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Saturday, October 30, 2010

ब्लाग्स ने किया हिंदी का कायाकल्प

हिंदी दिवस आने पर हिंदी से आसक्ति रखने वाले कई लोग इसके भविष्य की चिंता करने लगते हैं, हालांकि यह चिंता एक उबाऊ तरीके से और एक बहुत अल्प समय तक रहती है फिर भी इस चिंता को कहीं न कहीं हिंदी के बारे में विचार करने का श्रेय भी जाता है कुछ कहते हैं हिन्दी का जीवन समाप्ती की ओर है तो कुछ देववाणी की संस्कृत भाषा के कभी न मर सकने की हामी भरते हैं। बहरहाल हिन्दी का कहीं व्यवहार में भला होता नजर आ रहा है तो वह है नयी तकनीकि जन्य इंटरनेट के हिन्दी ब्लाग्स । हिंदी ब्लाग्स के माध्यम से हिंदी भाषा व साहित्य की दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति हो रही है। आए दिन दर्जनों की संख्या में दर्जनों ब्लाग्स हिन्दी में बनते हैं जिन्हें हिन्दी का वह पाठक वर्ग पढ़ता है जिसने हिन्दी पत्रिका तो दूर उनके बारे में सुना तक नहीं होता। यानि हिन्दी का एक नया संस्करण और एक नया पाठक वर्ग। भला इससे अच्छी उपलब्धि हिन्दी के लिए और क्या हो सकती है। वैसे बाजार की अंधाधुंध जरुरतों तेजी से बढ़ती साक्षरता दर ने हिन्दी अखबारों के कई नये संस्करणों को जन्म दिया है। व ढ़ेरों पत्रिकाएं हिंदी में निकल रही हैं। इससे हिंदी के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगाने वालों का मुहं बंद होता है। यह भी एक तथ्य है कि आने वाले समय की हिन्दी विशुद्ध संस्कारों वाली हिंदी नहीं होगी, व्यापार , विज्ञान, व भूमण्लीकृत हो चुके समाज में उसका एक नया ही रूप देखने को मिलेगा इस हिंदी में अंग्रेजी , पंजाबी व विज्ञान के ढ़ेरों शब्द आम बोलचाल के शब्द हो जाएंगे। हिंदी की शुद्धता का आग्रह करना भी ठीक नहीं । इस हिंदी को अशुद्ध कहने के बजाय यह नजरिया रखना ज्यादा बेहतर होगा कि तमाम भाषाओं से शब्द लेकर हिंदी ने खुद को समृद्ध व प्रगतिशील बनाया है। पिछले दस पन्द्रह सालों में अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व के बाबजूद हिंदी के लिए कोई खतरा नहीं है,आज की जरुरतों के हिसाब से लोग अंतराष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी समझना जरुरी समझते हैं। लेकिन हिंदी को सरल व आधुनिक रुप में बनाये रखना भी उनके लिए अनिवार्य है। अगर बाजार इतना निर्भय होता और अपनी ही मर्जी से चीजों को चलाने में सक्षम होता तो आज बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापन हिंदी में नहीं आते और रुपर्ट मर्डोक को स्टार न्यूज को हिंदी में नहीं देना पड़ता । बाजार के दबाव दो प्रकार के होते हैं उपभोक्ता के अनुसार ही व्यापारी को बदलना होगा। इलाहाबाद बैंक के गुमान सिंह रावत जी से हिंदी पखवाड़ा मनाने पर हमने पूछा कि कितने सार्थक होते हैं ये हिंदी पखवाड़े जवाब के रुप में रावत जी बोले कि हम जन भाषा में जन सेवा चाहते हैं हमारे व्यवसाय की जरुरत है हिंदी। भाषा तो बहता नीर है भाषा को बांधा नहीं जा सकता। हिंदी के ग्राहक ज्यादा हैं तो हम चाहेंगे कि हम अधिकांशत हिंदी का प्रयोग करें। हिंदी में नये प्रयोग अगर भाषायी मर्यादा में हैं तो वह ठीक हैं। हमें जनप्रचलित शब्दों का इस्तेमाल ही करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर वो बताते हैं कि बिल को अगर हम विपत्र,व ड्राफ्ट को धनादेश कहेंगें तो लोग समझ नहीं पायेगें। हिंदी भाषा में कई भाषाओं के समावेश होने व इन नये प्रयोगों से हिंदी को खतरा तो नहीं है? इस सवाल के जवाब में हिंदी के प्रसिद्ध कहानीकार ड़ा लक्ष्मण सिंह बटरोही कहते हैं कि जब भी कोई नयी शैली आती है तो लोगों को संकट लगने लगता है। मुसलवान आये थे तो अरबी फारसी का संकट सताने लगा था।भाषा को भाषा वैज्ञानिक नहीं बनायेंगे भाषा को तो आम जनता ही बनायेगी और वो ही आज हो रहा है। लेखन व बोलचाल की भाषा हमेशा अलग होती है। हिंदी आज बाजार की भाषा के रुप में विकसित हो रही है पाणिनी ने भाषा को संस्कृत बनाया तो लोगों ने पाली व अपभ्रशं अपना ली ,इसीलिए भाषा कभी भी व्याकरण से संचालित नहीं हो सकती। इसीलिए नये प्रयोगों को अधकचरापन कहना गलत है। कहीं हिंदी खत्म तो नहीं हो रही है इस सवाल के जवाब में जाने माने साहित्यकार लीलाधर जगूड़ी कहते हैं कि हिंदी को लेकर कई लोग शोक मुद्रा में बैठे हुए हैं और ये वो लोग हैं जो हिंदी को को स्थानीय भाषा के लिए खतरा मानते हैं। स्थानीय भाषा में अगर दम होता है तो वह स्वत ही फल फूल जाती है। हर देश व भूगोल को एक कॉमन भाषा की जरुरत होती है। हिंदी को आज सामाजिक जीवन व बाजार फैला रहे हैं सरकार कुछ नहीं कर रही है इसके लिए। दुनिया के सारे देश अपनी अपनी भाषा में रोटियां खा रहे हैं पर एक भारत है जो अभी भी अंग्रेजी मानसिकता से नहीं उबर पाया है। उनको लगता है कि अंग्रेजी ही उनको रोटी दिला सकती है। हिंदी कभी मर नहीं सकती जितनी भी हिंदी की दुर्दशा हुयी है तो वह सरकारी सैट अप के कारण हुआ है।
उत्तराखण्ड के लोकप्रिय ब्लागर अशोक पाण्डे हल्द्वानी का ब्लाग कबाडख़ाना हिन्दुस्तान में शुरुआती ब्लाग्स में से एक है। बेहतर लोक व फिल्मी संगीत की जानकारी व दुर्लभ फोटो व पेंटिग्स से इस ब्लाग को काफी रीडरशिप मिली है। भाषा को रचनात्मक बनाने का यह एक बेहतरीन प्रयास है। नैनिताल के कवि प्राध्यापक शिरीष मौर्य का ब्लाग अनुनाद कविता व आलोचना को समर्पित है, जिसमें हिन्दी की चर्चित कविताओं व उन पर टिप्पणियों को प्रासंगिक रुप में लाया गया है। देहरादून के विजय गौड़ का ब्लाग लिखो यहां वहां को अपनी छोटी छोटी टिप्पणियों व यात्रा वृतातों के लिए देखा जाता है।देहरादून के शिव जोशी के ब्लाग हिलवाणी में उत्तराखंड के समुग्र समाचारों के साथ साहित्य का भी रोचक कलेक्सन मिल जाएगा।

जश्ने आजादी की पूर्व संध्या पर मुशायरा सम्मेलन

जब बटी म्यर गौंक एक आदिम मंत्री बण तब बटी म्यर गौं गौं नी रेगे विधान सभा हैगे। जश्ने आजादी की पूर्व सन्ध्या पर गायी गयी ये पंक्तियाँ गढ़वाल के सुप्रसिद्ध हास्य कवि गणेश खुगशाल की हैं। संस्कृति विभाग द्वारा आजादी की पूर्व सन्ध्या पर कवि सम्मेलन व मुशायरे का आयोजन किया गया जिसमें देश भर से आये कवियों ने अपनी अपनी कविता के माध्यम से आजादी, राजनीति व रिश्तों के बदलते स्वरुप को व्यक्त किया। दिन के उजेरे में ना करो कोई ऐसा काम कि नीदं जो न आये तुम्हें रात के अंधेरे में। इस तरह के व्यग्यों से सबको हँसाने वाले दिल्ली से आये जाने माने कलाकार अशोक च्रकधर ने कवि सम्मेलन का संचालन किया। भोपाल से आयी र्उदू की मशहूर शायरा नुसरत मेहदी साहिबा ने क्यों मेरा दर्द लिया सहा करते हो कुछ पुराना लिया दिया है क्या नज्म गाकर अपनी मधुर आवाज से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं मंजर भोपाली ने प्रेम का संदेश देते हुए जो भी आया उसे सीने से लगाया हमने हम तो सबसे मिलते रहे गंगा के समान । व तुम भी पिओ हम भी पिएं रब की मेहरबानी प्यार के कटोरे में गंगा का पानी। व राजनीति पे व्यग्ंय करते हुए कहा कि खुद अपने आप ही सुधर जाईये तो बेहतर है ये मत समझिए कि दुनिया सुधरने वाली है। कलकत्ता से आये मुनव्वर राणा ने अपनी कविताओं से सभा को गमनीन कर दिया। घर में रहते हुए गैरों की तरह होती हैं बेटियाँ धान के पौधौं की तरह होती है उड़ के इक रोज ये बहुत दूर चली जाती है घर की शाखों में ये चिडिय़ों की तरह होती है। व आज फिर कूड़ेदान में एक बच्ची मिल गयी। कल अपने आप को देखा था माँ की आखों में ये आइना हमें बूढ़ा नहीं बताता है। पलायन पे मुनव्वर की वाणी कुछ इस तरह बोल उठी ना जाने कौन सी मजबूरियां शहर लायी उसे वो जितनी देर भी जिन्दा रहा घर याद करता रहा। वहीं लखनऊ से आयी सीमा सागर के काव्य छन्द में लिखे आधे घण्टे के उत्तराखण्ड के परिचय से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। नैनीताल से आये उत्तराखण्ड के जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा ने लोगों से जागने का आह्वान आज हिमालय तुमनकें धतुयछ जागो जागो ओ म्यारा लाल से किया तो वहीं से आये मशहूर शायर व युगमंच नाट्य अकादमी के जहूर आलम ने भी देश में छाए सन्नाटे को तोडऩे की बात कही। ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के गाने के मशहूर कवि व दुष्यंत की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले बल्ली सिहं चीमा ने हिन्दुस्तान की असलियत निम्न पंक्तियों से बयान की। खुश है रहबर फाइलों में देखकर खुशहालियां असली हिन्दुस्तान में तो अब भी गुरबत है तो है। सैणी बैग बच्चा बूढ़ा हम जां ले रूंलौ रे अपण अपण बाट देश क छजूलौ रे इन पंक्तियों के माध्यम से देश को सजाने की बात की कुँमाऊनी के मशहूर हास्य कलाकार शेर दा अनपढ़ ने । देहरादून के ही कवि सोमवारी लाल उनियाल ने आज के मौसम के माध्यम से मत्रिंयों पर व्यंग्य करते हुए कहा कि इस बार भी किसी मंत्री की तरह आया बसंत और हाथ हिलाकर चला गया। कार्यक्रम के अन्त में सुरेन्द्र शर्मा ने काफी देर तक दर्शकों को अपने हास्य व्यग्यों से बाँधे रखा। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राज्यपाल बीएल जोशी थे व अध्यक्षता मुख्यमत्रंी जी ने करते हुए शहीदों को याद किया। योगेश पन्त व प्रकाश पन्त के सहयोग से कार्यक्रम सफल रहा।

