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Thursday, October 7, 2010

‘मुम्बई प्रतिरोध 2004‘ एक याद

‘‘सैर कर दुनिया की गाफिल जिन्दगानी फिर कहॉ
जिन्दगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहॉ‘‘

..........और यात्रा उद्देश्यपूर्ण हो व पूरे विश्व के लोगों को एकता के सूत्र में पिरोने वाली हो तो जीवन में इतने बेहतर क्षण दूसरा नही हो सकता। अवसर था मुम्बई प्रतिरोध 2004। साम्राज्यवादी वैश्वीकरण और युद्व के खिलाफ मुम्बई प्रतिरोध को सफल बनाने हम सांस्कृतिक टीम व डेलीगेशन के सदस्य दिनांक 14 जनवरी की दोपहर 2.30 बजे अल्मोड़ा से रवाना हुए। हमें शेष साथियों ने विदा किया। इन साथियों को भी 19 तारीख को मुम्बई पहुचना था। रास्ते में हमारे प्रयोगों से एक जोरदार गीत का जन्म हुआ। इसके बोल थे-‘‘दूर बड़ी दूर यूरोप बे अबेर हमरो पाणी बोतलै में बन्द करि बेचि हालौ‘‘।

सायं पॉच बजे गीत गाते नारे लगाते हम काठगोदाम रेलवे स्टेशन में प्रविष्ट हुए। ट्रेन का समय 8.45 था। तब तक हमने मीटिग की और खाना खाया। संस्कृति टीम द्वारा दो नाटक भी प्लेटफार्म मे प्रदर्शित किये गये। कुछ देर में ट्रेन भी आ गयी। मेरे मस्तिष्क में 16 साल पुरानी याद ताजा हो गयी। छुक-छुक करते रेल का आना। रेल की सीटी, उसके डिब्बे में और लोगों के डब्बे में चढ़ने-उतरने के वर्षो पुराने बिम्ब साकार होकर ऑखों के सामने उतर आए। में काफी देर तक अपनी यादो से खेलती रही। कोई बड़ी बात नही थी। तब भी 16 साल बाद यह अनुभव अच्छा लगा।
रात्रि 8.45 बजे हमारी गाड़ी दिल्ली के लिये निकल पड़। हम सभी साथी जिज्ञासा से भरे हुए व आने वाले दिनों को लेकर उत्साहित थे रास्ते पर अनेक विषयों पर चर्चा हुई, गीत गाये और बहुत कुछ! प्रातः 6 बजे हम राजधानी में थे। राजधानी में ऊब और अजीब तरह की वितृष्णा पसरी हुई थी। उॅची-उॅची दीवारों पर अपराधियों के पोस्टर लगे थे। खूखॉर अपराधियों के पोस्टरों पर लिखा था-इनाम जिन्दा या मुर्दा पकड़ने पर। राजधानी अपराधियों से डरी सहमी और असुरक्षित। हर आदमी के चेहरे पर आंतक और खौप के निशान। ओफ! कितना जुगुप्सा भरा, पर कौन था इसका जिम्मेदार
हम सभी साथी चॉदनी चौक स्थित गुरूद्वारे में ठहरे। सिक्खों की धर्म व्यवस्था, एकता प्रेम भाव से सभी आगन्तुकों को खिलाना, उनकी जूठन को हाथ से अच्छी तरह से साफ करना,जूतों की सफाई -पालिस करना सचमुच हम पर्वत वासियों के लिये एक रोमांचक अनुभव था। रात्रि 1 बजे दिल्ली से बान्द्रा वाली रेल थी ।रात्रि मंे दिल्ली में घूमते हुए लगा कि इतनी जनसंख्या और ट्रेफिक न होता तो शायद दिल्ली खूबसूरत शहर होता। मुम्बई प्रतिरोध के लिये अभियानरत दिल्ली के कई साथी भी हमारे साथ थे। एक विचार व एक उदेश्य होने के कारण कही भी वे अपरिचित नही लगे। हम उमंग और साहस से लबरेज थे। दिल से बस यही कामना की- एक दिन होगा लाल किले पर लाल निशान। रात्रि 1बजे बैठकर तीसरे दिन 17 तारीख की सुबह 9 बजे हम थाणे से होते हुए बान्द्रा पहुॅचे। कल्याण के पास ट्रेन की अधेरी सुरंगों से गुजरता देखना एक विस्मयकारी अनुभव था।
