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Saturday, October 16, 2010

आत्मनिर्भरता के सपने को हकीकत में बदला देवकी ने



ओमी गुरू के परिवार ने दिखाया घर में रहकर जीविका अर्जन का रास्ता


हानी उस सामाजिक कार्यकर्ता के परिवार की है जो कभी सोवियत नारी पत्रिका का प्रचार व प्रसार करता था। लेकिन, सोवियत संघ की राजनीति में उलटफेर हुआ तो उस कार्यकर्ता को भी अपनी जड़ों की ओर लौटना पड़ा। पत्रिका बंद हो गई और अंतर्राष्ट्रीयतावाद को भारी झटका लगा। कार्यकर्ता के सामने नई चुनौतियां थीं। जमीनी सच्चाई से मुठभेड़ का वक्त था। दरअसल, देश दुनिया की तमाम प्रगति, सोविवत संघ व संयुक्त राज्य अमेरिका की वर्चस्व की लड़ाई के बावजूद, पहाड़ से पलायन का सिलसिला बदस्तूर जारी था।
कामरेड ओमप्रकाश जोशी यानि ओमी गुरू को वापस अपने सीमावर्ती गांव पिथौरागढ़ लौटना पड़ा। जहां पत्नी थी, बच्चे थे और आजीविका का संकट था। पहाड़ की ऊंचाईयों में लहरा रहे बाजार के परचम से मुकाबले का समय। बाहर से पहाड़ में घुस आया बाजार निर्मम था, लेकिन उसका चकाचौंध भरा चेहरा बड़ा मानवीय दिखता था। मानो पिछड़ गए लोगों के उद्धार का जिम्मा उसी का हो। यह बाजार गांवों की पाई-पाई निचोड़ रहा था।
विशाल उत्तर प्रदेश से खुद को मुक्त करने की पर्वतीय जनमानस की छटपटाहट अलग थी। लेकिन, हर किसी की जुबां पर यही सवाल था, भई अलग राज्य बना तो खाएंगे क्या ? कम्युनिस्ट राजनीतिक कार्यकर्ता के बतौर ओमी गुरू को यह बात जल्दी समझ आ गई थी कि जिस रफ्तार से मनीआर्डर पहाड़ पहुंच रहे हैं, उससे अधिक गति से पूंजी नीचे उतर जा रही है। सब्जी से लेकर राशन तक, नमक से तेल तक, सभी कुछ तो बाहर से ही आता है। परंपरागत अर्थव्यवस्था का हरण कर लिया गया है, उसको फिर से पैरों के बल खड़ा करना फौरी लक्ष्य है।
लेकिन, सपने को हकीकत में तब्दील करना आसान नहीं था। ओमी गुरू के पास दृष्टि तो थी, उसे अनुभव का संबल दिया पत्नी देवकी देवी जोशी ने।
जन्मजात मेहनतकश पहाड़ की महिला को बस दिशा ही तो चाहिए थी। परिवार का सफर शुरू हुआ ऐसे जहां खोने के लिए कुछ भी नहीं था, पर सामने पूरा आकाश था। चार मासूम बेटों के भविष्य के लिए देवकी हर यत्न आजमाने को तैयार थी। लोकतांत्रिक मिजाज के परिवार में बहुत बहस-मुहाबिशे के बाद यह तय हुआ कि पिथौरागढ़ में नमकीन बेची जा सकती है। मशीनें खरीदने में पूंजी का संकट था तो घरेलू उपकरणों से ही काम शुरू कर दिया गया। बेटों के हाथों में झोले थमाए गए, जिस काम को बेटों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। स्कूल की पढ़ाई में अच्छा होने के बावजूद उन्हें लोगों से सुनना पड़ता-नमकीन गुरू के बेटे। बहुत ताने, बहुत जलालत। पर कम्युनिस्ट शिक्षा से बच्चे इतने परिपक्व हो चुके थे कि बस चेहरे पर मुस्कान के अलावा कुछ नहीं मिलता।
1994 में शुरूआत की तो दुकानदारों से बहुत बारगेनिंग होती। कोई लोकल ब्रांड नहीं रखना चाहता, कोई लागत की पूरी कीमत नहीं देना चाहता। सो बड़े दुकानदारों की बजाय छोटे-छोटे दुकानदारों, चाय के ढाबों व आस-पास के ग्रामीण इलाकों आदि को प्राथमिकता में रखा गया। सीधे घरों तक भी पहुंच बनाई गई। हर आदमी खरीद सके इसलिए एक रुपए के भी पैकेट बनाए गए। बेटे यदि नमकीन के पूरे स्टॉक के साथ भी लौटते तो मां का दुलार कम नहीं होता। कोई बात नहीं बेटा आज नहीं तो कल बिक जाएगा। शुरुआती दिनों में बहुत तरह के भय व दवाब सहे। पर मेहनत व पसीने का यह संघर्ष धीरे-धीरे रंग लाने लगा। सफाई, स्वाद व कीमत में देवकी देवी का ब्रांड पसंद किया जाने लगा। लोग खुद मांगने लगे। तीन साल बाद थोड़ी-थोड़ी पूंजी बचने लगी तो खादी ग्रामोद्योग से लगभग डेढ़ लाख का लोन लेने का निर्णय हुआ। इस पैसे से मशीनें खरीदी गईं। साथ ही उद्योग को कुमाऊं नमकीन के नाम से रजिस्टर्ड कराया गया।
स्थानीय बाजार में मांग थी। क्योंकि, बाहर से हल्दीराम आदि के जो ब्रांड आए थे, वे महंगे थे तथा हल्द्वानी, पीलीभीत व बरेली से आने वाला माल पिथौरागढ़ तक आते-आते बासी पड़ जाता था। ग्राहक शिकायत करते तो दुकानदारों के पास कोई जवाब नहीं होता। ऐसे में कुमाऊं नमकीन से बेहतर विकल्प नहीं था। यदि इस माल में कोई शिकायत भी आती तो उसकी शिकायत की जा सकती थी।
मांग व आपूर्ति की समझ रखने वाले ओमी गुरू यह भली भांति देख रहे थे कि पिथौरागढ़ का कस्बा, अब नगरीय रूप ले रहा है। यहां बड़ी संख्या में सेना व शिक्षा से जुड़े लोगों के घर बन रहे हैं। इन घरों की ड्राईंग रूम को अच्छी नमकीन की तलाश है। सो ब्रांड को और बेहतर बनाने की सोची गई, साथ ही उसमें विविधता लाने का प्रयास भी हुआ। मशीन आने से अधिक मात्रा में नमकीन बन सकती थी, साथ ही उसमें सफाई भी आने लगी थी। अब पैकेजिंग के काम पर भी ध्यान दिया गया। धंधा चल पड़ा था। पूरे परिवार के लिए यह सुखद अहसास था कि पहाड़ के लोग कोशिश करें तो पयालन थम सकता है। इस बीच चारों बेटों ने अच्छी शिक्षा भी हासिल कर ली। कुलीन ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से डिप्लोमा कर गढ़वाल विवि के श्रीनगर परिसर में शिक्षण शुरू किया है। रवि ने राजनीतिशास्त्र में शोध कर अल्मोड़ा परिसर अल्मोड़ा में नौकरी पा ली है, सबसे छोटा कमल एयरफोर्स मुंबई में तैनात है। वहीं, अमित राजनीतिशास्त्र में शोध कर छात्र राजनीति व लिंगदोह समिति की सिफारिशें विषय पर शोध भी कर रहा है। चारों बेटे जब भी समय मिले मां के काम में आज भी हाथ बंटाते हैं। कुमाऊं नमकीन का नाम आज प्रदेश ही नहीं पूरे देश में पहुंच चुका है। देश की कोई व्यापारिक प्रदर्शनी कुमांऊ नमकीन के स्टाल के बिना अधूरी मानी जाती है। अब तक प्रदेश के हर जिला मुख्यालय व राजधानी देहरादून समेत दिल्ली, जयपुर, भोपाल, इलाहाबाद, बरेली, प्रगति मैदान दिल्ली, मेरठ आदि दर्जनों नगरों में स्टाल लग चुके हैं। लगभग हर नगर में पूरा का पूरा स्टॉक निकल जाता है।
देवकी देवी के लिए वह दिन बड़ा शुभ था जब उसे बताया गया कि वह देश भर में छोटा उद्यम खड़ा करने वाले लोगों में सर्वोच्च चुनी गई हैं। 2004 में उन्हें यह पुरस्कार वित्त मंत्री पी चिदंबरम के हाथों मिला। पुरस्कार देश भर से चयनित 20 हजार लोगों में से मिला था। जब 300 में से टॉप टेन में नाम आया तो देवकी ने तसल्ली की कि यह भी काफी है, क्योंकि वह पूरे उत्तर भारत में प्रथम थी। लेकिन, दिल्ली में जब उसका नाम प्रथम विजेता के रूप में पुकारा गया तो खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। अपने अनुभव बताते हुए देवकी ने कहा मेरी आंखें आंसुओं से भर गई थीं। मुझे अपने पति व बेटों का सारा संघर्ष याद आ गया। मेरे बेटों ने किताब पढऩे व गाय का गोबर निकालने के काम में फर्क नहीं किया। उनका मानना है पहाड़ की महिलाओं को स्वयं में आत्मविश्वास लाना चाहिए। वह कुछ भी कर सकती हैं, बस एक लक्ष्य तय कर लें। सरकार से अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए वह कहती हंै, उसने स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए कुछ नहीं किया है। सरकार को बड़े उद्योगों की बजाय छोटे-छोटे उद्यमों को बढ़ावा देना चाहिए, इसी से टिकाऊ विकास आएगा। देवकी देवी ने बताया कुमाऊं नमकीन अब स्थानीय कृषि उत्पादों से नमकीन तैयार करने पर जोर दे रही है। हाल में मडुए से बनी नमकीन व भुजिया बाजार में लाया गया तो हाथों हाथ बिक गया। आज मडुवा व सोयाबीन (भट) की नमकीन हमारी पहचान बन चुका है। हमने इस बार मदकोट के गांवों से 100 कुंतल मडुवा खरीदने का लक्ष्य लिया है, पिछले साल 52 कुंतल खरीदा था। इससे बेचने वाले किसानों को भी बल मडुवा उगाने को बल मिला है।
देवकी को केन्द्र सरकार ने पुरस्कृत क्या किया, राज्य के सभी पुरस्कार उनकी झोली में आने लगे। लगभग हर दूसरी संस्था उन्हें सम्मानित करने को लालायित हो गई। राज्य के लघु व कुटीर उद्योग विभाग को यदि दूसरे राज्यों में अपनी प्रदर्शनी ले जानी हो तो उसे सबसे पहले कुमाऊं नमकीन की याद आती है। देवकी देवी को सरकार आज अपने ट्रेनर के तौर पर नए उद्यमियों को सिखाने के लिए भी बुलाती है।
देवकी के परिवार को लंबे समय से जानने वाले अर्थशास्त्री प्रो. मृगेश पाण्डे कहते हैं, जरूरत सरकार को देवकी के परिवार से सीखने की है। यह परिवार दूसरे तमाम परिवारों के लिए एक मिशाल बन सकता है। पाण्डे कहते हैं जब राज्य की सरकार 16000 करोड़ के कर्ज में डूबी हो, ऐसे समय में यह छोटी अर्थव्यवस्था ही राज्य के पलायन को रोक सकती है। यह समझ लेना चाहिए कि तराई में लगे बड़े-बड़े उद्योग भी हमारे काम के नहीं हैं, क्योंकि वह रोजगार कम देते हैं जबकि स्थानीय पूंजी को चमड़ी समेत उधेड़ ले जाते हैं, जो बहुत खतरनाक है।

उसने मार्क्सवाद रटा नहीं जिया है

मुठभेड़ एक दिलेर लक्ष्मी से

क्ष्मी देवी हल्द्वानी के मोतीनगर वासियों के लिए जाना-पहचाना नाम है। होश संभालने के बाद से लेकर उम्र के ढलान तक लक्ष्मी ने जिंदगी के न जाने कितने उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन लक्ष्मी का हौंसला कभी नहीं डिगा। आज भी लक्ष्मी जब गुरबत में जी रही है उसकी बूढ़ी हड्डयिां कमजोरों, शोषितों को इंसाफ दिलाने के लिए अकड़ जाती हैं। बेशक उसने माक्र्सवाद के विचारों को घोट कर नहीं पिया पर सार्थक पहल के जरिये वह विचारों के मूल उद्देश्यों को जीती जरूर है। रूद््राक्ष की मालाएं गले में लटकाए 85 साल के झुर्रियों भरे चेहरे के अंदर युवा जोश देखकर कोई भी दंग हो सकता है। दूसरी महिलाओं की तरह वह अपने अतीत व परिवार की निजी बातों में उलझना नहीं चाहती बल्कि गैरबराबरी की व्यवस्था को उलट-पलट कर देने की बात करती है। तीन पानी, मोतीनगर स्थित जब उनके घर पर उनसे मिलने का मौका मिला तो घर की दयनीय दशा देखकर माजरा सब समझ में आ गया। यह लक्ष्मी देवी हैं, जिनकी जिंदगी का हमेशा एक ही सूत्रवाक्य रहा, संघर्ष। जिसे सब कुछ ठीक-ठाक मिल रहा हो उसे क्या पड़ी है लडऩे-भिडऩे की? लेकिन लक्ष्मी देवी की बूढ़ी हड्डियां आज भी दूसरों के लिए लडऩे-भिडऩे के लिए फड़कने लगती हैं।कच्ची जमीन पर बना हुआ घर, उस पर रिसती छत, कुपोषण के कारण विकलांग बच्चे, शूगर, ब्लड प्रेशर, आंखों से रुखसत होती रोशनी। लेकिन दुखों के पहाड़ तले दबी लक्ष्मी देवी आत्मसमर्पण करने को तैयार नहीं हैं। उनकी दिलेरी से आज भी तराई की महिलाएं व पुरूष ऊर्जा पाते हैं। जब भी कोई आंदोलन, धरना या प्रदर्शन होते हैं तो लक्ष्मी देवी ललकारती हुई सी प्रथम पंक्ति में दिखाई देती हैं। उन्हें भरोसा है कि एक दिन समाज बदलेगा, गैरबराबरी हटेगी। आदमियत का राज आएगा। पार्टी जन सहयोग से चलती है इसे बेहतर तरीके से जानने वाली लक्ष्मी बदहाली के बावजूद कहती हैं कि बहुत समय से लेवी नहीं दे पाई हूं और कहीं कुछ आशंकित सी होकर कहती हैं कि कोई लेवी लेने वाला भी तो नहीं आया। लक्ष्मी देवी का माक्र्सवाद लेनिनवाद किताबी पंडितों से कुछ अलग किस्म का सा है। वह व्यवहार की बात करती है। आचरण की बात करती है। चरित्र की बात करती है। कहती हैं, 'मैं माक्र्सवाद से ज्यादा रामायण की किताबें पढ़ती हूं।Ó कहना ना होगा कि लक्ष्मी देवी ने माक्र्सवाद रटा नहीं, जिया है। वह रूद्राक्ष की मोटी-मोटी माला जपती जरूर हैं, लेकिन उनकी गिनती में शिवजी या गणेश नहीं बल्कि इलाके के गरीब लोगों का जाप होता है। एक-एक दाने को छूते हुए वह सोचती हैं कि फलां आदमी क्या काम आ सकता है। फलां आदमी की समस्या का समाधान कैसे हो सकता है? खुद को ही कैडर-लीडर मानते हुए लक्ष्मी देवी हिसाब लगाती हैं कि जब तराई की खुरपिया फार्म जैसी कइयों एकड़ भूमि भूमिहीनों के पास आ जाएगी तो उसका किस तरह उपयोग किया जाएगा। जीवन के जब कोई पन्ने उलटने को कहता है तो वह भावुक हो जाती हैं। एकाएक पुरानी जिंदगी में उतरकर वह बताती हैं, ' छह महीने की थी, पिताजी चल बसे। तब मां 18 साल की थी। मां मायके धपोलासेरा, बागेश्वर में आकर रहने लगी। उनके पास काफी जमीन थी। नुमाइश मैदान व आधे बागेश्वर की जमीन हमारी ही ठैरी। सातवीं तक की पढ़ाई की। फिर 17 साल में मेरी शादी हो गई। 25 साल की थी। पति चल बसे। जिस कच्ची जमीन पर रहते थे वह सरकार व इलाके के भूमाफियाओं ने छीन ली। कई लोग बेघर हो गए। उस भूमि के लिए अदालत के कितने चक्कर काटे। उसी दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ लोगों से मुलाकात हुई। आगे पीछे तो कोई था नहीं इसलिए पूरा समय जमीन के संघर्ष में बीता। पुलिस से कितनी मुठभेड़ों के बाद खुरपिया फार्म की 18 एकड़ 7 बिसुआ जमीन पर हम कब्जा कर सके। लोगों को दोबारा से अपना आशियाने मिल सके। तब से लोग मेरे पास अपनी छोटी-छोटी परेशानियों को लेकर आने लगे। किसी की विधवा पेंशन लगाना तो किसी को वृद्धाश्रम पेंशन दिलवाना। मंदिरों से निकालकर पैसा मैं जरूरतमंदों को दे दिया करती थी। मेरे हथियार तो पत्थर दातुली ही थे। औरतें तो बहुत डरती हैं। मैं तो भूत से तक नहीं डरती थी कहां तो मनखी से डरना। उम्र पूछने पर कहती हैं कि 70 हो गई होगी नहीं तो फिर 80 हो गई होगी। चिन्ह तो उनके मरने के साथ ही फाड़ दिया था पता नहीं कितने साल हो गए हैं। सारी कम्युनिस्ट पार्टियों से अनभिज्ञ लक्ष्मी देवी कहती हैं,' हुए तो हम लेनिनवादी ही। भले ही आज मैं काम नहीं कर पा रही हूं। लेकिन इस उम्र में भी पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए जो हो सकता है वह करूंगी।Ó अपने जमीनी लड़ाई के दिनों के वाकये सुनाते हुए कहती हैं,' जब मैं भूमिहीनो को खुरपिया फार्म की जमीन दिलाने के लिए संघर्ष कर रही थी तब मुझे धमकाने व मारने घर पर गुंडों का एक दल आया करता था। मैं दिन से ही (चंूकि उन दिनों टिन की छत थी) छत पर खूब सारे पत्थर इकठ्टे कर लेती। जैसे ही वह आते, मैं पत्थरों की बौछार शुरू कर देती। उन्हें लगता कि कई सारे लोग हैं और वे भाग खड़े होते। मौत की दहलीज पर खड़ी लक्ष्मी देवी का आज भी अंतिम लक्ष्य यही है कि खुरपिया फार्म की बची हुई 3400 एकड़ जमीन को माफिया के कब्जे से मुक्त कर गरीब, भूमीहीनों में बांट सके।

