My Blog List

Tuesday, October 12, 2010

स्कूल का रास्ता खोजती बेटियां

फिल्म की रोशनी में शिक्षा के सवाल

पहाड़ की नंदाएं स्कूल जाना चाहती हैं लेकिन उनके स्कूल के रास्ते में कहीं पुरुष मानसिकता खड़ी तो कहीं पहाड़ी अर्थव्यवस्था की मजबूरियां। हालांकि हाल के वर्षों में पहाड़ का परिदृश्य काफी बदल गया है। अब ठेठ गांवों में भी स्कूल के रास्ते पर हिरनियों की तरह कुलांचे भरती लड़कियों का दिखना आम हो गया है। इसके बावजूद नंदा की पैली जात फिल्म की उपयोगिता कहीं कम नहीं होती। यह फिल्म सरकारी प्रचार की तरह ऊबाउ नहीं है। पेशेवर अंदाज में बनाई गई ऐसी फिल्म है जिसमें वृत चित्र की निरसता नहीं परोसी जाती। बल्कि वह समय के साथ सवाल उठाते हुए चलती है।
आजकल कुकरमुत्ते की तरह गढ़वाली गीतों और फिल्मों की सीडी जिस मात्रा में आ रही है उसके बीच कोई नई सीडी देखना भी एक साहसिक कार्य है। आमतौर पर ऐसा जोखिम न लेने के बावजूद नंदा की पैली जात को देखने के बाद लगा कि सालों बाद कोई गढ़वाली फिल्म ऐसी आई है जो निराश नहीं करती बल्कि उम्मीदें जगाती है कि हिलीवुड में भी कई प्रतिभशाली फिल्मकार हैं जिन्हें यदि आर्थिक मदद मिले तो वे अपनी रचनाधर्मिता के जरिये नए मुकाम हासिल कर सकते हैं। फिल्म में गीत नाटिका शैली में लोकोक्तियां चांचरी जागर का भी प्रयोग किया गया है। फिल्म की फोटोग्राफी बेहद खूबसूरत है। फिल्म की खासियत यह है कि निर्देशक महेश भट्ट ने चिकने-चुपड़े चाकलेटी चेहरों की बजाय पहाड़ के आम चेहरों पर यकीन किया। उनमें कुछ खुरदरे हैं तो कुछ इतने मासूम कि सहज ही ठेठ गांव के चेहरे लगते हैं। यही इस फिल्म की ताकत भी है। निर्देशक ने आम चेहरे लेकर जोखिम जरूर उठाया लेकिन यह कामयाब जोखिम रहा। फिल्म के हर कलाकार ने बिना लाउड हुए अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है। फिल्म के सूत्रधार के रूप में दिनेश बौड़ाई का अभिनय तो बहुत अच्छा है लेकिन आवाज कमजोर है। जिन्होंने भारत एक खोज में ओमपुरी या महाभारत में हरीश भीमानी की दमदार आवाज सुनी होगी वे समझ सकते हैं कि धीर गंभीर आवाज सूत्रधार को कैसे करिश्माई बना देती है। फिल्म में खटकने वाली भी कुछेक बातें हैं जैसे लड़कियों की शिक्षा के महत्व पर कुछ महिला आईएस अधिकारी के कथन एक व्यवधान की तरह आते हैं। वृतचित्र का भी एक प्रवाह होता है। पेशेवर रूख की पहली मांग रही है कि फिल्म तलुवे सहलाती हुई सी न लगे। हो सकता है यह निर्माता या निर्देशक की आर्थित मजबूरी रही हो लेकिन इसे ज्यादा गरिमापूर्ण तरीके से भी फिल्माया जा सकता है। निर्देशक चाहते तो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कामयाब पहाड़ की सेलिब्रिटी महिलाओं को दिखा सकते थे। इसमें बछेन्द्री पाल, हर्षवंती बिष्ट या चन्द्रप्रभा एतवालके पवर्तारोहण के दृश्य हो सकते थे तो आंदोलनों का नेतृत्व कर रही महिलाओं के दृश्य भी हो सकते थे। आखिर लड़कियों की शिक्षा का मकसद सिर्फ आईएएस बनना तो नहीं हो सकता।यह कामयाबी को दिखाने का घिसापिटा फार्मूला है। जब कोई फिल्म बनती है तो उसका सिर्फ एक ही सामाजिक संदेश नहीं हो सकता। लड़कियों को सिर्फ इसलिए नहीं पढऩा है कि वे आईएएस बनें, उन्हें इसलिए पढऩा है कि जनसंघषर्ओं के मैदान से लेकर पायलट तक के आसमान तक हर जगह अपनी छाप छोड़ती नजर आए। काश यह फिल्म ऐसा भी कुछ कह पाती। खैर निर्देशक की समझ की इन सीमाओं के बावजूद यह अच्छी फिल्म है जिसे खुले दिल से सराहा जाना चाहिए। सराहने के लिए जरूरी है कि हर परिवार इसकी एक सीडी खरीदे और फिल्म के जरिये बेटियों की अच्छाएं भी समझे और अपने गीत संगीत की ताकत को भी। सरोकार सेंटर फॉर डेवलपमेंट कम्युनिकेशन के बैनर तले बनी इस फिल्म के वितरण अधिकार नागराज फिल्म के पास हैं।

निर्देशक, छायांकन व संपादन-महेश भट्ट
लेखन-नंद किशोर हटवाल
गीत व संगीत-नंद किशोर हटवाल व किशन महिपाल
गायन-किशन महिपाल, सत्य अधिकारी, दीपा चौहान, सोना चौधरी
कलाकार-नेहा नेगी, वर्षा नेगी, सुनीता सती, विजय वशिष्ठ, वंदना नेगी, उपेन्द्र भंडारी, अनामिका।

No comments: