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Saturday, October 30, 2010

मुख्याधारा का निर्माणकर्ता हाशिए पर कैसे

पूरे देश भर में हमारी कला, संस्कृतिको अगर किसी ने जीवित रखा है, कोई धरोहर अगर बची हुई है, तो वह दलित वर्ग ने ही बचा रखी है। वो भले समाज की बुनियादी आवश्यकता वाले काम हों या फिर वाद्य यंत्रों को सहेजने बजाने से लेकर कला संगीत की उस परंपरा को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने का काम हो। फिर कैसे ये लोग हाशिये के हो गए, कैसे इनके उत्पीडऩ को लेखन के द्वारा उजागर करने वाले लोग या वो लेखन हाशिये का हो गया? आज हिंदी के अधिकांश लेखक अकादमिक तो बन गये पर जन से दूर हो गये। ये कहना था प्रख्यात दलित चिंतक कंवल भारती का। अवसर था देहरादून में हो रहे दलित साहित्य एंव सांस्कृतिक अकादमी के वार्षिक समारोह का। जिसमें प्रख्यात लेखक व पत्रकार प्रो। रामशरण जोशी को डा. अंबेडकर राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया। इससे पूर्व ये सम्मान डा. नामवर सिंह व डा. राजेन्द्र यादव को दिया गया है। साथ ही रूपनारायण सोनकर की नयी कहानी कफन पर भी चर्चा हुई। कहानी दहेज लोभी, पढ़े लिखे समाज के ढ़ोंग को सामने लाती है। कहानी में जातीय समाज के वर्गीय समाज में रूपांतरित होने के लक्षण दिखाये गये हैं और दिखाया गया है कि जाति की अपेक्षा वर्ग अधिक मजबूत धुरी है।दिल्ली से आये अजय नावरिया ने कहा कि साहित्य किसी वर्ग विशेष का एकालाप नहीं हो सकता। अगर कुछ दलित लेखक इसे खास ढ़ांचे में रखेंगे तो यह भी नये किस्म का मनुवाद और बाह्मणवाद साबित होगा। वहीं प्रो. रामशरण कहते हैं कि दलित साहित्य के मूल्यांकन के लिए अब तक के मानदण्ड अपर्याप्त हैं। दलित सौंदर्यबोध को मान्यता देना हिंदी साहित्य के विकास का एक प्रगतिशील कदम होगा। कहानीकार अल्पना मिश्र कहती हैं कि स्त्री विमर्श की तरह दलित विमर्श ने भी यातना व उत्पीडऩ का लंबा सफर तय किया है। दोनों की लड़ाई वर्चस्ववाद व सांमतवाद से है। इसीलिए दलितों व स्त्रियों को तो अपनी लड़ाई लडऩी ही है भले ही कितना समय लग जाए। परिणाम तो एक दिन सामने आते ही हैं। दिल्ली से आए डीयू में हिंदी के प्रो. व अपेक्षा पत्रिका के संपादक तेजपाल सिंह कहते हैं कि दलित विमर्श व दलित चेतना दोनों में काफी अंतर है। दलित चिंतक को अपने समाज के अंर्तविरोधों की गहरी पहचान होती है। कंवल भारती व मलखान सिंह जैसे कई लेखक हैं जो इस श्रेणी में आते हैं। उनका लेखन उत्पीडऩ को झेल चुका भोगा हुआ लेखन होता है। वहीं दूसरी ओर आज अन्य लेखक भी दलित विमर्श पर लिख रहे हैं। पर प्रेमचन्द के अलावा शायद ही कोई लेखक है जिसने दलित की पीड़ा को वास्तव में अभिव्यक्ति दी हो। गुजरात से आये दलित लेखक आर एच वर्णकार कहते हैं कि गांव की 70 फीसदी आबादी के जीवन में जब तक कोई परिवर्तन नहीं हो जाता तब तक इस तरह की संगोष्ठियों से कोई फायदा नहीं हो सकता। इस अवसर पर दून घाटी रंगमंच द्वारा अपनी 102 वीं प्रस्तुति सोनकर जी की कफन कहानी के मंचन से की गई। जिसका निर्देशन नाट्यभूषण लक्ष्मीनारायण ने किया।

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