मध्यमवर्गीय उम्मीदों की ताकत बनी सादिया

सदिया आलम। एक महीने पहले तक इस नाम को कौन जानता था भला? मगर आज सादिया के पांव जमीं पर नहीं हैं। सफलता के आसमान पर उसकी लंबी छलांग ने उसे ही नहीं उसकी मां, भाई और बहनों को एकाएक सबसे खास बना दिया है। राज्य प्रशासनिक सेवा की सर्वोच्च वरीयताधारी सादिया का जिक्र इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि वह एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार का प्रतिनिधित्व करती है, जहां बेटे और बेटियों को आईएएस और पीसीएएस अफसर बनाये जाने के भरपूर सपने देखे जाते हैं। सादिया का चुना जाना दरअसल मध्यमवर्गीय उम्मीदों का ताकतवर बनना है। बकौल सादिया 'दादा ने जज बनने का सपना देखा था, वह नहीं बन पाये मगर मरहूम पिता की प्रेरणा से मैंने प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना जरूर पूरा कर लिया।Ó उसके इस सपने ने उस सेवक आश्रम रोड को भी गुलजार बना दिया जो आज से पहले सिर्फ अपने होने के लिए जाना जाता था। पिछले दिनों तक इस रास्ते पर मीडिया वालों से लेकर परिजनों और मित्रों का तांता लगा रहा। बधाइयों से लदी सादिया से खुशियां संभाले नहीं संभल रही हैं। इन्हें संभालने में मां सैयद आलम, भाई और बहन भी पीछे नहीं थे। चूंकि आलम परिवार ने मीडिया कर्मियों की इतनी रेलम-पेल पहले कभी नहीं देखी थी, इसलिए यह अलग किस्म का दबाव उन्हें कई बार निजता में अतिक्रमण की तरह भी दिखाई दिया। यह तब महसूस हुआ जब सादिया से इंटरव्यू का वक्त मांगा गया मगर वह बहुत देरी से मिला। साक्षात्कार के दौरान सादिया से ज्यादा उसकी मां के जवाब उन लोगों के लिए अटपटे हो सकते हैं जो एक मां के संघर्षों से मिली खुशी को महसूस नहीं कर सकते। उनके असहज दिखाई देने के पीछे एक मां का वह सपना था जिसे उसने कठिनाइयों और संघर्र्षों के बीच एक दिये की तरह रोशन रखा और आज उसकी रोशनी में पूरा परिवार नहा रहा है। तभी तो जब सादिया से चर्चा शुरू हुई तो उसकी मां, बहन और भाई भी उसके चारों ओर जम गए। सादिया से पूछे जाने वाले एक-एक सवाल का जवाब वह देने को बेताब दिखे। खैर बातचीत के दौरान सादिया ने बताया कि वह भाग्यशाली हैं कि प्रथम प्रयास में ही सर्वोच्च स्थान पा सकी। सादिया मूलत: देहरादून में ही जन्मी, पली, बढ़ी। कॉन्वेंट स्कूल से प्रारम्भिक शिक्षा लेने के बाद डीएवी कालेज से बी.एससी की परीक्षा उत्तीर्ण की। फिर कानून की पढ़ाई पूरी की। छोटेपन से ही प्रशासनिक अधिकारी बनने का शौक रखने वाली सादिया पीसीएस में निकलने से खुश तो बहुत हैं पर उनका अंतिम लक्ष्य आईएएस बनना है जिसके लिए वह एक बार प्री एक्जाम निकाल भी चुकी हैं। 13 की उम्र से कविताओं का शौक रखने वाली सादिया अब तक 500 से अधिक कविताएं लिख चुकी है। वह कहती है कि प्रकृति व मानव के कई रूप ऐसे होते हैं जिनसे मन में उद्वेलना होती हैं और वही उद्वेलना कविता का रूप ले लेती है। एक प्रशासक के लिए सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्ट सामाजिक ढांचे को सही करने की है। कहती हैं पहाड़ी इलाकों के विकास के लिए कार्य करना, उनकी स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों को आसान करना प्रशासक की प्राथमिकता में होना चाहिए। पंचायतों को लोकतंत्र की रीढ़ मानने वाली सादिया महिलाओं के पंचायतों में बड़ी संख्या में भागीदारी को एक बड़े बदलाव के रूप में देखती हैं वो कहती हैं कि अगर युवा व पढ़ी लिखी लड़कियां पंचायतों में आएंगी तो महिला के मात्र रबड़ स्टैंप बनने की अवधारणा बदलेगी व वह अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाने में कामयाब होंगी। नारी को देवी कहने मात्र से नहीं होगा। उसे वो उचित सम्मान देने के लिए एक बड़े पैमाने पर मानसिक बदलाव की जरूरत है ताकि देवी बनने से पहले उसे इन्सानी हक तो मिलें। किसके विचारों ने आपको प्रभावित किया पूछने पर जवाब मिला कि परफेक्ट कोई भी नहीं होता पर अपने सार्वजनिक जीवन में मदर टेरेजा, नेल्सन मंडेला व गांधी ने मुझे प्रभावित किया। रंग दे बसन्ती फिल्म ने भी मुझे बल दिया जब नायक कहता है कि हम बदलेंगे समाज को आईएएस, पीसीएस बनकर बदलेंगे। तब मुझे इस पद की ताकत का अहसास हुआ। पेशा जब काफी चैलेंजिंग, डायनमिक व सामाजिकता से जुड़ा हो तो इससे बेहतर खुशी और क्या हो सकती है। अखबार पढऩा मेरा पहला शौक है। द हिन्दू मेरा प्रिय अखबार है। संगीत का शौक भी है। मैलोडियस धुनें मुझे बहुत पंसद हैं। विलियम शेक्सपियर मेरे प्रिय पोइट हैं। तारे जमीन पर फिल्म मुझे बेहद पसंद है इस तरह के नये प्रयोग होने चाहिए। मीडिया की मैं रिस्पेक्ट करती हूं क्योंकि एक जरूरी पार्ट है वह हमारी जिंदगी का। पीसीएस की तैयारी के संदर्भ में सादिया कहती हैं कि हर विषय की बेसिक जानकारी जरूर होनी चाहिए । बाकि जो विषय आपने चुने हैं उनका गहराई से अध्ययन करें। अच्छे राइटर की किताब एक मुख्य रोल अदा करती है। इतिहास में रोमिला थापर व विपिन चन्द्रा अच्छे लेखक हैं। कोचिंग ज्वाइन करके एक दिशा जरूर मिलती है पर सेल्फ स्टेडी का कोई तोड़ नहीं है। लगातार बढ़ती आतंकी घटनाओं के बारे में पूछे जाने पर कहती हैं कि आतंकवाद के मसले को मैं धर्म से जोड़ते हुए नहीं देखती। मैं मानती हूं कि इसे दूर करने के लिए मैच्योर व ब्रॉड माइंडेड होकर काम करने की बेहद जरूरत है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कद्र करने वाली सादिया उसे भारतीय युवाओं के लिए रोजगार की खान मानती हंै।

आध मुनस्यार की आवाज बनी मलिका

किसी के अंदर मानवता है तो यह बात बेमानी हो जाती हैं कि फलां व्यक्ति किस देश, जाति धर्म का है। सरला बहन ने ये बात साबित करके दिखाई। यहां से हजारों मील दूर यूरोपीय देश में जन्मी पर जब कुछ करने का निर्णय लिया तो कुमांऊ की पहाडिय़ों में आकर सेवा आश्रम स्थापित किया। यही बात लोहाघाट में मायावती आश्रम स्थापित करने वाले स्वामी विवेकानंद पर भी लागू होती है।सुदूर मुनस्यारी के गांवों में सशक्त लेकिन मूक शुरूआत करने वाली मलिका विर्दी की भावना भी कुछ ऐसी ही थी। दिल्ली के एक सिक्ख परिवार में जन्मी और वहीं पली बढ़ी शिक्षा देश के कई हिस्सों में हासिल की। सिक्ख दंगों व भोपाल गैस त्रादसी ने स्वयं में उलझी रहने वाली मलिका को झकझोर कर रख दिया। तब तक मलिका आदर्शवादी सोच रखती थी। कहीं ना कहीं संभ्रांत वर्ग का भाव था। लेकिन इस महत्वपूर्ण मोड़ ने उनकी जिंदगी को बदल कर रख दिया। सामाजिक भूमिका के कई प्रयोगों के बाद अन्तत: उन्होंने निर्णय लिया कि शुरूआत एक ठोस बिंदु से होनी चाहिए। और यह बिंदु बना सुदूर मुनस्यारी गांव। जिसे शायद ही कोई सरकारी मुलाजिम या कोई फंड खाऊ एनजीओ अपना केन्द्र बनाना चाहते। आज तक की हर योजना में मुनस्यारी हमेशा अंत में ही आता रहा है। यहां सरकारी मास्टर, एसडीएम, पटवारी सबसे अंत में आते हैं, जब कोई विकल्प नहीं बचता। चीन की सीमा से लगे होने के कारण यहां आईटीबीपी की बटालियनें जरूर हैं, लेकिन समाज से उसका वास्ता दूर-दूर तक नहीं है। मुनस्यारी के बारे में एक कहावत भी है आध मुनस्यार आध संसार। यहां के भोले-भाले लोग बाहरी दुनिया से अपरिचित होने के कारण यही मानकर चलते हैं कि आधे तो हम हैं बाकि आधी दुनिया है।दिल्ली में आवाजें बड़ी हैं काम छोटे, यही सोचकर मलिका ने देश का एक सबसे पिछड़ा इलाका अपने काम के लिए चुना। शायद यही सोच कर कि लोगों के जीवन में छोटे-छोटे परिवर्तन लाकर और परिवर्तन के मॉडल तैयार कर एक बड़े परिवर्तन का आधार तैयार हो सकता है। किसी भी सफलता का पहला चरण है अपने से शुरूआत। चुनौती बड़ी है लेकिन उसका समाधान ढूंढने के लिए किसी को तो पहल करनी ही होगी। मलिका ने मुनस्यारी आकर पहले लोगों को उनके हालातों व देश की समसामयिक चीजों के बारे में बताया। फिर उन्हें सपने दिखाए, कि उनकी भी तकदीर बदल सकती है, कि वे हमेशा उपेक्षित व अलग-थलग रहने के लिए नहीं बने हैं, कि उनको अपनी तकदीर बदलने के लिए खुद ही पहल करनी होगी। एक तरफ चेतना सम्पन्न होना है उसके लिए सामाजिक राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदार बनना है तो दूसरी तरफ सरकार का मुंह न ताककर अपनी आजीविका का जिम्मा खुद लेना है। मलिका ने लोगों को पारंपरिक रूप से उगाई जाने वाली राजमा की खेती को व्यवसायिक रूप में अपनाकर बाजार से जोडऩे का काम किया। परिणास्वरूप आज मुनस्यारी की राजमा देश दुनिया में अपना सिक्का जमा चुकी है। और यह काम लोग खुद करने लगे हैं। जिससे उनकी आजीविका में भी वृद्धि हुई है। मलिका कहती है कि लोगों के हाथ में बैसाखी देने की जरूरत नहीं है उन्हें उनके पैरों पर खड़ा होने के लिए कहना है। लोग किसी तरह खड़े हों इसी में प्रयोग व परियोजना की सफलता है। लोगों के स्नेह, विश्वास व अपनेपन के कारण मलिका ने पांच साल तक मुनस्यारी गांव की वन सरपंच होना स्वीकार किया। 1992 में मुनस्यारी पहुंची । मलिका 17 साल से पर्यावरणीय पंचायती राज व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण व महिला सशक्तीकरण को लेकर काम कर रही है। उनके काम में कोई बहुत बड़ी क्रांति तो नहीं हुई लेकिन शांत क्लंात मुनस्यारी में इतनी हलचल जरूर हुई है कि लोग अपनी पहचान व हक हकूक की बात सोचने लगे हैं। महिलाएं सामाजिक मुद्दों को लेकर आगे आई हैं। व लोग दिल्ली देहरादून में पाई जाने वाली सरकार से विकास का एक टुकड़ा मुनस्यारी के लिए भी मांगने लगे हैं। इसमें मलिका द्वारा विकेन्द्रीकृत सत्ता की चेतना का योगदान उल्लेखनीय है। आज वह माटी संगठन के माध्यम से क्षेत्र के 50 गांवों में काम कर रही है। नेवी ऑफिसर तेज सिंह विर्दी व मां जसराज कौर की बेटी मलिका की प्राईमरी शिक्षा उनके ननिहाल देहरादून में व बाद की दिल्ली में हुई। यूं तो सामाजिक सक्रियता में भागीदारी बचपन से ही शुरू हो गई थी लेकिन पर्वतारोहण के शौक ने जगह-जगह जाने की भूख जगाई। 1997 में पूरब से पश्चिम तक फैले पूरे हिमालय की चोटियों का अभियान लिया। इसमें बछेन्द्री पाल व अन्यों के साथ अरूणाचल के बामडिला से शुरू होकर नेपाल तक की साढ़े छ: महीने की यात्रा की। मलिका के जीवन पर 84 के दंगों का गहरा प्रभाव पड़ा। तब तक वह नारीवादी सोच तक सीमित थीं। कहती हैं दंगों ने मुझे समाज के पूरे ताने-बाने पर विचार करने के लिए मजबूर किया। इसी दौरान बस्तियों व रिलीफ कैंपों में काम करते हुए यह अहसास भी हुआ कि मध्यवर्ग के रूझान, रूचियां आम समाज के लिए काम करने में किस तरह से बाधक हैं। इसी दौरान निर्णय लिया कि यदि काम करना है तो सच्चे मन से मैदान में कूदना होगा। 1988 में दक्षिण भारतीय मूल के व्यक्ति से विवाह करने के बाद 1992 से मुनस्यारी को अपनी कर्मस्थली घोषित कर दिया। इस समपर्ण के फल आज मुनस्यारी के गांव में साफ तौर पर देखे जा सकते हैं।