बिना दरवाजों का समय

थकती नहीं कविता, अब तो सड़कों पर आओ व नदी तू बहती रहना काव्य संग्रह के बाद 'बिना दरवाजों का समय डा. अतुल शर्मा का नया काव्य संग्रह है। डा. शर्मा मूलत: गीत लिखते रहे हैं। गीत ने ही उनको पहचान दी, लेकिन जब-तब अतुुकांत में भी प्रकट होने से स्वंय को रोक नहीं पाते। लेकिन इनमें भी गेय तत्व का लेप साफ दिखाई देता है। काव्य संग्रह 'बिना दरवाजों का समयÓ इसी खिलदड़पने का परिचायक है। संग्रह में 53 कविताएं संकलित हैं। पहली कविता का शीर्षक 'मालिकÓहै। 'साठ साल से रहते हुए/इस किराए के मकान में/हमारा एक घर है/इसके हर कोने में।Ó इसके अलावा अव्यवहारिक शिक्षा पद्यति पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं लोकतंत्र में नौकरी की अराजकता स्कूल के दरवाजों से शुरू होती है। अतुल शर्मा अलग ही मिजाज के कवि हैं। लेखकीय मंचों से उनकी तटस्थता जग जाहिर है। लेकिन दूसरी तरफ अपनी आंतरिक छटपटाहट को किसी न किसी मंच से प्रकट भी करते रहे हैं। कविता का टाइटिल 'बिना दरवाजों का समयÓ एक असुरक्षित सभ्यता की गवाही है। 'सब कुछ कितना असुरक्षित होगा/जब बने होंगे दरवाजे।Ó दरवाजे डर की सभ्यता के परिचायक हैं। दरवाजे संर्कीणता के परिचायक हैं। दरवाजे पाप की कमाई को छुपाने का माध्यम हैं। 'घरों में बहुत दिन तक-दरवाजे नहीं थे/ये होते थे बड़े लोगों के खजाने के लिए।Ó डर मनुष्य के जीवन की विडंबना है। डर हमारे जीने की प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह है और डर को पनाह देता है दरवाजा। 'स्कूल का दरवाजा बच्चों को बंद रखता है/जेल का दरवाजा कैदियों को/दफ्तरों का दरवाजा कर्मचारियों को/दरवाजे जरूरी हो चुके हैं/ यह इस समय की सबसे बड़ी दुर्घटना है।Ó लोकप्रिय मुहावरों की बुनियाद पर खड़ी डा. शर्मा की कविताएं आसानी से दिल में उतर जाती हैं। टोपियां इसी तथ्य की परिचायक हैं। 'पैरों में ढकने के लिए जुराब/और हथेलियों को ढकने के लिए दस्ताने/सिर के लिए टोपियां।Ó बढ़ती हुई दुनिया, लिफाफे, शिकायत पेटी, सचिवालय आदि संग्रह की आकर्षक कविताएं हैं। कविता की पाठशाला में अपने ही शिष्य पवननारायण से संग्रह का परिचय लिखवाना डा. शर्मा जैसे जनकवि का अपना बड़प्पन हो सकता है। काव्य संग्रह-'बिना दरवाजों का समयÓलेखक-अतुल शर्मा, मूल्य-100 रूपये ,रमा प्रकाशन देहरादून।पुस्तक परिचय

दलित समाज के दर्द को सामने लाने का प्रयास

अपनी आत्मकथा जूठन से चर्चा में आये ओम प्रकाश बाल्मिकी ने अपनी कृति सफाई देवता में समाज की सामाजिक स्थिति को समझाने का प्रयास किया है। पुस्तक के माध्यम से वह उस मनोवृति को भी रेखांकित करने की कोशिश करते हैं, जिसमें दलित चिंतकों का यह प्रयास रहता है कि वे भी मूलत स्वर्ण थे, और यदि इतिहास को पुर्न परिभाषित किया जाय तो कई जगह उनकी जातीय श्रेष्ठता के उदाहरण मौजूद हैं। स्ंवय दलितों के मसीहा ड़ा. अम्बेडकर में भी यह हीन ग्रन्थि मौजूद थी। वह दलितों को मनुष्यों के रुप में स्थापित करने की कोशिश करते हुए कहते हैं कि यदि स्वर्णों दवारा लिखित वेद व पुराणों में उनका इतिहास नहीं भी उपलब्ध है तब भी वे किसी से कमतर नहीं हैं। एक कदम और आगे जाते हुए वह कहते हैं कि सवाल आज सामाजिक राजनीतिक हालात में दलितों के सही विकास की पड़ताल करने से होना चाहिए। इसके लिए वे सफाई देवता यानि बाल्मिकी समाज के लोगों को प्रमुख रुप से सामने लाते हैं। पुस्तक सफाई देवता मुख्यत बाल्मिकी समाज पर केंद्रित है, लेकिन यह संपूर्ण समाज के ऐतिहासिक शोषण उत्पीडऩ, दमन का विश्लेषण तमाम विवरणों से करते हैं। खासकर दलित साहित्य को साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा के रुप में स्थापित करने वाले बाल्मिकी के प्रयास का सामाजिक दायरे में स्वागत होगा, ऐसी आशा की जानी चाहिए। बाल्मिकी साहसपूर्वक अपनी पुस्तक में उस रुढि़वादी व्यवस्था को चुनौती देते हैं जो जानबूझकर यह स्थापित करने का प्रयास करती है कि वर्ण व्यवस्था हिन्दू धर्म की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था है। जातीय श्रेष्ठता के दर्प में चूर रुढि़वादियों के राष्टवाद को कटघरे में रखते हुए वह कहते हौं कि इस व्यवस्था के कारण शूद्र और दलित हजारों सालों से विकास से अवरुद्ध है। इस वर्ण व्यवस्था ने समूचे राष्ट को हानि पहुँचायी है। विभिन्न पुस्तकों व पत्र पत्रिकाओं की मदद लेते हुए उन्होंने सबसे कठिन श्रम करने समाज को हीन घोषित करने वाले ग्रन्थों व पुराणों को अमानवीय करार दिया। वे कहते हैं कि ऐसे साहित्य जिसमें मनु स्मृति जैसे घनघोर मनुष्य विरोधी ग्रन्थ शामिल हों,को लोकतान्त्रिक व सभ्य समाज द्वारा सिरे से नकार देना चाहिए। वह कहते हैं कि मनुष्य की बौद्धिक सृजनता को खांचों में नहीं ढ़ाला जा सकता। सृजनता किसी खास दिमाग की उपज होती तो बाल्मिकी रामायण नहीं लिख पाते। तमाम अवरोधों के बाबजूद अंतराष्टीय ख्याति प्राप्त के संगीतकार ,अभिनेता, गायक, वैज्ञानिक व लेखक इस समाज से निकले है। ड़ा अम्बेडकर को सवर्ण समाज ने एक बौद्धिक के रुप में विकसित होने में कई बाधाएं डाली, मगर वो उनके लेखन को निखारने में सहायक ही सिद्व हुयी। लेकिन वर्तमान संर्दभ में सवाल अधिक चुनौतीपूर्ण इसीलिए हो गया है क्योंकि दलित समाज का अगड़ा तबका सवर्ण समाज में विलीनीकरण की तीव्र इच्छा रखे हुए है। थोड़ा प्रगति कर लेने पर वह वर्गीय आधार पर अपने मूल समाज से थोड़ा कट गया है और उन ढ़कोसलों को धारण करने जा रहा है जिन्हें खुद स्वर्ण समाज छोड़ चुका है।

