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Saturday, October 16, 2010

आत्मनिर्भरता के सपने को हकीकत में बदला देवकी ने



ओमी गुरू के परिवार ने दिखाया घर में रहकर जीविका अर्जन का रास्ता


हानी उस सामाजिक कार्यकर्ता के परिवार की है जो कभी सोवियत नारी पत्रिका का प्रचार व प्रसार करता था। लेकिन, सोवियत संघ की राजनीति में उलटफेर हुआ तो उस कार्यकर्ता को भी अपनी जड़ों की ओर लौटना पड़ा। पत्रिका बंद हो गई और अंतर्राष्ट्रीयतावाद को भारी झटका लगा। कार्यकर्ता के सामने नई चुनौतियां थीं। जमीनी सच्चाई से मुठभेड़ का वक्त था। दरअसल, देश दुनिया की तमाम प्रगति, सोविवत संघ व संयुक्त राज्य अमेरिका की वर्चस्व की लड़ाई के बावजूद, पहाड़ से पलायन का सिलसिला बदस्तूर जारी था।
कामरेड ओमप्रकाश जोशी यानि ओमी गुरू को वापस अपने सीमावर्ती गांव पिथौरागढ़ लौटना पड़ा। जहां पत्नी थी, बच्चे थे और आजीविका का संकट था। पहाड़ की ऊंचाईयों में लहरा रहे बाजार के परचम से मुकाबले का समय। बाहर से पहाड़ में घुस आया बाजार निर्मम था, लेकिन उसका चकाचौंध भरा चेहरा बड़ा मानवीय दिखता था। मानो पिछड़ गए लोगों के उद्धार का जिम्मा उसी का हो। यह बाजार गांवों की पाई-पाई निचोड़ रहा था।
विशाल उत्तर प्रदेश से खुद को मुक्त करने की पर्वतीय जनमानस की छटपटाहट अलग थी। लेकिन, हर किसी की जुबां पर यही सवाल था, भई अलग राज्य बना तो खाएंगे क्या ? कम्युनिस्ट राजनीतिक कार्यकर्ता के बतौर ओमी गुरू को यह बात जल्दी समझ आ गई थी कि जिस रफ्तार से मनीआर्डर पहाड़ पहुंच रहे हैं, उससे अधिक गति से पूंजी नीचे उतर जा रही है। सब्जी से लेकर राशन तक, नमक से तेल तक, सभी कुछ तो बाहर से ही आता है। परंपरागत अर्थव्यवस्था का हरण कर लिया गया है, उसको फिर से पैरों के बल खड़ा करना फौरी लक्ष्य है।
लेकिन, सपने को हकीकत में तब्दील करना आसान नहीं था। ओमी गुरू के पास दृष्टि तो थी, उसे अनुभव का संबल दिया पत्नी देवकी देवी जोशी ने।
जन्मजात मेहनतकश पहाड़ की महिला को बस दिशा ही तो चाहिए थी। परिवार का सफर शुरू हुआ ऐसे जहां खोने के लिए कुछ भी नहीं था, पर सामने पूरा आकाश था। चार मासूम बेटों के भविष्य के लिए देवकी हर यत्न आजमाने को तैयार थी। लोकतांत्रिक मिजाज के परिवार में बहुत बहस-मुहाबिशे के बाद यह तय हुआ कि पिथौरागढ़ में नमकीन बेची जा सकती है। मशीनें खरीदने में पूंजी का संकट था तो घरेलू उपकरणों से ही काम शुरू कर दिया गया। बेटों के हाथों में झोले थमाए गए, जिस काम को बेटों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। स्कूल की पढ़ाई में अच्छा होने के बावजूद उन्हें लोगों से सुनना पड़ता-नमकीन गुरू के बेटे। बहुत ताने, बहुत जलालत। पर कम्युनिस्ट शिक्षा से बच्चे इतने परिपक्व हो चुके थे कि बस चेहरे पर मुस्कान के अलावा कुछ नहीं मिलता।
1994 में शुरूआत की तो दुकानदारों से बहुत बारगेनिंग होती। कोई लोकल ब्रांड नहीं रखना चाहता, कोई लागत की पूरी कीमत नहीं देना चाहता। सो बड़े दुकानदारों की बजाय छोटे-छोटे दुकानदारों, चाय के ढाबों व आस-पास के ग्रामीण इलाकों आदि को प्राथमिकता में रखा गया। सीधे घरों तक भी पहुंच बनाई गई। हर आदमी खरीद सके इसलिए एक रुपए के भी पैकेट बनाए गए। बेटे यदि नमकीन के पूरे स्टॉक के साथ भी लौटते तो मां का दुलार कम नहीं होता। कोई बात नहीं बेटा आज नहीं तो कल बिक जाएगा। शुरुआती दिनों में बहुत तरह के भय व दवाब सहे। पर मेहनत व पसीने का यह संघर्ष धीरे-धीरे रंग लाने लगा। सफाई, स्वाद व कीमत में देवकी देवी का ब्रांड पसंद किया जाने लगा। लोग खुद मांगने लगे। तीन साल बाद थोड़ी-थोड़ी पूंजी बचने लगी तो खादी ग्रामोद्योग से लगभग डेढ़ लाख का लोन लेने का निर्णय हुआ। इस पैसे से मशीनें खरीदी गईं। साथ ही उद्योग को कुमाऊं नमकीन के नाम से रजिस्टर्ड कराया गया।
स्थानीय बाजार में मांग थी। क्योंकि, बाहर से हल्दीराम आदि के जो ब्रांड आए थे, वे महंगे थे तथा हल्द्वानी, पीलीभीत व बरेली से आने वाला माल पिथौरागढ़ तक आते-आते बासी पड़ जाता था। ग्राहक शिकायत करते तो दुकानदारों के पास कोई जवाब नहीं होता। ऐसे में कुमाऊं नमकीन से बेहतर विकल्प नहीं था। यदि इस माल में कोई शिकायत भी आती तो उसकी शिकायत की जा सकती थी।
मांग व आपूर्ति की समझ रखने वाले ओमी गुरू यह भली भांति देख रहे थे कि पिथौरागढ़ का कस्बा, अब नगरीय रूप ले रहा है। यहां बड़ी संख्या में सेना व शिक्षा से जुड़े लोगों के घर बन रहे हैं। इन घरों की ड्राईंग रूम को अच्छी नमकीन की तलाश है। सो ब्रांड को और बेहतर बनाने की सोची गई, साथ ही उसमें विविधता लाने का प्रयास भी हुआ। मशीन आने से अधिक मात्रा में नमकीन बन सकती थी, साथ ही उसमें सफाई भी आने लगी थी। अब पैकेजिंग के काम पर भी ध्यान दिया गया। धंधा चल पड़ा था। पूरे परिवार के लिए यह सुखद अहसास था कि पहाड़ के लोग कोशिश करें तो पयालन थम सकता है। इस बीच चारों बेटों ने अच्छी शिक्षा भी हासिल कर ली। कुलीन ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से डिप्लोमा कर गढ़वाल विवि के श्रीनगर परिसर में शिक्षण शुरू किया है। रवि ने राजनीतिशास्त्र में शोध कर अल्मोड़ा परिसर अल्मोड़ा में नौकरी पा ली है, सबसे छोटा कमल एयरफोर्स मुंबई में तैनात है। वहीं, अमित राजनीतिशास्त्र में शोध कर छात्र राजनीति व लिंगदोह समिति की सिफारिशें विषय पर शोध भी कर रहा है। चारों बेटे जब भी समय मिले मां के काम में आज भी हाथ बंटाते हैं। कुमाऊं नमकीन का नाम आज प्रदेश ही नहीं पूरे देश में पहुंच चुका है। देश की कोई व्यापारिक प्रदर्शनी कुमांऊ नमकीन के स्टाल के बिना अधूरी मानी जाती है। अब तक प्रदेश के हर जिला मुख्यालय व राजधानी देहरादून समेत दिल्ली, जयपुर, भोपाल, इलाहाबाद, बरेली, प्रगति मैदान दिल्ली, मेरठ आदि दर्जनों नगरों में स्टाल लग चुके हैं। लगभग हर नगर में पूरा का पूरा स्टॉक निकल जाता है।
देवकी देवी के लिए वह दिन बड़ा शुभ था जब उसे बताया गया कि वह देश भर में छोटा उद्यम खड़ा करने वाले लोगों में सर्वोच्च चुनी गई हैं। 2004 में उन्हें यह पुरस्कार वित्त मंत्री पी चिदंबरम के हाथों मिला। पुरस्कार देश भर से चयनित 20 हजार लोगों में से मिला था। जब 300 में से टॉप टेन में नाम आया तो देवकी ने तसल्ली की कि यह भी काफी है, क्योंकि वह पूरे उत्तर भारत में प्रथम थी। लेकिन, दिल्ली में जब उसका नाम प्रथम विजेता के रूप में पुकारा गया तो खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। अपने अनुभव बताते हुए देवकी ने कहा मेरी आंखें आंसुओं से भर गई थीं। मुझे अपने पति व बेटों का सारा संघर्ष याद आ गया। मेरे बेटों ने किताब पढऩे व गाय का गोबर निकालने के काम में फर्क नहीं किया। उनका मानना है पहाड़ की महिलाओं को स्वयं में आत्मविश्वास लाना चाहिए। वह कुछ भी कर सकती हैं, बस एक लक्ष्य तय कर लें। सरकार से अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए वह कहती हंै, उसने स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए कुछ नहीं किया है। सरकार को बड़े उद्योगों की बजाय छोटे-छोटे उद्यमों को बढ़ावा देना चाहिए, इसी से टिकाऊ विकास आएगा। देवकी देवी ने बताया कुमाऊं नमकीन अब स्थानीय कृषि उत्पादों से नमकीन तैयार करने पर जोर दे रही है। हाल में मडुए से बनी नमकीन व भुजिया बाजार में लाया गया तो हाथों हाथ बिक गया। आज मडुवा व सोयाबीन (भट) की नमकीन हमारी पहचान बन चुका है। हमने इस बार मदकोट के गांवों से 100 कुंतल मडुवा खरीदने का लक्ष्य लिया है, पिछले साल 52 कुंतल खरीदा था। इससे बेचने वाले किसानों को भी बल मडुवा उगाने को बल मिला है।
देवकी को केन्द्र सरकार ने पुरस्कृत क्या किया, राज्य के सभी पुरस्कार उनकी झोली में आने लगे। लगभग हर दूसरी संस्था उन्हें सम्मानित करने को लालायित हो गई। राज्य के लघु व कुटीर उद्योग विभाग को यदि दूसरे राज्यों में अपनी प्रदर्शनी ले जानी हो तो उसे सबसे पहले कुमाऊं नमकीन की याद आती है। देवकी देवी को सरकार आज अपने ट्रेनर के तौर पर नए उद्यमियों को सिखाने के लिए भी बुलाती है।
देवकी के परिवार को लंबे समय से जानने वाले अर्थशास्त्री प्रो. मृगेश पाण्डे कहते हैं, जरूरत सरकार को देवकी के परिवार से सीखने की है। यह परिवार दूसरे तमाम परिवारों के लिए एक मिशाल बन सकता है। पाण्डे कहते हैं जब राज्य की सरकार 16000 करोड़ के कर्ज में डूबी हो, ऐसे समय में यह छोटी अर्थव्यवस्था ही राज्य के पलायन को रोक सकती है। यह समझ लेना चाहिए कि तराई में लगे बड़े-बड़े उद्योग भी हमारे काम के नहीं हैं, क्योंकि वह रोजगार कम देते हैं जबकि स्थानीय पूंजी को चमड़ी समेत उधेड़ ले जाते हैं, जो बहुत खतरनाक है।

2 comments:

Travel Trade Service said...

बहुत शुभ कामनाएं देवकी जी !!!!!!!!!!!!!!

सुशील कुमार छौक्कर said...

संघर्षो की इस जीवन यात्रा को पढ़्कर कमजोर होंसलो को कुछ हिम्मत मिल जाती है।