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Tuesday, October 12, 2010

सरकारी रिमोर्ट से चल रहे हैं आंदोलनकारी


चिन्हीकरण के लिए भीख मांगते दिखे आंदोलनकारी

अपरिपक्व उत्तराखंड आंदोलन ने कई अपरिपक्व कार्यकर्ताओं को जन्मा। यही कारण है कि उत्तराखंड आंदोलन के सपने दूर छिटक गए और कार्यकर्ता आंदोनकारी की उपाधि के लिए सरकार के दरवाजे पर नाक रगड़ रहे हैं। कभी कहा जाता था कि जन सहभागिता की दृष्टि से उत्तराखडं आंदोलन आर्दश आंदोलनों का पयार्य है जिसमें बूढ़े बच्चे महिला नौजवान सभी की भागीदारी रही। लेकिन सच्चाई का दूसरा पहलू यह भी है कि उत्तराखंड आंदोलन ने अवसरवादिता की हदें तोड़ डाली हैं। अब आंदोलनकारियों का जमावड़ा राज्यवासियों के सपनों के लिए संघर्ष की खातिर नहीं बल्कि अपनी खुद की नौकरी पेंशन व तमाम सुविधाओं तक की मांग तक सिमट कर रह गई हैं। भाजपा कांग्रेस की सरकारों ने आंदोलनकारियों के तुष्टिकरण के लिए जो तुरूप का पत्ता फेंका वह उनकी अपेक्षाओं से कहीं अधिक कामयाब साबित हुआ।
प्रथम राज्य निर्माण सेनानी सम्मेलन का तमगा लगाए इस सम्मेलन के एजेंडे में न तो मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को सजा दिलाने का मुद्दा प्राथमिकता में था और न ही राजधानी गैरसैंण का। सम्मेलन में जिन छ: बिंदुओं पर बातचीत केन्द्रत होनी थी उनमें नौ साल में राज्य ने क्या खोया क्या पाया, राज्य की मौजूदा जरूरतें और मौजूदा नीतियां, राज्य में पनपती कुरूतियां व उनका दुष्प्रभाव, राज्य की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना व राज्य निर्माण सेनानियों की समस्याएं प्रमुख थे। किसी भी समस्या पर बात होने से पहले सबकी जुबान पर या तो पेंशन का नारा था या फिर नौकरी का। दो दिनी सम्मेलन में कोई भी ऐसा आंदोलनकारी नहीं था जो उत्तराखंड के आंदोलनकारी व उत्तराखंड के लिए स्थापित उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक इन्द्रमणि बड़ोनी, 42 दिन तक उत्तराखंड के लिए अनशन पर बैठकर अपनी शहादत देने वाले बाबा मोहन उत्तराखंडी, उत्तराखंड आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाने वाले व शराब के खिलाफ शराब भट्टी में ही आत्मदाह करने वाले निर्मल पंडित की शहादत को याद कर सके। किसी ने श्रीयंत टापू, मुजफ्फरनगर व मसूरी कांड के शहीदों को याद नहीं किया। किसी महिला की जुबान पर हंसा धनाई व बेलमती चौहान जिंदाबाद के नारे नहीं थे। सरकार द्वारा सम्मानित किए जाने के बाद इन आंदोलकारियों ने भी शायद अंनत कुमार व बुआ सिंह की सजा को मांफ कर दिया वरना कहीं तो कोई गूंज इन्हें सजा दिलाने के लिए सुनाई पड़ती।
देहरादून में जुटी सैकड़ों की भीड़ किसी गैरसैंण को मांगने नहीं आई थी कोई रोजगार मांगने नहीं आई थी वह तो इसीलिए आई थी ताकि उन्हें पेंशन मिल सके उनको बच्चों को नौकरी मिल सके। महिलाएं अपने उत्तराखंड आंदोलन की तस्वीरों का एलबम लेकर पहुंची थी। तो कोई सरकार से निवेदन करती अर्जी लेकर। महिलाओं के पास से अर्जिया पढ़कर गर्दन शर्मशार हुई जा रही थी जिनमें लिखा था कि आपसे महानिवेदन है कि आप हमारा चिन्हीकरण कर दें हम आपके आजीवन आभारी रहेंगे। ये है सरकार के मंसूबों की सफलता। उत्तराखंड पर राज करने वाले सत्तासीन दल व विपक्षी दल कामयाब हुए हैं जनता को उत्तराखंड के मुददों से भटकाने के लिए। उन्हें भीख मांगने की मुद्रा में खड़े करने के लिए। सम्मेलन का नेतृत्व करने वाले लोगों ने भी उन्हें यही माहौल दिया।
दरअसल जिन कथित आंदोलकारियों का यह सम्मेलन था उनके एंजेडे में राज्य को नेता गुंड़ों व माफियाओं के चंगुल से छुड़ाने के लिए दोबारा एक आंदोलन खड़ा करने का कोई मुद्दा नहीं था। उनका एक सोचा समझा एजेंड़ा था कि राज्य में चिन्हीकरण की प्रक्रिया तेज हो, नियम के हिसाब से आंदोलनकारियों को पेंशन नौकरी मिले। आंदोलनकारियों का बहुुद्देशीय कार्ड बने जिसमें उन्हें बेरोकटोक सचिवालय व विधानसभा में नेता व अधिकारियों से मिलने की इजाजत हो जाए, यात्रा, चिकित्सा सहित नौकरियों में आरक्षण की सुविधा मिल जाए। सम्मेलन में आई सैकड़ों की भीड़ के चिन्हीकरण की रट इस बात को साफ बयंा कर रही है कि ऐतिहासिक उत्तराखंड आंदोलन का अंत किस हश्र के साथ हो रहा है।
ठीक इसके विपरीत उत्तराखंड आंदोलनकारियों की एक जमात ऐसी भी है जिन्होंने नौकरी पेंशन नहीं ली। इसे उत्तराखंडी अवाम के संघर्षों के विराम की साजिश कहते हुए इसका विरोध किया। ऐसे बेशक कम लोग हों लेकिन आज भी उनकी लड़ाई इस बात को लेकर है कि क्यों पहाड़ के जल जंगल जमीन कौड़ी के भाव बाहरी बिल्डरों व माफियाओं को सौंपे जा रहे हैं। क्यों पहाड़ के उद्योगों में यहां के लोगों को सम्मानजनक नौकरी नहीं मिल रही है। सिडकुल क्यों शोषण के प्रतीक बन गए हैं। विभागों की कमीशनखोरी पर क्यों लगाम नहीं लगती। पहाड़ की महिलाओं को काम के बोझ से क्यों मुक्ति नहीं मिली,चाय के खोमचों तक शराब व बिसलरी पेप्सी पहुंचाने वाली सरकार उन्हें पानी क्यों नहीं दे पा रही। जनता के पैसे को क्यों लाल बत्तियों व हवाई यात्राओं में खर्च किया जा रहा है। ये सवाल हैं एक असली उत्तराखंड आंदोलनकारी के। जो सत्ता के लुटेरों को मंच पर बैठाने से नहीं बल्कि इनके खिलाफ मार्चा खोल इन्हें सत्ता से हटाकर पूरे होंगे।

