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Tuesday, October 12, 2010

बिना दरवाजों का समय




थकती नहीं कविता, अब तो सड़कों पर आओ व नदी तू बहती रहना काव्य संग्रह के बाद 'बिना दरवाजों का समय डा. अतुल शर्मा का नया काव्य संग्रह है। डा. शर्मा मूलत: गीत लिखते रहे हैं। गीत ने ही उनको पहचान दी, लेकिन जब-तब अतुकांत में भी प्रकट होने से स्वंय को रोक नहीं पाते। लेकिन इनमें भी गेय तत्व का लेप साफ दिखाई देता है। काव्य संग्रह 'बिना दरवाजों का समय इसी खिलदड़पने का परिचायक है। संग्रह में 53 कविताएं संकलित हैं। पहली कविता का शीर्षक 'मालिक है। 'साठ साल से रहते हुए/इस किराए के मकान में/हमारा एक घर है/इसके हर कोने में। इसके अलावा अव्यवहारिक शिक्षा पद्यति पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं लोकतंत्र में नौकरी की अराजकता स्कूल के दरवाजों से शुरू होती है। अतुल शर्मा अलग ही मिजाज के कवि हैं। लेखकीय मंचों से उनकी तटस्थता जग जाहिर है। लेकिन दूसरी तरफ अपनी आंतरिक छटपटाहट को किसी न किसी मंच से प्रकट भी करते रहे हैं। कविता का टाइटिल 'बिना दरवाजों का समय एक असुरक्षित सभ्यता की गवाही है। 'सब कुछ कितना असुरक्षित होगा/जब बने होंगे दरवाजे। दरवाजे डर की सभ्यता के परिचायक हैं। दरवाजे संर्कीणता के परिचायक हैं। दरवाजे पाप की कमाई को छुपाने का माध्यम हैं। 'घरों में बहुत दिन तक-दरवाजे नहीं थे/ये होते थे बड़े लोगों के खजाने के लिए। डर मनुष्य के जीवन की विडंबना है। डर हमारे जीने की प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह है और डर को पनाह देता है दरवाजा।
'स्कूल का दरवाजा बच्चों को बंद रखता है/जेल का दरवाजा कैदियों को/दफ्तरों का दरवाजा कर्मचारियों को/दरवाजे जरूरी हो चुके हैं/ यह इस समय की सबसे बड़ी दुर्घटना है। लोकप्रिय मुहावरों की बुनियाद पर खड़ी डा. शर्मा की कविताएं आसानी से दिल में उतर जाती हैं। टोपियां इसी तथ्य की परिचायक हैं। 'पैरों में ढकने के लिए जुराब/और हथेलियों को ढकने के लिए दस्ताने/सिर के लिए टोपियां। बढ़ती हुई दुनिया, लिफाफे, शिकायत पेटी, सचिवालय आदि संग्रह की आकर्षक कविताएं हैं। कविता की पाठशाला में अपने ही शिष्य पवननारायण से संग्रह का परिचय लिखवाना डा. शर्मा जैसे जनकवि का अपना बड़प्पन हो सकता है।

काव्य संग्रह-'बिना दरवाजों का समय
लेखक-अतुल शर्मा,
मूल्य-100 रूपये ,
रमा प्रकाशन देहरादून।

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