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Saturday, October 16, 2010

स्त्री पीड़ा से भरे हैं लोक गीत

लोक गीतों में स्त्री

लोक गीत जीवन से सच्चा साक्षातकार कराते हैं, इनमें बिना किसी लाग लपेट के बात कह दी जाती है। प्राय: जीवन का हर रूप इसमें प्रतिबिंबत होता है। पर्वतीय क्षेत्र में महिलाओं के श्रमिक जीवन ने इन गीतों को विरह भावना से भर दिया है। हर देश अंचल क्षेत्र या भाषा बोली के अपने लोक गीत होते हैं। यह बात पिछले दिनों महिला समाख्या व महादेवी पीठ के लोक गीतों में स्त्री विषय पर आयोजित तीन दिवसीय गोष्ठी में सामने आई। अद्र्धशिक्षित, अशिक्षित, कृषक,ज्वाले, लकड़हारे,घसियारिनें, पनिहारिनें,गडरिये, प्रवासी, आदि ये सरल मानव समूह इस परंपरा के वाहक होते हैं। यह परंपरा श्रुति दर श्रुति या मुख दर मुख परंपरित होती है। लोक गीतों के दो तिहाई से अधिक हिस्से में महिलाओं का दर्द समाहित है। खासकर रेगिस्तानी व पहाड़ी महिलाओं के लिए लोक गीत जीने का बड़ा संबल हैं। लोकगीतों की सशक्त हस्ताक्षर कबूतरी देवी कहती हैं कि अविरल, अंतहीन श्रम का सिलसिला है पहाड़ी औरत का जीवन। जिस तरह से बड़े से बड़े दुख में रो लेने के बाद जी हल्का हो जाता है उसी तरह पहाड़ की महिलाओं ने अपने कष्टों को गीत बनाकर कष्ट सहने की क्षमता बढ़ाई है। लोक गीत हमेशा से ही स्त्री के अपने दर्द को कहने का माध्यम बने हैं। ऐसे बिंब भी लोक साहित्य में ही मिलेंगे जब कोई महिला पहाड़ से थोड़ा झुकने के लिए कहे ताकि वह अपने माइके को देख सके। ये तमाम गीत स्त्री की विभिन्न स्थितियों( जैसे ससुराल में उससे छोटी सी गलती हो जाने पर भी उसके मायके वालों को कोसा जाना, दिन में तीन-तीन बार जंगल जाना, पेट भर खाना न मिल पाना, जंगल में कांठियों से गिर जाना, बहुत दुख आने पर नदी में छलांग लगाकर मर जाना, जंगल में पतरौल(वन रक्षक) द्वारा देखे जाने पर जुर्माने का डर, पेट भर खाना व अच्छा खाना न मिल पाने के कारण माइके की भिटोली का इंतजार, कम उम्र में विधवा हो जाने का विलाप, गर्भावस्था के दौरान प्रत्येक माह की बदलती अवस्था में कुछ अलग सा खाने का मन दूसरी शादी करने पर (नौली समाज का उपेक्षित व्यवहार से ही बने। छत्तीसगढ़ की लोक गायिका अन्नामाधुरी कहती हैं कि लोक जीवन में स्त्री चाहे उत्तराखंड की हो या छत्तीसगढ़ की। भूगोल व भाषा के अंतर के बावजूद औरत का दर्द व उससे निकली कराह एक सी है। उरांव जनजाति का गीत जमानों के बाहरी हाथों में चले जाने की कहानी बंया करता है। महिलाएं कहती हैं मिट्टी बेचना रक्त बेचने जैसा है। वह जमीन के मालिकों को कोसती है। असल जीवन जमीन पर ही है। धरती की धड़कन लोक गीतों में सुनाई देती है। यहां गीत मरहम की तरह हैं। सुख की बात लोक गीतों में कम है। त्रासदियां ही ज्यादा मुखर रूप में सामने आई हैं। वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी कहते हैं कि कला को ज्ञानियों ने उतना नहीं बचाया जितना कि अज्ञानियों ने। एक से एक खूबसूरत शब्दों को बनाने वाले विद्वान लोग नहीं बल्कि साधारण लोग होते हैं। स्त्री को पांचवी व दलित को छठी जाति बताते हुए वह कहते हैं कि 90 फीसदी