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सैकड़ों की संख्या में जुटे आंदोलकारी
आंदोलन में पिटती तस्वीरें व सरकार से भीख मांगती अर्जी लेकर पहुंचे आंदोलनकारी

सीधे आपको उन आंदोलकारियों से मुखातिब कराते हैं जो देहरादून में राज्य गठन के एक दशक पर दशा व दिशा तय करने बैठे थे। नगर निगम प्रेक्षागृह की भीड़ का नजारा तो यहीं बंया कर रहा था कि राजधानी गैरसैंण को लेकर या कहें कि उत्तराखंड के: तमाम सवालों को लेकर आज भी पूरा उत्तराखंड सड़कों पर आ सकता है। लेकिन बातों में सबकी आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण व पेंशन पर जोर था। उत्तराखंड के पलायन, बेरोजगारी जैसे मुद्दे जुबान पर थे तो बस रटे रटाए। । बेशक सभी ने यह स्वीकारा कि हमारे सपनों का उत्तराखंड अभी नहीं मिला है लेकिन कोई आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण तो कोई सम्मान देने की बात में ही अटका रहा। कुछ ही लोग थे जिन्होंने यह स्वीकारा कि आज लड़ाई सम्मान पत्र से ज्यादा बेहतर उत्तराखंड बनाने के लिए लडऩे की है। ताकि सभी को सम्मान मिल सके। सम्मेलन का नाम उत्तराखंड राज्य निर्माण सेनानी सम्मेलन रखा गया था जिसकी तर्ज पर ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को मिलने वाली सुविधाओं की मांग की जा रही थी। दो दिनों तक लगातार संबोधनों का दौर चलता रहा। मंच पर बारी-बारी से राजनीतिक दलों के नेताओं को बुलाया जाता रहा दो दिन तक मंच पर बैठने वाले नेताओं में हरीश रावत, जोत सिंह गुनसोला, नारायण सिंह जंतवाल, बीडीरतूड़ी, किशोर उपाध्याय, वेद उनियाल, रवीन्द्र जुगरान, रहे। दो दिन तक नॉनस्टाप संबोधनों का दौर चलता रहा। कुछ शहीदों के परिवारजनों को सम्मानित किया गया लेकिन किसी ने जहमत नहीं उठाई कि उन्हें मंच पर लाकर माला पहनाई जाय। वह भीड़ में जहां बैठे थे वहीं उन्ही के गले में माला पहना दी गई। आखिर मंच पर उनके लिए जगह भी कहां थी वहां तो नेता बैठे थे। सम्मेलन के बीच में कुछ अन्य सावित्री कैड़ा सरीखी कथित महिलाओं द्वारा भी खुद को मंच पर नहीं बिठाने के विरोध में नारे लगाने शुरू कर दिए। सम्मेलन में संबोधित करने वाले लगभग सभी लोग या तो भाजपा से जुड़े थे या फिर कांग्रेस से। कुछ अपवाद थे जो अपने संगठन तले अभी लड़ाई लड़ रहे हैं।
विदित हो कि 2005 में गठित उत्तराखंड राज्य आंदलोनकारी मंच का यह पहला वार्षिक सम्मेलन था। जिसे उन्होंने उत्तराखंड राज्य निर्माण सेनानियों के सम्मेलन का मान दिया था। इसमें प्रदेश समेत दिल्ली से भी आंदोलकारियों ने हिस्सा लिया। प्रदेश के हर जनपद से लगभग 10 से 15 के बीच आंदोलनकारी आए। सम्मेलन में पूरे प्रदेश से लगभग 700-800 आंदोलनकारी आए थे। अधिकांश गांव की सीधी महिलाएं इसीलिए सम्मेलन में आई थी उन्हें लगा कि उन्हें नौकरी या पेंशन मिलने वाली है वह पंजीकरण रजिस्ट्रर में भी अपना नाम पता साफ साफ नोट कर रही थी ताकि कल के दिन वह कह सकें कि हम भी सम्मेलन में आए थे हमें भी नौकरी दो। किच्छा से आई एक महिला के कार्ड में इच्छा हो जाने से उन्हें बड़ी चिंता सालती रही दो दिन कि इसे कोई किच्छा कर दो वरना मुझे गलत पते के कारण नौकरी नहीं मिलेगी । वह दोनों दिन पंजीकरण करने वाली महिला को ही ढूंढते रही। आंदोलन में हिस्सा लेने वाली महिलाएं बूढ़ी हो चुकी हैं इसीलिए वह अपने बेटे के लिए नौकरी चाहती हैं। इस सम्मेलन के मुख्य आयोजक राज्य आंदोलनकारी मंच के प्रदेश अध्यक्ष जगमोहन नेगी, सचिव रामलाल खंडूडी, प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप कुकरेती, मोहन सिंह रावत सहित अन्य कई लोग थे।

