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Wednesday, October 27, 2010

केम्पा फंड से होगी वन अधिकारियों की पिकनिक

अकूत राशि मिलने से फाइलें संजाने लगे कागजों के उस्ताद
मुख्यमंत्री निशंक के मानस पुत्र स्पर्श गंगा का भी होगा कल्याण
लेकिन प्रकृति की संपदा में स्थानीय निवासियों को अधिकार नहीं
केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय का एक मामूली प्रावधान वन महकमे के लिए धनकुबेर साबित होगा, ऐसा किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। भला हो भारतीय वन अधिनियम का। दरअसल कैं पा फंड यानि कंपनसेटरी एफॉरेस्टेशन एंड मैनेजमेंट . . की यह माया नया राज्य बनने से नजर आई है। विशाल उत्तर प्रदेश में उत्तराखंड की हरित संपदा का महत्व सामने नहीं आ पाता था। कैंपा फंड वह धनराशि है जो मंत्रालय ने वन बेचकर कमाई है। यानि सड़क समेत तमाम गैर वानिकी कार्यों में जो वन भूमि ट्रांसफर हुई उसका मुआवजा। विभाग इसे सीधे खर्च न कर दे इसीलिए इसे मंत्रालय में जमा कराया जाता है। औपचारिक प्रावधान तो इस राशि से अनिवार्य वानिकी विकास का है, लेकिन वह अब तक फलीभूत नहीं हुआ। दीगर है कि वन अधिकारियों के वारे-न्यारे होते रहे। सबसे बड़ा उदाहरण टिहरी डैम में गई विशाल वन संपदा का है। बताया जाता है टिहरी के बदले खीरी या गोंडा जिलों के बंजरों में कुछ पौधे रोपे गए थे, अब उनका कोई नामोनिशान नहीं है। पिछले नौ साल में 3000 से अधिक निर्माण कार्यों के लिए विभाग लगभग 15 हजार हेक्टेअर भूमि दे चुका है।दरअसल उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से ही कैंपा फंड का धन केन्द्र दाबे बैठा था। साल दर साल वन भूमि के एवज में विभागों ने जो राशि जमा कराई वह मय ब्याज लगभग 900 करोड़ तक जा पहुंची। राज्य सरकार की कैंपा का धन लौटाने की मांग को लगातार अनसुना कर रहे केन्द्र को उस समय पोटली खोलनी पड़ी जब सुप्रीम कोर्ट की फटकार पड़ी। यह राशि राज्य को आगामी 10 वर्षों के लिए बनाई गई योजनाओं के एवज में किस्तवार मिलनी है। प्रतिवर्ष कम से कम 80 करोड़ की राशि मिलेगी। 16 हजार करोड़ के कर्ज में डूबी राज्य सरकार का भी इतराना लाजिमी है। पहली बार विभाग पर हुई ऐसी धनवर्षा से अधिकारी एकदम चुस्त हो गए हैं। शासन व अन्य परियोजनाओं में प्रतिनियुक्ति को आतुर दिखने वाले अफसर अब अपनी कुर्सी पकड़कर ठहर गए हैं। विभाग ने लगभग छह माह की कसरत के बाद जो रोडमैप बनाया है उसे राज्य सरकार बाकायदा हरी झंडी दे चुकी है, जाहिर है इस सबमें विभागीय अधिकारियों ने जनप्रतिनिधियों का ख्याल रखा होगा। वानिकी विकास के मुखौटे के पीछे गोलमोल योजनाओं का ऐसा जाल है, जहां न निगले बनता है- न उगले बनता है। अगर कहीं कोई छूट गया है तो वह है स्थानीय जन। उनकी भी दावेदारी बनती है विभाग को इसका ख्याल नहीं आया। ऐसा तो नहीं कि विकास कार्यों के लिए