My Blog List

Saturday, October 16, 2010

पहाड़ की औरतें तो रोज लांघती हैं चोटियाँ

चंद्रप्रभा एतवाल पर्वतारोहण के क्षेत्र में एक बड़ा नाम। सरल, सहज और बेवाक। रविवार, ग्यारह जनवरी की सुबह जब उनसे मुलाकात हुई तो यकीन करना मुश्किल था कि यह वही महिला है जिसने तीन-तीन एवरेस्ट अभियान सफलतापूर्वक पूरे किए। जो अजुर्न अवार्डी हैं। जिन्हें पदमश्री से भी नवाजा जा चुका है। जब उनसे पूछा गया कि कैसे चढ़ गई आप ऊंची-ऊंची चोटियों पर? वह भी एक महिला होकर तो बोली पहाड़ की औरतें तो रोज ही ऐसा करती हैं। हां नेहरू इंस्ट्टीट्यूट ऑफ माउंटनेयरिंग ने मेरा व्यक्त्तिव जरूर बदल दिया। मैं बहुत झेंपती थी। यहां मुझे खुलने का अवसर मिला। मेरा दुनिया को देखने का नजरिया ही बदल गया। सुदूर नेपाल के छागंडू गांव मेे दरजी सिंह एतवाल के घर जन्मी चन्द्रप्रभा ने पहली तक की पढ़ाई नेपाल से ही की। कहती हैं लोगों के आपसी सहयोग से गांव में एक स्कूल खोला गया था। गुरूजी हमारे पड़ोस में रहते थे। मै उनका बचा हुआ खाना खाती, फिर बर्तन धोती। वह मुझेे पढ़ाते भी थे जिस कारण मुझे जल्दी जमा एक में दाखिला मिल गया। उम्र तो याद नहीं पर मैंने बहुत देर से स्कूल जाना शुरू किया। मेरी दीदी मुझसे 6 साल बड़ी व अनपढ़ थी। उसने मुझे पढ़ाने के लिए बहुत फोर्स किया। बहुत बड़ी होने के कारण मुझे स्कूल की पाटी(स्लेट) ले जाने में शरम लगती थी। दीद ही पाठी स्कूल में रख आती। आज जो कुछ भी हूं अपनी दीदी के विशेष सहयोग व आग्रह के कारण हूं। बचपन से ही मुझे उटपटांग कामों में अधिक रुचि थी। पिताजी तिब्बत व तकलाकोट(मानसरोवर) व्यापार के लिए जाते तो उन्हें घोड़े तक पहुंचाने के बहाने मैं घर के एक जोड़ी कपड़ों में ही जिद करके चल देती। तीन महीने का टूर होता। मेरा काम होता कि मैं वहां चाय वहैरह बनाकर पिला देती बस। दूसरी क्लास से हम भारत बार्डर आ गए थे। पांचवी तक की पढ़ाई गबर््यान से की जो कि घर से 5 किमी दूर था। पांगू से 10वीं की जिसकी परीक्षा देने अस्कोट जाती थी। रोज का सुबह शाम आना जाना रहता था। जाड़ों के सीजन में हम कुछ महीने धारचूला आ जाते थे। खेती तो ज्यादा होती नहीं थी। दसवीं पास करने के बाद घर पर बहुत ज्यादा रिश्ते आने लग गए थे। इसलिए पिताजी ने मुझे नैनीताल पढऩे भेज दिया। वहां हास्टल में रहकर 12 वीं व बीए की परीक्षा उत्र्तीण की। अल्मोड़ा से आईआईटी भी किया। फिर इलाहाबाद से शारीरिक प्रशिक्षण की डिग्री ली व उसी पद पर 1966 पिथौरागढ़ में शिक्षक के रूप में आई। घर का पूरा खर्चा फिर मैं ही चलाती थी। गांव वाले व्यंग्य करते रहते कि बाप बेटी की कमाई खाता है। एक बार स्कूल में एक सर्कुलर आया था कि कोई शिक्षक मांउटेनियरिंग का कोर्स करना चाहता है? मुझे जिज्ञासा हुई कि ये क्या होता होगा। मैने फार्म डाल दिया। तब 1972 में मुझे कॉल आया एक महीने के प्रशिक्षण में उत्तराकाशी जाना पड़ा। गढ़वाल जाना व गंगा को इतने करीब से देखना बहुत सुखद अनुभव था। प्रशिक्षण देने आर्मी वाले आए थे। पूर लेक्चर अंग्रेजी में देते थे। एकबारगी तो लगा कि मैं नहीं कर पाउंगी पर अरूणाचल प्रदेश की लड़कियों को देखकर उत्साह बढ़ा। उन्हें तो न अंग्रेजी ठीक से आती थी और न ही हिंदी। मैं कम से कम हिंदी तो पूरी जानती थी। हिमालय पहाड़ के साथ मेडिकल की पढ़ाई भी होती थी। फिर प्रैक्टिकल का दौर आया तो पहाड़ की महिला का आत्मविश्वास बढऩा ही था। पीक पर चढऩे में मैं सबसे आगे थी। वहीं से मेरे स्वभाव में खुलापन आया। कई दोस्त बने। 