स्त्री पीड़ा से भरे हैं लोक गीत

लोक गीतों में स्त्री

लोक गीत जीवन से सच्चा साक्षातकार कराते हैं, इनमें बिना किसी लाग लपेट के बात कह दी जाती है। प्राय: जीवन का हर रूप इसमें प्रतिबिंबत होता है। पर्वतीय क्षेत्र में महिलाओं के श्रमिक जीवन ने इन गीतों को विरह भावना से भर दिया है। हर देश अंचल क्षेत्र या भाषा बोली के अपने लोक गीत होते हैं। यह बात पिछले दिनों महिला समाख्या व महादेवी पीठ के लोक गीतों में स्त्री विषय पर आयोजित तीन दिवसीय गोष्ठी में सामने आई। अद्र्धशिक्षित, अशिक्षित, कृषक,ज्वाले, लकड़हारे,घसियारिनें, पनिहारिनें,गडरिये, प्रवासी, आदि ये सरल मानव समूह इस परंपरा के वाहक होते हैं। यह परंपरा श्रुति दर श्रुति या मुख दर मुख परंपरित होती है। लोक गीतों के दो तिहाई से अधिक हिस्से में महिलाओं का दर्द समाहित है। खासकर रेगिस्तानी व पहाड़ी महिलाओं के लिए लोक गीत जीने का बड़ा संबल हैं। लोकगीतों की सशक्त हस्ताक्षर कबूतरी देवी कहती हैं कि अविरल, अंतहीन श्रम का सिलसिला है पहाड़ी औरत का जीवन। जिस तरह से बड़े से बड़े दुख में रो लेने के बाद जी हल्का हो जाता है उसी तरह पहाड़ की महिलाओं ने अपने कष्टों को गीत बनाकर कष्ट सहने की क्षमता बढ़ाई है। लोक गीत हमेशा से ही स्त्री के अपने दर्द को कहने का माध्यम बने हैं। ऐसे बिंब भी लोक साहित्य में ही मिलेंगे जब कोई महिला पहाड़ से थोड़ा झुकने के लिए कहे ताकि वह अपने माइके को देख सके। ये तमाम गीत स्त्री की विभिन्न स्थितियों( जैसे ससुराल में उससे छोटी सी गलती हो जाने पर भी उसके मायके वालों को कोसा जाना, दिन में तीन-तीन बार जंगल जाना, पेट भर खाना न मिल पाना, जंगल में कांठियों से गिर जाना, बहुत दुख आने पर नदी में छलांग लगाकर मर जाना, जंगल में पतरौल(वन रक्षक) द्वारा देखे जाने पर जुर्माने का डर, पेट भर खाना व अच्छा खाना न मिल पाने के कारण माइके की भिटोली का इंतजार, कम उम्र में विधवा हो जाने का विलाप, गर्भावस्था के दौरान प्रत्येक माह की बदलती अवस्था में कुछ अलग सा खाने का मन दूसरी शादी करने पर (नौली समाज का उपेक्षित व्यवहार से ही बने। छत्तीसगढ़ की लोक गायिका अन्नामाधुरी कहती हैं कि लोक जीवन में स्त्री चाहे उत्तराखंड की हो या छत्तीसगढ़ की। भूगोल व भाषा के अंतर के बावजूद औरत का दर्द व उससे निकली कराह एक सी है। उरांव जनजाति का गीत जमानों के बाहरी हाथों में चले जाने की कहानी बंया करता है। महिलाएं कहती हैं मिट्टी बेचना रक्त बेचने जैसा है। वह जमीन के मालिकों को कोसती है। असल जीवन जमीन पर ही है। धरती की धड़कन लोक गीतों में सुनाई देती है। यहां गीत मरहम की तरह हैं। सुख की बात लोक गीतों में कम है। त्रासदियां ही ज्यादा मुखर रूप में सामने आई हैं। वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी कहते हैं कि कला को ज्ञानियों ने उतना नहीं बचाया जितना कि अज्ञानियों ने। एक से एक खूबसूरत शब्दों को बनाने वाले विद्वान लोग नहीं बल्कि साधारण लोग होते हैं। स्त्री को पांचवी व दलित को छठी जाति बताते हुए वह कहते हैं कि 90 फीसदी लोक गीतों का काम देश भर की भाषाओं में केवल स्त्री ने किया है। लोक भाषा के ठेठ रूप की वाहक उस इलाके की अनपढ़ स्त्री होती है। स्त्री की व्यथा कथा लोक गीतों का प्राण है। दलित स्त्री व पुरूषों के मिले योगदान से ही लोक गीतों की परंपरा बची हुई है। भाषा अशुद्ध होकर ही फलीभूत होती है। लोक गीत साक्षर समाज की देन नहीं हैं। गायक नरेन्द्र ंिह नेगी पहाड़ के विकास से महिलाओं के काम में हुए परिवर्तन पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि उन्हें पहले लकड़ी के गठ्ठर ढ़ोने पड़ते थे आज सिलेंडर ढ़ो रही हैं। अब खाना भले ही भरपेट मिल जाता हो पर काम के बोझ से आज भी निजात नहीं मिल पाई है। भले ही आटा चक्की आ जाने से अब उन्हें हाथ से अनाज नहीं पीसना पड़ता है पर धान से लेकर झिंगोरा वो हाथ से ही कूटती हैं। पानी के नल भले ही गांव में बन गए हों पर पानी कोसों दूर नौलौ या अन्य स्त्रोतों से ही लाना पड़ता है। तीन नहीं तो दो वक्त निश्चित रूप से जंगल जाना ही पड़ता है। कभी घास को जाने में चट्टान से गिर गई। कभी जंगल में बाघ ने खा दिया, तो कभी इलाज के अभाव में दम तोड़ देती हैं। कोई बचपन में ही विधवा हो जाती है तो कोई गरीबी के कारण अपने से कई गुना ज्यादा उम्र वाले को ब्याह दी जाती है। जेएनयू के पूर्व भाषा विभाग अध्यक्ष प्रो मैनेजर पाण्डेय लोक गीतों की सबसे बड़ी खासियत बताते हुए कहते हैं कि 1857 के संग्राम में लोक गीतों ने संचार में बड़ी भूमिका निभाई। ये गीत लिखित थे इनका कोई एक रचनाकार नहीं था इसीलिए अंग्रेज सरकार भी इन पर पाबंदी नहीं लगा सकी। आगे वह कहते हैं कि संभ्रांत या शिष्ट साहित्य में हर माह गर्भ बदलने की अवस्था का ज्ञान नहीं हो सकता। यह केवल लोक काव्य में ही संभव है। आज लोक गीतों के नाम पर विवाह गीत या संस्कार गीत ही याद किए जाते हैं, लेकिन वास्तविक लोकगीत श्रम के सामूहिक गीत हैं। प्रसिद्ध उपन्यासकार पकंज बिष्ट का मानना है कि नारीवादी विमर्श के बिना लोक साहित्य में महिलाओं के योगदान का मूल्यांकन संभव नहीं था। पर नारी विमर्श की भी अपनी सीमाएं हैं। शिष्ट साहित्य में महिलाएं हाशिए पर हैं जबकि लोक साहित्य में वे अपनी पीड़ा खुलकर कह सकती है। वह कहते हैं कि बाजार व संचार क्रांति के हमलों से यह कला निष्प्राण हो चुकी है। शायद ही आने वाले दिनों में लोक गीत रचे जाएंगे। दूसरी ओर फिल्मों के लिए लोक गीतों का खजाना रीत चुका है। इसीलिए नई परिस्थितियों में लोक विधा को अस्तित्व के संकट से जूझना पड़ेगा। हरियाणा पुलिस के उपमहानिदेशक व लेखक विकास नारायण राय ने कहा कि सामंती संस्कारों को महिमामंडित करने वाले लोक गीतों का बड़ा हिस्सा स्त्री विरोधी ही है। जो अमोरिका के गुलामों की तरह अपने मालिकों को कम याय अधिक बुरा बताने का काम करते हैं। इन गीतों के कथ्य में परिवर्तन बेहद जरूरी है। कथाकार मैत्रेयी पुष्पा लोक गीतों को स्त्री के दावे, अर्जियां व शिकायतनामे करार देती हैं। और एक भोजपुरी लोक गीत के माध्यम से वह दादी इसका अंत बदल दो कहकर लोक गीतों में स्त्री विरह को खत्म करने की जरूरत बताती है।

शोहरत नहीं भूख के लिए गाया

अघिक मायने रखता है कि घुघूती नी बासा को गोपाल बाबू गोस्वामी गाएं या कबूतरी देवी। दोनों का स्वर लोकोन्मुखी है। उदासी है तो वह भी सामूहिक और खुशी है तो वह भी सामूहिक।

आए दिन प्रेस कांफ्रेंस व सीडी रिलीज करने वालों के लिए कबूतरी देवी अटपटा नाम हो सकता है, लेकिन असल में यह वह नाम है जिसने पर्वतीय लोक गीतों को उस समय पहचान दिलाई जब उसे जानने वाला कोई नहीं था। कबूतरी किसी स्कूल कालेज में नहीं पढ़ी, न ही किसी संगीत घराने से ही उसका ताल्लुक रहा बल्कि उसने पहाड़ी गांव के कठोर जीवन के बीच कला को देखा ,अपनाया, उसे अपनी खनकती आवाज से आगे बढ़ाया। पिथौरागढ़ के क्वीतड़ गांव की कबूतरी देवी की आवाज के लिए एक समय आकाशवाणी लखनऊ व नजीबाबाद तरसते थे। वह पिछले 20 वर्षों से गुमनामी के अंधेरे में हैं। कुछ लोगों के व्य्क्तिगत प्रयासों से उन्हें संस्कृति विभाग की मासिक 1000 रूपया पेंशन तो मिलने लगी है, लेकिन जीवन की कठिनाइयां उन्हें जीवन में घेरे हुए है। दुबली पतली काया तराशे हुए नैन-नक्श, सुघड़ वेश-भूषा, मीठी सुसंस्कृत भाषा यही कबूतरी देवी का परिचय है। मेरे दिल की दुनिया में हलचल मचा दी, मुहब्बत जता कर मुहब्बत जगा दी। बीते जमाने का यह भूला बिसरा गीत जब उनकी जुबां पर चढ़ता है तो आज भी हलचल मचाने के लिए पर्याप्त होता है। संगीत की औपचारिक तालीम न लेने पर भी उनका अनुभव सुर व ताल को अपनी उंगली पर नचाना है वह गाने के साथ खुद हारमोनियम बजाती हैं तो साथी तबला वादक को सही निर्देश भी देती हैं। दरअसल कबूतरी देवी का संबंध पहाड़ की उस परंपरागत गायकी से रहा है जिसे यहां की मूल कला भी कहा जा सकता है। दलित समाज की कबूतरी देवी के माता पिता का खानदानी पेशा गायकी ही रहा। 14 साल की उम्र में काली कुमांऊ(चंपावत जिले) से सोर(पिथौरागढ़ जिले) ब्याह कर लाई गई कबूतरी के माता-पिता दोनों उस्ताद थे। पिता गांव-गांव जाकर हारमोनियम, तबला, सारंगी बजाते मां गाती। इसी से रोजी रोटी भी चलती। कला की बुलंदी थी कि ससुराल आकर कबूतरी देवी को अपनी गायकी आजमाने का मौका मिला। पति दीवानी राम उन्हें कई आकाशवाणी केन्द्रों में ले गए। बताती हैं तब नजीबाबाद में एक गाना रिकार्ड करने का 25 रूपया दिया जाता था, लेकिन मुझे 50 रूपये दिए जाते थे। पति को मरे अब 25 वर्ष होने वाले हैं खुद कबूतरी भी 70 में पहुंच गई है लेकिन बीच-बीच में कला का सम्मान करने वाले कुछ लोग उन तक पहुंचते रहे हैं यही उनके जीवन का सबसे बड़ा संतोष है। कबूतरी देवी का जीवन संघर्ष यह समझने में मदद कर सकता है कि वास्तविक कला क्या होती है, वह कहां से उपजती है तथा उसका विज्ञान क्या है। वेदों के मूल रचयिता ग्वाले थे यह बात प्रमाणित हो चुकी है। इन ग्वालों ने जीवन को सहज रूप में जैसा देखा उसे बयंा कर दिया। उसको उत्सवधर्मिता का रूप देने के लिए श्रृचाओं का जन्म हुआ, धुनें आई, धुनों में जीवन के तमाम रूप प्रकट हुए लोक की खासियत है खुलापन। उसका कोई पेटेंट नहीं हो सकता, न ही वहां लिखने-गाने, संगीत व धुन देने वालों के खांचे बने हैं। लोक कलाकार सच्चे अर्थों में ऑलराउंडर होता है। कबूतरी पर्वतीय समाज के एक आदिम हिस्से की विरासत है। मशहूर साहित्यिक आलोचक क्रिस्टोफर कॉडवेल अपनी रचना विभ्रम और यथार्थ में यह तथ्य उद्घाटित करते हैं कविता एक व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि साझे आवेग की एक पूरी दुनिया के भागीदार के रूप में मनुष्य की उदीयमान आत्म चेतना है। लोककला पर लंबे समय से शोधरत डा. कपिलेश भोज कहते हैं लोक कलाकार हमारे समाज का साझा आवेग है। अधिक मायने रखता है घुघुती नी बासा को गोपाल बाबू गोस्वामी गाएं या कबूतरी देवी दोनों का स्वर लोकोन्मुखी है। उदासी है तो वह भी सामूहिक। खुशी है तो वह भी सामूहिक। लोक कला के हमारे जो भी बड़े कलाकार हैं गौर्दा, गिर्दा, जीत सिंह नेगी, गोपाल बाबू गोस्वामी या नरेन्द्र नेगी इनके वही गीत अधिक लोकप्रिय हुए जिनको आम लोग अपना सके। कबूतरी देवी कुमांऊ के परस्पर पूरक तीन समाजों की कला की वाहक हैं। कुमांउनी, नेपाली व फाग(संस्कार गीत)। इसके अलावा वह समकालीन लोकप्रिय हिंदी गीतों को भी सजाएं हैं। टीवी या टेप तब नहीं था रेडियो में जो गीत प्रसारित होते थे कबूतरी उन्हें सुनकर याद करती। सुना, आत्मसात किया, फिर जंगल में घास काटते समय उसे सुर में साधा। यही थी रिहर्सल। भूमिहीन दीवानी राम(जिन्हें कबूतरी देवी नेताजी कहती है) के परिवार के लिए धीरे-धीरे कबूतरी की आवाज ही आजीविका बन गई। नेता जी आकाशवाणी केन्द्रों के चक्कर काटते, कागजों को घुमाते बारी आने पर कबूतरी को वहां ले जाते। तब आज की तरह परिवहन व संचार की व्यवस्था नहीं थी। पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से 30 किमी दूर स्थित गांव से देश देशांतर की यात्रा कर आना सचमुच रोमांचक अनुभव रहा होगा। बंबई आकाशवाणी में रिर्काडिंग के लिए जाते हुए कबूतरी देवी अपने अनुभव सुनाते हुए कहती हैं मैं रास्ते में ही गाना याद करती बहुत घबराहट होती। पति मेरा हौसला बढ़ाते। बंबई चर्च गेट व एक दूसरी जगह हम दोनों रियाज करते रहते। गीत संगीत व क्लासिकी को कबूतरी शब्दों में नहीं बता पाती तो कहती हंै हारमोनियम की भाषा में बता देती हूं। आकाशवाणी के अलावा वह पहाड़ में जब-तब लगने वाले मेलों में भी खूब गाती। बताती हैं तब मेले, मेले जैसे थे उनमें भीड़ जुटती थी और लोग सुनते थे। उनके पास द्वाराहाट, गंगोलीहाट, थल, जौलजीवी व देवीधुरा मेलों की सजीव यादें हैं। 'भात पकायो बासमती को भूख लागी खै कबूतरी देवी की कही इन पंक्तियों से हम उनके व्यक्तित्व का अंदाज लगा सकते हैं कि बिना किसी से कोई उम्मीद व अपेक्षा किए कैसे उन्होंने अपना जीवन सादे तरीके से जिया।

पहाड़ की औरतें तो रोज लांघती हैं चोटियाँ

चंद्रप्रभा एतवाल पर्वतारोहण के क्षेत्र में एक बड़ा नाम। सरल, सहज और बेवाक। रविवार, ग्यारह जनवरी की सुबह जब उनसे मुलाकात हुई तो यकीन करना मुश्किल था कि यह वही महिला है जिसने तीन-तीन एवरेस्ट अभियान सफलतापूर्वक पूरे किए। जो अजुर्न अवार्डी हैं। जिन्हें पदमश्री से भी नवाजा जा चुका है। जब उनसे पूछा गया कि कैसे चढ़ गई आप ऊंची-ऊंची चोटियों पर? वह भी एक महिला होकर तो बोली पहाड़ की औरतें तो रोज ही ऐसा करती हैं। हां नेहरू इंस्ट्टीट्यूट ऑफ माउंटनेयरिंग ने मेरा व्यक्त्तिव जरूर बदल दिया। मैं बहुत झेंपती थी। यहां मुझे खुलने का अवसर मिला। मेरा दुनिया को देखने का नजरिया ही बदल गया। सुदूर नेपाल के छागंडू गांव मेे दरजी सिंह एतवाल के घर जन्मी चन्द्रप्रभा ने पहली तक की पढ़ाई नेपाल से ही की। कहती हैं लोगों के आपसी सहयोग से गांव में एक स्कूल खोला गया था। गुरूजी हमारे पड़ोस में रहते थे। मै उनका बचा हुआ खाना खाती, फिर बर्तन धोती। वह मुझेे पढ़ाते भी थे जिस कारण मुझे जल्दी जमा एक में दाखिला मिल गया। उम्र तो याद नहीं पर मैंने बहुत देर से स्कूल जाना शुरू किया। मेरी दीदी मुझसे 6 साल बड़ी व अनपढ़ थी। उसने मुझे पढ़ाने के लिए बहुत फोर्स किया। बहुत बड़ी होने के कारण मुझे स्कूल की पाटी(स्लेट) ले जाने में शरम लगती थी। दीद ही पाठी स्कूल में रख आती। आज जो कुछ भी हूं अपनी दीदी के विशेष सहयोग व आग्रह के कारण हूं। बचपन से ही मुझे उटपटांग कामों में अधिक रुचि थी। पिताजी तिब्बत व तकलाकोट(मानसरोवर) व्यापार के लिए जाते तो उन्हें घोड़े तक पहुंचाने के बहाने मैं घर के एक जोड़ी कपड़ों में ही जिद करके चल देती। तीन महीने का टूर होता। मेरा काम होता कि मैं वहां चाय वहैरह बनाकर पिला देती बस। दूसरी क्लास से हम भारत बार्डर आ गए थे। पांचवी तक की पढ़ाई गबर््यान से की जो कि घर से 5 किमी दूर था। पांगू से 10वीं की जिसकी परीक्षा देने अस्कोट जाती थी। रोज का सुबह शाम आना जाना रहता था। जाड़ों के सीजन में हम कुछ महीने धारचूला आ जाते थे। खेती तो ज्यादा होती नहीं थी। दसवीं पास करने के बाद घर पर बहुत ज्यादा रिश्ते आने लग गए थे। इसलिए पिताजी ने मुझे नैनीताल पढऩे भेज दिया। वहां हास्टल में रहकर 12 वीं व बीए की परीक्षा उत्र्तीण की। अल्मोड़ा से आईआईटी भी किया। फिर इलाहाबाद से शारीरिक प्रशिक्षण की डिग्री ली व उसी पद पर 1966 पिथौरागढ़ में शिक्षक के रूप में आई। घर का पूरा खर्चा फिर मैं ही चलाती थी। गांव वाले व्यंग्य करते रहते कि बाप बेटी की कमाई खाता है। एक बार स्कूल में एक सर्कुलर आया था कि कोई शिक्षक मांउटेनियरिंग का कोर्स करना चाहता है? मुझे जिज्ञासा हुई कि ये क्या होता होगा। मैने फार्म डाल दिया। तब 1972 में मुझे कॉल आया एक महीने के प्रशिक्षण में उत्तराकाशी जाना पड़ा। गढ़वाल जाना व गंगा को इतने करीब से देखना बहुत सुखद अनुभव था। प्रशिक्षण देने आर्मी वाले आए थे। पूर लेक्चर अंग्रेजी में देते थे। एकबारगी तो लगा कि मैं नहीं कर पाउंगी पर अरूणाचल प्रदेश की लड़कियों को देखकर उत्साह बढ़ा। उन्हें तो न अंग्रेजी ठीक से आती थी और न ही हिंदी। मैं कम से कम हिंदी तो पूरी जानती थी। हिमालय पहाड़ के साथ मेडिकल की पढ़ाई भी होती थी। फिर प्रैक्टिकल का दौर आया तो पहाड़ की महिला का आत्मविश्वास बढऩा ही था। पीक पर चढऩे में मैं सबसे आगे थी। वहीं से मेरे स्वभाव में खुलापन आया। कई दोस्त बने। 1975 में कलकत्ता की रमा सेन गुप्ता ने अपने हिमालय एसोसिएशन की मेंबर बनने का आग्रह पर उनके साथ 22410 फीट ऊंची बेबी शिवलिंग पीक में ट्रैंकिंग की। इसके अलावा जापान में 4-5 चोटियों व न्यूजीलैंड और नेपाल में कई चोटियों में गई। जापान के अनुभव बेहद रोमांचक रहे। वहां के लोगों जैसा स्वभाव मुझे कहीं नही लगता कि दुनिया में कहीं और होगा। अपने अतिथियों के लिए वे चाहते थे कि एक खरोंच तक न आए। इसके लिए उन्होंने किसी भी पीक पर मुझे आगे नहीं जाने दिया। वहा की एक सबसे बडी़ खासियत यह थी कि माउंटेन में चढऩे से पहले नीचे माउंटेन हट्ज बने होते हैं जहां उससे संबधित सारा सामान मिलता है। जिसको भी जिस चीज की जरूरत होती है वह उठा लेता और अभियान पूरा होने पर उस सामान को सुखाकर वहीं रख देता। एक एवरेस्ट को ही चढऩे में अब 11-12 लाख रूपये से कम का खर्चा नहीं आता। कहती हैं पहले व तीसरे अभियान में मुझे समझ नहीं आया कि मुझे आगे क्यों नहीं बढऩे दिया।दूसरे अभियान में खराब मौसम के कारण टीम आगे नहीं जा पाई। और वापस लौट गई। तीसरे अभियान में बछेन्द्री पाल हमारी टीम की लीडर थी। एवरेस्ट पर उन्हीं को परमिशन मिलनी थी जो 24 हजार फीट तक आसानी से चढ़़ सकते थे पर मुझे एवरेस्ट चढऩे से रोक दिया गया। जबकि मैं पूरी चढ़ाई आसानी से चढ़ चुकी थी। नहीं चढ़ सकने वालों को शामिल किया गया पर मुझे आधे से ही वापस आना पड़ा। मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि मुझे क्यों रोक दिया गया। दोनों अभियानों में जाने से। उनके चेहरे पर एवरेस्ट न चढ़ सकने का मलाल आज भी साफ देखा जा सकता है। आज भी इच्छा जताती हैं कि एक बार एवरेस्ट जरूर चढ़ूं। लेकिन 12 लाख तक का खर्चा उठाउंगी कहां से। कहती हैं वैसे जीवन में हर किसी को एक बार माउंटनेयरिंग जरूर करनी चाहिए. आदमी जूझने व जोखिम के इस काम से बहुत विनम्र बना जाता है। कैसा लगा पुरूस्कार पाने पर तो भरी हुई आंखें लेकर कहती हैं कि जब अजुर्न परुस्कार मिला तब मैं माणा चमोली पीक पर गई थी वहीं मुझे खबर मिली और जब पदमश्री मिला तो न्यूजीलैंड की चोटी पर थी। मां बाबू तो चल बसे थे। भाई नहीं था दीदी थी बस। तो पुरस्कार की घोषणा से मैं बहुत रोयी कि काश ये खबर मेरे मां बाबू भी सुन पाते। मेरे साथ मेरी दीदी के बच्चे भी रहते थे। वो सब भी माउंटनेयरिंग कर चुके हैं। अगर कोई मुझसे सीखना चाहता है तो मैं आज भी उन्हें राह दिखाने के लिए तत्पर हूं मैं चाहती हूं कि हर लड़की एक बार माउंटनेयरिंग का बेसिक कोर्स जरूर करें।