बहुत बड़ा है सुरों का कुनबा

अपने 60 घंटे की सितार बजाने की यात्रा को पूरा करने निकले सुरमणि अग्नि वर्मा होटल के एक छोटे से कमरे में जब सितार बजाते-बजाते मदमाती मुस्कान से लोगों का स्वागत करते हैं तो लगता है कि इन्हें और ऊंचा लक्ष्य लेना चाहिए था। सुरमणि वर्मा ने टोरंटो निवासी शंभू दास का 24 घंटे का रिकार्ड तो तोड़ा ही साथ ही लगातार 60 घंटा सितार बजाने का नया रिर्काड भी कायम किया। मसूरी इंटरनेशनल स्कूल में सितार वादन के शिक्षक सुरमणि एक साधारण परंतु असाधारण इंसान हैं पत्नि व दोनों बच्चे भी सितार में माहिर हैं सितार के तारों से कट चुकी अंगुली कब तार से छूटेगी और कैसे जल्दी से उस अंगुली के घाव में तेल लगेगा यह उनकी जीवन संगिनी से बेहतर कौन जान सकता है। जिन चुनौतियों को झेलते हुए उन्होंने 60 घंटे का सितार वादन समाप्त किया इसमें उनके परिवार व दोस्तों सब का सहयोग रहा। बीच-बीच में सितार प्रेमी उन्हें बल देते रहे। अग्नि वर्मा के संगीत के सफर की शुरूआत विश्वविख्यात बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया के गुरू रहे स्व। राजाराम जायसवाल से संगीत की शिक्षा ग्रहण करने के साथ हुई। अग्नि वर्मा को संगीत के क्षेत्र में राष्ट्रपति पुरस्कार, प्रयाग गौरव, महर्षि सम्मान व सुरमणि जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। संगीत के बारे में बताते हैं कि हजार फूलों से निकले शहद की तरह है संगीत। यह वह रस है जो कभी दूषित नहीं हो सकता। कहने को तो सात ही सुर हैं पर बहुत बड़ा है सुरों का कुनबा। पूछने पर कि संगीत कुछ घरानों तक ही सिमट कर क्यों रह जाता है क्यों नहीं पहुंच पाता वह आम जन तक। कहते हैं कि संगीत को जन-जन तक ले जाने का काम वही कर सकता है जिसका पेट भरा हो। स्टेज से नीचे उतरते हैं तो याद आ जाता है कि अरे सितार का तार टूटा है उसकी मरम्मत भी करनी है। घर जाना है वहां घर परिवार है। कलाकारों की अगर दो रोटी की जुगत हो जाए तो क्रांति हो सकती है कला के क्षेत्र में। फिर घराने कभी नहीं चाहते कि कला आम जन तक पहुंचे। वो तो उसमें अपना पेटेंट चाहते हैं। आज तो गुरू-शिष्य की पंरपरा भी दूषित हो गई है मैं अपनी लड़की को संगीत की शिक्षा लेने घरानों में कभी नहीं भेज सकता क्योंकि मैंने करीब से वहां के माहौल को देखा है। मैं तो कहता हूं कि मिडिल क्लास को कभी संगीत की शिक्षा नहीं लेनी चाहिए या तो आपके पास खूब पैसा हो या फिर आप फकीर हों तब ठीक है वरना संगीत आपको फकीर बना के छोड़ेगा। संगीतकार खय्याम कहते हैं कि संगीत तो जन से ही निकला शायद मां के बच्चे को थपथपाने से धुन निकली होंगी। शायद पशुओं के चरने व रंभाने, कुलांचे भरने से कोई नये स्वर का निर्माण हुआ होगा और फिर उसी को परिष्कृत कर शास्त्रीय संगीत का जन्म हुआ होगा।

एक था खडग बहादुर

लोग रोज खडग़ बहादुर रोड से गुजरते हैं और उसके नाम से होने वाले फुटबाल टूर्नामेंट में भाग लेते हैं लेकिन कोई नहीं जानता कि ये खडग़ बहादुर कौन था। जानने की जरूरत भी नहीं रही आए दिन के लांफिग चैनल व अन्य टीवी चैनल ने जो युवा पीढ़ी के सामने परोसा है उसमें कहां फुरसत है कि वो दादी के किस्सों में बहादुर लोगों के कारनामे सुन सकें। गांधी के नमक तोड़ो आंदोलन मेे शिरकत करने वाले खडग़ बहादुर कहते हैं कि मैं चर्खा तो नहीं चला सकता हां खुखरी जरूर चला सकता हूं। खुखरी चलाने वाला यह वीर वही खडग़सिंह था जिसने कलकत्ता के हीरामन नाम के एक सेठ को उसके ऑफिस में जाकर अपनी खुखरी से इसीलिए मार दिया था क्योंकि वह लड़कियों की खरीद फरोख्त का व्यापार करता था। तब से कई बहनें उसे राखी बांधने आया करती थी। ऐसे लोग आज और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं जब कि लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा ही उठ गया हो। न्यायपालिका की यह बहुत बड़ी कमजोरी है कि लोग आज मजबूर होकर कानून को अपने हाथ में लेने लग गए हैं। उत्तराखण्ड में इस योद्धा को याद किया जनकवि अतुल शर्मा व उनके कुछ साथियों ने। देश भक्ति के जजबे में खडग़ बहादुर यहां तक पहुंच गए थे कि मां बाबूजी दोनों चल बसे मकान खण्डहर हो गया। अतुल शर्मा ने उनके मोहल्ले में जाकर जनगीत गाए लोगों को खडग़बहादुर के किस्से सुनाए महिलाओं व बच्चों की बड़ी तादात उन्हें गौर से सुन रही थी उनके जनगीतों का अर्थ बच्चे निकालने का प्रयास कर रहे थे। पाश की कविता उनके लिए एक नई चीज थी-संविधान में सबसे मौलिक गांरटी है मर्जी से पेशा चुनने की गर्दन पकड़कर बताना नहीं होता कि भीख मांगो, चोरी करो, सियाचीन में मरो। इस तरह गणतंत्र दिवस उन्होंने अपनी तरह से मनाया।

मुख्याधारा का निर्माणकर्ता हाशिए पर कैसे

पूरे देश भर में हमारी कला, संस्कृतिको अगर किसी ने जीवित रखा है, कोई धरोहर अगर बची हुई है, तो वह दलित वर्ग ने ही बचा रखी है। वो भले समाज की बुनियादी आवश्यकता वाले काम हों या फिर वाद्य यंत्रों को सहेजने बजाने से लेकर कला संगीत की उस परंपरा को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने का काम हो। फिर कैसे ये लोग हाशिये के हो गए, कैसे इनके उत्पीडऩ को लेखन के द्वारा उजागर करने वाले लोग या वो लेखन हाशिये का हो गया? आज हिंदी के अधिकांश लेखक अकादमिक तो बन गये पर जन से दूर हो गये। ये कहना था प्रख्यात दलित चिंतक कंवल भारती का। अवसर था देहरादून में हो रहे दलित साहित्य एंव सांस्कृतिक अकादमी के वार्षिक समारोह का। जिसमें प्रख्यात लेखक व पत्रकार प्रो। रामशरण जोशी को डा. अंबेडकर राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया। इससे पूर्व ये सम्मान डा. नामवर सिंह व डा. राजेन्द्र यादव को दिया गया है। साथ ही रूपनारायण सोनकर की नयी कहानी कफन पर भी चर्चा हुई। कहानी दहेज लोभी, पढ़े लिखे समाज के ढ़ोंग को सामने लाती है। कहानी में जातीय समाज के वर्गीय समाज में रूपांतरित होने के लक्षण दिखाये गये हैं और दिखाया गया है कि जाति की अपेक्षा वर्ग अधिक मजबूत धुरी है।दिल्ली से आये अजय नावरिया ने कहा कि साहित्य किसी वर्ग विशेष का एकालाप नहीं हो सकता। अगर कुछ दलित लेखक इसे खास ढ़ांचे में रखेंगे तो यह भी नये किस्म का मनुवाद और बाह्मणवाद साबित होगा। वहीं प्रो. रामशरण कहते हैं कि दलित साहित्य के मूल्यांकन के लिए अब तक के मानदण्ड अपर्याप्त हैं। दलित सौंदर्यबोध को मान्यता देना हिंदी साहित्य के विकास का एक प्रगतिशील कदम होगा। कहानीकार अल्पना मिश्र कहती हैं कि स्त्री विमर्श की तरह दलित विमर्श ने भी यातना व उत्पीडऩ का लंबा सफर तय किया है। दोनों की लड़ाई वर्चस्ववाद व सांमतवाद से है। इसीलिए दलितों व स्त्रियों को तो अपनी लड़ाई लडऩी ही है भले ही कितना समय लग जाए। परिणाम तो एक दिन सामने आते ही हैं। दिल्ली से आए डीयू में हिंदी के प्रो. व अपेक्षा पत्रिका के संपादक तेजपाल सिंह कहते हैं कि दलित विमर्श व दलित चेतना दोनों में काफी अंतर है। दलित चिंतक को अपने समाज के अंर्तविरोधों की गहरी पहचान होती है। कंवल भारती व मलखान सिंह जैसे कई लेखक हैं जो इस श्रेणी में आते हैं। उनका लेखन उत्पीडऩ को झेल चुका भोगा हुआ लेखन होता है। वहीं दूसरी ओर आज अन्य लेखक भी दलित विमर्श पर लिख रहे हैं। पर प्रेमचन्द के अलावा शायद ही कोई लेखक है जिसने दलित की पीड़ा को वास्तव में अभिव्यक्ति दी हो। गुजरात से आये दलित लेखक आर एच वर्णकार कहते हैं कि गांव की 70 फीसदी आबादी के जीवन में जब तक कोई परिवर्तन नहीं हो जाता तब तक इस तरह की संगोष्ठियों से कोई फायदा नहीं हो सकता। इस अवसर पर दून घाटी रंगमंच द्वारा अपनी 102 वीं प्रस्तुति सोनकर जी की कफन कहानी के मंचन से की गई। जिसका निर्देशन नाट्यभूषण लक्ष्मीनारायण ने किया।

