My Blog List

Wednesday, October 27, 2010

देश भर के बर्ड वाचर पहुंचे गढवाल की वादियों में.

यह एक रोचक काम था। चिडिय़ों की आवाज सुनने का, उन्हें करीब से उड़ते देखने का। सचमुच शहरी जीवन की यांत्रिकता से एकदम उलट। कितनी अच्छी थकान। यह उद्गार आईआईटी कानपुर के छात्र अभिनव मलासी व अंशुल शर्मा के थे। वह गढ़वाल की 12 नदी घाटियों में चली तीन दिवसीय ग्रेट हिमालयन बर्ड काउंट के हिस्सा थे। यह अभियान 7, 8 व 9 नवंबर को गढ़वाल की यमुना, टोंस, भागीरथी, भिलंगना, मंदाकिनी, अलकनंदा व गंगा समेत झिलमिल व आसान संरक्षित क्षेत्र में एक साथ चला। देहरादून के पक्षी प्रेमियों की संस्था आर्क की पहल को बाल भवन दिल्ली, वन विभाग, यूकोस्ट व उत्तराखंड टूरिज्म ने सहयोग दिया था। अभियान में भारत में बर्ड वांचिंग के पितामह कहे जाने वाले सालिम अली के सहयोगी रहे बंगलुरु से आए 70 वर्षीय एसए हुसैन थे तो 80 साल पूर्व पूर्ण विलुप्त घोषित जॉर्डन पारसर को दोबारा खोज निकालने वाले पूना से आए डा. भारतभूषण भी थे। अभियान 15 टीमों के माध्यम से चला, प्रत्येक टीम में 5 से 7 सदस्य शामिल थे। उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों के पक्षी प्रेमियों समेत चंडीगढ़, मुंबई, दिल्ली विश्वविद्यालय, सूरत आदि से कुल 112 लोगों ने शिरकत की। उत्तराखंड में पक्षियों की गणना का बेसिक डाटा तैयार करने की महत्वाकांक्षा व वन्यजीवों के प्रति अनुराग पैदा करने के इरादे से की गई यात्रा को प्रदेश के वन मंत्री विशन सिंह चुफाल ने झरी झंडी दी। इस मौके पर उपस्थित उत्तराखंड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के निदेशक डा. राजेन्द्र डोभाल ने युवाओं से कहा यह कसरत उनके जीवन के लिए नए आयाम खोलने वाली साबित होगी। इससे उन्हें पक्षियों से प्रेम तो होगा ही साथ ही यह समझ भी मिलेगी कि प्रकृति की इस अनूठी विरासत को कैसे संहेजा व संरक्षितज किया जाय। आर्क संस्था ने इस क्षेत्र में ग्रेट हिमालय बर्उ काउंट को पिछले साल भी संचालित किया था। पहले प्रयास को प्रकृतिपे्रमियों, स्कूलों के अध्यापकों, वैज्ञानिकों व वन अधिकारियों की विशेष सराहना मिली। संस्था के संयोजक प्रतीक पंवार कहते हैं, बर्ड काउंट सिर्फ चिडिय़ों की संख्या जान लेने का उपक्रम भर नहीं है। हालांकि, आने वाले दिनों में गढ़वाल के साथ, कुमाऊं व फिर उससे अगले क्रम में पूरे हिमालय की पक्षी संपदा का आंकलन करने की योजना है, लेकिन मकसद इससे कही बड़ा है। पंवार बताते हैं हम स्थानीय निवासियों, सरकार व प्रकृति को जानने वालों की मदद से एक बड़ा आन्दोलन खड़ा करना चाहते हैं। महानगरों के बंद व यांत्रिक माहौल में रहने वाली युवा पीढ़ी पक्षियों व अन्य वन्यजीवों से रू-ब-रू हो, साथ ही स्थानीय युवाओं को पर्यटन का एक नया क्षेत्र मिले। पर्यटन सिर्फ हिमालय व वनों का दृश्य भर नहीं है, वह वहां रह रहे हर तरह के जीवन में भी है। अभियान यदि कुछ और बार संचालित हो जाता है तो हम वन्यजीवों व जंगलों की स्थिति पर कुछ ठोस कहने की भी स्थिति में होंगे। कहां चिडिय़ों की तादात ठीक है, और कहां वे कम हो रही हैं। इस सब में चिडिय़ां एक प्रतीक भर हैं, बल्कि उन्हें हमारी संकटग्रस्त जैव विविधता के रूप में देखा जाना चाहिए। निष्कर्ष बाकायदा राज्य व केन्द्र के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को सौंपे जाएंगे। कुल 32 ट्रैकों को नाप कर लौटी टीमों के अनुभव सुनने को बाकायदा अंतिम दिन वन विभाग के दून स्थित मंथन सभागार में मुख्य सूचना आयुक्त डा. आरएस टोलिया, अपर प्रमुख सचिव एनएस नपच्याल, प्रमुख वन संरक्षक डा. आरबीएस रावत समेत बड़ी संख्या में लोग आए। अनुभव मिश्रित थे। कुछ घाटियों में खूब चिडिय़ां व वन्यजीव दिखे तो कुछ क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम। इन अनुभवों को चिडिय़ों की पिछली इंडेक्सिंग से मिलान कर प्रस्तुत किया गया। प्रमुख वन संरक्षक डा. रावत ने कहा उत्तराखंड के वनों में देश में पाई जाने वाली लगभग 630 पक्षी प्रजातियों में से लगभग आधी प्रजातियां पाई जाती हैं। यह हमारे प्रदेश की बहुत बड़ी संपदा है, जिस पर हम गर्व कर सकते हैं। यहां साइवेरिया के चलकर पक्षी आते हैं। ब्राह्मिनी डक जैसे पक्षी तो भरतपुर को छूकर अंतत: यहां एकत्र हो जाते हैं। राज्य के छह राष्ट्रीय पार्क व छह सेन्चुरियां पक्षियों के लिए एक बड़ा आसरा हैं। उन्होंने घरों के आस-पास पाई जाने वाली गौरेया के तेजी से घटती संख्या पर चिंता भी जताई। डा. टोलिया ने कहा युवाओं ने राज्य वन महकमे को रौशनी दिखाने का काम किया है। वास्तव में यह काम वन विभाग का है, लेकिन आने वाले दिनों में जंगलों में काम करने वाले वन रक्षकों को ऐसे अभियानों में शामिल किया जा सकता है। उन्होंने कहा वह पक्षियों के बारे में जानकारी देने वाले सबसे प्रामाणिक स्रोत बन सकते हैं।

No comments: