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Saturday, October 30, 2010

जश्ने आजादी की पूर्व संध्या पर मुशायरा सम्मेलन

जब बटी म्यर गौंक एक आदिम मंत्री बण तब बटी म्यर गौं गौं नी रेगे विधान सभा हैगे। जश्ने आजादी की पूर्व सन्ध्या पर गायी गयी ये पंक्तियाँ गढ़वाल के सुप्रसिद्ध हास्य कवि गणेश खुगशाल की हैं। संस्कृति विभाग द्वारा आजादी की पूर्व सन्ध्या पर कवि सम्मेलन व मुशायरे का आयोजन किया गया जिसमें देश भर से आये कवियों ने अपनी अपनी कविता के माध्यम से आजादी, राजनीति व रिश्तों के बदलते स्वरुप को व्यक्त किया। दिन के उजेरे में ना करो कोई ऐसा काम कि नीदं जो न आये तुम्हें रात के अंधेरे में। इस तरह के व्यग्यों से सबको हँसाने वाले दिल्ली से आये जाने माने कलाकार अशोक च्रकधर ने कवि सम्मेलन का संचालन किया। भोपाल से आयी र्उदू की मशहूर शायरा नुसरत मेहदी साहिबा ने क्यों मेरा दर्द लिया सहा करते हो कुछ पुराना लिया दिया है क्या नज्म गाकर अपनी मधुर आवाज से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं मंजर भोपाली ने प्रेम का संदेश देते हुए जो भी आया उसे सीने से लगाया हमने हम तो सबसे मिलते रहे गंगा के समान । व तुम भी पिओ हम भी पिएं रब की मेहरबानी प्यार के कटोरे में गंगा का पानी। व राजनीति पे व्यग्ंय करते हुए कहा कि खुद अपने आप ही सुधर जाईये तो बेहतर है ये मत समझिए कि दुनिया सुधरने वाली है। कलकत्ता से आये मुनव्वर राणा ने अपनी कविताओं से सभा को गमनीन कर दिया। घर में रहते हुए गैरों की तरह होती हैं बेटियाँ धान के पौधौं की तरह होती है उड़ के इक रोज ये बहुत दूर चली जाती है घर की शाखों में ये चिडिय़ों की तरह होती है। व आज फिर कूड़ेदान में एक बच्ची मिल गयी। कल अपने आप को देखा था माँ की आखों में ये आइना हमें बूढ़ा नहीं बताता है। पलायन पे मुनव्वर की वाणी कुछ इस तरह बोल उठी ना जाने कौन सी मजबूरियां शहर लायी उसे वो जितनी देर भी जिन्दा रहा घर याद करता रहा। वहीं लखनऊ से आयी सीमा सागर के काव्य छन्द में लिखे आधे घण्टे के उत्तराखण्ड के परिचय से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। नैनीताल से आये उत्तराखण्ड के जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा ने लोगों से जागने का आह्वान आज हिमालय तुमनकें धतुयछ जागो जागो ओ म्यारा लाल से किया तो वहीं से आये मशहूर शायर व युगमंच नाट्य अकादमी के जहूर आलम ने भी देश में छाए सन्नाटे को तोडऩे की बात कही। ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के गाने के मशहूर कवि व दुष्यंत की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले बल्ली सिहं चीमा ने हिन्दुस्तान की असलियत निम्न पंक्तियों से बयान की। खुश है रहबर फाइलों में देखकर खुशहालियां असली हिन्दुस्तान में तो अब भी गुरबत है तो है। सैणी बैग बच्चा बूढ़ा हम जां ले रूंलौ रे अपण अपण बाट देश क छजूलौ रे इन पंक्तियों के माध्यम से देश को सजाने की बात की कुँमाऊनी के मशहूर हास्य कलाकार शेर दा अनपढ़ ने । देहरादून के ही कवि सोमवारी लाल उनियाल ने आज के मौसम के माध्यम से मत्रिंयों पर व्यंग्य करते हुए कहा कि इस बार भी किसी मंत्री की तरह आया बसंत और हाथ हिलाकर चला गया। कार्यक्रम के अन्त में सुरेन्द्र शर्मा ने काफी देर तक दर्शकों को अपने हास्य व्यग्यों से बाँधे रखा। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राज्यपाल बीएल जोशी थे व अध्यक्षता मुख्यमत्रंी जी ने करते हुए शहीदों को याद किया। योगेश पन्त व प्रकाश पन्त के सहयोग से कार्यक्रम सफल रहा।

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