Wednesday, October 27, 2010

लोक ह्रदय को स्वर देती बसंती बिष्ट



जागर गाकर पुरुषों के एकाधिकार को किया समाप्त

रीच संस्था द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला विरासत सांस्कृतिक महोत्सव, दून घाटी की पहचान बन चुका है। लगातार सोलहवें वर्ष आयोजित हो रहे विरासत के पखवाड़े भर के कार्यक्रम का शुभारंभ इस बार जागर साम्राज्ञी बसंती बिष्ट के हाथों हुआ। जिस कार्यक्रम में बिरजू महाराज जैसे मूर्धन्य कलाकार शिरकत कर रहे हों, उसमें बसंती बिष्ट को सर्वोपरि रखना महज एक संयोग नहीं है। लोक गीत मुक्त हृदय की अभिव्यक्ति हैं। इसकी महत्वपूर्ण विधा जागर दैवीय शक्तियों के जागरण का विधान है। न्योली, चांचरी, भगनौल, छपेली, प्रेमगीतों के साथ ही जागर विधा को नईऊंचाईयों तक ले जाने का काम चमोली के ल्वाणी गांव की बसंती बिष्ट ने किया है। गढ़-कुमाऊं की इस जीवंत संस्कृति को विकसित करने में बसंती ने पूरा जीवन समर्पित कर दिया। महिला होते हुए भी पुरुषों के क्षेत्र की कला में उन्होंने वह महारत हासिल की जिसके फनकार अब कम ही रह गए हैं। कुमांऊ व गढ़वाल के हृदयस्थल चमोली में रूपपकुंड के समीप ही जन्मी बसंती को जन्म से ही संगीत का माहौल मिला। कहती हैं, मां सुलाते समय लोरी के रूप में जो धुनें गाती, वो मेरे खून में घुलते गए। मां की ऋणी हूं इस संगीत के लिए। मां पिताजी के रिश्ते बहुत अच्छे थे। मां कोई गाना गाती तो पिताजी उसे और बेहतर करते। उसकी धुन बनाते, और साथ में गाते भी। मैं केवल पांचवी ही पढ़ी हूं। पर लगता है कि ऐसा कुछ नहीं जो नहीं पढ़ा, क्योंकि उस समय पढ़ाई का ढांचा कहीं बेहतर था। बाद में फौजी से शादी हुई। शादी के बाद चंडीगढ़ संगीत विश्वविद्यालय से शास्त्रीय संगीत सीखा। बेतकल्लुप हो कहती हैं, विशारद तो नहीं कर पाई। परिवार की देखभाल में वक्त कहां बचता अपने लिए। बाद में गांव आई तो प्रधानी का जिम्मा मिला। हर पांच साल में होने वाले नंदा राजजात की यात्राओं में रही जो कि चमोली के नौटी गांव से शुरू होकर हिमालय की जड़ बधाण तक 18 पड़ावों से होकर गुजरती है। बसंती जितनी सहजता से बताती हैं, उनकी कला साधना का सफर इतना आसान नहीं था। जागर गाने पर उनके लिए कई फब्तियां कसी गई। कई व्यंग्य हुए। कहती हैं कि समाज की प्रताडऩा से कई बार छोड़ देने का मन किया, पर फिर लगा कि मैं दो पीढिय़ों के साथ अन्याय कर रही हूं। हमारे पूर्वजों ने जिस गरीबी में कंदराओं, जंगलों व पशु पक्षियों के संरक्षण में इन गीतों-धुनों को जिंदा रखा-पाला- पोषित किया, उन धुनों को अगली पीढ़ी तक पहुचांने का ऋण है मेरे ऊपर है। इसीलिए मैंने सारी वर्जनाओं को तोड़ा। यही बात मुझे जीने को बल व गाने को साहस देते हंै। खेतों, जंगलों, गाड़, गदेरों व घरों के अंदर गाने वाली बसंती जब पहली बार 2002 में सार्वजनिक रूप से मंच पर आई तो निश्चय ही कला की दुनिया में एक नया आकर्षण बनीं। उसने कला के बड़े-बड़े मर्मज्ञों को दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर दिया। आजीविका का दबाव न होने के कारण वह कला को बाजारू रूप देने के दबाव से मुक्त रख सकी। उन्हें इस काम में परिवार व पति का जरूर समर्थन हासिल रहा। स्वयं उनके पति रणजीत सिंह अनेक गानों को हुड़के की थाप से संगत देते रहे। जागर के संबंध में वह कहती हैं कि जागर शरणागत होकर गाई जाती है। ये नहीं देखा जाता कि कितने लोग देखने वाले हैं। मैंने कभी पैसा नहीं देखा। दर्शक मेरे लिए हमेशा देवता के समान रहे। जिस भी सभा में गाऊं मुझे लगता है मैं देवसभा में गा रही हूं। गाते समय आंखों के सामने जन्म के समय की भौगोलिक स्थितियां आ जाती हैं। जागर आत्मा को पोषित करता है। शीतल करता है। एक महासागर है जिसके हर आयाम को पकड़ पाना मुश्किल है। मेरी मां बिरमा देवी 80 साल की हो चुकी हैं। गांव में रहती हैं अकेले। जब भी मां के पास जाने का मौका लगता है कुछ नया सीख के आती हूं उससे। इस बार जब गई थी तो पण्डवानी सिखाई मां ने। मैं जब जागर गाती हूं तो हमेशा परंपरागत वेश-भूषा में ही गाती हूं। गीत गाने आसान होते हैं पर जागर में बहुत मेहनत लगती है। गांव में तो जागर गाने से पहले अभी भी एक सेर घी पिलाया जाता है। अभी तक बरेली, रामनगर, जोशीमठ, पौड़ी व चमोली सहित दर्जनों नगरों व मेलों में जागर का जादू बिखेर चुकी बसंती अब रूपकुंड सांस्कृतिक धरोहर संस्था बनाकर अपने जैसी कलाकार महिलाओं को उससे जोडऩे के काम में लगी हैं। ताकि पुरखों की संस्कृति उनकी आंखों के सामने ही गायब न हो जाए। साथ ही वह वेदी, कर्मकांड, यज्ञोपवीत, धूनी रमाने जैसे महिला वर्जित कार्यो को भी चुनौती देने का काम कर रही है। बसंती बिष्ट जैसे उदाहरण आज कम ही मिलते हैं। लेकिन, कला की गहराई, उसको प्रचारित करने की गंभीरता व समर्पण के कारण इन दुर्लभ कलाओं के बारे में आश्वस्त रहा जा सकता है। निश्चय ही इन प्रयासों से उननए कलाकारों को प्रोत्साहन मिलेगा जो अपनी संस्कृति से अनुराग रखते हैं। अपनी कला को लोहा मनवा चुकी बसंती की कला की याद अब गढ़वाल विवि को भी आई है। उनकी कला को विवि संग्रहीत कर रहा है। यदि राज्य सरकार चाहे तो बसंती को वही सम्मान मिल सकता है जो मध्य प्रदेश सरकार ने तीजन बाई को दिया। बसंती बिष्ट को जितनी महारत गढ़वाल की संस्कृति में हासिल है, उतनी ही कुमाऊं की संस्कृति में भी। वह दोनों क्षेत्रों के बीच पुल का काम करती हैं। यह संयोग उत्तराखंड की समन्वित संस्कृति को पोसने में निश्चत रूप से सहायक होगा। ठीक उसी प्रकार जैसे एफआरआई, आईएमए, भारतीय वन्यजीव संस्थान व ओएनजीसी, दून के परिचय से अलग नहीं किए जा सकते।

उपेक्षित हैं मूल कलाकार- राही

कुमाउनी -गढ़वाली के लोकप्रिय गायक सत्तर वर्ष की उम्र में भी निरंतर सक्रिय
सर्ग तारा जुन्याली राता को सुणौलो तेरी मेरी बाता व हिलमा चांदी को बटना तेरी मन छौ मेरी रटना, जैसी पंक्तियों से भला किसका रिश्ता नहीं। ऐसा प्रतीत होता है ये गीत हिमालयवासियों के सौंदर्यबोध की विकास यात्रा का प्रारंभ बिंदु रहे हैं। जैसा कि, पांच नदियों से सींचे गए उर्वर प्रदेश पंजाब के चारागाहों में हुआ। वेदों की ऋचाओं के कोई न कोई रचनाकार तो रहे ही, क्योंकि कविता हर किसी के बूते की बात नहीं, आत्मिक स्पर्श से वह भले हर किसी को अपनी लगती हो। लेकिन, इस काल में इतिहास का चैतन्य कहें या कहें व्यक्तिवाद इतना सजग नहीं था कि गीतों के शिल्पियों को याद रखा जाय। आदिम साम्यवाद में संपत्ति की तरह ही बौद्धिक संपदा भी निजी नहीं थी। हर्ष का विषय है कि, ऊपर लिखी पंक्तियों के रचनाकार न सिर्फ ज्ञात हैं, बल्कि वे अपनी सतायु में भी निरंतर सक्रिय व सरस हैं। युवाओं के लिए सुरुचिपूर्ण गीत रच सकें, इसके लिए वह दिल में अपने को युवा बनाए रखने का भरसक प्रयास करते हैं।नाम। चंद्र सिंह राही। जन्म। पौड़ी के एकेश्वर ब्लॉक के चौनकोट गांव में। प्रारंभिक गुरू। जागर के महारथी व पिता देवराज सिंह। उन्हीं की संगत में गायन की क्लासिकी का रियाज शुरू हुआ। पिता की भावना थी कि बेटा पुरखों से मिली विरासत को आगे ले जाए, उसे संवारे, और नाम कमाए। आठवीं तक की पढ़ाई गांव में हुई। यहां, जंगलों में चरवाहा बनकर खूब बंसी बजाई, गले को खूब साधा। बाकी वाद्य यंत्रों को भी आजमाया। गुरू पिता सुलझे हुए कलाकार थे। जीवन के दर्शन की गहरी समझ थी। राही यह बताने में अत्यंत कृतज्ञ महसूस करते हैं कि उनका ज्ञान बस पिता की अमानत है। पिता ने इसे अपने पुरखों से लिया। लोक गायन या लोक वाद्य एक व्यक्ति या एक पीढ़ी के नहीं हो सकते। उसमें सदियों का योगदान होता है। जीवन के भोगे हुए का सार ही तो लोक मन है। वह चिंतन व अभिव्यक्ति के धरातल पर फूट पड़े तो गीत बन जाते हैं। राही की यात्रा बचपन से ही शुरू हो गई। सन् 1967। पहली बार आकाशवाणी के लिए गाना हुआ तो क्रम कहीं रुका नहीं। दिमाग पर जोर डालते हुए कहते हैं, पहला गीत-यह कोई सवाल-जवाब वाला गीत था। घस्यारिन व पतरोल के बीच का जैसा संवाद। 10वीं देहरादून से की और बाद में दिल्ली आने पर हिंदी साहित्य रत्न व प्रभाकर की डिग्री ली। मन गांव में था, लेकिन रोजी दिल्ली से बांधे रही।40 वर्षों के कॅरिअर में गायन व वाद्य यंत्रों पर तमाम प्रयोग किए। संस्कार, ऋतुरैंण, नामकरण, जातियों के गीत, विवाह गीत, चूड़ाकर्म, खुदेड़ व नराई गीत। इन सब में कुछ न कुछ नया जोड़ा। राही का पक्का विश्वास है, जब तक नई पीढ़ी को लोक गीतों की खूबसूरती का अहसास व वाद्य यंत्रों की बारीकियों का ज्ञान ट्रांसफर नहीं होगा, कला का विकास व संरक्षण संभव नहीं। यदि वे चलताऊ विधा से काम चला रहे हैं तो इसका मतलब है, पुराने कलाकारों ने ज्ञान को प्रसारित नहीं किया। उस पर आसन लगाकर बैठे रहे। राही की चिंता है, मूल कलाकारों का तेजी से ह्रास हो रहा है। पूछते हैं, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में फरक क्या रह गया, कलाकारों को पहचानने वाला अब भी कोई नहीं है। पहाड़ को जातिवाद का कोढ़ ले डूबा है। असली कलाकार को आदर मिलता है, न ही पैसा। लोक धुन के धुनी राही ने शुरुआत में दूरसंचार विभाग में भी नौकरी की, लेकिन उसमें अधिक दिन तक मन नहीं लगा। नौकरी छोडऩे के बाद गांव-गांव घूमकर कलाकारों पर आधारित छोटी-छोटी डॉक्यूमेंट्री बनाईं। मध्य हिमालय की जनजातियों, पिथौरागढ़ के वन रौतों, पंच प्रयागों, गंगा में प्रदूषण, गढ़वाल की भोटिया जनजाति, कुमांऊ की सांस्कृतिक जात पर डॉक्यूमेंट्री बनाने समेत 2500 विलुप्त होते गीतों को भी रिकार्ड किया। लोकगीत व नृत्य, लोक वाद्यों तुलनात्मक व्याख्या, ढोलसागर, ढोल दमाऊ, हुड़का, डमरू, थाली, डौर थाली, वादन गायन, सिणैं, शहनाई, हुड़का, विणाई आदि पर वृहद संकलन कर लिया है। संभवत: वह आने वाली पीढ़ी के लिए संग्रहालय का पर्याय बनेंगे। राही का विश्चास है, लोक से सभी विधाएं जुड़ी हैं। समय के साथ परिवर्तन आता है, आता रहेगा। तांबे के बर्तन बना रहे हैं वह भी एक संस्कृति है, शिल्पकार मकान बना रहा है वह भी संस्कृति है। भोटिया लोग कपड़े, दन, शॉल बना रहे हैं वह भी संस्कृति है। राही कहते हैं, कुमाऊं के लोगों ने मुझे, स्वर्ग तारा जुन्याली राता व हिलमा चांदी को बटना, से याद रखा तो गढ़वाल वाले मुझे, सतपुलि को सैंणा मेरी बौ सुरेला, बौ मी ना जाणां मेरी बौ सुरेला से जाना। फिलहाल, दिल्ली में उत्तराखंड कला संगम नाम से ग्रुप चला रहे हैं।