फिदाईन बनने को मजबूर शिक्षा आचार्य

अब टावर चढ़ा बेरोजगारी का बुखार

दरअसल शिक्षा आचार्य, शिक्षा अनुदेशक, शिक्षा बंधु, शिक्षा मित्र जैसे मनमाने प्रयोग कर सरकार ने शिक्षा के परंपरागत स्वरूप को तो क्षतिग्रस्त किया ही, अब खुद उसकी दी गई व्यवस्था उसके लिए भस्मासुरी साबित होने जा रही है। समीक्षा उन परियोजनाओं की भी होनी चाहिए जो विश्व बैंक के धन से शुरू तो हो जाती हैं, लेकिन किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाती।

प्रदेश की भाजपा सरकार जिस समय अपने चहेतों को लाल बत्तियां परोस रही थी, लगभग उसी समय एक बेरोजगार विधान सभा के सामने स्थित प्रसार भारती के टावर पर खुद पर पैट्रोल छिड़कने को मजबूर था। उसका यह टावर में पांचवा दिन था। चूंकि, गणतंत्र की सालगिरह भी आ रही थी इसलिए पुलिस के एक अधिकारी ने हिम्मत दिखाते हुए इस बेरोजगार को जबरन नीचे का उतारने का करतब किया, जिसमें वह झुलस भी गया। जैसे-तैसे दोनों को नीचे उतारकर अस्पताल ले जाया गया। लेकिन, मेहरबानी उत्तराखंड सरकार की कि पुलिस के अधिकारी को तो गैलेण्ट्री अवार्ड से नवाजा गया, लेकिन युवक पर भारतीय दंड संहिता की कठोर धाराएं ठोंक दी गईं। यही नहीं अंधे गणतंत्र की भव्यता पर खलल न पहुंचे इसके लिए विरोध कर रहे युवक के साथियों को जबरन उठाकर सींखचों के पीछे भेज दिया गया। ये वो युवक हैं, जिन्हें प्रदेश की पहली भाजपानीत सरकार ने पिछड़े पर्वतीय गांवों में कांट्रेक्ट टीचर के बतौर तैनात किया था, तथा सात साल बाद भाजपा के शासन में ही उन्हें नौकरी से हटा दिया गया। शिक्षा आचार्य व शिक्षा अनुदेशक कहे जाने वाले ये युवक पिछले 730 दिन से अपने लिए रोजगार की मांग विधान सभा के समक्ष बैठकर कर रहे थे। इन युवकों को यहीं कहना है जब उन्होंने अपनी जवानी के सबसे ऊर्जावान वर्ष पिछड़े स्कूलों में मामूली तनख्वाह में गुजार दिए तो अब अधेड़ उम्र में वे किस सरकार को अपना दुखड़ा सुनाएं। बताना जरूरी होगा पुलिस की नौकरी में बतौर एसआई भर्ती हुआ, टावर में जांबाजी दिखाने पहुंचा परमेन्द्र डोबाल भी कभी इन आचार्यों की तरह उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए निकलने वाली रैलियों में उत्तराखंड जिंदाबाद के नारे लगाता था। पर आज राज्य सरकार को पुलिस प्यारी है, लेकिन बेराजगारों को रोजगार देना अंतिम वरीयता है। यही सबक है नौ साला उत्तराखंड राज्य का, जो बेरोजगारों के खूंन से सींचकर बड़ी हसरतों से लिया गया था। इन नौ सालों में सरकार बेरोजगारों को आत्महंता बनने के लिए ही उकसाया है। किसी आदमी की जिंदगी के सबसे ऊर्जावान वर्ष एक टेंट में धरना प्रदर्शन करते हुए बीत जाएं इससे बड़ी कुनीति क्या हो सकती है। इससे पूर्व भी एक शिक्षा आचार्य सरकार की असंवेदनशीलता के कारण अपने सर्टिफिकेट सहित नदी में कूदकर जान दे चुका है। दूर दराज क्षेत्रों से राजधानी में अपनी पीड़ा कहने आए इन शिक्षा आचार्यों का कहना है कि आंदोलन के अलावा अब उनके पास कोई चारा नहीं है। दो साल से अपना घर बार छोड़कर हम यहां धरने में लगे हैं। यहां तक कि हमारा एक साथी अपने पिता की अर्थी को कंधा तक देने तक को नहीं जा पाया। दरअसल शिक्षा आचार्य, शिक्षा अनुदेशक, शिक्षा बंधु, शिक्षा मित्र जैसे मनमाने प्रयोग कर सरकार ने शिक्षा के परंपरागत स्वरूप को तो क्षतिग्रस्त किया ही, अब खुद उसकी दी गई व्यवस्था उसके लिए भस्मासुरी साबित होने जा रही है। सरकार को सोचना चाहिए वह जिस भी योग्यता के युवकों-युवतियों को कामचलाऊ रोजगार दे रही है, कल वह उन्हें घर बैठ जाने के लिए कैसे कह सकती है। समीक्षा उन परियोजनाओं की भी होनी चाहिए जो विश्व बैंक के धन से शुरू तो हो जाती हैं, लेकिन किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाती। जिन स्कूलविहीन क्षेत्रों में शिक्षा आचार्यों व अनुदेशकों को तैनात किया गया था, उन्हें हटाने से वहां फिर वीरानी है। यह गरीब बच्चों के साथ खिलवाड़ है।ज्ञात हो कि केन्द्र सरकार ने बल्र्ड बैंक पोषित सर्व शिक्षा अभियान के तहत 2001 में दुरूह क्षेत्रों में आचार्य तैनात करने की व्यवस्था दी। एक आचार्य के स्कूल में न्यूनतम 20 बच्चे होने चाहिए थे। इससे अधिक बच्चे होने पर वहां जूनियर हाईस्कूल खोलकर उसमें दो शिक्षा अनुदेशक रखे जाने का प्रावधान रखा गया। इस तरह से 2001 में पूरे उत्तराखंड में 2595 शिक्षा आचार्य व अनुदेशक रखे गए। शर्त यह थी कि अगर बच्चों की संख्या बढ़ती है तो उस स्कूल को अपग्रेड करके उस आचार्य को शिक्षा मित्र के रूप में वहीं तैनात कर दिया जाएगा। इनको केन्द्र द्वारा 1000 रुपये का मानदेय दिया जाएगा। अक्टूबर 2006 से राज्य सरकार ने इनके काम को देखते हुए 1500 रूपये इन्हें राज्य के कोटे से देने शुरू किए। हर साल शिक्षा मित्रों की तरह इनका भी डाइट में प्रशिक्षण होता था। टिहरी विस्थापन के समय कुछ स्कूल डूब क्षेत्र में आ गए थे व कुछ अपग्रेड हो गए थे, इसलिए 2007 में 127 शिक्षा आचार्य व अनुदेशकों को शिक्षा मित्र के रूप में नियुक्ति दे दी गई। इसके अलावा 2006 में 400 शिक्षा आचार्यों को स्कूल अपग्रेड होने के कारण शिक्षा मित्र में समायोजित कर दिया गया। अब बचे हुए 1745 शिक्षा आचार्य भी धीरे-धीरे अपनी 7 सालों की सेवा के बाद अपने-अपने स्कूलों के भी अपग्रेड होने की आस लगाए हुए थे। बच्चों की संख्या भी स्कूलों में लगातार बढ़ रही थी। और अपने-अपने इलाकों में ही स्कूल होने के कारण भी यह बड़ी लगन से बच्चों को पढ़ा रहे थे पर सरकार ने अचानक 7 जनवरी 2008 को यह फरमान सुनाया कि सारे प्राईमरी व जूनियर स्कूलों को बंद कर दिया जाय व उनके बच्चों को समीप के प्राईमरी स्कूलों में समायोजित करने के लिए कहा दिया।तभी से आचार्य आंदोलनरत हैं कि उन्हें शिक्षा मित्र बनाकर समायोजित किया जाय। उत्तराखंड के कोने-कोने से आकर ये लोग कैसे इन दो सालों में अपना खर्चा चला रहे है,ं कैसे मूसलाधार बारिश व ठंड का सामना टैंट में ठिठुरकर किया इसका सुधलेवा कोई नहीं है। कभी इन्हें आचार संहिता ने रूलाया तो कभी नेताओं के अंदरूनी झगड़ों ने। पिछले साल केबिनेट मंत्री प्रकाश पंत की अध्यक्षता में बनी समिति ने कहा कि स्नातक डिग्रीधारी आचार्यों को शिक्षा मित्र में समायोजित किया जाना चाहिए। जो आचार्य स्नातक नहीं हुए हैं उन्हें तीन साल का समय दिए जाने की बात भी कही गई।लंबे समय तक निर्णय नहीं निकला तो आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई।उससे पता चला कि कोई रिपोर्ट बनी ही नहीं है। यानि कि मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। बार-बार शिक्षा मंत्री व सरकार द्वारा इन्हें आश्वासन मिलते रहे कि हां कुछ कर रहे हैं। पिछले विधान सभा सत्र में इन सब दावों व आश्वासनों की पोल खुली जब शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह बिष्ट से पूछा गया कि आप इन आचार्यों का क्या कर रहे हैं ? जवाब मिला कि हम इन्हें कहीं समायोजित नहीं कर सकते। मंत्री के इस बयान से निराश शिक्षा आचार्यों ने ठान लिया कि अब कोई गांधीवादी तरीका नहीं चलेगा। वह करो या मरो की स्थिति में आ गए। संगठन के अध्यक्ष पूर्ण सिंह राणा कहते हैं कि उत्तराखंड राज्य की लड़ाई में हमने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था, लेकिन 9 साल बाद पता चला कि यह राज्य तो हमारा है ही नहीं। रोजगार तो यहां उन 70 लोगों व उनके चमचों को ही मिला है जो जनता के प्रतिनिधि होने का ढोंग करते हैं। युवाओं ने तो सिर्फ धोखा खाया है। अगर जनप्रतिनिधियों की मंशा होती तो जिस तरह से अपनी विधायक निधि के पैसे को बढ़ाने को लेकर एकजुट हो रहे हैं तो क्या सरकार पर दबाव बनाकर यह काम नहीं कर सकते थे। सरकार अपने चहेतों को लाल बत्तियां बांट सकती है, उनके वेतन भत्ते बढ़ा सकती है लेकिन हमें रोजगार नहीं दे सकते। घटनाक्रम 17 जनवरी की रात पूर्ण सिंह राणा धरना स्थल के निकट प्रसार भारती के 60 मीटर ऊंचे टावर पर चढ़ गए।18 जनवरी को प्रशासन को सूचना मिली तो एसडीएम उन्हें मनाने पहुंचे।19 जनवरी को जिला शिक्षा अधिकारी मनाने पहुंचे। 20 को एसपी सिटी व सिटी मजिस्ट्रेट व शिक्षा विभाग के अधिकारी उन्हें मनाने पहुंचे। इस बीच उनके अन्य साथी विधानसभा पर लगातर प्रदर्शन करते रहे। 21 जनवरी को भी सिटी मजिस्ट्रेट मनाने पहुंचे तो पर्चा फेंककर दी आत्मदाह की धमकी। 22 जनवरी को राणा की पत्नी व पिता को पुलिस उत्तरकाशी से देहरादून ले आई। देर रात सीओ अपवी टीम सहित राणा को टावर से उतारने के लिए गए। टावर पर सीओ को चढ़कता देख राणा ने खुद पर पैट्रोल छिड़ककर आग लगा ली। राणा को बचाने में सीओ प्रमेंन्द्र डोबाल भी झुलस गए। राणा को नीचे उतार कर अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसके बाद पुलिस ने राणा के ऊपर आत्मदाह के प्रयास, जानलेवा हमले का प्रयास व लोक सेवक को गंभीर क्षति पहुंचाने के मामले में धाराएं लगा दी। और शासन द्वारा परमेन्द्र डोबाल को गैलेन्ट्री अवार्ड व दो लाख व राणा को नीचे उतारने के एवज में पूरी टीम को तीन लाख रूपये के पुरस्कार की घोषणा की गई।और अब गणतंज्ञ दिवस पर कुछ गड़बड़ न कर दें इसी आशंका के चलते सारे आचार्य अनुदेशकों को जेल में डाल दिया गया है। आचार्यों ने जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया है।

Tuesday, October 12, 2010

स्कूल का रास्ता खोजती बेटियां

फिल्म की रोशनी में शिक्षा के सवाल

पहाड़ की नंदाएं स्कूल जाना चाहती हैं लेकिन उनके स्कूल के रास्ते में कहीं पुरुष मानसिकता खड़ी तो कहीं पहाड़ी अर्थव्यवस्था की मजबूरियां। हालांकि हाल के वर्षों में पहाड़ का परिदृश्य काफी बदल गया है। अब ठेठ गांवों में भी स्कूल के रास्ते पर हिरनियों की तरह कुलांचे भरती लड़कियों का दिखना आम हो गया है। इसके बावजूद नंदा की पैली जात फिल्म की उपयोगिता कहीं कम नहीं होती। यह फिल्म सरकारी प्रचार की तरह ऊबाउ नहीं है। पेशेवर अंदाज में बनाई गई ऐसी फिल्म है जिसमें वृत चित्र की निरसता नहीं परोसी जाती। बल्कि वह समय के साथ सवाल उठाते हुए चलती है।
आजकल कुकरमुत्ते की तरह गढ़वाली गीतों और फिल्मों की सीडी जिस मात्रा में आ रही है उसके बीच कोई नई सीडी देखना भी एक साहसिक कार्य है। आमतौर पर ऐसा जोखिम न लेने के बावजूद नंदा की पैली जात को देखने के बाद लगा कि सालों बाद कोई गढ़वाली फिल्म ऐसी आई है जो निराश नहीं करती बल्कि उम्मीदें जगाती है कि हिलीवुड में भी कई प्रतिभशाली फिल्मकार हैं जिन्हें यदि आर्थिक मदद मिले तो वे अपनी रचनाधर्मिता के जरिये नए मुकाम हासिल कर सकते हैं। फिल्म में गीत नाटिका शैली में लोकोक्तियां चांचरी जागर का भी प्रयोग किया गया है। फिल्म की फोटोग्राफी बेहद खूबसूरत है। फिल्म की खासियत यह है कि निर्देशक महेश भट्ट ने चिकने-चुपड़े चाकलेटी चेहरों की बजाय पहाड़ के आम चेहरों पर यकीन किया। उनमें कुछ खुरदरे हैं तो कुछ इतने मासूम कि सहज ही ठेठ गांव के चेहरे लगते हैं। यही इस फिल्म की ताकत भी है। निर्देशक ने आम चेहरे लेकर जोखिम जरूर उठाया लेकिन यह कामयाब जोखिम रहा। फिल्म के हर कलाकार ने बिना लाउड हुए अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है। फिल्म के सूत्रधार के रूप में दिनेश बौड़ाई का अभिनय तो बहुत अच्छा है लेकिन आवाज कमजोर है। जिन्होंने भारत एक खोज में ओमपुरी या महाभारत में हरीश भीमानी की दमदार आवाज सुनी होगी वे समझ सकते हैं कि धीर गंभीर आवाज सूत्रधार को कैसे करिश्माई बना देती है। फिल्म में खटकने वाली भी कुछेक बातें हैं जैसे लड़कियों की शिक्षा के महत्व पर कुछ महिला आईएस अधिकारी के कथन एक व्यवधान की तरह आते हैं। वृतचित्र का भी एक प्रवाह होता है। पेशेवर रूख की पहली मांग रही है कि फिल्म तलुवे सहलाती हुई सी न लगे। हो सकता है यह निर्माता या निर्देशक की आर्थित मजबूरी रही हो लेकिन इसे ज्यादा गरिमापूर्ण तरीके से भी फिल्माया जा सकता है। निर्देशक चाहते तो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कामयाब पहाड़ की सेलिब्रिटी महिलाओं को दिखा सकते थे। इसमें बछेन्द्री पाल, हर्षवंती बिष्ट या चन्द्रप्रभा एतवालके पवर्तारोहण के दृश्य हो सकते थे तो आंदोलनों का नेतृत्व कर रही महिलाओं के दृश्य भी हो सकते थे। आखिर लड़कियों की शिक्षा का मकसद सिर्फ आईएएस बनना तो नहीं हो सकता।यह कामयाबी को दिखाने का घिसापिटा फार्मूला है। जब कोई फिल्म बनती है तो उसका सिर्फ एक ही सामाजिक संदेश नहीं हो सकता। लड़कियों को सिर्फ इसलिए नहीं पढऩा है कि वे आईएएस बनें, उन्हें इसलिए पढऩा है कि जनसंघषर्ओं के मैदान से लेकर पायलट तक के आसमान तक हर जगह अपनी छाप छोड़ती नजर आए। काश यह फिल्म ऐसा भी कुछ कह पाती। खैर निर्देशक की समझ की इन सीमाओं के बावजूद यह अच्छी फिल्म है जिसे खुले दिल से सराहा जाना चाहिए। सराहने के लिए जरूरी है कि हर परिवार इसकी एक सीडी खरीदे और फिल्म के जरिये बेटियों की अच्छाएं भी समझे और अपने गीत संगीत की ताकत को भी। सरोकार सेंटर फॉर डेवलपमेंट कम्युनिकेशन के बैनर तले बनी इस फिल्म के वितरण अधिकार नागराज फिल्म के पास हैं।