हस्तांतरित किए गए वन विभाग ने खुद उगाए हों, या नेताओं के फर्जी पौधारोपरण अभियानों की देन हों। यदि वनों से किसी व्यक्ति की नजदीकी संबंध है तो वह यही स्थानीय जनता है। लंबे संघर्ष व सृजन के बाद अधिकारियों ने यह तो स्वीकारा है कि वनों की रक्षा, विकास व संरक्षण लोगों केे बगैर संभव नहीं। विभाग भले ही कितना पुराना होने का गुमान कर ले, लेकिन उसकी उम्र जनता से अधिक नहीं हो सकती। कैंपा फंड पर नैसर्गिक न्याय के नियमानुसार पहला हक जनता का है। विभाग को यदि वनों की चिंता होती तो योजनाओं की वरीयता में ऐसे लोगों का सशक्तीकरण प्राथमिकता में होता, जिनकी फसलें जंगली सुंअर रौंद जाते हैं। जिनके स्कूल जाते बच्चों पर गुलदार नजरें गढ़ाए बैठा रहता है। पिछले नौ साल में ही तकरीबन 200 लोग गुलदार, 80 लोग हाथी, 15 लोग भालू व एक दर्जन लोग बाघ ने मार डाले। वहीं जंगली जीवों के हाथों गंभीर रूप से घायल होकर आंख, कान, हाथ, पैर आदि की तमाम शारीरिक विकलांगता वालों की संख्या 1000 का आंकड़ा पार कर गई है। लेकिन विभाग ने मुख्यमंत्री की पेट परियोजना स्पर्श गंगा का वरण करना अधिक मुनासिब समझा, जिसके सहारे वे अपनी ब्रांडिंग कर रहे हैं। स्पर्श गंगा के तहत गंगा नदी से पॉलीथिन हटाने के लिए 10 करोड़ की राशि का प्रावधान है। यह धन मुख्यमंत्री के साये में पल रहे एनजीओ को मिलना है। मुख्यमंत्री व बाबा रामदेव की प्रेरणा से ही 16 करोड़ मुख्यमंत्री जड़ी-बूटी योजना में खर्च किए जाएंगे। इसके तहत प्रत्येक जिले में जड़ी-बूटियों का प्रदर्शन होगा। एनजीओ का ही पोषण करने वाली एक और योजना है- ईको टूरिज्म की। बताया जाता है स्वयं कई वन अधिकारी, नातेदारों के नाम से ईको टूरिज्म के धंधे में लगे हैं। अपने संपर्कों व विभाग के विश्राम गृहों का लाभ उठाकर ये मोटी मछलियां फांसते हैं। गुलदार पुनर्वास केन्द्र व वन्यजीव कोरिडोर के निर्माण को 124 करोड़, प्रत्येक जिला मुख्यालय के वानिकीकरण को मुख्यमंत्री हरित योजना के तहत लगभग सात करोड़, वन पंचायतों के पुन: सीमांकन को छह करोड़ मिलेंगे। अब तक करोड़ों खर्च कर विफल साबित हुए लेन्टाना उन्मूलन कार्यक्रम को लगभग 18 करोड़ मिले हैं। जिस धन को अनिवार्य रूप से वनीकरण कार्य में खर्च करना था, विभाग उससे अपने ऐशो-आराम के माध्यम तलाश रहा है। विभाग 177 करोड़ रुपए की लागत से वन मुख्यालय का निर्माण करेगा। देहरादून के राजपुर रोड स्थित जिस भवन से अभी वन मुख्यालय का काम लिया जा रहा है, वह सर्वसुविधासंपन्न नहीं है, ऐसा नहीं कह सकते, लेकिन अधिकारीप्रधान विभाग के लिए यह कारपोरेट शैली का नहीं है। विभाग में इस समय कुल कर्र्मचारियों का एक तिहाई हिस्सा वन अधिकारियों का है-जिन पर विभाग के कुल वेतन का 90 फीसदी खर्च हो जाता है। बताया जा रहा है मुख्यालय के प्रस्तावित भवन को सचिवालय व विधानसभा से अधिक खूबसूरत बनाने की योजना है।

