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Tuesday, October 12, 2010

स्त्री चिंतन कि वाहक है अल्पना



महिला लेखिकाओं की युवा पीढ़ी में घर, नौकरी व लेखन के बीच एक अद्भुत सांमजस्य बनाने वाला एक नाम है डॉ. अल्पना मिश्र। स्त्री जीवन के संवेदनशील बिंदुओं को उभारने वाली लेखिका की कहानियों ने हिंदी जगत को एक नई ताजगी दी है। भारतीय ज्ञानपीठ ने उनके दो कथा संग्रह 'भीतर का वक्त व 'छावनी में बेघर प्रकाशित किए हैं। प्रख्यात लेखक, समालोचक व तत्व विद् डा. हजारीप्रसाद द्विवेदी की भतीजी अल्पना मूलत: आजमगढ़ के बलिया जिले में जन्मी। वहीं पली-बढ़ी। प्राथमिक शिक्षा ली। उच्च शिक्षा के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। कुछ वर्षों से देहरादून स्थित एमकेपी कालेज में वरिष्ठ हिंदी व्याख्याता हैं। इससे पूर्व वे आईएमए देहरादून, काशीपुर व ऋषिकेश में भी अध्यापन कर चुकी हैं। इनकी रचनाओं का मलयालम, पंजाबी, बांग्ला व अंग्रेजी में भी अनुवाद हो चुका है। इनकी 'मुक्ति प्रसंग कहानी केरल विश्विद्यालय में पढ़ाई जाती है। साहित्यिक पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से ही शायद अल्पना छोटी उम्र से ही लिखने लगी व उनका मूल्यांकन भी होता रहा। भाषा परिषद कलकत्ता ने इस वर्ष उन्हें युवा लेखिका पुरस्कार से नवाजा है। इससे पूर्व वह मध्य प्रदेश राष्ट्र भाषा समिति का शैलेश मटियानी स्मृति व परिवेश सम्मान भी पा चुकी हैं। पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश-

लिखने का सिलसिला कैसे शुरू हुआ?
यूं तो ताऊ जी के कारण घर में शुरू से ही साहित्यिक माहौल था। तब की हिंदी की प्रमुख पत्रिकाएं धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान, माया आदि घर पर आती थी। पर मैं जब दस वर्ष की थी तो ताऊ जी का देहांत हो गया था इसीलिए उनसे लेखन के अनुभव नहीं ले सकी। लेकिन पिताजी से बहुत कुछ सीखा। पिता श्री रविन्द्रनाथ द्विवेदी किस्सागो थे। उनकी पौराणिक कथाओं व पात्रों के तार्किक विश्लेषण आज भी मेरी स्मृति व लेखन में बराबर सहयोगी हैं। लेखन की शुरुआत एक ऐसे घटना क्रम से हुई थी जिसमें पूरा परिवार हम पांचों बहनों को गाड़ी में बंद कर घूमने चला गया। बस फिर क्या था घर पहुंचते ही पिंजरे रूपी गाड़ी में बिताए उन घंटों को कापी में लिख डाला बस वही कविता बन गई। घर का प्रोत्साहन भी मिला। नामवर जी ने भी तारीफ की। संवेदनशील थी तो बस लिखते चली गई।

अभी तक किन विषयों पर लिखा? नया क्या लिखना चाहती हैं?
मेरे पति अमिताभ मिश्र सेना में ऑफीसर हैं साथ ही पढऩे में रूचि रखते हैं मेरे लेखन के आलोचक भी हैं। उनके साथ सीमा पर जब भी रही, मैं सिपाहियों की पत्नियों से मिलती। इसीलिए सेना के भीतरी जीवन पर मैंने काफी कुछ लिखा है। सेना के अंदर वर्ग भेद बहुत साफ दिखाई देता है। सामाजिकता जैसा कोई शब्द सेना की डिक्शनरी में नहीं होता वहां तो बस अनुशासन है, आर्डर है। अभी बहुत कुछ सेना पर और लिखना है। इसके अलावा महिला विषयों पर अभी बहुत कुछ लिखना है। कहानी विधा पाठकों पर जल्दी प्रभाव डालती है इसीलिए मैं अक्सर कहानी ही लिखती हूं।