निर्देशक, छायांकन व संपादन-महेश भट्ट
लेखन-नंद किशोर हटवाल
गीत व संगीत-नंद किशोर हटवाल व किशन महिपाल
गायन-किशन महिपाल, सत्य अधिकारी, दीपा चौहान, सोना चौधरी
कलाकार-नेहा नेगी, वर्षा नेगी, सुनीता सती, विजय वशिष्ठ, वंदना नेगी, उपेन्द्र भंडारी, अनामिका।

स्त्री चिंतन कि वाहक है अल्पना



महिला लेखिकाओं की युवा पीढ़ी में घर, नौकरी व लेखन के बीच एक अद्भुत सांमजस्य बनाने वाला एक नाम है डॉ. अल्पना मिश्र। स्त्री जीवन के संवेदनशील बिंदुओं को उभारने वाली लेखिका की कहानियों ने हिंदी जगत को एक नई ताजगी दी है। भारतीय ज्ञानपीठ ने उनके दो कथा संग्रह 'भीतर का वक्त व 'छावनी में बेघर प्रकाशित किए हैं। प्रख्यात लेखक, समालोचक व तत्व विद् डा. हजारीप्रसाद द्विवेदी की भतीजी अल्पना मूलत: आजमगढ़ के बलिया जिले में जन्मी। वहीं पली-बढ़ी। प्राथमिक शिक्षा ली। उच्च शिक्षा के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। कुछ वर्षों से देहरादून स्थित एमकेपी कालेज में वरिष्ठ हिंदी व्याख्याता हैं। इससे पूर्व वे आईएमए देहरादून, काशीपुर व ऋषिकेश में भी अध्यापन कर चुकी हैं। इनकी रचनाओं का मलयालम, पंजाबी, बांग्ला व अंग्रेजी में भी अनुवाद हो चुका है। इनकी 'मुक्ति प्रसंग कहानी केरल विश्विद्यालय में पढ़ाई जाती है। साहित्यिक पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से ही शायद अल्पना छोटी उम्र से ही लिखने लगी व उनका मूल्यांकन भी होता रहा। भाषा परिषद कलकत्ता ने इस वर्ष उन्हें युवा लेखिका पुरस्कार से नवाजा है। इससे पूर्व वह मध्य प्रदेश राष्ट्र भाषा समिति का शैलेश मटियानी स्मृति व परिवेश सम्मान भी पा चुकी हैं। पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश-

लिखने का सिलसिला कैसे शुरू हुआ?
यूं तो ताऊ जी के कारण घर में शुरू से ही साहित्यिक माहौल था। तब की हिंदी की प्रमुख पत्रिकाएं धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान, माया आदि घर पर आती थी। पर मैं जब दस वर्ष की थी तो ताऊ जी का देहांत हो गया था इसीलिए उनसे लेखन के अनुभव नहीं ले सकी। लेकिन पिताजी से बहुत कुछ सीखा। पिता श्री रविन्द्रनाथ द्विवेदी किस्सागो थे। उनकी पौराणिक कथाओं व पात्रों के तार्किक विश्लेषण आज भी मेरी स्मृति व लेखन में बराबर सहयोगी हैं। लेखन की शुरुआत एक ऐसे घटना क्रम से हुई थी जिसमें पूरा परिवार हम पांचों बहनों को गाड़ी में बंद कर घूमने चला गया। बस फिर क्या था घर पहुंचते ही पिंजरे रूपी गाड़ी में बिताए उन घंटों को कापी में लिख डाला बस वही कविता बन गई। घर का प्रोत्साहन भी मिला। नामवर जी ने भी तारीफ की। संवेदनशील थी तो बस लिखते चली गई।

अभी तक किन विषयों पर लिखा? नया क्या लिखना चाहती हैं?
मेरे पति अमिताभ मिश्र सेना में ऑफीसर हैं साथ ही पढऩे में रूचि रखते हैं मेरे लेखन के आलोचक भी हैं। उनके साथ सीमा पर जब भी रही, मैं सिपाहियों की पत्नियों से मिलती। इसीलिए सेना के भीतरी जीवन पर मैंने काफी कुछ लिखा है। सेना के अंदर वर्ग भेद बहुत साफ दिखाई देता है। सामाजिकता जैसा कोई शब्द सेना की डिक्शनरी में नहीं होता वहां तो बस अनुशासन है, आर्डर है। अभी बहुत कुछ सेना पर और लिखना है। इसके अलावा महिला विषयों पर अभी बहुत कुछ लिखना है। कहानी विधा पाठकों पर जल्दी प्रभाव डालती है इसीलिए मैं अक्सर कहानी ही लिखती हूं।

आप एक प्राध्यापिका हैं, साथ में लेखिका भी क्या प्रभाव पड़ता है प्राध्यापिका के पेशे पर?
बहुत प्रभाव पड़ता है। आप विषय की इतनी गहराई में चले जाते हैं कि बच्चा फिर उस विषय को भूल नहीं पाता। वो तमाम किस्से, उदारहरण उसे मजबूत बनाते हैं विषय के प्रति। मैं मानती हूं कि अध्यापक का पेशा ही जिम्मेदारी वाला है। नई पीढ़ी जिसे आप ढालते हैं, कैसी होगी, समाज को क्या देगी ये काफी हद तक उस अध्यापक पर निर्भर होता है। मैं पूरी जीवंतता के साथ अपनी छात्राओं को पढ़ाती हूं साथ ही उन्हें बाजार की भांैड़ी और विकृत सोच से अवगत कराती हुई सचेत भी करती हूं ।

समय बदल गया है, स्त्रियां कहां पहुंची?
आज स्त्रियां कामकाजी हो गई हैं। बड़ी तादात में वे घर से बाहर निकल रही हैं। कमाने से उनमें आत्मविश्वास आया है। लेकिन अब भी अपनी कमाई पर उनका अधिकार नहीं है। ये एक शातिर किस्म की गुलामी है जो उन पर थोपी गई है। यदि वे अपनी कमाई का हिस्सा भी अपनी व्यक्तिगत जरूरतों पर खर्च कर दें तो आंखें तनने लगती हैं। किसी को अपनी ओर से कुछ दे दिया तो यह बड़ी बात हो जाती है। संपति स्त्री की तब होगी जब वह स्वंय किसी और की संपति नहीं रहेगी। वैसे भी स्त्रियों के दिमाग की कंडीशनिंग इस तरह से की गई है कि वह पितृसत्ता की जरूरतों के हिसाब से स्वंय ढल जाती हैं। दूसरी तरफ बाजार की अपनी चुनौतियां हैं जो स्त्रियों को उत्पाद बनाकर विकृत तरीके से बाजार में उतारना चाहती हैं। वास्तविक मुक्ति के लिए स्त्रियों को अभी बहुत लंबी लड़ाई लडऩी है।

स्त्री लेखिकाओं की एक बड़ी तादाद के बावजूद स्त्री चिंतक व विचारक नाम मात्र ही क्यूं हैं?
मैं मानती हूं स्त्री को महसूसना बहुत जरूरी है। किसी भी कामकाजी स्त्री का जीवन दोधारी तलवार के समान होता है जिस पर उसे रोज चलना होता है। स्त्रियों के लिए विचार, चिंतन, अनुभूति अपनी घरेलू जिम्मेदारियों को निपटा लेने के बाद की चीजें हैं। शायद पुरूषों के साथ ऐसा नहीं होता। अधिकांश लेखिकाएं अपने इन घरेलू कामों की बारीक से बारीक अनुभूतियों को तो लिख डालती हैं पर उनके कारणों व असल निदान की ओर नहीं पहुंच पाती और पुरूष को अपना दुश्मन मानने लगती हैं। कुछ ही लेखिकाएं होती हैं जो इसे एक विचार के तौर पर देखती हैं एक व्यापक वर्ग की मुक्ति के साथ उनकी मुक्ति भी देखती हैं और यही सब उसके लेखन में होता है। इसीलिए वह एक चिंतक होती हैं, विचारक होती हैं, समाज को सही दिशा देती हैं। एसी लेखिकाएं ही महाश्वेता देवी, अरूंधति राय या चित्रा मुदगल बन पाती हैं।

रेदास ने बचाई नाट्य महोत्सव कि लाज

नाट्य भूषण लक्ष्मी नारायण अपनी संस्था 'दून घाटी रंगमंच की ओर से प्रतिवर्ष अखिल भारतीय नाट्य महोत्सव का आयोजन देहरादून में करते हैं। इस बार भी दून में उनके द्वारा सातवां नाट्य महोत्सव आयोजित किया गया। आयोजन को संस्कृति विभाग व कुछ व्यवसायिक प्रतिष्ठानों ने प्रायोजित किया था। नाट्य भूषण लक्ष्मी नारायण नाटक के लिए कम, आए दिन किए जाने वाले आयोजनों के लिए अधिक जाने जाते हैं। नाट्य महोत्सव का जो रंगीन ब्रासर उन्होंने दर्शकों व मीडिया में वितरित किया उसका दो तिहाई हिस्सा उनके अपने गुणगान को समर्पित है। वह स्वंय को दर्जन भर से अधिक पुरस्कारों का स्वामी बताते हैं लेकिन इनमें से एक भी ऐसा सम्मान नहीं है जो थियेटर या नाटक के क्षेत्र में प्रतिष्ठित रहा हो। 2003 में उन्हें जिस नाट्य भूषण की उपाधि से नवाजा गया था वह तो आज उनके नाम का हिस्सा ही बन चुका है। बताया जाता है कि इसकी स्थापना उन्होंने खुद करवाई थी और पहली बार यह उन्हें ही प्रदान किया गया। यह भी कहा जाता है कि नाट्य भूषण या तो आयोजनों में व्यस्त रहते हैं या संस्कृति विभाग में आर्थिक मदद के लिए गुहार लगाए बैठे रहते हैं। जिन 20 नाटकों को वे अपनी संस्था दून घाटी रंगमंच के चर्चित नाटक बताते हैं उनमें से सभी का निर्देशन या तो उन्होंने स्वंय किया है या उनके पुत्रों बृजेश नारायण व आदेश नारायण ने उनकी टीम में 95 फीसदी कलाकार उनके अपने कुनबे के हैं। संस्था के महासचिव व उनके संबंधी महेश नारायण उन्हें भारतीय नाट्य विधा का भीष्म नारायण बताते हैं। अगर लक्षमीनारायण नाटकों के भीष्म कहे जा सकते हैं तो नाटक व अभिनय के क्षेत्र में पूरा जीवन समर्पित कर चुके टॉम आल्टर जैसे कलाकारों को आप किस पितामह की उपाधि देंगे जो स्वयं को विनम्रतापूर्वक इस विधा का विद्यार्थी कहकर संतुष्टि कर लेते हैं। अशोक चक्रवती, अमरजीत चढ्ढा, सतीश चांद जैसे नामी कलाकारों को क्या कहेंगे जिन्होंनेे रंगमंच को आगे बढ़ाने और पहचान दिलाने के लिए अपना जीवन ही लगा दिया।
दरअसल राजधानी बनने के बाद देहरादून में तथाकथित खतरनाक कवियों, कलाकारों व आयोजकों का पूरा एक कॉकस बन चुका है, जिसके फर्जीवाड़े में संस्कृति विभाग जैसी संस्थाएं भी पूरी तरह से लिप्त है। इस तरह के सारे खेलों को ढकने के लिए विधानसभा अध्यक्ष या संस्कृति मंत्री को उद्घाटन या समापन के लिए बुला लिया जाता है, जबकि प्रतिष्ठित संस्थाओं व कलाकारों ने हमेशा ही नेताओं से परहेज ही किया है। नाट्य महोत्सव की ही बात करें तो इसमें लगभग 30 नाटकों को आमंत्रित किया गया था। उड़ीसा, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, असम, गुजरात, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा आदि जगहों से टीमें आयी थी, जिनका कद दून घाटी रंगमंच जैसा ही था। दरअसल नाटक के इस खेल में अखिल भारतीय नाट्य महोत्सव के नाम पर नाट्य प्रेमी दर्शक व ईमानदार नाट्य संस्थाएं ठगी जाती हैं।
संस्था के संचालन की एक बानगी देखिए नाटक की एक शाम बिजली गुल होने से शोरगुल होने पर संचालक साहब किसी गली छाप शोहदे की तर्ज पर दर्शकों से धमकी भरे लहजे में कहते हैं, 'चुप हो जाओ वरना हमें भी व्यवस्था बनानी आती है। मतलब आप कलाकारों व कला प्रेमियों को डंगरों की तरह हांक रहे हैं। संचालक महोदय का यह इकलौता बयान ही इस बात को समझने के लिए काफी है कि वह कला को कितना ही समझते हैं।
नाट्य महोत्सव में आईं 99 फीसदी टीमों को ऐसेे व्यवहार से कोई आपत्ति भी नहीं हुई क्योंकि यह तो तू मेरी पीठ खुजला मैं तेरी खुजलाऊं वाला खेल है जहां नाटक नहीं, खाना, कमाना व तफरी करना ही पहला मकसद है। यही चीज मेहमान टीमों के राज्य में भी दोहराई जाती है, जहां संस्कृति व कला के नाम पर इस तरह के समूह मलाई चाट जाते हैं।
लेकिन संस्कृति के इस नक्कारखाने में कहीं न कहीं नाटक आज भी जिंदा हैं। शाहजहांपुर, उत्तरप्रदेश से आई 'अभिव्यक्ति टीम के नाटक 'रैदास ने यही साबित किया है। शायद अभिव्यक्ति के मझे हुए कलाकरों की टीम दून घाटी रंगमंच के आमत्रंण पर कम बल्कि दून घाटी में रंगमंच की लंबी विरासत को देखकर यहां आई थी इसका सिला भी रैदास नाटक को खूब मिला। स्पष्ट थीम, प्रभावशाली अदाकारी व सभी पक्षों में संतुलन, टीम को जहां पहले पुरस्कार तक ले गया वहीं अन्य नाटकों की अपेक्षा दर्शकों का भी खूब स्नेह इसे मिला।
नाटक, 14वीं सदी के समय में समाज में व्याप्त बाह्य आडंबरों, छुआछूत रूढिय़ों व जातियों के खिलाफ बोलने वाले उन फक्कड़ संतों पर फोकस था जो गली नुक्कड़ों में जाकर इसका संदेश दिया करते थे। नाटक की शुरूआत ही इससे होती है कि गांव की चमार जाति की बह्मकुमारी कुंए में डूब जाती है। कोई भी बाह्मण जाति का व्यक्ति उसे बचाने नहीं जाता। चमार लोग जब उसे बचाने की पहल करते हैं तो बाह्मण वादी व्यवस्था के पैरोकार कुएं के अछूत हो जाने की बात करते हैं और बह्मकुमारी से धर्म को बड़ा बताते हैं। जिससे बह्मकुमारी मर जाती है। इन्हीं रूढिय़ों के बीच रैदास का विरोध शुरू हो जाता है। मीराबाई के कई बार आग्रह करने पर रैदास चित्तौड़ पहुंच कर उनके साथ सहभोज करते हैं तो बाह्मणों को दिक्कत होने लगती है। बाह्मणों द्वारा शास्त्रार्थ को ललकारे जाने पर रैदास कहते हैं कि सारे शास्त्रार्थ तो धर्म के चंद ठेकेदारों के आधार पर बने हैं फिर किस आधार पर शास्त्र करें। इस नाट्य समारोह में आया अभिव्यक्ति वही मंच है जिसने हिंदी सिनेमा को राजपाल यादव जैसा मंझा हुआ कलाकार दिया। इस मंच के कलाकारों में नाट्य विधा को जिंदा रखने का जुनून दिखाई दिया। लगभग सभी कलाकार अपनी आजीविका अन्य पेशों से कमाने के बावजूद (जिनमें ठेली लगाने, छात्र, मोची का काम करने से लेकर सरकारी कर्मचारी तक शामिल हैं।)हर रोज अपने नाटक का अभ्यास करने के लिए जुटने का समय निकालते हैं। शायद इसी जूनून ने उनके अभिनय को यह असरदार धार प्रदान की है।