लोक गीतों का काम देश भर की भाषाओं में केवल स्त्री ने किया है। लोक भाषा के ठेठ रूप की वाहक उस इलाके की अनपढ़ स्त्री होती है। स्त्री की व्यथा कथा लोक गीतों का प्राण है। दलित स्त्री व पुरूषों के मिले योगदान से ही लोक गीतों की परंपरा बची हुई है। भाषा अशुद्ध होकर ही फलीभूत होती है। लोक गीत साक्षर समाज की देन नहीं हैं। गायक नरेन्द्र ंिह नेगी पहाड़ के विकास से महिलाओं के काम में हुए परिवर्तन पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि उन्हें पहले लकड़ी के गठ्ठर ढ़ोने पड़ते थे आज सिलेंडर ढ़ो रही हैं। अब खाना भले ही भरपेट मिल जाता हो पर काम के बोझ से आज भी निजात नहीं मिल पाई है। भले ही आटा चक्की आ जाने से अब उन्हें हाथ से अनाज नहीं पीसना पड़ता है पर धान से लेकर झिंगोरा वो हाथ से ही कूटती हैं। पानी के नल भले ही गांव में बन गए हों पर पानी कोसों दूर नौलौ या अन्य स्त्रोतों से ही लाना पड़ता है। तीन नहीं तो दो वक्त निश्चित रूप से जंगल जाना ही पड़ता है। कभी घास को जाने में चट्टान से गिर गई। कभी जंगल में बाघ ने खा दिया, तो कभी इलाज के अभाव में दम तोड़ देती हैं। कोई बचपन में ही विधवा हो जाती है तो कोई गरीबी के कारण अपने से कई गुना ज्यादा उम्र वाले को ब्याह दी जाती है। जेएनयू के पूर्व भाषा विभाग अध्यक्ष प्रो मैनेजर पाण्डेय लोक गीतों की सबसे बड़ी खासियत बताते हुए कहते हैं कि 1857 के संग्राम में लोक गीतों ने संचार में बड़ी भूमिका निभाई। ये गीत लिखित थे इनका कोई एक रचनाकार नहीं था इसीलिए अंग्रेज सरकार भी इन पर पाबंदी नहीं लगा सकी। आगे वह कहते हैं कि संभ्रांत या शिष्ट साहित्य में हर माह गर्भ बदलने की अवस्था का ज्ञान नहीं हो सकता। यह केवल लोक काव्य में ही संभव है। आज लोक गीतों के नाम पर विवाह गीत या संस्कार गीत ही याद किए जाते हैं, लेकिन वास्तविक लोकगीत श्रम के सामूहिक गीत हैं। प्रसिद्ध उपन्यासकार पकंज बिष्ट का मानना है कि नारीवादी विमर्श के बिना लोक साहित्य में महिलाओं के योगदान का मूल्यांकन संभव नहीं था। पर नारी विमर्श की भी अपनी सीमाएं हैं। शिष्ट साहित्य में महिलाएं हाशिए पर हैं जबकि लोक साहित्य में वे अपनी पीड़ा खुलकर कह सकती है। वह कहते हैं कि बाजार व संचार क्रांति के हमलों से यह कला निष्प्राण हो चुकी है। शायद ही आने वाले दिनों में लोक गीत रचे जाएंगे। दूसरी ओर फिल्मों के लिए लोक गीतों का खजाना रीत चुका है। इसीलिए नई परिस्थितियों में लोक विधा को अस्तित्व के संकट से जूझना पड़ेगा। हरियाणा पुलिस के उपमहानिदेशक व लेखक विकास नारायण राय ने कहा कि सामंती संस्कारों को महिमामंडित करने वाले लोक गीतों का बड़ा हिस्सा स्त्री विरोधी ही है। जो अमोरिका के गुलामों की तरह अपने मालिकों को कम याय अधिक बुरा बताने का काम करते हैं। इन गीतों के कथ्य में परिवर्तन बेहद जरूरी है। कथाकार मैत्रेयी पुष्पा लोक गीतों को स्त्री के दावे, अर्जियां व शिकायतनामे करार देती हैं। और एक भोजपुरी लोक गीत के माध्यम से वह दादी इसका अंत बदल दो कहकर लोक गीतों में स्त्री विरह को खत्म करने की जरूरत बताती है।

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