केम्पा फंड से होगी वन अधिकारियों की पिकनिक

अकूत राशि मिलने से फाइलें संजाने लगे कागजों के उस्ताद
मुख्यमंत्री निशंक के मानस पुत्र स्पर्श गंगा का भी होगा कल्याण
लेकिन प्रकृति की संपदा में स्थानीय निवासियों को अधिकार नहीं
केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय का एक मामूली प्रावधान वन महकमे के लिए धनकुबेर साबित होगा, ऐसा किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। भला हो भारतीय वन अधिनियम का। दरअसल कैं पा फंड यानि कंपनसेटरी एफॉरेस्टेशन एंड मैनेजमेंट . . की यह माया नया राज्य बनने से नजर आई है। विशाल उत्तर प्रदेश में उत्तराखंड की हरित संपदा का महत्व सामने नहीं आ पाता था। कैंपा फंड वह धनराशि है जो मंत्रालय ने वन बेचकर कमाई है। यानि सड़क समेत तमाम गैर वानिकी कार्यों में जो वन भूमि ट्रांसफर हुई उसका मुआवजा। विभाग इसे सीधे खर्च न कर दे इसीलिए इसे मंत्रालय में जमा कराया जाता है। औपचारिक प्रावधान तो इस राशि से अनिवार्य वानिकी विकास का है, लेकिन वह अब तक फलीभूत नहीं हुआ। दीगर है कि वन अधिकारियों के वारे-न्यारे होते रहे। सबसे बड़ा उदाहरण टिहरी डैम में गई विशाल वन संपदा का है। बताया जाता है टिहरी के बदले खीरी या गोंडा जिलों के बंजरों में कुछ पौधे रोपे गए थे, अब उनका कोई नामोनिशान नहीं है। पिछले नौ साल में 3000 से अधिक निर्माण कार्यों के लिए विभाग लगभग 15 हजार हेक्टेअर भूमि दे चुका है।दरअसल उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से ही कैंपा फंड का धन केन्द्र दाबे बैठा था। साल दर साल वन भूमि के एवज में विभागों ने जो राशि जमा कराई वह मय ब्याज लगभग 900 करोड़ तक जा पहुंची। राज्य सरकार की कैंपा का धन लौटाने की मांग को लगातार अनसुना कर रहे केन्द्र को उस समय पोटली खोलनी पड़ी जब सुप्रीम कोर्ट की फटकार पड़ी। यह राशि राज्य को आगामी 10 वर्षों के लिए बनाई गई योजनाओं के एवज में किस्तवार मिलनी है। प्रतिवर्ष कम से कम 80 करोड़ की राशि मिलेगी। 16 हजार करोड़ के कर्ज में डूबी राज्य सरकार का भी इतराना लाजिमी है। पहली बार विभाग पर हुई ऐसी धनवर्षा से अधिकारी एकदम चुस्त हो गए हैं। शासन व अन्य परियोजनाओं में प्रतिनियुक्ति को आतुर दिखने वाले अफसर अब अपनी कुर्सी पकड़कर ठहर गए हैं। विभाग ने लगभग छह माह की कसरत के बाद जो रोडमैप बनाया है उसे राज्य सरकार बाकायदा हरी झंडी दे चुकी है, जाहिर है इस सबमें विभागीय अधिकारियों ने जनप्रतिनिधियों का ख्याल रखा होगा। वानिकी विकास के मुखौटे के पीछे गोलमोल योजनाओं का ऐसा जाल है, जहां न निगले बनता है- न उगले बनता है। अगर कहीं कोई छूट गया है तो वह है स्थानीय जन। उनकी भी दावेदारी बनती है विभाग को इसका ख्याल नहीं आया। ऐसा तो नहीं कि विकास कार्यों के लिए हस्तांतरित किए गए वन विभाग ने खुद उगाए हों, या नेताओं के फर्जी पौधारोपरण अभियानों की देन हों। यदि वनों से किसी व्यक्ति की नजदीकी संबंध है तो वह यही स्थानीय जनता है। लंबे संघर्ष व सृजन के बाद अधिकारियों ने यह तो स्वीकारा है कि वनों की रक्षा, विकास व संरक्षण लोगों केे बगैर संभव नहीं। विभाग भले ही कितना पुराना होने का गुमान कर ले, लेकिन उसकी उम्र जनता से अधिक नहीं हो सकती। कैंपा फंड पर नैसर्गिक न्याय के नियमानुसार पहला हक जनता का है। विभाग को यदि वनों की चिंता होती तो योजनाओं की वरीयता में ऐसे लोगों का सशक्तीकरण प्राथमिकता में होता, जिनकी फसलें जंगली सुंअर रौंद जाते हैं। जिनके स्कूल जाते बच्चों पर गुलदार नजरें गढ़ाए बैठा रहता है। पिछले नौ साल में ही तकरीबन 200 लोग गुलदार, 80 लोग हाथी, 15 लोग भालू व एक दर्जन लोग बाघ ने मार डाले। वहीं जंगली जीवों के हाथों गंभीर रूप से घायल होकर आंख, कान, हाथ, पैर आदि की तमाम शारीरिक विकलांगता वालों की संख्या 1000 का आंकड़ा पार कर गई है। लेकिन विभाग ने मुख्यमंत्री की पेट परियोजना स्पर्श गंगा का वरण करना अधिक मुनासिब समझा, जिसके सहारे वे अपनी ब्रांडिंग कर रहे हैं। स्पर्श गंगा के तहत गंगा नदी से पॉलीथिन हटाने के लिए 10 करोड़ की राशि का प्रावधान है। यह धन मुख्यमंत्री के साये में पल रहे एनजीओ को मिलना है। मुख्यमंत्री व बाबा रामदेव की प्रेरणा से ही 16 करोड़ मुख्यमंत्री जड़ी-बूटी योजना में खर्च किए जाएंगे। इसके तहत प्रत्येक जिले में जड़ी-बूटियों का प्रदर्शन होगा। एनजीओ का ही पोषण करने वाली एक और योजना है- ईको टूरिज्म की। बताया जाता है स्वयं कई वन अधिकारी, नातेदारों के नाम से ईको टूरिज्म के धंधे में लगे हैं। अपने संपर्कों व विभाग के विश्राम गृहों का लाभ उठाकर ये मोटी मछलियां फांसते हैं। गुलदार पुनर्वास केन्द्र व वन्यजीव कोरिडोर के निर्माण को 124 करोड़, प्रत्येक जिला मुख्यालय के वानिकीकरण को मुख्यमंत्री हरित योजना के तहत लगभग सात करोड़, वन पंचायतों के पुन: सीमांकन को छह करोड़ मिलेंगे। अब तक करोड़ों खर्च कर विफल साबित हुए लेन्टाना उन्मूलन कार्यक्रम को लगभग 18 करोड़ मिले हैं। जिस धन को अनिवार्य रूप से वनीकरण कार्य में खर्च करना था, विभाग उससे अपने ऐशो-आराम के माध्यम तलाश रहा है। विभाग 177 करोड़ रुपए की लागत से वन मुख्यालय का निर्माण करेगा। देहरादून के राजपुर रोड स्थित जिस भवन से अभी वन मुख्यालय का काम लिया जा रहा है, वह सर्वसुविधासंपन्न नहीं है, ऐसा नहीं कह सकते, लेकिन अधिकारीप्रधान विभाग के लिए यह कारपोरेट शैली का नहीं है। विभाग में इस समय कुल कर्र्मचारियों का एक तिहाई हिस्सा वन अधिकारियों का है-जिन पर विभाग के कुल वेतन का 90 फीसदी खर्च हो जाता है। बताया जा रहा है मुख्यालय के प्रस्तावित भवन को सचिवालय व विधानसभा से अधिक खूबसूरत बनाने की योजना है।