बिना दरवाजों का समय




थकती नहीं कविता, अब तो सड़कों पर आओ व नदी तू बहती रहना काव्य संग्रह के बाद 'बिना दरवाजों का समय डा. अतुल शर्मा का नया काव्य संग्रह है। डा. शर्मा मूलत: गीत लिखते रहे हैं। गीत ने ही उनको पहचान दी, लेकिन जब-तब अतुकांत में भी प्रकट होने से स्वंय को रोक नहीं पाते। लेकिन इनमें भी गेय तत्व का लेप साफ दिखाई देता है। काव्य संग्रह 'बिना दरवाजों का समय इसी खिलदड़पने का परिचायक है। संग्रह में 53 कविताएं संकलित हैं। पहली कविता का शीर्षक 'मालिक है। 'साठ साल से रहते हुए/इस किराए के मकान में/हमारा एक घर है/इसके हर कोने में। इसके अलावा अव्यवहारिक शिक्षा पद्यति पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं लोकतंत्र में नौकरी की अराजकता स्कूल के दरवाजों से शुरू होती है। अतुल शर्मा अलग ही मिजाज के कवि हैं। लेखकीय मंचों से उनकी तटस्थता जग जाहिर है। लेकिन दूसरी तरफ अपनी आंतरिक छटपटाहट को किसी न किसी मंच से प्रकट भी करते रहे हैं। कविता का टाइटिल 'बिना दरवाजों का समय एक असुरक्षित सभ्यता की गवाही है। 'सब कुछ कितना असुरक्षित होगा/जब बने होंगे दरवाजे। दरवाजे डर की सभ्यता के परिचायक हैं। दरवाजे संर्कीणता के परिचायक हैं। दरवाजे पाप की कमाई को छुपाने का माध्यम हैं। 'घरों में बहुत दिन तक-दरवाजे नहीं थे/ये होते थे बड़े लोगों के खजाने के लिए। डर मनुष्य के जीवन की विडंबना है। डर हमारे जीने की प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह है और डर को पनाह देता है दरवाजा।
'स्कूल का दरवाजा बच्चों को बंद रखता है/जेल का दरवाजा कैदियों को/दफ्तरों का दरवाजा कर्मचारियों को/दरवाजे जरूरी हो चुके हैं/ यह इस समय की सबसे बड़ी दुर्घटना है। लोकप्रिय मुहावरों की बुनियाद पर खड़ी डा. शर्मा की कविताएं आसानी से दिल में उतर जाती हैं। टोपियां इसी तथ्य की परिचायक हैं। 'पैरों में ढकने के लिए जुराब/और हथेलियों को ढकने के लिए दस्ताने/सिर के लिए टोपियां। बढ़ती हुई दुनिया, लिफाफे, शिकायत पेटी, सचिवालय आदि संग्रह की आकर्षक कविताएं हैं। कविता की पाठशाला में अपने ही शिष्य पवननारायण से संग्रह का परिचय लिखवाना डा. शर्मा जैसे जनकवि का अपना बड़प्पन हो सकता है।

काव्य संग्रह-'बिना दरवाजों का समय
लेखक-अतुल शर्मा,
मूल्य-100 रूपये ,
रमा प्रकाशन देहरादून।

सरकारी रिमोर्ट से चल रहे हैं आंदोलनकारी


चिन्हीकरण के लिए भीख मांगते दिखे आंदोलनकारी

अपरिपक्व उत्तराखंड आंदोलन ने कई अपरिपक्व कार्यकर्ताओं को जन्मा। यही कारण है कि उत्तराखंड आंदोलन के सपने दूर छिटक गए और कार्यकर्ता आंदोनकारी की उपाधि के लिए सरकार के दरवाजे पर नाक रगड़ रहे हैं। कभी कहा जाता था कि जन सहभागिता की दृष्टि से उत्तराखडं आंदोलन आर्दश आंदोलनों का पयार्य है जिसमें बूढ़े बच्चे महिला नौजवान सभी की भागीदारी रही। लेकिन सच्चाई का दूसरा पहलू यह भी है कि उत्तराखंड आंदोलन ने अवसरवादिता की हदें तोड़ डाली हैं। अब आंदोलनकारियों का जमावड़ा राज्यवासियों के सपनों के लिए संघर्ष की खातिर नहीं बल्कि अपनी खुद की नौकरी पेंशन व तमाम सुविधाओं तक की मांग तक सिमट कर रह गई हैं। भाजपा कांग्रेस की सरकारों ने आंदोलनकारियों के तुष्टिकरण के लिए जो तुरूप का पत्ता फेंका वह उनकी अपेक्षाओं से कहीं अधिक कामयाब साबित हुआ।
प्रथम राज्य निर्माण सेनानी सम्मेलन का तमगा लगाए इस सम्मेलन के एजेंडे में न तो मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को सजा दिलाने का मुद्दा प्राथमिकता में था और न ही राजधानी गैरसैंण का। सम्मेलन में जिन छ: बिंदुओं पर बातचीत केन्द्रत होनी थी उनमें नौ साल में राज्य ने क्या खोया क्या पाया, राज्य की मौजूदा जरूरतें और मौजूदा नीतियां, राज्य में पनपती कुरूतियां व उनका दुष्प्रभाव, राज्य की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना व राज्य निर्माण सेनानियों की समस्याएं प्रमुख थे। किसी भी समस्या पर बात होने से पहले सबकी जुबान पर या तो पेंशन का नारा था या फिर नौकरी का। दो दिनी सम्मेलन में कोई भी ऐसा आंदोलनकारी नहीं था जो उत्तराखंड के आंदोलनकारी व उत्तराखंड के लिए स्थापित उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक इन्द्रमणि बड़ोनी, 42 दिन तक उत्तराखंड के लिए अनशन पर बैठकर अपनी शहादत देने वाले बाबा मोहन उत्तराखंडी, उत्तराखंड आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाने वाले व शराब के खिलाफ शराब भट्टी में ही आत्मदाह करने वाले निर्मल पंडित की शहादत को याद कर सके। किसी ने श्रीयंत टापू, मुजफ्फरनगर व मसूरी कांड के शहीदों को याद नहीं किया। किसी महिला की जुबान पर हंसा धनाई व बेलमती चौहान जिंदाबाद के नारे नहीं थे। सरकार द्वारा सम्मानित किए जाने के बाद इन आंदोलकारियों ने भी शायद अंनत कुमार व बुआ सिंह की सजा को मांफ कर दिया वरना कहीं तो कोई गूंज इन्हें सजा दिलाने के लिए सुनाई पड़ती।
देहरादून में जुटी सैकड़ों की भीड़ किसी गैरसैंण को मांगने नहीं आई थी कोई रोजगार मांगने नहीं आई थी वह तो इसीलिए आई थी ताकि उन्हें पेंशन मिल सके उनको बच्चों को नौकरी मिल सके। महिलाएं अपने उत्तराखंड आंदोलन की तस्वीरों का एलबम लेकर पहुंची थी। तो कोई सरकार से निवेदन करती अर्जी लेकर। महिलाओं के पास से अर्जिया पढ़कर गर्दन शर्मशार हुई जा रही थी जिनमें लिखा था कि आपसे महानिवेदन है कि आप हमारा चिन्हीकरण कर दें हम आपके आजीवन आभारी रहेंगे। ये है सरकार के मंसूबों की सफलता। उत्तराखंड पर राज करने वाले सत्तासीन दल व विपक्षी दल कामयाब हुए हैं जनता को उत्तराखंड के मुददों से भटकाने के लिए। उन्हें भीख मांगने की मुद्रा में खड़े करने के लिए। सम्मेलन का नेतृत्व करने वाले लोगों ने भी उन्हें यही माहौल दिया।
दरअसल जिन कथित आंदोलकारियों का यह सम्मेलन था उनके एंजेडे में राज्य को नेता गुंड़ों व माफियाओं के चंगुल से छुड़ाने के लिए दोबारा एक आंदोलन खड़ा करने का कोई मुद्दा नहीं था। उनका एक सोचा समझा एजेंड़ा था कि राज्य में चिन्हीकरण की प्रक्रिया तेज हो, नियम के हिसाब से आंदोलनकारियों को पेंशन नौकरी मिले। आंदोलनकारियों का बहुुद्देशीय कार्ड बने जिसमें उन्हें बेरोकटोक सचिवालय व विधानसभा में नेता व अधिकारियों से मिलने की इजाजत हो जाए, यात्रा, चिकित्सा सहित नौकरियों में आरक्षण की सुविधा मिल जाए। सम्मेलन में आई सैकड़ों की भीड़ के चिन्हीकरण की रट इस बात को साफ बयंा कर रही है कि ऐतिहासिक उत्तराखंड आंदोलन का अंत किस हश्र के साथ हो रहा है।
ठीक इसके विपरीत उत्तराखंड आंदोलनकारियों की एक जमात ऐसी भी है जिन्होंने नौकरी पेंशन नहीं ली। इसे उत्तराखंडी अवाम के संघर्षों के विराम की साजिश कहते हुए इसका विरोध किया। ऐसे बेशक कम लोग हों लेकिन आज भी उनकी लड़ाई इस बात को लेकर है कि क्यों पहाड़ के जल जंगल जमीन कौड़ी के भाव बाहरी बिल्डरों व माफियाओं को सौंपे जा रहे हैं। क्यों पहाड़ के उद्योगों में यहां के लोगों को सम्मानजनक नौकरी नहीं मिल रही है। सिडकुल क्यों शोषण के प्रतीक बन गए हैं। विभागों की कमीशनखोरी पर क्यों लगाम नहीं लगती। पहाड़ की महिलाओं को काम के बोझ से क्यों मुक्ति नहीं मिली,चाय के खोमचों तक शराब व बिसलरी पेप्सी पहुंचाने वाली सरकार उन्हें पानी क्यों नहीं दे पा रही। जनता के पैसे को क्यों लाल बत्तियों व हवाई यात्राओं में खर्च किया जा रहा है। ये सवाल हैं एक असली उत्तराखंड आंदोलनकारी के। जो सत्ता के लुटेरों को मंच पर बैठाने से नहीं बल्कि इनके खिलाफ मार्चा खोल इन्हें सत्ता से हटाकर पूरे होंगे।

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सैकड़ों की संख्या में जुटे आंदोलकारी
आंदोलन में पिटती तस्वीरें व सरकार से भीख मांगती अर्जी लेकर पहुंचे आंदोलनकारी

सीधे आपको उन आंदोलकारियों से मुखातिब कराते हैं जो देहरादून में राज्य गठन के एक दशक पर दशा व दिशा तय करने बैठे थे। नगर निगम प्रेक्षागृह की भीड़ का नजारा तो यहीं बंया कर रहा था कि राजधानी गैरसैंण को लेकर या कहें कि उत्तराखंड के: तमाम सवालों को लेकर आज भी पूरा उत्तराखंड सड़कों पर आ सकता है। लेकिन बातों में सबकी आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण व पेंशन पर जोर था। उत्तराखंड के पलायन, बेरोजगारी जैसे मुद्दे जुबान पर थे तो बस रटे रटाए। । बेशक सभी ने यह स्वीकारा कि हमारे सपनों का उत्तराखंड अभी नहीं मिला है लेकिन कोई आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण तो कोई सम्मान देने की बात में ही अटका रहा। कुछ ही लोग थे जिन्होंने यह स्वीकारा कि आज लड़ाई सम्मान पत्र से ज्यादा बेहतर उत्तराखंड बनाने के लिए लडऩे की है। ताकि सभी को सम्मान मिल सके। सम्मेलन का नाम उत्तराखंड राज्य निर्माण सेनानी सम्मेलन रखा गया था जिसकी तर्ज पर ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को मिलने वाली सुविधाओं की मांग की जा रही थी। दो दिनों तक लगातार संबोधनों का दौर चलता रहा। मंच पर बारी-बारी से राजनीतिक दलों के नेताओं को बुलाया जाता रहा दो दिन तक मंच पर बैठने वाले नेताओं में हरीश रावत, जोत सिंह गुनसोला, नारायण सिंह जंतवाल, बीडीरतूड़ी, किशोर उपाध्याय, वेद उनियाल, रवीन्द्र जुगरान, रहे। दो दिन तक नॉनस्टाप संबोधनों का दौर चलता रहा। कुछ शहीदों के परिवारजनों को सम्मानित किया गया लेकिन किसी ने जहमत नहीं उठाई कि उन्हें मंच पर लाकर माला पहनाई जाय। वह भीड़ में जहां बैठे थे वहीं उन्ही के गले में माला पहना दी गई। आखिर मंच पर उनके लिए जगह भी कहां थी वहां तो नेता बैठे थे। सम्मेलन के बीच में कुछ अन्य सावित्री कैड़ा सरीखी कथित महिलाओं द्वारा भी खुद को मंच पर नहीं बिठाने के विरोध में नारे लगाने शुरू कर दिए। सम्मेलन में संबोधित करने वाले लगभग सभी लोग या तो भाजपा से जुड़े थे या फिर कांग्रेस से। कुछ अपवाद थे जो अपने संगठन तले अभी लड़ाई लड़ रहे हैं।
विदित हो कि 2005 में गठित उत्तराखंड राज्य आंदलोनकारी मंच का यह पहला वार्षिक सम्मेलन था। जिसे उन्होंने उत्तराखंड राज्य निर्माण सेनानियों के सम्मेलन का मान दिया था। इसमें प्रदेश समेत दिल्ली से भी आंदोलकारियों ने हिस्सा लिया। प्रदेश के हर जनपद से लगभग 10 से 15 के बीच आंदोलनकारी आए। सम्मेलन में पूरे प्रदेश से लगभग 700-800 आंदोलनकारी आए थे। अधिकांश गांव की सीधी महिलाएं इसीलिए सम्मेलन में आई थी उन्हें लगा कि उन्हें नौकरी या पेंशन मिलने वाली है वह पंजीकरण रजिस्ट्रर में भी अपना नाम पता साफ साफ नोट कर रही थी ताकि कल के दिन वह कह सकें कि हम भी सम्मेलन में आए थे हमें भी नौकरी दो। किच्छा से आई एक महिला के कार्ड में इच्छा हो जाने से उन्हें बड़ी चिंता सालती रही दो दिन कि इसे कोई किच्छा कर दो वरना मुझे गलत पते के कारण नौकरी नहीं मिलेगी । वह दोनों दिन पंजीकरण करने वाली महिला को ही ढूंढते रही। आंदोलन में हिस्सा लेने वाली महिलाएं बूढ़ी हो चुकी हैं इसीलिए वह अपने बेटे के लिए नौकरी चाहती हैं। इस सम्मेलन के मुख्य आयोजक राज्य आंदोलनकारी मंच के प्रदेश अध्यक्ष जगमोहन नेगी, सचिव रामलाल खंडूडी, प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप कुकरेती, मोहन सिंह रावत सहित अन्य कई लोग थे।

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आखिर किस नीति का हिस्सा था यह सम्मेलन
पूरे सम्मेलन में लगातार मंच पर सम्मानित होते राजनीतिक दल के नेताओं( जिन्होंने इन दस सालों में बारी बारी से इसे लूटा है) को देखते हुए सम्मेलन के आयोजकों पर सवाल उठना लाजमी है कि सम्मेलन के पीछे की इनकी मंशा क्या थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि ये अपने खाने कमाने का जुगाड़ फिट कर रहे थे। हालांकि इन्होंने सम्लेलन से पहले बताया कि यह सम्मेलन सर्वदलीय होगा जिसमें उत्तराखंड के हर तबके का व्यक्ति मौजूद होगा। लेकिन जो लोग दस साल उत्तराखंड को लूटते रहे जिन्होंने यहां भी न जाने कितने मधुु कोड़ाओं को पनपने का माहौल दिया उन्हीं को मंच पर बैठाकर उनके संबोधन सुनना इनकी किस नीति का हिस्सा है यह सोचने वाली बात है।

बयान
हरीश रावत- उत्तराखंड यूपी की कार्बन कापी हो चुका है सत्ता विकेन्द्रीकृत हो चुकी है।
रणजीत सिंह वर्मा- राजधानी देहरादून बनना सबसे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण
समर भंडारी- जनता दिनों दिन बढ़ते माफियाओं को देख रही है।
सुनील कैंथोला- उत्तराखंड का जिन्न आंदोलनकारियों ने अपने संघर्ष के बूते बोतल से बाहर निकाला और खुला छोड़ दिया। सियासी दल इस जिन्न को अब अपने इशारों पर नचा रहे हैं।
विजयलक्ष्मी गुसाई- सूबे की भ्रष्ट व्यव्स्था के गले में घंटी बांधनी होगी मातृशक्ति को।
विजय भट्ट- आंदोलनकारियों से याचक नहीं बल्कि स्वालंबी की भूमिका में रहने को कहा।
सुशीला बलूनी- बेरोजगारी, पलायन भ्रष्ट्राचार पर लामबद्ध होने की जरूरत।
मोहन पाठक- साजिशन उत्तराखंड की जनता को बाहर धकेला जा रहा है।
गांव से आई महिलाएं- हमने नहीं की थी मांग की हमें नौकरी पेंशन दो या फिर हमारा चिन्हीकरण करो लेकिन सरकार जब सबका चिन्हीकरण कर रही है तो हमें बुरा लगता है कि हम भी तो जेल में रहे हमारे सामने कई लोग हैं जिनके पैर तक टूटे उनको कोई लाभ नहीं मिला।














































