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Tuesday, October 12, 2010

रेदास ने बचाई नाट्य महोत्सव कि लाज

नाट्य भूषण लक्ष्मी नारायण अपनी संस्था 'दून घाटी रंगमंच की ओर से प्रतिवर्ष अखिल भारतीय नाट्य महोत्सव का आयोजन देहरादून में करते हैं। इस बार भी दून में उनके द्वारा सातवां नाट्य महोत्सव आयोजित किया गया। आयोजन को संस्कृति विभाग व कुछ व्यवसायिक प्रतिष्ठानों ने प्रायोजित किया था। नाट्य भूषण लक्ष्मी नारायण नाटक के लिए कम, आए दिन किए जाने वाले आयोजनों के लिए अधिक जाने जाते हैं। नाट्य महोत्सव का जो रंगीन ब्रासर उन्होंने दर्शकों व मीडिया में वितरित किया उसका दो तिहाई हिस्सा उनके अपने गुणगान को समर्पित है। वह स्वंय को दर्जन भर से अधिक पुरस्कारों का स्वामी बताते हैं लेकिन इनमें से एक भी ऐसा सम्मान नहीं है जो थियेटर या नाटक के क्षेत्र में प्रतिष्ठित रहा हो। 2003 में उन्हें जिस नाट्य भूषण की उपाधि से नवाजा गया था वह तो आज उनके नाम का हिस्सा ही बन चुका है। बताया जाता है कि इसकी स्थापना उन्होंने खुद करवाई थी और पहली बार यह उन्हें ही प्रदान किया गया। यह भी कहा जाता है कि नाट्य भूषण या तो आयोजनों में व्यस्त रहते हैं या संस्कृति विभाग में आर्थिक मदद के लिए गुहार लगाए बैठे रहते हैं। जिन 20 नाटकों को वे अपनी संस्था दून घाटी रंगमंच के चर्चित नाटक बताते हैं उनमें से सभी का निर्देशन या तो उन्होंने स्वंय किया है या उनके पुत्रों बृजेश नारायण व आदेश नारायण ने उनकी टीम में 95 फीसदी कलाकार उनके अपने कुनबे के हैं। संस्था के महासचिव व उनके संबंधी महेश नारायण उन्हें भारतीय नाट्य विधा का भीष्म नारायण बताते हैं। अगर लक्षमीनारायण नाटकों के भीष्म कहे जा सकते हैं तो नाटक व अभिनय के क्षेत्र में पूरा जीवन समर्पित कर चुके टॉम आल्टर जैसे कलाकारों को आप किस पितामह की उपाधि देंगे जो स्वयं को विनम्रतापूर्वक इस विधा का विद्यार्थी कहकर संतुष्टि कर लेते हैं। अशोक चक्रवती, अमरजीत चढ्ढा, सतीश चांद जैसे नामी कलाकारों को क्या कहेंगे जिन्होंनेे रंगमंच को आगे बढ़ाने और पहचान दिलाने के लिए अपना जीवन ही लगा दिया।
दरअसल राजधानी बनने के बाद देहरादून में तथाकथित खतरनाक कवियों, कलाकारों व आयोजकों का पूरा एक कॉकस बन चुका है, जिसके फर्जीवाड़े में संस्कृति विभाग जैसी संस्थाएं भी पूरी तरह से लिप्त है। इस तरह के सारे खेलों को ढकने के लिए विधानसभा अध्यक्ष या संस्कृति मंत्री को उद्घाटन या समापन के लिए बुला लिया जाता है, जबकि प्रतिष्ठित संस्थाओं व कलाकारों ने हमेशा ही नेताओं से परहेज ही किया है। नाट्य महोत्सव की ही बात करें तो इसमें लगभग 30 नाटकों को आमंत्रित किया गया था। उड़ीसा, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, असम, गुजरात, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा आदि जगहों से टीमें आयी थी, जिनका कद दून घाटी रंगमंच जैसा ही था। दरअसल नाटक के इस खेल में अखिल भारतीय नाट्य महोत्सव के नाम पर नाट्य प्रेमी दर्शक व ईमानदार नाट्य संस्थाएं ठगी जाती हैं।