108 की तर्ज पर घायल जानवरों के लिए चलेगी मोबाइल वेन

घायल जानवरों को आपातकालीन राहत के लिए वन विभाग की कवायद
मुख्यमंत्री की प्रिय आपातकालीन चिकित्सा सेवा 108 की तर्ज पर घायल जानवरों को आपातकालीन चिकित्सा सेवा देने के लिए मोबाइल वैन चलाने की भी बात है। 108 सेवा पिछड़े क्षेत्रों में अस्पतालों की मांग का अस्थाई लेकिन चमकदार विकल्प बनकर सामने आई है। लेकिन मुख्यमंत्री की आत्मुगधता बरकरार रहे, इसके लिए वन्यजीवों पर भी तीसमार खां प्रयोग की तैयारी है। बताया जा रहा है, जहां भी जंगली जीव घायल होंगे, उन्हें नजदीक की सड़क पर लाया जाएगा, जहां सर्वसुविधासंपन्न वैन में उनको प्राथमिक उपचार मिलेगा। शुरुआत में कुमाऊं व गढ़वाल मंडल में एक-एक वैन तैनात की जा रही हैं।प्रमुख वन संरक्षक डा. आरबीएस रावत ने बताया प्राकृतिक दुर्घटना व तस्करों द्वारा घायल जंगली जीवों के उपचार को विभाग के पास कोई चिकित्सालय व चिकित्सक नहीं है। विगत सप्ताह देहरादून से जीबी पंत विवि स्थित वेटनेरी कॉलेज ले जाते समय रास्ते में ही दो गुलदारों की मौत हो गई। कई जंगली जानवर घायल होने के बाद उपचार के लिए ले जाते वक्त दम तोड़ देते हैं। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए विभाग 12-12 लाख रुपए की दो वैन सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में लगा रही है। यदि इस प्रयोग को सफलता मिली तो भविष्य में वैनों की संख्या बढ़ा दी जाएगी। उसी प्रकार आदमखोर व उत्पाती गुलदार को नियंत्रण में लाने के लिए प्रत्येक दो जनपद में एक-एक मोबाइल जीप खरीदी जा रही हैं। जीप की मदद से वनकर्मी गुलदार या अन्य उत्पाती जीव के समीप शीघ्रता से पहुंचेंगे। इस जीप में ट्रेंक्वेलाइजिंग गन व फस्र्ट एड किट रखा जाएगा। रावत ने बताया खूंखार जानवरों के लिए हरिद्वार व अल्मोड़ा में एक-एक रेस्क्यू सेंटर का काम निर्माणाधीन है। हरिद्वार सेंटर का निर्माण कार्य अंतिम चरण में है, यह शीघ्र्र शुरू होगा। विभाग राष्ट्रीय पार्कों से पर्यटकों का दवाब कम करने के लिए पार्कों के समीप सफारी की योजना पर विचार कर रही है, ताकि जंगल का जीवन बाधित न हो और पर्यटकों को भी संतुष्टि मिल सके। कालसी से लेकर टनकपुर तक के कोरिडोर में गर्मी के सीजन में जंगली जीवों को पीने के पानी की मुसीबत झेलनी पड़ती है। पानी की तलाश में जानवर आबादी की तरफ आते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष व तस्करी की घटनाएं बढ़ जाती हैं। विभाग इस चुनौती का सामना करने के लिए कोरिडोर 1500 वॉटर होल बनाएगा। यह काम राजाजी पार्क में शुरू हो चुका है, पूरा काम होने में तीन-चार साल लगेंगे। इससे पानी की समस्या पर कम से कम 50 प्रतिशत नियंत्रण हो सकेगा। लोगों का जंगली जीवों के प्रति आक्रोश न बढ़े इसके लिए जानवर द्वारा मारे मृत व्यक्ति के परिजनों को 15 दिन के भीतर मुआवजा देने की योजना है। उसी प्रकार जंगली जीवों से हुए फसलों के नुकसान का मुआवजा भी समय से दे दिया जाएगा। कैंपा फंड से वनकर्मियों के लिए पुलिस लाइन का निर्माण, सीमावर्ती क्षेत्रों में उच्च स्थलीय वन निगरानी चौकियां बनाना, बुगयालों के संरक्षण में 177 करोड़ खर्च करना, वन चौकियों का जीर्णोद्धार करना आदि योजनाएं भी शामिल हैं। विभागीय कर्मचारियों को आपातकाल में सहायता के लिए 11 करोड़ के कॉरपस फंड का गठन किया गया है। इसके ब्याज से कर्मचारियों को लाभ मिलेगा, लेकिन आम आदमी को सीधा लाभ देने वाली कोई भी योजना नदारद है। यह आशंका जताना गलत नहीं कि कैंपा के बाद लोगों पर विभाग का शिकंजा अधिक मजबूती से खिंचेगा। वन प्रधान राज्य के लोगों की यही नियति है।
कुछ जरूरी सवाल
पर्वतीय क्षेत्र में मात्र 7 फीसद भूमि पर कृषि जोत सिमटकर रह गई है। ऐसे में स्थानीय लोगों की वनों पर निर्भरता अत्यधिक है।
रिजर्व वनों के साथ सिविल वनों की भूमि भी विकास कार्यों में गई है, और कैंपा के मुआवजे में इस भूमि का भी धन शामिल है।
राज्य में 12 हजार वन पंचायतें हैं, जो ग्रामीणों की वन चेतना का अनोखा उदाहरण हैं। विभाग को इन वन पंचायतों को मजबूत करने के लिए आर्थिक मदद देनी चाहिए।
पिछले कई सालों से सीजनल फायर वाचर्स का बकाया निस्तारित नहीं हुआ है उसे प्राथमिकता में लाना चाहिए।
जंगली जीवों के हाथों मारे जाने वाले लोगों, घायल लोगों व फसलों को हुए नुकसान का मुआवजा बढ़ाया जाना चाहिए।
ईको टूरिज्म योजना के तहत ग्रामीणों को सब्सिडी पर आधारित लोन देने चाहिए ताकि वे आर्थिक गतिविधि कर सकें।
पर्यटन मार्गों पर स्थित गांवों के लोगों को वुडक्राफ्ट का प्रशिक्षण देकर हैंडीक्राफ्ट उद्योग को बढ़ावा देना चाहिए।
वर्तमान में विभाग में फ्रंटलाइन स्टॉफ यानि फारेस्ट गार्ड की संख्या लगभग ढ़ाई हजार है, इनमें से प्रत्येक को कम से कम 5 हजार हेक्टेअर वन क्षेत्र की रक्षा करनी होती है, जो व्यावहारिक रूप से संभव नहीं। अत: ग्रामीण युवकों से बड़ी मात्रा में भर्तियां होनी चाहिए, ताकि रोजगार के साथ वनों की रक्षा भी हो सके।

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