उत्सवधर्मी व रस्म अदायगी भर रहा महिला दिवस का 100 वां वर्ष



गायब हुए लाल झंडे, हाथों में आई मेंहदी

पिछले एक दशक पहले तक भी महिला दिवस के दिन महिलाओं के हाथों में लाल झंडे हुआ करते थे लेकिन आज हाथों में मेंहदी आ गई है। आज हाथ रंगोली बना रहे हैं। नाच गाना कर रहे हैं। क्योंकि अब महिला दिवस की लोकप्रियता ज्यादा बढ़ गई है। इसे स्वीकार्यता जो मिल गई है। एनजीओ ने गांव-गांव तक बता दिया है। बाकि की कसर राजनीतिक दलों के महिला प्रकोष्ठों ने पूरी कर दी है। पंचायतों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण मिल गया है। विधानसभा व संसद में 33 फीसदी की तैयारी चल रही है। पूरा वातावरण महिलामय हो रखा है। इसीलिए हाथ के संघर्ष की मशाल अब बुझने लगी है क्योंकि अब महिलाओं की चिंता सरकारें जो करने लगी हैं। मशाल का रूप अब मेंहदी की कीप में बदल चुका है। बाजार ने भी महिला को आजाद कर दिया है कि जाओ जितनी मर्जी उतने कपड़े पहनो। सुंदर बनो अपने हर अंग को सुंदर बनाओ और फिर हमारा माल बेचो। गैर सरकारी संस्थाओं ने गांव-गांव में अपनी पैठ बनाकर महिला को पुरूष के खिलाफ लड़ाने में कामयाबी हासिल की कि यही तुम्हारा दुश्मन है।
अब लाल झंडे वालों की बातें न कोई नहीं सुनता है, कि विरासत में ढो रहे पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ लडऩा है। शासक वर्ग के खिलाफ लडऩा है और न ही वह ही लोगों को यह बताने में कामयाब रहे हैं।
चलिए आपको देहरादून में महिला दिवस की 100 वीं जयंती का सीधा प्रसारण दिखाते हैं। धाद नामक एक संस्था ने राज्य विज्ञान एंव प्रौद्योगिकी परिषद ( यूकॉस्ट)व पीपुल्स एसोसिएशन ऑफ हिल एरिया लांचर्स (पहल) के साथ मिलकर एक मैदान में टैंट लगाकर महिलाओं को पालीथीन उन्मूलन के लिए एक-एक हरे बैग बांटे। एक दिनीं कार्यशाला का विषय रखा गया महिलाओं में वैज्ञानिक साक्षरता की प्रासंगिकता। उच्च संभ्रांत वर्ग की महिलाओं के साथ कुछ मध्यवर्गीय महिलाओं व स्कूली बच्चियां भी वहां दिखी। मुख्य अतिथि के रूप में महिला सशक्तीकरण मंत्र विजया बडथ्वाल थी। सभी ने महिला को वैज्ञानिक तरीके से काम करने की सलाह दी। एक महिला ने तो बैसाखी के दिन होने वाले अपनी साहित्यकार मां के जन्मदिन पर सभी महिलाओं को आमंत्रित कर यह भी चेतावनी दी कि सभी महिलाएं सज धज के आएं पूरे श्रृगांर में आएं हमें मेधा पाटेकर नहीं बनना है। महिलाएं गहनों में ही खूबसूरत लगती हैं। इस तरह से यूकॉस्ट व पहल ने अपना पता नहीं कितना बजट यहां खपा दिया। और धाद की कुछ महिला नेत्रियों को लोकप्रियता भी मिल गई।
शहर के एक आलीशान होटल में उमा नामक ट्रस्ट ने भी कुछ महिलाओं को सम्मानित किया। जिसमें एक-आध को छोड़कर वह महिलाएं थी जो कि वल्र्ड बैंक सरीखी संस्थाओं से पैसा लेकर अपने घरों में एक-एक संस्था खोलकर बैठी हैं।
भाजपा के महिला मोर्चे द्वारा राजधानी के नगर निगम प्रेक्षागृह में महिला दिवस का कार्यक्रम रखा गया। पूरा हाल महिलाओं से ठसाठस भरा हुआ था। देहरादून के सभी ब्लाकों से महिलाओं को इकठ्ठा किया था। जो कि नेताओं के न समझ में आने वाले भाषण को कम और एक दिन घर से बाहर निकलने व कुछ खा-पी लेने के उद्देश्य से ज्यादा आईथी। वहीं कांग्रेस की महिलाओं ने मेंहदी प्रतियोगिता कराकर महिला दिवस मनाया। उक्रांद की गिनी चुनी महिलाओं द्वारा भी इस बार महिला दिवस अपने कार्यालय में मनाया गया। इसके अलावा कौशिल्या डबराल संघर्ष समिति द्वारा भी कचहरी शहीद स्मारक में महिला दिवस मनाया गया। सुबह से ही महिलाएं एकत्र होने लगी। और समिति की अध्यक्षा बाल विकास व महिला सशक्तीकरण मंत्री विजया बड़थ्वाल के आतिथ्य में सुबह से ही पलकें बिछाए रही और जब वह वयस्तता के कारण वहीं पहुच पाई तो समिति की अध्यक्षा के आंसू तक निकल गए। उन्हें लगा कि बड़ी मंत्री महोदया आएंगे तो हमारा कार्यक्रम हिट होगा। लेकिन उनके मना करने पर अध्यक्षा जी के स्वाभिमान को चोट पहुंच गई। जिस कारण उनका आयोजन फीका रहा। बाकि की महिलाएं जो खुशी-खुशी घर से आई थी उनको तो मंत्री महोदया से कोई मतलब नहीं था। लेकिन उनके न आने का खामियाजा उन्हें भी भुगतना पड़ा।
राजभवन में महामहिम राज्यपाल मारग्रेट अल्वा द्वारा महिला दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किया गया था। जिसमें सभी पार्टियों की कददावार महिलाओं से लेकर अन्य संभ्रांत घरों की महिलाएं मौजूद थी। राजभवन में कार्यक्रम रखा गया था। जहां पिछले कुछ सालों से दिए जाने वाले तीलू रौतेली पुरूस्कार भी महिलाओं को दिए गए। जिन 12 महिलाओं को तीलू रौतेली पुरुस्कार से सम्मानित किया गया मालूम चला कि उनमें से एक आध को छोड़ दें तो बाकि सभी महिलाएं भाजपा से जुड़ी हुई महिलाएं थी। कोई तो ऐसी थी जो लाल बत्ती की दौड़ में थी वह न मिल पाने से उन्हें तीलू रौतेली पुरुस्कार देकर संतुंष्ट किया गया। और कुछ महिलाएं ऐसी भी थी जिनको जिस कार्य के लिए यह सम्मान दिया गया पता लगा कि उन्होंने वह काम कभी किया ही नहीं। एक नेत्री को रक्त दान करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने पर यह सम्मान दिया गया और उन्होंने कभी अपनी जिंदगी में रक्तदान ही नहीं किया है। तो इस तरह से राजभवन में तीलू रौतेली पुरुस्कार वितरण हुए। इसके अलावा राज्य भर से आई आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को भी पुरूस्कार भी दिए गए। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता दूर दराज से बड़े उत्साह से आई थी लेकिन उन्हें सम्मान भी सम्मानजनक तरीके से नहीं दिया। काम चलाऊ अंदाज में जल्दी-जल्दी निपटा दिया गया। उन एलीट क्लास की महिलाओं द्वारा जो बातें की गई उनसे ऐसा प्रतीत हुआ कि हमें महिला सत्ता समाज काबिज करना है। पुरूष हमारे घोर विरोधी हैं।
इसके अलावा कई सारे लाल झंडे वालों ने भी महिला दिवस मनाया। किसी ने मंहगाई पर विरोध कर विधानसभा पर हल्ला बोला तो किसी ने संयुक्त मोर्चा बनाकर गांधी पार्क में महिला दिवस मनाया। पर दूसरे दिन अखबार की एक कॉलम की खबर बनकर रह गए।
इस तरीके से महिला दिवस के 100 साल सम्पन्न हो गए।
क्या इस सब से किसी आम महिला को कोई फायदा पहुंचा। किसी महिला को राजनीतिक रूप से मजबूती मिली। सवाल यह भी है कि कौन देगा राजनीतिक समझदारी। जिस पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर एक महिला संचालित कर रही हो उसकी पार्टी के लोग महिला दिवस को मेंहदी प्रतियोगिता कराएं इससे बड़ी समझदारी की कमी और क्या हो सकती है। दरअसल पार्टियों के भीतर ऐसी संस्कृति ही नहीं है कि महिला दिवस के दिन महिला मुद्दों पर चर्चा की जाय। सरकारी योजनाओं की जो महिलाओं को दी जा रही हैं उनकी समीक्षा की जाय। ऐसा कोई एजेंडा मुख्यधारा की पार्टियों के पास नहीं है क्योंकि वह चाहते ही नहीं हैं कि महिलाओं में ऐसी समझदारी विकसित हो।
लगभग एक दशक पहले जब महिला दिवस मनता था तो संघर्ष उत्पीडऩ की बातें मुख्य स्वर होते थे लेकिन कुछ सालों से मन रहे महिला दिवस उत्सवधर्मी हो गए हैं। मानो व महिला उत्पीडऩ की बात न करते हों बल्कि कोई त्यौहार मना रहे हों। जब यह तय हो गया है कि महिलाओं को समाजिक व राजनीतिक जीवन में प्रवेश से रोका नहीं जा सकता। आज जब पंचायतों में 50 फीसदी आरक्षण के बाद राज्य सभा में 33 फीसदी आरक्षण तय हो गया है तो ऐसे में तो उनकी ऊर्जा को निरर्थक कामों में लगाया जा रहा है। उन्हें बस एक बुत के तौर पर आगे लिया जा रहा है। सबसे अधिक महिला आंदोलन को सवार्धिक नुकसान एनजीओ ने पहुंचाया है।
महिला संघर्षों की अगर हम बात करें तो आज से सालों पहले भारत में जब महिलाएं घरों से बाहर चौखट लांघने का अधिकार तक नहीं था वह परंपराओं की बेडिय़ों में जकड़ी थी तब कुछ पश्चिमी देशों की साहसी महिलाओं ने उन अमानवीय परिस्थितयों के खिलाफ मशाल उठाई थी। इसी संघर्ष को जर्मनी की समाजवादी महिला क्लारा जेटकिन ने प्रस्ताव रख एक दिन को महिला दिवस मनाने का निर्णय लिया था।
भारत की महिलाएं भी इन संघर्षों से अझूती नहीं थी। जिनमें गार्गी अपाला जैसी महिलाएं भी हुई जिन्होंने सांमती शोषण के घृणित रूप को चुनौती दी। सावित्रीबाई फूले, आनंदी बाई व पंडिता रमाबाई ने पितृसत्तात्मक मूल्यों को चुनौती दी। क्रूर जमींदारों के खिलाफ चला चेलंगाना व तेभागा आंदोलन तो महिलाओं के सशक्त व सशस्त्र संघर्षों के लिए ही जाना जाता है।









































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खामोश हुई एक मौखिक परंपरा कि आवाज

रवांई के प्रसिद्ध लोकगायक बुलीदास का निधन
रंवाई के प्रसिद्ध लोकगायक बुलीदास विगत 3 दिसंबर को चुपचाप चले गए। स्वयं को संस्कृति की ध्वजवाहक कहने वाली प्रदेश की सरकार को बुलीदास के मरने की खबर शायद ही हो, परंतु नृवंशशास्त्रियों व लोक संस्कृति के शुभचिंतकों के लिए वाकई यह किसी सदमे से कम नहीं।
दूसरों की खुशी के लिए हमेशा ही गाने-बजाने को तत्पर बुलीदास की खनकती आवाज तो चुप हो ही गई, सदियों पुरानी परंपरा का अंतिम वारिस भी हमसे छूट गया। 65 वर्षीय बुली का जन्म हर की दून क्षेत्र के देऊरा गांव में हुआ था। यूं तो पुरखों का पुश्तैनी काम गाना, बजाना व नाचना रहा था, लेकिन उनमेंं एक विशिष्ट परंपरा और चली आ रही थी। पंवाड़ा यानि वीरगाथागायन। वह इस समूची घाटी में पंवाड़ा गाने वाले अकेले व्यक्ति थे। पंवाड़ा वाचक परंपरा में सत्ता के तत्कालीन संघर्ष ही नहीं स्थानीय लोगों के इतिहास व सांस्कृतिक परंपराओं का भी बखान करती है। हमारे देश में इतिहास को लिखित रूप में संग्रहीत करने की पंरपरा बहुत कमजोर है, ऐसे में यही मौखिक परंपरा सदियों के इतिहास का दस्तावेज होती है। दुर्भागयवश बुलीदास की कला दूसरे किसी कलाकार को स्थानान्तरित नहीं हो पायी, इस कारण रवांई की कई सदियों की ज्ञान धारा सूख गई। शायद आने वाली पीढिय़ों को इस बात का पश्चाताप हो पर फिलहाल तो बुली के लंबे समय तक बीमार रहकर चले जाने की खबर, खबर नहीं बन सकी है।

हिमाचल के बुशेहर और टौंस घाटी के लोगों के बीच चारागाह विवाद, या राजपूतों में पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही खानदानी दुश्मनी के किस्से हों, सभी में स्थानीय लोक व संस्कृति के दर्शन होते थे।

गढ़वाल के लोक वाद्यों पर वर्षों से शोध कर रहे हाईडलबर्ग विवि अमेरिका के प्रोफेसर विलियम सैक्स ने बताया कि बुलीदास को दमे की शिकायत थी। और वे करीब एक साल से बीमार थे। उन्हें रोहडु के अस्पताल में ले जाया गया। सैक्स ने बताया बुली पंवाड़ा के अद्भुत गायक थे। माधो सिंह भंडारी, दले सिंह जडय़ान, जीतू जडिय़ान, नागदेव फन्दाटा, बहादुर सिंह या कर्ण महाराज के रांगड़ वजीर-नायकों के बारे में जानकारी का स्त्रोत बुली की गायन परंपरा ही थी। बेड़ा, बादी, औजी, ढ़ाकी आदि नामों से जाने जाने वाले बुली के पुरखों का परंपरागत पेशा आज कई कारणों से खतरे में है। संस्कृति को अपने यशोगान में पेश होने वाले मंचीय नाच-गाने से अधिक न मानने वाली सरकार व संस्कृति विभाग से इस पेशे को संरक्षण की कल्पना करना फिजूल है। उत्तरकाशी निवासी लेखक व शोधकर्ता डा. हिम आहुजा ने कहा हमारी लोक संस्कृति के इतने बड़े पुरोधा का चुपचाप चला जाना दुखद है। सरकार तो दूर की बात संस्कृति के चितिंत लोग भी बुलीदास को बुरे दिनों में भूल गए। जन्म के गीत हों या मृत्यु के या शादी ब्याह के, पशुओं, मेलों और देवता के उत्सव बिना बुलीदास के अब रवांई में सब कुछ अधूरा-अधूरा लगेगा।

एक स्कूल जहाँ घसियारिन भी हो सकती है टीचर


क्या आप ऐसे स्कूल की कल्पना कर सकते हैं जहां धसियारिन भी टीचर बन सकती है। जहां जीवनयापन के तमाम माध्यमों को सम्ता है। हल जोतने, घास काटने की विधियां विज्ञान मानी जाती हैं, और उस विज्ञान को बच्चों को सीखाने के लिए ऐसे ही लोगों को स्कूल में आमंत्रिक किया जाता है। जी हां ऐसा ही एख स्कूल है। यह किसी राजधानी या शहर में नहीं बल्कि टिहरी के सुदूर चमियाला गांव में है। इस स्कूल के बच्चों को पता है कि उनके गांव में कितनी सब्जियां, दालें, अनाज और जड़ी बूटियां पाई जाती हैं। स्कूल के बच्चे सर्वे करते हैं कि साल भर में गांव सरकार कितना लाभ कम रही है औ्र एवज में गांव को कितना देती है। उनके सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि सरकार साल भर में गांव को 4 लाख रुपये देती है तो बदले में गांव से लीसा, लकड़ी बिजली, रोड टैक्स बिजली टै्सऔर लोन कुल मिलाकर लगभग 40 लाख रूपये तक ले जाती है। स्कूल के बच्चे पास में चल रही मनेरी भाली परियोजना से विस्थापित होने वाले गांव व उनी पुर्नवास नीति के बारे में पूरी जानकारी रखते हैं। यह एख ऐसे स्कूल है जिसमें मम्मी को बोई कहने में कोई अपराध महसूस नहीं होता। बल्कि बच्चे को प्रोत्साहित किया जाता है कि वह अधिक से अधिक स्थानीय भाषा को तवज्जो दे। आप सोच सकते हैं कि स्कूल के संस्थापकों ने इसका उद्घाटन किसी मंत्री अधिकारी से न कराकर लोक कलाकार नरेन्द्र सिंह नेगी से कराय। निश्चित रूप से स्कूल की परिकल्पना है कि वास्तविक व उपयोगी शिक्षा वह है जो हमारे आसपास है जो हमें स्थानीय लोक जीवन व प्रकृति से अनुराग सीखाती है। स्कूल उस शिक्षा को नकारता है जिसे पढ़कर बच्चे अपने को ही हीनताबोध से देखने लगते हैं। स्कूल के संचालक त्रेपन सिंह चौहान कहते हैं पहाड़ के गांव में शिक्षा तीन तरह की चुनौतियों का सामना कर रही है। पहली यह कि सरकारी स्कूल दुरुस्त नहीं हैं। अभिभावक यहां से अपने बच्चे बाहर निकाल रहे हैं। दूसरी आरएसएस संचालित शिशु मंदिरों का जाल गांव-गांव फैल रहा है। जो कि क्रिश्चन मिशनरी की तर्ज पर ग्रामीण क्षेत्र में अपनी निश्चित संस्कृति को प्रचारित कर रही है। जो संस्कार आरएसएस गांव के बच्चों को दे रहा है वो पहाड़ के संस्कार नहीं हैं। बल्कि यह आरएसएस की घोशित राजनीति है जो घनसाली जैसे सुदूर क्षेत्र के लोगों को मुस्लिमों के प्रति घृणा सिखा रही है।
आरएसएस की इस राजनीति में स्थानीय लोगों के जल जंगल व जमीन के हक हकूकों की बात कहीं नहीं होती। बल्कि एक ऐसे अंधराष्ट्रवाद की वकालत होती है जो लोगों के हितों का नहीं बल्कि हिटलरशाही का समर्थन करता है। चौहान कहते हैं हम बच्चों को उनके गांव, मिट्टी, भाषा व जंगलों के प्रति संवेदनशील बनाते हैं। उनमें उनके प्रति प्रेम जागृत करते हां तथा उनके कल्याण के लिए उनको प्रेरित करते हैं। और यही सच्चा राष्ट्रवाद है।
तीसरा खतरा उन अधकचरे अंग्रेजी पब्लिक स्कूलों से बताते हैं जो बच्चों में स्थानीय चीजों के प्रति अलगाव पैदा करती है। जिसमें बच्चों में खंडित व्यक्त्तिव का निर्माण होता है। इनके स्कूलों की जड़ ही इस बात से शुरू होती है कि हमारे पास कुछ नहीं हैं हमें शहरों से सीखना है। इन तीनों खतरों से लोगों को आगाह करते हुए चौहान ने गांव के लोगों से एख ऐसा स्कूल बनाने का आह्वान किया है जहां अंग्रेजी पढ़ाई जाएगी लेकिन अंग्रेजियत नहीं। जहां संस्कार तो दिए जाएंगे लेकिन वो रुढिग़त, पुरातनपंथी संस्कार नहीं जो दूसरी कौन के प्रति नफरत सीखाए। जहां बच्चा बराक ओबामा की बात भई करेगा तो वहीं घनश्याम सैलानी की भी। जहां बच्चा देश के वित्तीय संकट को भई जानेगा तो वहीं उत्तराखंड में बढ़ते ाफिया को भी। लोगों ने खुशू-खुशी प्रस्ताव किया और स्कूल के लिए जमीन दान में दे दी। परिणआमस्वरूप स्कूल में एलकेजी से लेकर एक तक में 60 बच्चे व एक से पांचवी में 40 बच्चे पढ़ रहे हैं। शहरों में मामूली सी नौकरी के लिए भटकते शिक्षित युवाओं की योज्यता को इस स्कूल ने पहचाना और उन्हें आमंित्रत किया पढ़ाने के लिए। चैहान कहते हैं कि यदि सरकार कम फीस में ऐसी शिक्षा बच्चों को दे पाती तो यह देश का सौभआज्य होता।
चेतना आंदोलन के स्कूल को देखने आए भआरत के प्रथम पंक्ति के लोगों में गिने जाने वाले शिक्षाविद व कई पाठ्यक्रमनिर्माण समितियों में रह चुके अनिल सदगोपाल का मानना है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय व्यापक वर्ग की गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा से बचने का उपाय है। जरूरत पहले से मौजूद विश्वविद्यालयों की शिक्षा में गुणवत्ता लाने की है। न कि नए केन्दरीय विश्वविद्यालय बनाकर 250 से अधिक विश्वविद्यालयों को ठेंगा दिखाने की। प्रो. सदगोपाल इसे लार्ड मैकाले की शिक्षआ व्यवस्था को आगे बढ़ाने की नीति मानते हैं। जिसके अनुसार मेधावी छात्रों की क्रीम छानकर उन्हें पूंजीवादी व्यवस्था की जरूरतें पूरी करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। 12 लाख स्कूलों के देश में 6000 नए मॉडल स्कूल तेजी से उभरते मध्यवर्ग की आकांक्षआ को पूरा करने की कवायद है। क्योंकि यही स्कूल जब संसाधनों के लिए मुंह ताक रहे थे तो मॉडल स्कूल अलग से निर्मित क्यों? उन्होंने मडि डे मील योजना पे कुठाराघात करते हुए कहा कि इस योजना से ड्राप आउट्स (बीच में स्कूल छोड़ देने वाले बच्चे)की संख्या में कोई कमी नहीं आई है। 96-97 में नरसिंहाराव द्वारा यह योजना तमिलनाडू से शुरू की गई। आज पूरे देश भर में यह योजना धड़ल्ले से लागू हो रही है। पर इसके पीछे के तीनों तर्क धराशाई हैं। खाने के कारण न तो स्कूलों में छात्रों की संख्या में इजाफा हुआ है ना कुपोषण खत्म हुआ और सरकार का तीसरा तर्क जिसमें की कुछ दम लगता था (कि बच्चे साथ खाएंगे तो जाति पाति की संरचना ध्वस्त होगी) वह भई वैसे ही धराशई हो गया यह आप गांव की घोर सवर्ण मानसिकता देखकर जान सकते हैं। दूसरी तरफ एख ही कमरे में खाना बनाने औ्र राशन रखने जैसी तमाम दिक्कतों ने प्राथमिक स्कूल की अवधारणा( जिसमें बच्चों के आसपास पढ़ाई के उपकरण होंगे) को ही खत्म कर दिया है।

