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Saturday, October 16, 2010

मध्यमवर्गीय उम्मीदों की ताकत बनी सादिया

सदिया आलम। एक महीने पहले तक इस नाम को कौन जानता था भला? मगर आज सादिया के पांव जमीं पर नहीं हैं। सफलता के आसमान पर उसकी लंबी छलांग ने उसे ही नहीं उसकी मां, भाई और बहनों को एकाएक सबसे खास बना दिया है। राज्य प्रशासनिक सेवा की सर्वोच्च वरीयताधारी सादिया का जिक्र इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि वह एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार का प्रतिनिधित्व करती है, जहां बेटे और बेटियों को आईएएस और पीसीएएस अफसर बनाये जाने के भरपूर सपने देखे जाते हैं। सादिया का चुना जाना दरअसल मध्यमवर्गीय उम्मीदों का ताकतवर बनना है। बकौल सादिया 'दादा ने जज बनने का सपना देखा था, वह नहीं बन पाये मगर मरहूम पिता की प्रेरणा से मैंने प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना जरूर पूरा कर लिया।Ó उसके इस सपने ने उस सेवक आश्रम रोड को भी गुलजार बना दिया जो आज से पहले सिर्फ अपने होने के लिए जाना जाता था। पिछले दिनों तक इस रास्ते पर मीडिया वालों से लेकर परिजनों और मित्रों का तांता लगा रहा। बधाइयों से लदी सादिया से खुशियां संभाले नहीं संभल रही हैं। इन्हें संभालने में मां सैयद आलम, भाई और बहन भी पीछे नहीं थे। चूंकि आलम परिवार ने मीडिया कर्मियों की इतनी रेलम-पेल पहले कभी नहीं देखी थी, इसलिए यह अलग किस्म का दबाव उन्हें कई बार निजता में अतिक्रमण की तरह भी दिखाई दिया। यह तब महसूस हुआ जब सादिया से इंटरव्यू का वक्त मांगा गया मगर वह बहुत देरी से मिला। साक्षात्कार के दौरान सादिया से ज्यादा उसकी मां के जवाब उन लोगों के लिए अटपटे हो सकते हैं जो एक मां के संघर्षों से मिली खुशी को महसूस नहीं कर सकते। उनके असहज दिखाई देने के पीछे एक मां का वह सपना था जिसे उसने कठिनाइयों और संघर्र्षों के बीच एक दिये की तरह रोशन रखा और आज उसकी रोशनी में पूरा परिवार नहा रहा है। तभी तो जब सादिया से चर्चा शुरू हुई तो उसकी मां, बहन और भाई भी उसके चारों ओर जम गए। सादिया से पूछे जाने वाले एक-एक सवाल का जवाब वह देने को बेताब दिखे। खैर बातचीत के दौरान सादिया ने बताया कि वह भाग्यशाली हैं कि प्रथम प्रयास में ही सर्वोच्च स्थान पा सकी। सादिया मूलत: देहरादून में ही जन्मी, पली, बढ़ी। कॉन्वेंट स्कूल से प्रारम्भिक शिक्षा लेने के बाद डीएवी कालेज से बी.एससी की परीक्षा उत्तीर्ण की। फिर कानून की पढ़ाई पूरी की। छोटेपन से ही प्रशासनिक अधिकारी बनने का शौक रखने वाली सादिया पीसीएस में निकलने से खुश तो बहुत हैं पर उनका अंतिम लक्ष्य आईएएस बनना है जिसके लिए वह एक बार प्री एक्जाम निकाल भी चुकी हैं। 13 की उम्र से कविताओं का शौक रखने वाली सादिया अब तक 500 से अधिक कविताएं लिख चुकी है। वह कहती है कि प्रकृति व मानव के कई रूप ऐसे होते हैं जिनसे मन में उद्वेलना होती हैं और वही उद्वेलना कविता का रूप ले लेती है। एक प्रशासक के लिए सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्ट सामाजिक ढांचे को सही करने की है। कहती हैं पहाड़ी इलाकों के विकास के लिए कार्य करना, उनकी स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों को आसान करना प्रशासक की प्राथमिकता में होना चाहिए। पंचायतों को लोकतंत्र की रीढ़ मानने वाली सादिया महिलाओं के पंचायतों में बड़ी संख्या में भागीदारी को एक बड़े बदलाव के रूप में देखती हैं वो कहती हैं कि अगर युवा व पढ़ी लिखी लड़कियां पंचायतों में आएंगी तो महिला के मात्र रबड़ स्टैंप बनने की अवधारणा बदलेगी व वह अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाने में कामयाब होंगी। नारी को देवी कहने मात्र से नहीं होगा। उसे वो उचित सम्मान देने के लिए एक बड़े पैमाने पर मानसिक बदलाव की जरूरत है ताकि देवी बनने से पहले उसे इन्सानी हक तो मिलें। किसके विचारों ने आपको प्रभावित किया पूछने पर जवाब मिला कि परफेक्ट कोई भी नहीं होता पर अपने सार्वजनिक जीवन में मदर टेरेजा, नेल्सन मंडेला व गांधी ने मुझे प्रभावित किया। रंग दे बसन्ती फिल्म ने भी मुझे बल दिया जब नायक कहता है कि हम बदलेंगे समाज को आईएएस, पीसीएस बनकर बदलेंगे। तब मुझे इस पद की ताकत का अहसास हुआ। पेशा जब काफी चैलेंजिंग, डायनमिक व सामाजिकता से जुड़ा हो तो इससे बेहतर खुशी और क्या हो सकती है। अखबार पढऩा मेरा पहला शौक है। द हिन्दू मेरा प्रिय अखबार है। संगीत का शौक भी है। मैलोडियस धुनें मुझे बहुत पंसद हैं। विलियम शेक्सपियर मेरे प्रिय पोइट हैं। तारे जमीन पर फिल्म मुझे बेहद पसंद है इस तरह के नये प्रयोग होने चाहिए। मीडिया की मैं रिस्पेक्ट करती हूं क्योंकि एक जरूरी पार्ट है वह हमारी जिंदगी का। पीसीएस की तैयारी के संदर्भ में सादिया कहती हैं कि हर विषय की बेसिक जानकारी जरूर होनी चाहिए । बाकि जो विषय आपने चुने हैं उनका गहराई से अध्ययन करें। अच्छे राइटर की किताब एक मुख्य रोल अदा करती है। इतिहास में रोमिला थापर व विपिन चन्द्रा अच्छे लेखक हैं। कोचिंग ज्वाइन करके एक दिशा जरूर मिलती है पर सेल्फ स्टेडी का कोई तोड़ नहीं है। लगातार बढ़ती आतंकी घटनाओं के बारे में पूछे जाने पर कहती हैं कि आतंकवाद के मसले को मैं धर्म से जोड़ते हुए नहीं देखती। मैं मानती हूं कि इसे दूर करने के लिए मैच्योर व ब्रॉड माइंडेड होकर काम करने की बेहद जरूरत है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कद्र करने वाली सादिया उसे भारतीय युवाओं के लिए रोजगार की खान मानती हंै।

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