित होने के बाद रमेश पोखरियाल निशंक के स्वास्थ्य मंत्री का ओहदा संभालने पर प्रदेश वासियों में उनके शुरूआती तेवरों को देखकर एक आस जगी थी। स्वास्थ्य मंत्री जहां जाते वहां के अस्पताल में जरूर धमक पड़ते। रोज-रोज स्वास्थ्य मंत्री के औचक निरीक्षणों से स्वास्थ्य विभाग में खलबली मच गई। डाक्टर ड्यूटी के घंटों में अस्पताल में मौजूद रहने लगे सरकार द्वारा दी जाने वाली दवाएं वितरित होने लगी। इस तरह की सक्रियता से स्वास्थ्य विभाग में जान आने लगी थी, लेकिन मंत्री की यह चुस्ती जल्दी ही काफूर हो गई। मंत्री जी के दौरे बंद हो गए। अब वह किसी अस्पताल में नहीं जाते। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि उन्होंने शुरूआती दौरे क्यों किए? क्या सरकारी नौकरी के साथ प्राइवेट क्लीनिकों से चांदी काट रहे डॉक्टरों को संभल जाने मात्र के लिऐ यह ट्रायल मात्र था।

राजधानी के अस्पताल में जिला स्तर की सुविधाएं।

चिकित्सकों, स्टाफ नर्स,पैरामेडिकल स्टाफ,तकनाशियनों की भारी कमी। ट्रामा( विशेष तौर से सिर पर चोट लगने वाले मरीज), ह्दयय रोगियों, फआलिश(ब्रेन स्टोक) , किडनी रोग पीडि़तों , कैैंसर पीडि़तों, गंभीर किस्म के आपरेशनों(सजरी) के लिए मरीजों को हायर सेंटर भेज दिया जाता है। श्रीनगर व हल्द्वानी मेडिकल कालेज से भी मरीज यहां भेजे जाते हैं। जटिल नेत्र सर्जन का इंतजाम नहीं।कार्डियोलाजी विभाग में एक ह्दय रोग विशेषज्ञप्रदेश भ्र में बर्न युनिट केवल दून में। यूनिट में 13 बैड एक सूपर स्पेशलिस्ट।मध्यम दर्जे की प्लास्टिक सर्जरी की व्यवस्था भी नहीं। न्यूरो डिपार्टमेंट-धूल खा रही हैं करोड़ों की मशीनें। अलग से आपरेशन थियेटर नहीं। टाइम न्यूरो सर्जन नहीं।न्यूरो का पैरामेडिकल स्टाफ नहीं।पैथोलॉजी विभाग में आधुनिक उपकरण नहीं। बड़ी जांच के लिए मरीज निजी क्षेत्र में।संविदा पे हैं चिकित्सक> नेफ्रोलाजी यूरोलाजी के सूपर स्पेशल्सिट संविदा पर तैनात अलग से य विभाग नहीं।

1 comment:

sangwal said...

Hospital ki nurces ka to sabhi jagah hi yeh haal hai.