सबसे ठीक नदी का रास्ता...

सबसे ठीक नदी का रास्ता

रचना प्रक्रिया में 'लाउडनेस ठीक नहीं मानी जाती लेकिन अगर लाउडनेस से बचना किसी सच्चाई से बचने का उपक्रम बन जाए तो मैं लाउड होने का जोखिम उठाउंगा। यह विचार हैं 'सबसे ठीक नदी का रास्ता काव्य संग्रह के रचनाकार विजय गौड़ का। संग्रह फरवरी माह में देहरादून में लोकार्पित हुआ। गौड़ का यह पहला काव्य संग्रह 1988 से अब तक की रचना यात्रा का प्रतिबिंब है। समालोचक दिनेश जोशी उन्हें हायर एल्टीट्यूड का कवि इसीलिए कहते हैं क्योंकि उनकी कविताओं में पहाड़, झरने, नदी, बुग्याल, झील, दर्रे, ग्लेशियर, आदि के बिंब बहुतायत में मिलते हैं। कई बार इसीलिए कि वह यात्राएं बहुत करते हैं, और कई बार इसीलिए कि संवेदना की यात्रा के छोर उन्हें वहां तक ले जाते हैं। 'मेरे पूर्वज बधांण पट्टी के थे, शिव की बारात में भी गण रहे होंगे, यह मैंने पिता से नहीं इतिहास से जाना॥ मेरे पूर्वज की ये पंक्तियां व्यक्ति के चेतन होने की कहानी है। जब व्यक्ति एक पिता का बेटा या किसी विरासत को ढ़ोने का पुर्जा नहीं बल्कि मनुष्य की समूची यात्रा का एक जीवित पिंड होता है। 'बांज की जड़ों का पानी जिनके हाथों को ठीक करता रहा, नमक की इच्छा जिन्हें तिब्बत के पहाड़ों से बांधती रही, पेट की आग ने जिन्हें, खेतों को सीढ़ीदार बनाना सीखाया।
गौड़ की कविता मनुष्य की अंतरात्मा उसके दायित्वबोध और उसके अंह को ललकारने की चेष्टा करती है। वह मनुष्य में बेचैनी व छटपटाहट की मांग करते हैं। 'जीने का सबसे अच्छा ढंग वही जानते हैं जो समय को रोग की तरह झेल पाते हैं, पांव से सिर तक तन पाते हैं एक सख्त पेड़ की तरह॥समाज की विसंगतियां कवि की नसों में बारूद बनकर फूटती है। 'बंदूक की नाल को किसी भ्रष्ट अर्थशास्त्री के सिर पर तानो या रूपयों के बदले फैसला सुनाते किसी न्यायाधीश की पसली में घुसा दो चापड़॥
विजय गौड़ सड़ी गली व्यवस्था में विस्फोट चाहते हैं। लाउड कहे जाने के खतरों के बावजूद वे खतरों से खेलते हैं। 'बेशक सट्टे बाजार के इर्द-गिर्द घूमते हुए हम पूजींवाद का विरोध करते रहे पर जंगल से दूर रहकर जंगलराज पर कब तक मारते रहेंगे ठप्पे॥ इसी कसमसाहट को बंया करती एक कविता का अंश है।
'यह एक ही जगह पर खड़े होकर कदम ताल करने का वक्त है ही नहीं, ना ही वक्त है खुद को समाधिस्थ कर योग करते हुए चेहरे पर तेज बिखेरने का। इनकी कविताओं में पहाड़ बार-बार प्रकट होता है। जब वह पहाड़ से दूर जाते हैं तो पहाड़ और मुखरित होकर गूंजने लगता है। जैसे
'भूल जाए कोई,अपनी भूमि और जड़ इस बाजारू दुनिया में रख दे गिरवी अपनी भुजाएं, टांगे और धड़ ऐसे में ,रसूल हमजातोव का दागिस्तान कैसे होगा जिंदा॥ तनाव उनकी कविता का मूल तत्व है जो कि स्प्रिंग की तरह खिंचता और दबता रहता है। 'मैंने कितनी बार चाहा दुनिया की तमाम इच्छाएं अपने भीतर रोप सकूं, कितनी बार चाहा है मैंने दुनिया की तंग गलियों में बिजली के तारों सा खिंच जाऊं॥
भेड़ चरवाहे गौड़ के काव्य यात्रा की परिपक्वता का परिचय देती है। इसमें विचार भी है, विस्तार भी है, बेचैनी भी है और दिशा भी। प्रगतिशील सौंदर्यबोध के मानदंड़ों पर भी इसे बेहतर कविता माना जा सकता है। 'लकड़ी चिरान हो या भेड़ चुगान कहीं भी जा सकता है डोडा का अनवर। पेट की आग रोहणू के राजू को भी वैसे ही सताती है जैसे बगौरी के थालग्या दौरजे को॥ वह देवभूमि को मनुष्य भूमि के रूप में देखने का आग्रह करते हैं। उन कठोर ऊंचाइयों पर जीवन का स्पंदन देने के लिए चरवाहे मौजूद हैं। अगर देवता कहना है तो इन्हीं चरवाहों को कहें। 'ऊंचे पहाड़ों पर देवता नहीं चरवाहे रहते हैं भेड़ों में डूबी उनकी आत्माएं खतरनाक ढ़लानों पर घास चुगती है।
कविताई में डूबते उतराते गौड़ चोटियों के उपर ही नहीं बल्कि उनके भीतर से रिस रही बूंद-बंूद का अनुभव करते हैं। पिघलती चोटियों का रस उनके भीतर रक्त बनकर दौड़ता है। बुग्यालों के बाहर की आक्रांत दुनिया से आगाह कवि कहता है कि 'ये जानते हुए भी कि रूतबेदार जगहों पर बैठे रूतबेदार लोग उन्हें वहां से बेदखल करने पर आमादा हैं वे नए से नए रास्ते बनाते चले जाते हैं॥

काव्य संग्रह-सबसे ठीक नदी का रास्ता
मूल्य-50 रूपये
रचनाकार-विजय गौड़
प्रकाशक-धाद प्रकाशन


Monday, October 11, 2010

गुमनामी के अँधेरे मैं पहली गढवाली फिल्म का गायक

गुमनामी के अंधेरे में पहली गढ़वाली फिल्म का गायक


कुछ भूला सा कुछ धुंधला सा, ये मेरी खामोश जिंदगी राज भी है और राज नहीं ...बाबा फिल्म का यह टाइटिल सांग लिखने व गाने वाले सतेन्द्र पर ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं। सत्येन्द्र पंडरियाल ऐसा नाम है जिसे पहली गढ़वाली फिल्म जग्वाल का गीतकार व गायक होने का श्रेय जाता है। वह दूसरी गढ़वाली फिल्म घरजवैं के भी गायक रहे। लेकिन परिस्थिति की आंधी में वह ऐसे गुम हुए कि आज उन्हें कोई पहचानने वाला नहीं है। सतेन्द्र ने अपनी पूरी जिंदगी लोक कला को समझने व साधने में लगा दी। उनके जीवन की कठिन तपस्या में नये लोगों के लिए सीखने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन मंचों व जुगाड़बाजियों से दूर एक सच्चे कलाकार की योग्यता की सुध कौन लेता है। बुर्जुग सी काया औसत कद काठी के साथ लगभग अपनी आवाज को ही अपना परिचय बनाते हुए जब एक दिन शाम के समय मीलों पैदल यात्रा से सतेन्द्र जनपक्ष आजकल के कार्यालय पहुंचे तो हमारे लिए वह अमूमन लोगों की तरह ही सामान्य इंसान थे, पर जब धीरे-धीरे उनके जीवन की परतें खुली तब तक हम उनके कायल हो चुके थे। जिंदगी की कठोरता ने जरूर उन्हें फटेहाल बना दिया होगा पर अपनी कला को वे निरंतर संवारते रहे। मध्यकालीन सूफी गायकों के अंदाज में वह जीवन का सार कला के माध्यम से गाते हैं तो सुनते ही जाने का मन होता है। कला पर महारत का आत्मविश्वास उनके माथे पर हमेशा गालिब रहता है। एक चलते फिरते स्कूल के अंदाज में जब वह यह बता रहे होते हैं कि छपेली, न्योली, बारहमासा आदि की उत्पति कैसे हुई तो लोक कला में डूब जाने का मन होता है। कला में जीवन और जीवन में कला। लोक कला की अमुक धुन तेज क्यों है इस पर सतेन्द्र कहते हैं कि पहाड़ में पूरी अर्थव्यवस्था स्त्री द्वारा चलाई जाती है। इसीलिए सारे लोक गीत स्त्रियों की देन हैं उसमें उन्हीं की वेदना मिलेगी। सुबह की बासी रोटी(कलेव) खाकर जब स्त्रियां जंगल को जाती है तो पक्षियों, मौसम को अपना साथी मानकर अलग-अलग धारों में लकड़ी काटते हुए लंबी आवाज में अपनी संगिनियों को गानों से संदेश भी देती हैं। काम के बोझ को कम करने के लिए ही लंबी धुनों का निर्माण हुआ। चरवाहे जब दूर जानवरों को चरवाने के लिए ले जाते तो सवाल जवाब वाले गाने गाते हैं। ओ सुवा मुरुली बजूंल त्यर गौं की डांड्यों मां, ओ नौना मि घास काटूंल त्यर गौं कि बणौं मां। प्रेम के इजहार की यह पंक्तियां सुनाते हुए सतेन्द्र कहते हैं कि आज तो प्यार करने व इजहार के तरीके ही बदल गये हैं। रिश्ते टिकाऊ भी नहीं रहे। हिमालय की विभिन्न परतों को वे ओ दरी हिमाला दरी से व्यक्त करते हैं। प्रथम विश्व युद्ध के समय का एक गाना सुनाते हुए (सात समुंदर पार छ जाणू मां) वह भावनात्मक हो जाते हैं जब लड़ाई पर जाने वाला एक सैनिक अपनी मां से विदा होता है। कहते हैं संवेदनाएं सदैव जन्मदात्री पर ही जाती हैं।
सतेन्द्र जब अपने जीवन के फ्लैश बैक में रोशनी डालते गये तो हम चौंकते गये। शास्त्रीय संगीत के मर्म को लेकर चलने व उसे लोक जीवन के श्रम से जोड़ कर देखने वाले कलाकार के मधुर कंठ में जीवन का सारा राग है। वह बताते हैं कि लोक गीत वह है जो लोगों को श्रम करने में मदद करे चाहे खेत में गुड़ाई हो या जंगल से घास काटना। पीड़ा, हर्ष, विषाद, भय व रोमांच से भरपूर गीत ही मानव के अपने हो सकते हैं।
मूलत: पौड़ी के नैनीडंाडा में रहने वाले सतेन्द्र का जन्म दिल्ली में हुआ। पढ़ाई किदवई स्कूल दिल्ली से की। उसी दौरान उनके अंग्रेजी के अध्यापक अलखनाथ उप्रेती ने कला व पहाड़ी भाषा के प्रति रूझान बढ़ाया व पर्वतीय कला मंच के मोहन उप्रेती से मिलाया। मोहन उप्रेती से मिलना जिंदगी का एक महत्वपूर्ण मोड़ रहा। तब शुरू हुआ इनकी गायकी का सफर। नजीबाबाद रेडियो से कृषि दर्शन में कई बार इनके गानों की रिकार्डिंग हुई। जागर व हुड़के में महारत हासिल करने के बाद गुमान सिंह से ठेठ कुमांऊनी गाने सीखे। दिल्ली सरकार की नौकरी से बिना बताये मुंबई की मायानगरी में पहुंच गये। वहां कई फिल्मों में गाने गाये कुछ फिल्में रिलीज नहीं हो पाई। हम पंछी एक डाल के, झिलमिल सितारों का आंगन व दो राहें जैसे धारावाहिकों के लिए टाइटिल सांग गाये। दो राहें का टाइटिल सांग गा के सुनाते हैं जिंदगी एक दो राहा समझ ही ना पाये।
संगीत प्रेम में वो तय ही नहीं कर पाए कि किस राह पर चला जाए। सतेन्द्र, सोनू निगम, कविता कृष्णामूर्ति, उदित नारायण, विनोद राठौर व बाबुल सुप्रियो के साथ भी गा चुके हैं। वो बताते हैं कि हिंदी फिल्मों की अधिकांश धुनें मोहन उप्रेती के गानों व पुराने पहाड़ी गानों से ली गई हैं। आगे कहते हैं कि मैंने जो भी गाने गाये उनमें नये नये प्रयोग किये। कई बार गढ़वाली व कुमांऊनी को मिलाकर एक नयी भाषा बनायी ताकि दोनों के समझ में आ सके, नहीं तो भाषा का बड़ा अंतर हो जाता है। जिस मायानगरी के लिए मैंनेे नौकरी छोड़ दी वो कितनी निर्मम है वहीं जाकर पता लगा। किसी म्यूजिक डायरेक्टर को अगर आपने कोई अच्छी धुन सुना दी तो आप बाहर और आपकी धुन उनके किसी गाने में। आज तो धुनें चोरी होने लगी हैं। एक्टर तक गाने लग गए हैं। मेरा अनुभव कहता है कि अगर आपकी पृष्ठभूमि कमजोर है तो आप वहां कभी मत जाएं वरना दर दर की ठोकरें खानी पड़ेंगी। वहां की हर गाडी़ से ट्रेन से रोज 100 आदमी फिल्मों में गायक, अभिनेता बनने के लिए उतरते हैं। पहले का जैसा समय भी नहीं रहा कि चने खाकर फुटपाथ पर सो लेंगे अब तो सरकार आंतकवादी करार दे देगी। मार्मिक गानों से लेकर रूमानियत भरे गानों तक का सफर तय करने वाले सतेन्द्र आज बीमारी से जूझ रहे हैं। पास में ढेला तक नहीं। सवाल उठता है कि जो कलाकार स्वंय को कला में ही झोंके रहे। जिन्होंने जीवन यापन के लिए दूसरे जुगत नहीं किये या जिन्हें कला को साधने के लिए उसकी फुर्सत ही नही रही, क्या समाज व सरकार का दायित्व उनको संरक्षण देने का नहीं होना चाहिए। सरकार व कला प्रेमी की भूमिका ऐसे कलाकारों को प्रशिक्षक की भूमिका दिला सकते हैं ताकि पहाड़ी सीडीयों में मुंबईया स्टाइल व रिमिक्स की जगह पहाड़ की सुरीली धुन व माटी से जुड़े गाने आ सकें । दो रोटी का जुगाड़ हो जाए तो सतेन्द्र 52 वर्ष की उम्र में आज भी पहाड़ की लोक कला को नयी ऊंचाईयों तक ले जाने को आतुर हैं।