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Tuesday, October 12, 2010

खामोश हुई एक मौखिक परंपरा कि आवाज

रवांई के प्रसिद्ध लोकगायक बुलीदास का निधन
रंवाई के प्रसिद्ध लोकगायक बुलीदास विगत 3 दिसंबर को चुपचाप चले गए। स्वयं को संस्कृति की ध्वजवाहक कहने वाली प्रदेश की सरकार को बुलीदास के मरने की खबर शायद ही हो, परंतु नृवंशशास्त्रियों व लोक संस्कृति के शुभचिंतकों के लिए वाकई यह किसी सदमे से कम नहीं।
दूसरों की खुशी के लिए हमेशा ही गाने-बजाने को तत्पर बुलीदास की खनकती आवाज तो चुप हो ही गई, सदियों पुरानी परंपरा का अंतिम वारिस भी हमसे छूट गया। 65 वर्षीय बुली का जन्म हर की दून क्षेत्र के देऊरा गांव में हुआ था। यूं तो पुरखों का पुश्तैनी काम गाना, बजाना व नाचना रहा था, लेकिन उनमेंं एक विशिष्ट परंपरा और चली आ रही थी। पंवाड़ा यानि वीरगाथागायन। वह इस समूची घाटी में पंवाड़ा गाने वाले अकेले व्यक्ति थे। पंवाड़ा वाचक परंपरा में सत्ता के तत्कालीन संघर्ष ही नहीं स्थानीय लोगों के इतिहास व सांस्कृतिक परंपराओं का भी बखान करती है। हमारे देश में इतिहास को लिखित रूप में संग्रहीत करने की पंरपरा बहुत कमजोर है, ऐसे में यही मौखिक परंपरा सदियों के इतिहास का दस्तावेज होती है। दुर्भागयवश बुलीदास की कला दूसरे किसी कलाकार को स्थानान्तरित नहीं हो पायी, इस कारण रवांई की कई सदियों की ज्ञान धारा सूख गई। शायद आने वाली पीढिय़ों को इस बात का पश्चाताप हो पर फिलहाल तो बुली के लंबे समय तक बीमार रहकर चले जाने की खबर, खबर नहीं बन सकी है।

हिमाचल के बुशेहर और टौंस घाटी के लोगों के बीच चारागाह विवाद, या राजपूतों में पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही खानदानी दुश्मनी के किस्से हों, सभी में स्थानीय लोक व संस्कृति के दर्शन होते थे।

गढ़वाल के लोक वाद्यों पर वर्षों से शोध कर रहे हाईडलबर्ग विवि अमेरिका के प्रोफेसर विलियम सैक्स ने बताया कि बुलीदास को दमे की शिकायत थी। और वे करीब एक साल से बीमार थे। उन्हें रोहडु के अस्पताल में ले जाया गया। सैक्स ने बताया बुली पंवाड़ा के अद्भुत गायक थे। माधो सिंह भंडारी, दले सिंह जडय़ान, जीतू जडिय़ान, नागदेव फन्दाटा, बहादुर सिंह या कर्ण महाराज के रांगड़ वजीर-नायकों के बारे में जानकारी का स्त्रोत बुली की गायन परंपरा ही थी। बेड़ा, बादी, औजी, ढ़ाकी आदि नामों से जाने जाने वाले बुली के पुरखों का परंपरागत पेशा आज कई कारणों से खतरे में है। संस्कृति को अपने यशोगान में पेश होने वाले मंचीय नाच-गाने से अधिक न मानने वाली सरकार व संस्कृति विभाग से इस पेशे को संरक्षण की कल्पना करना फिजूल है। उत्तरकाशी निवासी लेखक व शोधकर्ता डा. हिम आहुजा ने कहा हमारी लोक संस्कृति के इतने बड़े पुरोधा का चुपचाप चला जाना दुखद है। सरकार तो दूर की बात संस्कृति के चितिंत लोग भी बुलीदास को बुरे दिनों में भूल गए। जन्म के गीत हों या मृत्यु के या शादी ब्याह के, पशुओं, मेलों और देवता के उत्सव बिना बुलीदास के अब रवांई में सब कुछ अधूरा-अधूरा लगेगा।

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