आप एक प्राध्यापिका हैं, साथ में लेखिका भी क्या प्रभाव पड़ता है प्राध्यापिका के पेशे पर?
बहुत प्रभाव पड़ता है। आप विषय की इतनी गहराई में चले जाते हैं कि बच्चा फिर उस विषय को भूल नहीं पाता। वो तमाम किस्से, उदारहरण उसे मजबूत बनाते हैं विषय के प्रति। मैं मानती हूं कि अध्यापक का पेशा ही जिम्मेदारी वाला है। नई पीढ़ी जिसे आप ढालते हैं, कैसी होगी, समाज को क्या देगी ये काफी हद तक उस अध्यापक पर निर्भर होता है। मैं पूरी जीवंतता के साथ अपनी छात्राओं को पढ़ाती हूं साथ ही उन्हें बाजार की भांैड़ी और विकृत सोच से अवगत कराती हुई सचेत भी करती हूं ।

समय बदल गया है, स्त्रियां कहां पहुंची?
आज स्त्रियां कामकाजी हो गई हैं। बड़ी तादात में वे घर से बाहर निकल रही हैं। कमाने से उनमें आत्मविश्वास आया है। लेकिन अब भी अपनी कमाई पर उनका अधिकार नहीं है। ये एक शातिर किस्म की गुलामी है जो उन पर थोपी गई है। यदि वे अपनी कमाई का हिस्सा भी अपनी व्यक्तिगत जरूरतों पर खर्च कर दें तो आंखें तनने लगती हैं। किसी को अपनी ओर से कुछ दे दिया तो यह बड़ी बात हो जाती है। संपति स्त्री की तब होगी जब वह स्वंय किसी और की संपति नहीं रहेगी। वैसे भी स्त्रियों के दिमाग की कंडीशनिंग इस तरह से की गई है कि वह पितृसत्ता की जरूरतों के हिसाब से स्वंय ढल जाती हैं। दूसरी तरफ बाजार की अपनी चुनौतियां हैं जो स्त्रियों को उत्पाद बनाकर विकृत तरीके से बाजार में उतारना चाहती हैं। वास्तविक मुक्ति के लिए स्त्रियों को अभी बहुत लंबी लड़ाई लडऩी है।

स्त्री लेखिकाओं की एक बड़ी तादाद के बावजूद स्त्री चिंतक व विचारक नाम मात्र ही क्यूं हैं?
मैं मानती हूं स्त्री को महसूसना बहुत जरूरी है। किसी भी कामकाजी स्त्री का जीवन दोधारी तलवार के समान होता है जिस पर उसे रोज चलना होता है। स्त्रियों के लिए विचार, चिंतन, अनुभूति अपनी घरेलू जिम्मेदारियों को निपटा लेने के बाद की चीजें हैं। शायद पुरूषों के साथ ऐसा नहीं होता। अधिकांश लेखिकाएं अपने इन घरेलू कामों की बारीक से बारीक अनुभूतियों को तो लिख डालती हैं पर उनके कारणों व असल निदान की ओर नहीं पहुंच पाती और पुरूष को अपना दुश्मन मानने लगती हैं। कुछ ही लेखिकाएं होती हैं जो इसे एक विचार के तौर पर देखती हैं एक व्यापक वर्ग की मुक्ति के साथ उनकी मुक्ति भी देखती हैं और यही सब उसके लेखन में होता है। इसीलिए वह एक चिंतक होती हैं, विचारक होती हैं, समाज को सही दिशा देती हैं। एसी लेखिकाएं ही महाश्वेता देवी, अरूंधति राय या चित्रा मुदगल बन पाती हैं।

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