1975 में कलकत्ता की रमा सेन गुप्ता ने अपने हिमालय एसोसिएशन की मेंबर बनने का आग्रह पर उनके साथ 22410 फीट ऊंची बेबी शिवलिंग पीक में ट्रैंकिंग की। इसके अलावा जापान में 4-5 चोटियों व न्यूजीलैंड और नेपाल में कई चोटियों में गई। जापान के अनुभव बेहद रोमांचक रहे। वहां के लोगों जैसा स्वभाव मुझे कहीं नही लगता कि दुनिया में कहीं और होगा। अपने अतिथियों के लिए वे चाहते थे कि एक खरोंच तक न आए। इसके लिए उन्होंने किसी भी पीक पर मुझे आगे नहीं जाने दिया। वहा की एक सबसे बडी़ खासियत यह थी कि माउंटेन में चढऩे से पहले नीचे माउंटेन हट्ज बने होते हैं जहां उससे संबधित सारा सामान मिलता है। जिसको भी जिस चीज की जरूरत होती है वह उठा लेता और अभियान पूरा होने पर उस सामान को सुखाकर वहीं रख देता। एक एवरेस्ट को ही चढऩे में अब 11-12 लाख रूपये से कम का खर्चा नहीं आता। कहती हैं पहले व तीसरे अभियान में मुझे समझ नहीं आया कि मुझे आगे क्यों नहीं बढऩे दिया।दूसरे अभियान में खराब मौसम के कारण टीम आगे नहीं जा पाई। और वापस लौट गई। तीसरे अभियान में बछेन्द्री पाल हमारी टीम की लीडर थी। एवरेस्ट पर उन्हीं को परमिशन मिलनी थी जो 24 हजार फीट तक आसानी से चढ़़ सकते थे पर मुझे एवरेस्ट चढऩे से रोक दिया गया। जबकि मैं पूरी चढ़ाई आसानी से चढ़ चुकी थी। नहीं चढ़ सकने वालों को शामिल किया गया पर मुझे आधे से ही वापस आना पड़ा। मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि मुझे क्यों रोक दिया गया। दोनों अभियानों में जाने से। उनके चेहरे पर एवरेस्ट न चढ़ सकने का मलाल आज भी साफ देखा जा सकता है। आज भी इच्छा जताती हैं कि एक बार एवरेस्ट जरूर चढ़ूं। लेकिन 12 लाख तक का खर्चा उठाउंगी कहां से। कहती हैं वैसे जीवन में हर किसी को एक बार माउंटनेयरिंग जरूर करनी चाहिए. आदमी जूझने व जोखिम के इस काम से बहुत विनम्र बना जाता है। कैसा लगा पुरूस्कार पाने पर तो भरी हुई आंखें लेकर कहती हैं कि जब अजुर्न परुस्कार मिला तब मैं माणा चमोली पीक पर गई थी वहीं मुझे खबर मिली और जब पदमश्री मिला तो न्यूजीलैंड की चोटी पर थी। मां बाबू तो चल बसे थे। भाई नहीं था दीदी थी बस। तो पुरस्कार की घोषणा से मैं बहुत रोयी कि काश ये खबर मेरे मां बाबू भी सुन पाते। मेरे साथ मेरी दीदी के बच्चे भी रहते थे। वो सब भी माउंटनेयरिंग कर चुके हैं। अगर कोई मुझसे सीखना चाहता है तो मैं आज भी उन्हें राह दिखाने के लिए तत्पर हूं मैं चाहती हूं कि हर लड़की एक बार माउंटनेयरिंग का बेसिक कोर्स जरूर करें।

1 comment:

rohitsej said...

आपके ब्लॉग पढने से सिखने को मिलता है,,,के हिमालय मैं क्या हो रहा है...शुक्रिया