संस्था के संचालन की एक बानगी देखिए नाटक की एक शाम बिजली गुल होने से शोरगुल होने पर संचालक साहब किसी गली छाप शोहदे की तर्ज पर दर्शकों से धमकी भरे लहजे में कहते हैं, 'चुप हो जाओ वरना हमें भी व्यवस्था बनानी आती है। मतलब आप कलाकारों व कला प्रेमियों को डंगरों की तरह हांक रहे हैं। संचालक महोदय का यह इकलौता बयान ही इस बात को समझने के लिए काफी है कि वह कला को कितना ही समझते हैं।
नाट्य महोत्सव में आईं 99 फीसदी टीमों को ऐसेे व्यवहार से कोई आपत्ति भी नहीं हुई क्योंकि यह तो तू मेरी पीठ खुजला मैं तेरी खुजलाऊं वाला खेल है जहां नाटक नहीं, खाना, कमाना व तफरी करना ही पहला मकसद है। यही चीज मेहमान टीमों के राज्य में भी दोहराई जाती है, जहां संस्कृति व कला के नाम पर इस तरह के समूह मलाई चाट जाते हैं।
लेकिन संस्कृति के इस नक्कारखाने में कहीं न कहीं नाटक आज भी जिंदा हैं। शाहजहांपुर, उत्तरप्रदेश से आई 'अभिव्यक्ति टीम के नाटक 'रैदास ने यही साबित किया है। शायद अभिव्यक्ति के मझे हुए कलाकरों की टीम दून घाटी रंगमंच के आमत्रंण पर कम बल्कि दून घाटी में रंगमंच की लंबी विरासत को देखकर यहां आई थी इसका सिला भी रैदास नाटक को खूब मिला। स्पष्ट थीम, प्रभावशाली अदाकारी व सभी पक्षों में संतुलन, टीम को जहां पहले पुरस्कार तक ले गया वहीं अन्य नाटकों की अपेक्षा दर्शकों का भी खूब स्नेह इसे मिला।
नाटक, 14वीं सदी के समय में समाज में व्याप्त बाह्य आडंबरों, छुआछूत रूढिय़ों व जातियों के खिलाफ बोलने वाले उन फक्कड़ संतों पर फोकस था जो गली नुक्कड़ों में जाकर इसका संदेश दिया करते थे। नाटक की शुरूआत ही इससे होती है कि गांव की चमार जाति की बह्मकुमारी कुंए में डूब जाती है। कोई भी बाह्मण जाति का व्यक्ति उसे बचाने नहीं जाता। चमार लोग जब उसे बचाने की पहल करते हैं तो बाह्मण वादी व्यवस्था के पैरोकार कुएं के अछूत हो जाने की बात करते हैं और बह्मकुमारी से धर्म को बड़ा बताते हैं। जिससे बह्मकुमारी मर जाती है। इन्हीं रूढिय़ों के बीच रैदास का विरोध शुरू हो जाता है। मीराबाई के कई बार आग्रह करने पर रैदास चित्तौड़ पहुंच कर उनके साथ सहभोज करते हैं तो बाह्मणों को दिक्कत होने लगती है। बाह्मणों द्वारा शास्त्रार्थ को ललकारे जाने पर रैदास कहते हैं कि सारे शास्त्रार्थ तो धर्म के चंद ठेकेदारों के आधार पर बने हैं फिर किस आधार पर शास्त्र करें। इस नाट्य समारोह में आया अभिव्यक्ति वही मंच है जिसने हिंदी सिनेमा को राजपाल यादव जैसा मंझा हुआ कलाकार दिया। इस मंच के कलाकारों में नाट्य विधा को जिंदा रखने का जुनून दिखाई दिया। लगभग सभी कलाकार अपनी आजीविका अन्य पेशों से कमाने के बावजूद (जिनमें ठेली लगाने, छात्र, मोची का काम करने से लेकर सरकारी कर्मचारी तक शामिल हैं।)हर रोज अपने नाटक का अभ्यास करने के लिए जुटने का समय निकालते हैं। शायद इसी जूनून ने उनके अभिनय को यह असरदार धार प्रदान की है।

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