108 की तर्ज पर घायल जानवरों के लिए चलेगी मोबाइल वेन

घायल जानवरों को आपातकालीन राहत के लिए वन विभाग की कवायद
मुख्यमंत्री की प्रिय आपातकालीन चिकित्सा सेवा 108 की तर्ज पर घायल जानवरों को आपातकालीन चिकित्सा सेवा देने के लिए मोबाइल वैन चलाने की भी बात है। 108 सेवा पिछड़े क्षेत्रों में अस्पतालों की मांग का अस्थाई लेकिन चमकदार विकल्प बनकर सामने आई है। लेकिन मुख्यमंत्री की आत्मुगधता बरकरार रहे, इसके लिए वन्यजीवों पर भी तीसमार खां प्रयोग की तैयारी है। बताया जा रहा है, जहां भी जंगली जीव घायल होंगे, उन्हें नजदीक की सड़क पर लाया जाएगा, जहां सर्वसुविधासंपन्न वैन में उनको प्राथमिक उपचार मिलेगा। शुरुआत में कुमाऊं व गढ़वाल मंडल में एक-एक वैन तैनात की जा रही हैं।प्रमुख वन संरक्षक डा. आरबीएस रावत ने बताया प्राकृतिक दुर्घटना व तस्करों द्वारा घायल जंगली जीवों के उपचार को विभाग के पास कोई चिकित्सालय व चिकित्सक नहीं है। विगत सप्ताह देहरादून से जीबी पंत विवि स्थित वेटनेरी कॉलेज ले जाते समय रास्ते में ही दो गुलदारों की मौत हो गई। कई जंगली जानवर घायल होने के बाद उपचार के लिए ले जाते वक्त दम तोड़ देते हैं। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए विभाग 12-12 लाख रुपए की दो वैन सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में लगा रही है। यदि इस प्रयोग को सफलता मिली तो भविष्य में वैनों की संख्या बढ़ा दी जाएगी। उसी प्रकार आदमखोर व उत्पाती गुलदार को नियंत्रण में लाने के लिए प्रत्येक दो जनपद में एक-एक मोबाइल जीप खरीदी जा रही हैं। जीप की मदद से वनकर्मी गुलदार या अन्य उत्पाती जीव के समीप शीघ्रता से पहुंचेंगे। इस जीप में ट्रेंक्वेलाइजिंग गन व फस्र्ट एड किट रखा जाएगा। रावत ने बताया खूंखार जानवरों के लिए हरिद्वार व अल्मोड़ा में एक-एक रेस्क्यू सेंटर का काम निर्माणाधीन है। हरिद्वार सेंटर का निर्माण कार्य अंतिम चरण में है, यह शीघ्र्र शुरू होगा। विभाग राष्ट्रीय पार्कों से पर्यटकों का दवाब कम करने के लिए पार्कों के समीप सफारी की योजना पर विचार कर रही है, ताकि जंगल का जीवन बाधित न हो और पर्यटकों को भी संतुष्टि मिल सके। कालसी से लेकर टनकपुर तक के कोरिडोर में गर्मी के सीजन में जंगली जीवों को पीने के पानी की मुसीबत झेलनी पड़ती है। पानी की तलाश में जानवर आबादी की तरफ आते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष व तस्करी की घटनाएं बढ़ जाती हैं। विभाग इस चुनौती का सामना करने के लिए कोरिडोर 1500 वॉटर होल बनाएगा। यह काम राजाजी पार्क में शुरू हो चुका है, पूरा काम होने में तीन-चार साल लगेंगे। इससे पानी की समस्या पर कम से कम 50 प्रतिशत नियंत्रण हो सकेगा। लोगों का जंगली जीवों के प्रति आक्रोश न बढ़े इसके लिए जानवर द्वारा मारे मृत व्यक्ति के परिजनों को 15 दिन के भीतर मुआवजा देने की योजना है। उसी प्रकार जंगली जीवों से हुए फसलों के नुकसान का मुआवजा भी समय से दे दिया जाएगा। कैंपा फंड से वनकर्मियों के लिए पुलिस लाइन का निर्माण, सीमावर्ती क्षेत्रों में उच्च स्थलीय वन निगरानी चौकियां बनाना, बुगयालों के संरक्षण में 177 करोड़ खर्च करना, वन चौकियों का जीर्णोद्धार करना आदि योजनाएं भी शामिल हैं। विभागीय कर्मचारियों को आपातकाल में सहायता के लिए 11 करोड़ के कॉरपस फंड का गठन किया गया है। इसके ब्याज से कर्मचारियों को लाभ मिलेगा, लेकिन आम आदमी को सीधा लाभ देने वाली कोई भी योजना नदारद है। यह आशंका जताना गलत नहीं कि कैंपा के बाद लोगों पर विभाग का शिकंजा अधिक मजबूती से खिंचेगा। वन प्रधान राज्य के लोगों की यही नियति है।
कुछ जरूरी सवाल
पर्वतीय क्षेत्र में मात्र 7 फीसद भूमि पर कृषि जोत सिमटकर रह गई है। ऐसे में स्थानीय लोगों की वनों पर निर्भरता अत्यधिक है।
रिजर्व वनों के साथ सिविल वनों की भूमि भी विकास कार्यों में गई है, और कैंपा के मुआवजे में इस भूमि का भी धन शामिल है।
राज्य में 12 हजार वन पंचायतें हैं, जो ग्रामीणों की वन चेतना का अनोखा उदाहरण हैं। विभाग को इन वन पंचायतों को मजबूत करने के लिए आर्थिक मदद देनी चाहिए।
पिछले कई सालों से सीजनल फायर वाचर्स का बकाया निस्तारित नहीं हुआ है उसे प्राथमिकता में लाना चाहिए।
जंगली जीवों के हाथों मारे जाने वाले लोगों, घायल लोगों व फसलों को हुए नुकसान का मुआवजा बढ़ाया जाना चाहिए।
ईको टूरिज्म योजना के तहत ग्रामीणों को सब्सिडी पर आधारित लोन देने चाहिए ताकि वे आर्थिक गतिविधि कर सकें।
पर्यटन मार्गों पर स्थित गांवों के लोगों को वुडक्राफ्ट का प्रशिक्षण देकर हैंडीक्राफ्ट उद्योग को बढ़ावा देना चाहिए।
वर्तमान में विभाग में फ्रंटलाइन स्टॉफ यानि फारेस्ट गार्ड की संख्या लगभग ढ़ाई हजार है, इनमें से प्रत्येक को कम से कम 5 हजार हेक्टेअर वन क्षेत्र की रक्षा करनी होती है, जो व्यावहारिक रूप से संभव नहीं। अत: ग्रामीण युवकों से बड़ी मात्रा में भर्तियां होनी चाहिए, ताकि रोजगार के साथ वनों की रक्षा भी हो सके।

देश भर के बर्ड वाचर पहुंचे गढवाल की वादियों में.