चंूकि हम सामान्य श्रेणी के डिब्बोें में बैठकर इतनी लम्बी यात्रा पर आये थे। अतः एक आम हिन्दुस्तानी की जिन्दगी को हमने भी धक्के खाकर, दो दिन लगातार खड़-खड़े गहराई से महसूस किया। बान्द्रा में सभी साथियों ने एक दूसरे का हाथ पकड़कर साम्राज्यवाद विरोधी झोड़ा गाया। सारा सहर साम्राज्यवाद हो बरबाद‘ जार्ज बुश को खड्या दियो‘ के गगनभेदी नारो से गॅूज उठा था।
बान्द्रा की लोकल ट्रेन द्वारा हम गोरे गॉव पहुचे जहॉ विश्व सामाजिक मंच (wsf) के समंातर हमारा ‘मुम्बई प्रतिरोध कार्यक्रम सम्पन्न होना था। मुम्बई ‘प्रतिरोध‘ में विश्व भर के 350 संगठनों ने अपनी भागीदारी की थी। हमारे ही विचारों के लाखों दोस्त वहॉ मौजूद थे। जिनमें मेहनतकश किसान, मजदूर, कर्मचारी, महिलायें व छात्र सभी थे। डब्लू0एस0एफ0 का कार्यक्रम फैसन परस्त, सुविधाजीवी बुर्जवा समाजवादियों का कार्यक्रम था। वहॉ मौजूद तथाकथित शोसल एक्टिविस्ट वातानूकुलित कमरों में बहस करने के आदि थे। इनमें से अधिकांश लोग एन0जी0ओ0 के पैसे से यहॉ आये थे। हालाकि डब्लू0एस0एफ0 की कामना एक नई दुनिया निर्माण की थी परन्तु गोरेगॉव के नेस्को ग्राउंड की चकाचौद बता रही थी कि इन लोगो ंकी एक ‘संभव दुनिया‘ पहले से मौजद है, इन्हें अपने लिये साम्राज्यवाद से कुछेक रियायतें दे दी जाय तो वही इनकी नई दुनिया होगी। बहुसख्यक जनता की मुक्ति की बात करना इसके लिये फिजूल का झंझट होता। हकीकत में डब्लू0एस0एफ0 साम्राज्यवाद के लिये ‘सेफिटी वॉल्ब‘ का काम कर रहा था। बुद्विजीवियों का यह कोरस दुनिया को बहसों में उलझाकर जनता को जमीनी सघर्ष से भटकाया चाहता था। हालाकि भूलवश डब्ल्यू0एस0एफ0 मेें कई भोले-भाले लोग भी चले गये थे, जिन्हें डब्लू0एस0एफ0 के वास्तविक चरित्र की जानकारी नही थी। हमने एसे लोगों का आहान डब्ल्यू0एस0एफ0 कैंपस में एम0आर0 में आओ मौका है, डब्ल्यू0एस0एफ0 धोखा है‘‘ नारा लगाकर किया।
मुम्बई प्रतिरोध(एम0 आर0) के शहीद भगत सिह मैदान में दर्शन पाल,बरबरा राव, व गदर जैसे महान क्रान्तिकारी उपस्थित थे। यहॉ विश्व भर से आये तमाम-तमाम क्रान्तिकारी मौजूद थे जो गंभीरता से मानवीय दुनिया के निर्माण में लगे हुए थे । मैदान के विभिन्न पंडालो ंपर अलग-अलग विषयों पर कार्यशालाऐ आयोजित की गई थी, जिनमें सभी साथियों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की। हालाकि अग्रजी भाषा का अत्यधिक प्रयोग थोडा़ बाधक सिद्व हुआ। परन्तु विश्वभर से मौजूद विविधभाषी संस्कृतियों के लिये सम्पर्क भाषा का काम यहॉ अग्रेजीभाषा ही कर सकती थी।
प्रगति छात्र मंच(पी0एस0एफ0) से देहरादून, रामनगर, नैनीताल, व अल्मोड़ा के साथी आये हुए थे । 19 तारीख की सुबह रैली वाले साथी भी वहॉ पहुचे। इन साथियों से रास्ते में महिला साथियों की बहादूरी की कहानी सुनने को मिली कि किस तरह उन्होने एक घंण्टा रेल रूकवाकर पुलिस द्वारा कि गई क्र्रूर गलती पर उन्हें माफी मॉगने के लिये विवश किया । व पटरी पर जाम लगाकर उत्तराखण्ड की महिलाओं ने ये साबित कर दिया कि महिलाएॅ अपने हको ंके लिये जूझना और जीतना जानती है ।
अगले दिन 20 तारीक को भगत सिह मैदान से अगस्त क्रान्ति मैदान तक विशाल रैली जानी थी। तथा वहॉ एक एतिहासिक सभा का आयोजन होना था। गोरेगॉव से अगस्त क्रान्ति मैदान तक की लम्बी दूरी को पैदल मार्च व लोकल ट्रेन को कब्जा करके पार किया गया। मुम्बई की सड़कें लाल,पीले,व विभिन्न रंगों में लिखे बैनरों से पॅट गई। दुनियाभर की मेहनतकश ताकतवर जनता की साम्राज्यवाद को खुली चेतावनी थी और ये एलान भी था कि भविष्य साम्यवाद का है। दूसरी तरफ डब्लू0एस0एफ0 का तरीका बड़ा विचित्र था वहॉ नेस्को ग्राउन्ड के नीले आकाश में रंग बिरंगे गुब्बारे उड़ रहे थे, वहॉ जश्न और खुशी का माहौल था। चुकि हमारा इस तरह का पहला अभियान था अतः हम अपने ही एक साथी के नेत्रत्व में प्रातः बिना बताये जूहू स्थित समुद्र देखने निकल पड़े। अब हम यह सोच कर गये थे कि रैली निकलने से पूर्व वापस गतब्य तक पहॅुच जायगे पर हमारे वहॉ पहुॅचने से पूर्व ही रैली निकल चुकी थी। हमने समुद्र का आनन्द तो लिया पर रैली में नही रह पाये। पंरतु भारत की आर्थिक राजधानी साम्राज्यवाद को ध्वस्त करो‘ जार्ज बुश पे हल्ला बोल,हल्ला बोल के नारे से गुंजायमान थी।
इस अभियान मे जहॉ एक तरफ आन्ध्रा से हजारों की संख्या में किसान आये थे तोे दूसरी तरफ झारखण्ड के आदिवासियों को देखा जो झुम्बक बाला झूम‘ जैसे गानों के माध्यम से वैश्वीकरण के प्रभाव को अभिव्यक्त कर रहे थे। नेपाल से भी कई साथियों ने भागीदारी की थी। 19 तारीख की शाम मशाल जूलूस निकालकर प्रदर्शन किया गया जिसमें महान संस्कृतिकर्मी गदर ने भीड़ के बीच ‘‘देखो रे देखो भैया अमेरिका वाला आया‘‘ जनगीत गाया। गदर के गीत को सारा जनसमूह दोहराता था।
अगस्त क्रान्ति मैदान में हम अपने अन्य साथियों से मिलने में सफल हुए। हमें अपनी गलती के लिये सजा तो नही मिली, परन्तु स्वय ही आत्मग्लानि हो रही थी। तत्पश्चात हम सभी साथियों ने बारी-बारी से वही पास के होटल में खाना खाया। होटल मे एक छोटा लड़का खाना बॉटने लगा था। उसने अपना नाम कमल बताया। में उसके बारे में अधिक जानना चाहती थी। इसलिये बार-बार कुछ न कुछ मॅगाने के बहाने रोक लेती लेकिन ‘‘मालिक मारेगा‘‘ कहकर वह भाग जाता। उसके बारे इतना ही जान पायी कि पिताजी मकान बनाने के बनाने का काम करते थे।एक बार उॅची दीवार से गिरकर अकाल काल-कवलित हो गए। मकान बनाने वाले, कोठियों को खड़ा करने वाले बेटे कमल के लिये अब कोई मामूली घर भी नही। उससे में सिर्फ इतना कहकर आई भाई हमारी ये लड़ाई तुम्हारी तरह के लोगों के लिये है। एक दिन जरूर मेहनतकश जनता का राज होगा। भविष्य कोटी-कोटी मेहनतकश जनता का है और वही क्रान्ति की मुख्य वाहक शक्ति है।