My Blog List

Saturday, October 30, 2010

एक था खडग बहादुर

लोग रोज खडग़ बहादुर रोड से गुजरते हैं और उसके नाम से होने वाले फुटबाल टूर्नामेंट में भाग लेते हैं लेकिन कोई नहीं जानता कि ये खडग़ बहादुर कौन था। जानने की जरूरत भी नहीं रही आए दिन के लांफिग चैनल व अन्य टीवी चैनल ने जो युवा पीढ़ी के सामने परोसा है उसमें कहां फुरसत है कि वो दादी के किस्सों में बहादुर लोगों के कारनामे सुन सकें। गांधी के नमक तोड़ो आंदोलन मेे शिरकत करने वाले खडग़ बहादुर कहते हैं कि मैं चर्खा तो नहीं चला सकता हां खुखरी जरूर चला सकता हूं। खुखरी चलाने वाला यह वीर वही खडग़सिंह था जिसने कलकत्ता के हीरामन नाम के एक सेठ को उसके ऑफिस में जाकर अपनी खुखरी से इसीलिए मार दिया था क्योंकि वह लड़कियों की खरीद फरोख्त का व्यापार करता था। तब से कई बहनें उसे राखी बांधने आया करती थी। ऐसे लोग आज और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं जब कि लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा ही उठ गया हो। न्यायपालिका की यह बहुत बड़ी कमजोरी है कि लोग आज मजबूर होकर कानून को अपने हाथ में लेने लग गए हैं। उत्तराखण्ड में इस योद्धा को याद किया जनकवि अतुल शर्मा व उनके कुछ साथियों ने। देश भक्ति के जजबे में खडग़ बहादुर यहां तक पहुंच गए थे कि मां बाबूजी दोनों चल बसे मकान खण्डहर हो गया। अतुल शर्मा ने उनके मोहल्ले में जाकर जनगीत गाए लोगों को खडग़बहादुर के किस्से सुनाए महिलाओं व बच्चों की बड़ी तादात उन्हें गौर से सुन रही थी उनके जनगीतों का अर्थ बच्चे निकालने का प्रयास कर रहे थे। पाश की कविता उनके लिए एक नई चीज थी-संविधान में सबसे मौलिक गांरटी है मर्जी से पेशा चुनने की गर्दन पकड़कर बताना नहीं होता कि भीख मांगो, चोरी करो, सियाचीन में मरो। इस तरह गणतंत्र दिवस उन्होंने अपनी तरह से मनाया।

No comments: