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Wednesday, October 27, 2010

उपेक्षित हैं मूल कलाकार- राही

कुमाउनी -गढ़वाली के लोकप्रिय गायक सत्तर वर्ष की उम्र में भी निरंतर सक्रिय
सर्ग तारा जुन्याली राता को सुणौलो तेरी मेरी बाता व हिलमा चांदी को बटना तेरी मन छौ मेरी रटना, जैसी पंक्तियों से भला किसका रिश्ता नहीं। ऐसा प्रतीत होता है ये गीत हिमालयवासियों के सौंदर्यबोध की विकास यात्रा का प्रारंभ बिंदु रहे हैं। जैसा कि, पांच नदियों से सींचे गए उर्वर प्रदेश पंजाब के चारागाहों में हुआ। वेदों की ऋचाओं के कोई न कोई रचनाकार तो रहे ही, क्योंकि कविता हर किसी के बूते की बात नहीं, आत्मिक स्पर्श से वह भले हर किसी को अपनी लगती हो। लेकिन, इस काल में इतिहास का चैतन्य कहें या कहें व्यक्तिवाद इतना सजग नहीं था कि गीतों के शिल्पियों को याद रखा जाय। आदिम साम्यवाद में संपत्ति की तरह ही बौद्धिक संपदा भी निजी नहीं थी। हर्ष का विषय है कि, ऊपर लिखी पंक्तियों के रचनाकार न सिर्फ ज्ञात हैं, बल्कि वे अपनी सतायु में भी निरंतर सक्रिय व सरस हैं। युवाओं के लिए सुरुचिपूर्ण गीत रच सकें, इसके लिए वह दिल में अपने को युवा बनाए रखने का भरसक प्रयास करते हैं।नाम। चंद्र सिंह राही। जन्म। पौड़ी के एकेश्वर ब्लॉक के चौनकोट गांव में। प्रारंभिक गुरू। जागर के महारथी व पिता देवराज सिंह। उन्हीं की संगत में गायन की क्लासिकी का रियाज शुरू हुआ। पिता की भावना थी कि बेटा पुरखों से मिली विरासत को आगे ले जाए, उसे संवारे, और नाम कमाए। आठवीं तक की पढ़ाई गांव में हुई। यहां, जंगलों में चरवाहा बनकर खूब बंसी बजाई, गले को खूब साधा। बाकी वाद्य यंत्रों को भी आजमाया। गुरू पिता सुलझे हुए कलाकार थे। जीवन के दर्शन की गहरी समझ थी। राही यह बताने में अत्यंत कृतज्ञ महसूस करते हैं कि उनका ज्ञान बस पिता की अमानत है। पिता ने इसे अपने पुरखों से लिया। लोक गायन या लोक वाद्य एक व्यक्ति या एक पीढ़ी के नहीं हो सकते। उसमें सदियों का योगदान होता है। जीवन के भोगे हुए का सार ही तो लोक मन है। वह चिंतन व अभिव्यक्ति के धरातल पर फूट पड़े तो गीत बन जाते हैं। राही की यात्रा बचपन से ही शुरू हो गई। सन् 1967। पहली बार आकाशवाणी के लिए गाना हुआ तो क्रम कहीं रुका नहीं। दिमाग पर जोर डालते हुए कहते हैं, पहला गीत-यह कोई सवाल-जवाब वाला गीत था। घस्यारिन व पतरोल के बीच का जैसा संवाद। 10वीं देहरादून से की और बाद में दिल्ली आने पर हिंदी साहित्य रत्न व प्रभाकर की डिग्री ली। मन गांव में था, लेकिन रोजी दिल्ली से बांधे रही।40 वर्षों के कॅरिअर में गायन व वाद्य यंत्रों पर तमाम प्रयोग किए। संस्कार, ऋतुरैंण, नामकरण, जातियों के गीत, विवाह गीत, चूड़ाकर्म, खुदेड़ व नराई गीत। इन सब में कुछ न कुछ नया जोड़ा। राही का पक्का विश्वास है, जब तक नई पीढ़ी को लोक गीतों की खूबसूरती का अहसास व वाद्य यंत्रों की बारीकियों का ज्ञान ट्रांसफर नहीं होगा, कला का विकास व संरक्षण संभव नहीं। यदि वे चलताऊ विधा से काम चला रहे हैं तो इसका मतलब है, पुराने कलाकारों ने ज्ञान को प्रसारित नहीं किया। उस पर आसन लगाकर बैठे रहे। राही की चिंता है, मूल कलाकारों का तेजी से ह्रास हो रहा है। पूछते हैं, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में फरक क्या रह गया, कलाकारों को पहचानने वाला अब भी कोई नहीं है। पहाड़ को जातिवाद का कोढ़ ले डूबा है। असली कलाकार को आदर मिलता है, न ही पैसा। लोक धुन के धुनी राही ने शुरुआत में दूरसंचार विभाग में भी नौकरी की, लेकिन उसमें अधिक दिन तक मन नहीं लगा। नौकरी छोडऩे के बाद गांव-गांव घूमकर कलाकारों पर आधारित छोटी-छोटी डॉक्यूमेंट्री बनाईं। मध्य हिमालय की जनजातियों, पिथौरागढ़ के वन रौतों, पंच प्रयागों, गंगा में प्रदूषण, गढ़वाल की भोटिया जनजाति, कुमांऊ की सांस्कृतिक जात पर डॉक्यूमेंट्री बनाने समेत 2500 विलुप्त होते गीतों को भी रिकार्ड किया। लोकगीत व नृत्य, लोक वाद्यों तुलनात्मक व्याख्या, ढोलसागर, ढोल दमाऊ, हुड़का, डमरू, थाली, डौर थाली, वादन गायन, सिणैं, शहनाई, हुड़का, विणाई आदि पर वृहद संकलन कर लिया है। संभवत: वह आने वाली पीढ़ी के लिए संग्रहालय का पर्याय बनेंगे। राही का विश्चास है, लोक से सभी विधाएं जुड़ी हैं। समय के साथ परिवर्तन आता है, आता रहेगा। तांबे के बर्तन बना रहे हैं वह भी एक संस्कृति है, शिल्पकार मकान बना रहा है वह भी संस्कृति है। भोटिया लोग कपड़े, दन, शॉल बना रहे हैं वह भी संस्कृति है। राही कहते हैं, कुमाऊं के लोगों ने मुझे, स्वर्ग तारा जुन्याली राता व हिलमा चांदी को बटना, से याद रखा तो गढ़वाल वाले मुझे, सतपुलि को सैंणा मेरी बौ सुरेला, बौ मी ना जाणां मेरी बौ सुरेला से जाना। फिलहाल, दिल्ली में उत्तराखंड कला संगम नाम से ग्रुप चला रहे हैं।

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