अगस्त क्रान्ति मैदान में हुअी सभा जिसमें रोम,इस्त्राइल, फिलीस्तीन, इटली,पेरू,क्यूबा,ब्राजील, फ्रांस,फिलीपीन्स, अफ्रीका नार्वो, श्रीलंका, बाग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान इत्यादि देशों के लोग थे, से यही बात निकलकर आयी कि आज दुनियाभर में साम्राज्यवादी भूमण्डलीकरण द्वारा मचायी गयी लूट से सर्वत्र जनता जनता पीड़ा में है। हालाकि लैटिन अमेरिकी व दशिण एसिया खासकर नेपाल व भारत में मुक्ति युद्व मजबूत ताकत बनकर उभर रहा है। निश्चित ही यह बात नई दुनिया का भ्रूण बनेगा। हमारी आवाज को दबाने की कोशिशें हो रही है । हमें जनवादी तरीके से अपने विचार प्रकट करने की आजादी नही है। मीडिया जो अमीरों व ताकतवर लोगों के हाथ में है हमें आतंकवादियों के तौर पर पेश करता है । आज सच्चे देशभक्तों को जरूरत है कि वे साम्राज्यवाद का खात्मा कर सच्चे जनवाद की स्थापना करें।
सभा समाप्ति के बाद उत्तराखण्ड के सभी साथी समुद्र की सैर को निकले। आज समुद्र भी मेहनतकशों की ताकत को देखकर प्रफुल्लित हो उठा था। रात्रि 10 बजे ट्रेन पकड़कर राजधानी दिल्ली के लिये रवाना होना था। उत्तराखण्ड के साथी अन्य साथियों से विदा लेकर मुम्बई सैन्ट्रल रेलवे स्टेशन पर एकत्र हुए। लेकिन सभी साथियों के लिये ट्रेन में जगह न होने व अव्यवस्था के कारण उस ट्रेन से उतरने का आदेश हुआ। रात भर स्टेशन पर रूककर प्रातः 8 बजे हम पंजाब मेल से दिल्ली को निकल पड़े। रास्ते भर सफर बेहद कठिनाई में बीता। एक जगह पुलिस से काफी झगड़ा हुआ। दिल्ली हम लालकिला होते हुए हम गुरूद्वारे पहुचे। रात में काठगोदाम वाली ट्रेन में बैठ गये। यहॉ से रामनगर वाले साथियों का डब्बा अलग हो गया। हालाकि गला बैठ चुका था। तब भी क्रान्तिकारी गीत गाते हुए सुबह 8 बजे हल्द्वानी पहुचे। वहॉ नैनीताल, हल्द्वानी के साथियांें को छोड़कर हम अल्मोड़ा की बस में बैठ गये। शाम 4 बजे हम अल्मोड़ा में थे। अल्मोड़ा की सड़कों पर चलते हुए उस दिन एक गर्व की अनुभूति हो रही थी। 14 जनवरी से 23 जनवरी तक 10 दिनों के सफर में हमारे पास ढेरों अनुभव थे। मुम्बई की एक दुकान का अनुभव बार-बार स्मरण हो आता है। जब हमने दुकानदार से पूछा आपके शहर में कौन-कौन सी चीज सस्ती मिलती है तो उसका जबाब था-‘आदमी! आदमी यहॉ बहुत सस्ता है‘। प्रकृति के अभिभावकत्व में जीते हम पहाड़वासी भी श्रम करते है परन्तु मैदान की जिन्दगी में हमने देखा कि वहॉ रात में भी दिन का जैसा माहौल है। सभी ब्यस्त लेकिन अपने तक सीमित। कमबख्त पेट व परिवार के खातिर उन्है जीवन के बारे में, उसकी बेहतरी के बारे में सोचने की फुर्सत ही नही। भारतवर्ष की राजधानी जहॉ संसद है, सुप्रीम कोर्ट है, जहॉ बड़े-बड़े प्रशासनिक अधिकारी, बुद्विजीवी व पत्रकार है, वहॉ की फुटपाथों में आदमी को भीख के लिये गिड़गिड़ाते देखकर अपने लोकतन्त्र पर शर्म महसूस होती है।
संसद के गलियारों पर ओ इतराने वालो,
ओ वातानुकुलित कक्षों के वासी, ओ दागी छवि के मतवालो
सकल देश में हालाहल है फुटपाथों पर हाला है,
संसद में रोशनी शेष भारत में अधियारा है,
मुम्बई प्रतिरोध 2004‘ की याद हमेशा के लिये दिलों में दर्ज हो गयी।