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Saturday, October 16, 2010

उसने मार्क्सवाद रटा नहीं जिया है

मुठभेड़ एक दिलेर लक्ष्मी से

क्ष्मी देवी हल्द्वानी के मोतीनगर वासियों के लिए जाना-पहचाना नाम है। होश संभालने के बाद से लेकर उम्र के ढलान तक लक्ष्मी ने जिंदगी के न जाने कितने उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन लक्ष्मी का हौंसला कभी नहीं डिगा। आज भी लक्ष्मी जब गुरबत में जी रही है उसकी बूढ़ी हड्डयिां कमजोरों, शोषितों को इंसाफ दिलाने के लिए अकड़ जाती हैं। बेशक उसने माक्र्सवाद के विचारों को घोट कर नहीं पिया पर सार्थक पहल के जरिये वह विचारों के मूल उद्देश्यों को जीती जरूर है। रूद््राक्ष की मालाएं गले में लटकाए 85 साल के झुर्रियों भरे चेहरे के अंदर युवा जोश देखकर कोई भी दंग हो सकता है। दूसरी महिलाओं की तरह वह अपने अतीत व परिवार की निजी बातों में उलझना नहीं चाहती बल्कि गैरबराबरी की व्यवस्था को उलट-पलट कर देने की बात करती है। तीन पानी, मोतीनगर स्थित जब उनके घर पर उनसे मिलने का मौका मिला तो घर की दयनीय दशा देखकर माजरा सब समझ में आ गया। यह लक्ष्मी देवी हैं, जिनकी जिंदगी का हमेशा एक ही सूत्रवाक्य रहा, संघर्ष। जिसे सब कुछ ठीक-ठाक मिल रहा हो उसे क्या पड़ी है लडऩे-भिडऩे की? लेकिन लक्ष्मी देवी की बूढ़ी हड्डियां आज भी दूसरों के लिए लडऩे-भिडऩे के लिए फड़कने लगती हैं।कच्ची जमीन पर बना हुआ घर, उस पर रिसती छत, कुपोषण के कारण विकलांग बच्चे, शूगर, ब्लड प्रेशर, आंखों से रुखसत होती रोशनी। लेकिन दुखों के पहाड़ तले दबी लक्ष्मी देवी आत्मसमर्पण करने को तैयार नहीं हैं। उनकी दिलेरी से आज भी तराई की महिलाएं व पुरूष ऊर्जा पाते हैं। जब भी कोई आंदोलन, धरना या प्रदर्शन होते हैं तो लक्ष्मी देवी ललकारती हुई सी प्रथम पंक्ति में दिखाई देती हैं। उन्हें भरोसा है कि एक दिन समाज बदलेगा, गैरबराबरी हटेगी। आदमियत का राज आएगा। पार्टी जन सहयोग से चलती है इसे बेहतर तरीके से जानने वाली लक्ष्मी बदहाली के बावजूद कहती हैं कि बहुत समय से लेवी नहीं दे पाई हूं और कहीं कुछ आशंकित सी होकर कहती हैं कि कोई लेवी लेने वाला भी तो नहीं आया। लक्ष्मी देवी का माक्र्सवाद लेनिनवाद किताबी पंडितों से कुछ अलग किस्म का सा है। वह व्यवहार की बात करती है। आचरण की बात करती है। चरित्र की बात करती है। कहती हैं, 'मैं माक्र्सवाद से ज्यादा रामायण की किताबें पढ़ती हूं।Ó कहना ना होगा कि लक्ष्मी देवी ने माक्र्सवाद रटा नहीं, जिया है। वह रूद्राक्ष की मोटी-मोटी माला जपती जरूर हैं, लेकिन उनकी गिनती में शिवजी या गणेश नहीं बल्कि इलाके के गरीब लोगों का जाप होता है। एक-एक दाने को छूते हुए वह सोचती हैं कि फलां आदमी क्या काम आ सकता है। फलां आदमी की समस्या का समाधान कैसे हो सकता है? खुद को ही कैडर-लीडर मानते हुए लक्ष्मी देवी हिसाब लगाती हैं कि जब तराई की खुरपिया फार्म जैसी कइयों एकड़ भूमि भूमिहीनों के पास आ जाएगी तो उसका किस तरह उपयोग किया जाएगा। जीवन के जब कोई पन्ने उलटने को कहता है तो वह भावुक हो जाती हैं। एकाएक पुरानी जिंदगी में उतरकर वह बताती हैं, ' छह महीने की थी, पिताजी चल बसे। तब मां 18 साल की थी। मां मायके धपोलासेरा, बागेश्वर में आकर रहने लगी। उनके पास काफी जमीन थी। नुमाइश मैदान व आधे बागेश्वर की जमीन हमारी ही ठैरी। सातवीं तक की पढ़ाई की। फिर 17 साल में मेरी शादी हो गई। 25 साल की थी। पति चल बसे। जिस कच्ची जमीन पर रहते थे वह सरकार व इलाके के भूमाफियाओं ने छीन ली। कई लोग बेघर हो गए। उस भूमि के लिए अदालत के कितने चक्कर काटे। उसी दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ लोगों से मुलाकात हुई। आगे पीछे तो कोई था नहीं इसलिए पूरा समय जमीन के संघर्ष में बीता। पुलिस से कितनी मुठभेड़ों के बाद खुरपिया फार्म की 18 एकड़ 7 बिसुआ जमीन पर हम कब्जा कर सके। लोगों को दोबारा से अपना आशियाने मिल सके। तब से लोग मेरे पास अपनी छोटी-छोटी परेशानियों को लेकर आने लगे। किसी की विधवा पेंशन लगाना तो किसी को वृद्धाश्रम पेंशन दिलवाना। मंदिरों से निकालकर पैसा मैं जरूरतमंदों को दे दिया करती थी। मेरे हथियार तो पत्थर दातुली ही थे। औरतें तो बहुत डरती हैं। मैं तो भूत से तक नहीं डरती थी कहां तो मनखी से डरना। उम्र पूछने पर कहती हैं कि 70 हो गई होगी नहीं तो फिर 80 हो गई होगी। चिन्ह तो उनके मरने के साथ ही फाड़ दिया था पता नहीं कितने साल हो गए हैं। सारी कम्युनिस्ट पार्टियों से अनभिज्ञ लक्ष्मी देवी कहती हैं,' हुए तो हम लेनिनवादी ही। भले ही आज मैं काम नहीं कर पा रही हूं। लेकिन इस उम्र में भी पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए जो हो सकता है वह करूंगी।Ó अपने जमीनी लड़ाई के दिनों के वाकये सुनाते हुए कहती हैं,' जब मैं भूमिहीनो को खुरपिया फार्म की जमीन दिलाने के लिए संघर्ष कर रही थी तब मुझे धमकाने व मारने घर पर गुंडों का एक दल आया करता था। मैं दिन से ही (चंूकि उन दिनों टिन की छत थी) छत पर खूब सारे पत्थर इकठ्टे कर लेती। जैसे ही वह आते, मैं पत्थरों की बौछार शुरू कर देती। उन्हें लगता कि कई सारे लोग हैं और वे भाग खड़े होते। मौत की दहलीज पर खड़ी लक्ष्मी देवी का आज भी अंतिम लक्ष्य यही है कि खुरपिया फार्म की बची हुई 3400 एकड़ जमीन को माफिया के कब्जे से मुक्त कर गरीब, भूमीहीनों में बांट सके।

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