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आखिर किस नीति का हिस्सा था यह सम्मेलन
पूरे सम्मेलन में लगातार मंच पर सम्मानित होते राजनीतिक दल के नेताओं( जिन्होंने इन दस सालों में बारी बारी से इसे लूटा है) को देखते हुए सम्मेलन के आयोजकों पर सवाल उठना लाजमी है कि सम्मेलन के पीछे की इनकी मंशा क्या थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि ये अपने खाने कमाने का जुगाड़ फिट कर रहे थे। हालांकि इन्होंने सम्लेलन से पहले बताया कि यह सम्मेलन सर्वदलीय होगा जिसमें उत्तराखंड के हर तबके का व्यक्ति मौजूद होगा। लेकिन जो लोग दस साल उत्तराखंड को लूटते रहे जिन्होंने यहां भी न जाने कितने मधुु कोड़ाओं को पनपने का माहौल दिया उन्हीं को मंच पर बैठाकर उनके संबोधन सुनना इनकी किस नीति का हिस्सा है यह सोचने वाली बात है।

बयान
हरीश रावत- उत्तराखंड यूपी की कार्बन कापी हो चुका है सत्ता विकेन्द्रीकृत हो चुकी है।
रणजीत सिंह वर्मा- राजधानी देहरादून बनना सबसे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण
समर भंडारी- जनता दिनों दिन बढ़ते माफियाओं को देख रही है।
सुनील कैंथोला- उत्तराखंड का जिन्न आंदोलनकारियों ने अपने संघर्ष के बूते बोतल से बाहर निकाला और खुला छोड़ दिया। सियासी दल इस जिन्न को अब अपने इशारों पर नचा रहे हैं।
विजयलक्ष्मी गुसाई- सूबे की भ्रष्ट व्यव्स्था के गले में घंटी बांधनी होगी मातृशक्ति को।
विजय भट्ट- आंदोलनकारियों से याचक नहीं बल्कि स्वालंबी की भूमिका में रहने को कहा।
सुशीला बलूनी- बेरोजगारी, पलायन भ्रष्ट्राचार पर लामबद्ध होने की जरूरत।
मोहन पाठक- साजिशन उत्तराखंड की जनता को बाहर धकेला जा रहा है।
गांव से आई महिलाएं- हमने नहीं की थी मांग की हमें नौकरी पेंशन दो या फिर हमारा चिन्हीकरण करो लेकिन सरकार जब सबका चिन्हीकरण कर रही है तो हमें बुरा लगता है कि हम भी तो जेल में रहे हमारे सामने कई लोग हैं जिनके पैर तक टूटे उनको कोई लाभ नहीं मिला।














































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