यह एक रोचक काम था। चिडिय़ों की आवाज सुनने का, उन्हें करीब से उड़ते देखने का। सचमुच शहरी जीवन की यांत्रिकता से एकदम उलट। कितनी अच्छी थकान। यह उद्गार आईआईटी कानपुर के छात्र अभिनव मलासी व अंशुल शर्मा के थे। वह गढ़वाल की 12 नदी घाटियों में चली तीन दिवसीय ग्रेट हिमालयन बर्ड काउंट के हिस्सा थे। यह अभियान 7, 8 व 9 नवंबर को गढ़वाल की यमुना, टोंस, भागीरथी, भिलंगना, मंदाकिनी, अलकनंदा व गंगा समेत झिलमिल व आसान संरक्षित क्षेत्र में एक साथ चला। देहरादून के पक्षी प्रेमियों की संस्था आर्क की पहल को बाल भवन दिल्ली, वन विभाग, यूकोस्ट व उत्तराखंड टूरिज्म ने सहयोग दिया था। अभियान में भारत में बर्ड वांचिंग के पितामह कहे जाने वाले सालिम अली के सहयोगी रहे बंगलुरु से आए 70 वर्षीय एसए हुसैन थे तो 80 साल पूर्व पूर्ण विलुप्त घोषित जॉर्डन पारसर को दोबारा खोज निकालने वाले पूना से आए डा. भारतभूषण भी थे। अभियान 15 टीमों के माध्यम से चला, प्रत्येक टीम में 5 से 7 सदस्य शामिल थे। उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों के पक्षी प्रेमियों समेत चंडीगढ़, मुंबई, दिल्ली विश्वविद्यालय, सूरत आदि से कुल 112 लोगों ने शिरकत की। उत्तराखंड में पक्षियों की गणना का बेसिक डाटा तैयार करने की महत्वाकांक्षा व वन्यजीवों के प्रति अनुराग पैदा करने के इरादे से की गई यात्रा को प्रदेश के वन मंत्री विशन सिंह चुफाल ने झरी झंडी दी। इस मौके पर उपस्थित उत्तराखंड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के निदेशक डा. राजेन्द्र डोभाल ने युवाओं से कहा यह कसरत उनके जीवन के लिए नए आयाम खोलने वाली साबित होगी। इससे उन्हें पक्षियों से प्रेम तो होगा ही साथ ही यह समझ भी मिलेगी कि प्रकृति की इस अनूठी विरासत को कैसे संहेजा व संरक्षितज किया जाय। आर्क संस्था ने इस क्षेत्र में ग्रेट हिमालय बर्उ काउंट को पिछले साल भी संचालित किया था। पहले प्रयास को प्रकृतिपे्रमियों, स्कूलों के अध्यापकों, वैज्ञानिकों व वन अधिकारियों की विशेष सराहना मिली। संस्था के संयोजक प्रतीक पंवार कहते हैं, बर्ड काउंट सिर्फ चिडिय़ों की संख्या जान लेने का उपक्रम भर नहीं है। हालांकि, आने वाले दिनों में गढ़वाल के साथ, कुमाऊं व फिर उससे अगले क्रम में पूरे हिमालय की पक्षी संपदा का आंकलन करने की योजना है, लेकिन मकसद इससे कही बड़ा है। पंवार बताते हैं हम स्थानीय निवासियों, सरकार व प्रकृति को जानने वालों की मदद से एक बड़ा आन्दोलन खड़ा करना चाहते हैं। महानगरों के बंद व यांत्रिक माहौल में रहने वाली युवा पीढ़ी पक्षियों व अन्य वन्यजीवों से रू-ब-रू हो, साथ ही स्थानीय युवाओं को पर्यटन का एक नया क्षेत्र मिले। पर्यटन सिर्फ हिमालय व वनों का दृश्य भर नहीं है, वह वहां रह रहे हर तरह के जीवन में भी है। अभियान यदि कुछ और बार संचालित हो जाता है तो हम वन्यजीवों व जंगलों की स्थिति पर कुछ ठोस कहने की भी स्थिति में होंगे। कहां चिडिय़ों की तादात ठीक है, और कहां वे कम हो रही हैं। इस सब में चिडिय़ां एक प्रतीक भर हैं, बल्कि उन्हें हमारी संकटग्रस्त जैव विविधता के रूप में देखा जाना चाहिए। निष्कर्ष बाकायदा राज्य व केन्द्र के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को सौंपे जाएंगे। कुल 32 ट्रैकों को नाप कर लौटी टीमों के अनुभव सुनने को बाकायदा अंतिम दिन वन विभाग के दून स्थित मंथन सभागार में मुख्य सूचना आयुक्त डा. आरएस टोलिया, अपर प्रमुख सचिव एनएस नपच्याल, प्रमुख वन संरक्षक डा. आरबीएस रावत समेत बड़ी संख्या में लोग आए। अनुभव मिश्रित थे। कुछ घाटियों में खूब चिडिय़ां व वन्यजीव दिखे तो कुछ क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम। इन अनुभवों को चिडिय़ों की पिछली इंडेक्सिंग से मिलान कर प्रस्तुत किया गया। प्रमुख वन संरक्षक डा. रावत ने कहा उत्तराखंड के वनों में देश में पाई जाने वाली लगभग 630 पक्षी प्रजातियों में से लगभग आधी प्रजातियां पाई जाती हैं। यह हमारे प्रदेश की बहुत बड़ी संपदा है, जिस पर हम गर्व कर सकते हैं। यहां साइवेरिया के चलकर पक्षी आते हैं। ब्राह्मिनी डक जैसे पक्षी तो भरतपुर को छूकर अंतत: यहां एकत्र हो जाते हैं। राज्य के छह राष्ट्रीय पार्क व छह सेन्चुरियां पक्षियों के लिए एक बड़ा आसरा हैं। उन्होंने घरों के आस-पास पाई जाने वाली गौरेया के तेजी से घटती संख्या पर चिंता भी जताई। डा. टोलिया ने कहा युवाओं ने राज्य वन महकमे को रौशनी दिखाने का काम किया है। वास्तव में यह काम वन विभाग का है, लेकिन आने वाले दिनों में जंगलों में काम करने वाले वन रक्षकों को ऐसे अभियानों में शामिल किया जा सकता है। उन्होंने कहा वह पक्षियों के बारे में जानकारी देने वाले सबसे प्रामाणिक स्रोत बन सकते हैं।

