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Saturday, October 30, 2010

दलित समाज के दर्द को सामने लाने का प्रयास

अपनी आत्मकथा जूठन से चर्चा में आये ओम प्रकाश बाल्मिकी ने अपनी कृति सफाई देवता में समाज की सामाजिक स्थिति को समझाने का प्रयास किया है। पुस्तक के माध्यम से वह उस मनोवृति को भी रेखांकित करने की कोशिश करते हैं, जिसमें दलित चिंतकों का यह प्रयास रहता है कि वे भी मूलत स्वर्ण थे, और यदि इतिहास को पुर्न परिभाषित किया जाय तो कई जगह उनकी जातीय श्रेष्ठता के उदाहरण मौजूद हैं। स्ंवय दलितों के मसीहा ड़ा. अम्बेडकर में भी यह हीन ग्रन्थि मौजूद थी। वह दलितों को मनुष्यों के रुप में स्थापित करने की कोशिश करते हुए कहते हैं कि यदि स्वर्णों दवारा लिखित वेद व पुराणों में उनका इतिहास नहीं भी उपलब्ध है तब भी वे किसी से कमतर नहीं हैं। एक कदम और आगे जाते हुए वह कहते हैं कि सवाल आज सामाजिक राजनीतिक हालात में दलितों के सही विकास की पड़ताल करने से होना चाहिए। इसके लिए वे सफाई देवता यानि बाल्मिकी समाज के लोगों को प्रमुख रुप से सामने लाते हैं। पुस्तक सफाई देवता मुख्यत बाल्मिकी समाज पर केंद्रित है, लेकिन यह संपूर्ण समाज के ऐतिहासिक शोषण उत्पीडऩ, दमन का विश्लेषण तमाम विवरणों से करते हैं। खासकर दलित साहित्य को साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा के रुप में स्थापित करने वाले बाल्मिकी के प्रयास का सामाजिक दायरे में स्वागत होगा, ऐसी आशा की जानी चाहिए। बाल्मिकी साहसपूर्वक अपनी पुस्तक में उस रुढि़वादी व्यवस्था को चुनौती देते हैं जो जानबूझकर यह स्थापित करने का प्रयास करती है कि वर्ण व्यवस्था हिन्दू धर्म की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था है। जातीय श्रेष्ठता के दर्प में चूर रुढि़वादियों के राष्टवाद को कटघरे में रखते हुए वह कहते हौं कि इस व्यवस्था के कारण शूद्र और दलित हजारों सालों से विकास से अवरुद्ध है। इस वर्ण व्यवस्था ने समूचे राष्ट को हानि पहुँचायी है। विभिन्न पुस्तकों व पत्र पत्रिकाओं की मदद लेते हुए उन्होंने सबसे कठिन श्रम करने समाज को हीन घोषित करने वाले ग्रन्थों व पुराणों को अमानवीय करार दिया। वे कहते हैं कि ऐसे साहित्य जिसमें मनु स्मृति जैसे घनघोर मनुष्य विरोधी ग्रन्थ शामिल हों,को लोकतान्त्रिक व सभ्य समाज द्वारा सिरे से नकार देना चाहिए। वह कहते हैं कि मनुष्य की बौद्धिक सृजनता को खांचों में नहीं ढ़ाला जा सकता। सृजनता किसी खास दिमाग की उपज होती तो बाल्मिकी रामायण नहीं लिख पाते। तमाम अवरोधों के बाबजूद अंतराष्टीय ख्याति प्राप्त के संगीतकार ,अभिनेता, गायक, वैज्ञानिक व लेखक इस समाज से निकले है। ड़ा अम्बेडकर को सवर्ण समाज ने एक बौद्धिक के रुप में विकसित होने में कई बाधाएं डाली, मगर वो उनके लेखन को निखारने में सहायक ही सिद्व हुयी। लेकिन वर्तमान संर्दभ में सवाल अधिक चुनौतीपूर्ण इसीलिए हो गया है क्योंकि दलित समाज का अगड़ा तबका सवर्ण समाज में विलीनीकरण की तीव्र इच्छा रखे हुए है। थोड़ा प्रगति कर लेने पर वह वर्गीय आधार पर अपने मूल समाज से थोड़ा कट गया है और उन ढ़कोसलों को धारण करने जा रहा है जिन्हें खुद स्वर्ण समाज छोड़ चुका है।

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