आदमी सुरक्षित ना जानवर ये केसा वन प्रबंधन

वन प्रबंधन में फिसड्डी सरकार

वन अधिकारियों की मौज, वन रक्षकों का टोटा

वन प्रधान प्रदेश का हाल बेहाल

नौ सालों में ६०० से अधिक गुलदार, बाघ व हाथी, व ३०० से अधिक लोग मारे गए

वन्य जीव संरक्षण के नाम पर आता है करोड़ों पैसा

नाम मात्र का मुआवजा देता है वन विभाग

दोनों राष्ट्रीय पार्कों पर लगी है तस्करों की नजर

हजारों तस्करी के केस दर्ज

उत्तराखंड राज्य बना तो उत्तरप्रदेश से बेहतर वन प्रबन्धन की आशाएं जगी थी, लेकिन पिछले नौ सालों में जहां बड़ी संख्या में जंगली जानवर मारे गए हैं वहीं जानवरों द्वारा लोगों को मारे जाने की संख्या भी कम नहीं है। वन व वन्य जीव प्रबंधन के नाम पर करोड़ों रूपया पानी की तरह बहाया जा रहा है। जबकि लोगों के हक हकूकों को वन अधिनियम का बुल्डोजर रौंद रहा है। जंगल में लगातार कम हो रहे शिकार व प्राकृतिक संसाधनों के कारण बाघ, तेंदुए, हाथी, व सुअंर समेत अन्य जानवर समीप के खेतों व बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं। और खाली बंजरों में झाडिय़ां उग रही हैं। जिससे आदमी व जानवरों के बीच संघर्ष बढ़ गया है। लोगों को उनके जंगल, पानी व अन्य नागरिक सुविधाओं से वंचित कर बनाए गए सेंचुरी व पार्क भी वन्यजीव प्रबंधन की दृष्टि से असफल ही साबित हुए हैं।लगभग ११ फीसदी वन भूमि पर स्थित छ: पार्क व छ: सेंचुरी अपने उद्देश्य में नाकाम रहे हैं। अगर कार्बेट पार्क को अपवाद मान भी लें तो बाकि के ११ पार्को का रिकार्ड निराशाजनक ही रहा है। यहां पार्क बनने से पहले जानवरों की जो स्थिति थी उसमें खास सुधार नहीं आया है, बलिक कहीं-कहीं तो यह संख्या कम ही हुई है। और यह सब सैकड़ों गांवों को वर्षों तक लकड़ी, पत्ती, औषधि और पानी आदि से वंचित करने के एवज में किया गया है। गोविंद पशु विहार के नाम पर बने पार्क के बीचों-बीच रहने वाले लोग आदिम मनुष्य की जिंदगी जीने को विवश हैं। आजादी के ६० वर्ष से अधक समय बीत जाने पर भी इन गांवों में न बिजली के खंभे लगे हैं न स्कूलों को भवन मिल सके हैं। यहां के ग्रामीण सरकार को यह समझाते-समझाते थक गए हैं कि पार्क सेचुंरी उनके यहां बसने के बहुत बाद आए हैं जबकि वे और उनके पूर्वज पीढिय़ों से जंगलों का हिस्सा रहे हैं। और जंगल उनके अपने हैं। कोई भी वन अधिनियम व कठोर से कठोर कानून जंगलो की उनसे बेहतर सेवा नहीं कर सकते। लेकिन वन विभाग व सरकारों ने लोगों को तमाम सुविधाओं से वंचित रख उनके जातीय उन्मूलन की साजिश रच डाली है. लोगों के लिए आखिरी विकल्प यही बचा है कि या तो वह लोग आत्महत्या करें या इन जंगलों से भागकर कहीं चले जाएं।यही हाल अस्कोट वन्य जीव विहार का भी है। यहां कस्तूरी मृग भी देखने को नहीं मिलते। और आसपास के सैकड़ों गांवों की जिंदगी भी विहार से नर्क बनी हुई है. लोग वर्षों से विहार का श्रेत्रफल कम करने की मांग को लेकर आंदोलनरत रहे हैं। लेकिन उनकी बात की अनदेखी कर क्षेत्र को कम करने की बजाय बढ़ाया जा रहा है। सरकार का पार्क व सेंचुरी क्षेत्रों को संरक्षित करने का एक ही मतलब है कि वहां गरीब व जरूरतमंद आदमी को न घुसने दिया जाय। उसे उन अमीरों व उनकी आने वाली पीढिय़ों की अय्याशी के लिए सुरक्षित रखो जो विभाग की बाघ व गुलदार दिखाने पर पीठ थपथपा सकें। यह क्षेत्र वह इलाके हैं जिन्हें अमीर लोग अपने वातानुकूलित कमरों की जिंदगी में अनुभव नहीं कर पाते हैं। कार्बेट पार्क जिसे देश का सर्वाधिक सफल पार्क होने का श्रेय हासिल है उसके गुनाह भी कम नहीं हैं। कुमांऊ को गढ़वाल व देहरादून से जोडऩे वाली एकमात्र निकटस्थ सड़क पार्क के बीचों बीच से गुजरती है लेकिन वन विभाग व केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय इसी बात के लिए सड़कों से वाहनों की आवाजाही नहीं होने देता कि सड़क से जब अमीरों के शहजादे अपनी खुली जिप्सियों से गुजरेंगे तो जानवरों के भय से मुक्त होकर जंगल का भरपूर मजा उठा पाऐंगे। दूसरी तरफ कार्बेट पार्क की सीमा से लगे नैनीताल व पौड़ी के गांवों में लगातार तेंदुए व सुअंरं की भारी घुसपपैठ चल रही है। दुगड्डा, लैंसडाउन आदि क्षेत्रों में गुलदार द्वारा बच्चों को आंगन से उठा ले जाना आम बात हो गई है। वहीं रामनगर के ढिकुली जैसे गांव विशुद्ध कार्पोरेट संस्कृति का हिस्सा बन रहे हैं। जहां अमीर लोग माफियाओं द्वारा बनाए गए आलिशान होटलों में अय्याशी के लिए डेरे डाले रहते हैं। राजाजी पार्क अपने उत्पाती हाथियों के लिए बदनाम हो चुका है। २५ वर्ष पूर्व बने इस पार्क में हाथियों को बांधकर रखना वन विभाग के बूते की बात नहीं रह गई है। वहीं जंगल के मूल निवासियों को अन्यत्र प्रवासित करने की कहानी भी लंबी हो चुकी है। पार्क की सीमा में रह रहे १०० से अधिक गूजर परिवारों को अभी तक जमीन का टुकड़ा नहीं मिल पाया है। अल्मोड़ा स्थित बिनसर वन्य जीव विहार की स्थापना से ही उसका विरोध शुरू हो गया था। क्योंकि घनी आबादी से लगी सेंचुरी सुअंरबाड़ा बनकर रह गई थी। यहां दूसरे पशु पक्षी तो लगातार कम होते गए लेकिन जंगली सुअंरों की तादाद लगातार बढ़ती रही। परिणामस्वरूप जंगल से लगे गांवों में सुअर खेती तबाह कर रहे हैं। प्रतिवर्ष इनकी संख्या बढ़ते जा रही है। जबकि लोगों को जंगलों से पेयजल लाइन बिछाने, सड़क निकालने, चारा-पत्ती लाने, पर पूर्ण रोक है सिसे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि आप जिस जंगल में रह रहे हैं उसके लाभ लेने के लिए वन विभाग ने आपको प्रतिबंधित कर दिया हो। दूसरी तरफ बाहर से आने वाले अमीर पर्यटकों के लिए काम करने वाली कंपनियों व एनजीओ को वन विभाग ने खुली छूट दे रखी है। वन भूमि पर रेस्त्रा, होटल शिविर लगे हैं, जिससे ये कंपनियां ईको टूरिज्म के नाम पर कमाई करती हैं।नंदा देवी बायोस्फेयर की कहानी कौन नहीं जाता। चमोली के सैकड़ों गांवों ने बायोस्फेअर के खिलाफ छीनो-झपटो आंदोलन चलाया था। इसका यही अर्थ था कि जंगल मूल रूप से हमारा है, जंगल पर अधिकार दर्शाने वाले वन विभाग के कागज मुश्किल से १००-१५० साल पुराने हैं। यहां की लकड़ी, पत्ती, पानी, चारा लेन ेसे हमें कोई नहीं रोक सकता। हालांकि बायोस्फेयर के कई गांवं को सुविधाएं देने के लिए सरकार को मजबूर होना पड़ा था लेकिन अब भी कई गावों को सुविधाएं देने के लिए सरकार को मजबूर होना पड़ा था लेकिन अब ऐसे कई गांव हैं जो कठोर वन अधिनियम के कारण नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। वर्ष २००० से पहले उत्तराखंड के जंगलों में जानवर व उनसे हताहत लोगों का हिसाब किताब बट्टे खाते में जाता था कोई भी घटना विशाल उत्तरप्रदेश में मामूली लगती। राज्य बनने के बाद कई आश्चर्यजनक पहलू सामने आए। राष्ट्ीय बाघ संरक्षण परियोजनाओं के बावजूद छोटे से राज्य में पिछले नौ सालों में ४५ से अधिक बाघ प्राकृतिक दुर्घटना, अवैध शिकार, व अन्य कारणों से मौत तक पहुंच गए।राज्य में कहीं भी पाया जाने वाला बाघ सर्वाधिक खतरे में है। पिछले नौ सालों में ही ४५० गुलदार मारे गए हैं। अब विभाग मिशन टाइगर की तर्ज पर मिशन लैपर्ड की मांग कर रहा है। हाथियों की संख्या भी कम हुई है। इन सालों में लगभग १७० हाथी मारे गए हैं। ऐसे में पार्कों व सेचुरियों का औचित्य सवालों के घेरे में आ गया है। इन्हीं पार्क व सेचुरियों ने राज्य की बड़ी आबादी को नागरिक सुविधाओं से वंचित किया है। बावजूद सिके अगर यह जानवरों को सुरक्षित नहीं रख पाते तो इनकी जरूरत ही कया है। क्या जंगलों व जानवरों की बात वन अधिकारियों को धनकूबेर बनाने के लिए है। आम आदमी तक यह बात कहने लगा है कि वनों को उजाडऩे में सबसे बड़ा हाथ वन विभाग का ही है। इन्हीं सालों में केवल गुलदार के हाथों मारे जाने वाले लोगों की संख्या ३०० का आंकड़ा छूने वाली है। जबकि गंभीर रूप से घायल लोंगों की संख्या इसकी तीन गुनी है। हरिद्वार जिले में हाथियों द्वारा अब तक ५० से अधिक जाने ले ली गई हैं, जबकि गन्ने व धान की फसल को करोड़ों की क्षति पहुंचाई है। पर्वतीय क्षेत्रों में सुअंरों का आतंक सर चढ़कर बोल रहा है। बताया जाता है कि सुअंर अब उन क्षेत्रों तक भी पहुंच गए हैं जहां पहले कभी नहीं हुआ करते थे। जंगली जानवर आपके खेतों में आकर फसल रौंद जाए तो मुआवजा लोने के लिए आपको वर्षों तक वन अधिाकारयिों के दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं। वर्षों की मांग के बाद सुअंरों को मारने की छूट मिली है लेकिन उसे भी सिविल क्षेत्र में स्थानीय अधिकारी की इजाजत के बाद मारना होता है। सोग सुअंरों के आतंक से खेती करना छोड़ रहे हैं। जबकि संरक्षित क्षेत्रों में तस्करों की मौज है। बड़ी संख्या मे बाघ व गुलदार की खालें बरामद हो रही हैं। टस्कर(नर हाथी) के दांत भी सप्लाई होते देखे जा चुके हैं। ऐसा कोई वाकिया नजर नहीं आता जब वन विभाग ने वन तस्करों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की हो। तस्कर जुर्माना देकर छूट जाते हैं। इस सब में वन विभाग बुरी तरह लिप्त है। यदि सेचुंरीयों व पार्कों से विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों को निकाल बाहर करें तो शायद जानवरों की तादाद अपने आप बढऩे लगेगी। वनस्पितयां भी फलेंगी-फूलेंगी। उत्तराखंड की सदियों से चली आ रही वन पंचायतों को रीढ़विहीन करने में वन विभाग का बड़ा हाथ रहा है। १२ हजार से अधिक वन पंचायतों को वन विभाग जंगल का दोस्त मानने की बजाय दुश्मन मानता है। वन पंचायतों की वन प्रबंधन में शानदार भूमिका रही है। लोगों की जगल से लकड़ी, पत्ती लव उसे सुरक्षित करने की वैज्ञानिक प्रणाली है। जिन क्षेत्रों में एक बार पातन हो जाता है उसे फिर कुछ समय के लिए पूर्ण प्रतिबंधित कर देते हैं। उसी प्रकार चीड़ को रोकने के लिए भी लोगों ने बड़े कारगर उपाय किए हैं. वर्षों बाद यदि उत्तराखंड में वानिकी का इतिहास देखें तो रिजर्व व सिविल वन मिश्रित वन हैं। जहां एकल प्रजातियों जैसे चीड़ के लिए बहुत कम स्थान है। इन वनों में जैव विविधता की समृद्धि के साथ जल स्त्रोतों की भी प्रचुरता है। ये वन रिजर्व वनों से अधिक घने हैं। यहां हर आयु वर्ग का पेड़ दिखाई देता है। कभी जब जंगल का अधिक दोहन हो जाय तो गांव वाले कुछ पहल कर इसे सेक्रेच फारेस्ट) बना डालते हैं। वनों को एक निश्चित समय के लिए स्थानीय ग्रामदेवता या श्कति को चढ़ा दिया जाता है। स्वंय की जरूरतों का निषेध करते हुए स्वानुशासन लागू कर वन प्रबंधन की ये पहल बड़ी अनूठी है। इस भावना को वन विभाग लोगों में कभी पैदा नहीं कर सकता। क्योंकि २०० साल पहले अंग्रेजों ने जिस वन प्रबंधन की नींव रखी उसका एक ही मकसद था स्थानीय लोगों को प्रतिबंधित कर जंगल को अपने दोहन व उपयोग के लिए सुरक्षित रखना। वन विभाग आज भी अंग्रेजों के नक्शे कदम पर चल रहा है, परिणामस्वरूप उसके जंगल विरल होते जा रहे हैं। उनमें एख प्रजातियों व बढ़े पेड़ों का दबदबा बढ़ रहा है। पार्क वाले कुछ हिस्सों को छोड़ दें तो जानवरों का यहाम से बाहर को पलायन हो रहा है। क्योंकि वन विभाग ने कभी पारिस्थितीय संतुलन की बात पर विचार नहीं किया। जबकि वन अनुसंधान संस्थान, भारतीय वन्यजीव संस्थान जैसे विश्वविख्यात संस्थान उत्तराखंड में स्थित हैं। इनका लाभ राज्य के वन्य जीव संस्थान उत्तराखंड में स्थित हैं। इनका लाभ राज्य के वन विभाग ने नहीं लिया। प्रतिवर्ष रिजर्व वनों में घनघोर आग की लपटें उठती हैं। स्थानीय ग्रामीणों का वनट विभाग से मोहभंग व अलगाव हो से वे इन लपटों को शांत करने नहीं आते। बल्कि कभी तो उनको अपनी इच्छा इसलिए दबानी पड़ती है कि वहां आग बुझाने पहुंचे तो पता लगा वनकर्मियों ने उन्हें आग लगाने वाला बताकर धक लिया। ऐसा कई बार हुआ है। बताया जाता है कि वन विभाग के कर्मचारियों व वन माफिया की मिलीभगत से रिजर्व वनों में आग लगती है। इससे लकड़ी के अवैध कारोबार को ढ़कने व वन्यजीवों मे भगदड़ पैदा करने में मदद मिलती है। अवैध कटे पेड़ों के ठूंठों को जलाकर उन्हें वनाग्नि का परिणाम बता दिया जाता है। यह वर्षों पुरानी जुगलबंदी है। आग सिविल वनों में भी लगती है लेकिन लोग अपने जंगलों की आग खुद बुझा लेते हैं। २००९ की प्रचंड वनाग्नि के समय पौड़ी के गंगवााड़ा में तो ७ लोगों ने अपने जंगल बचाने के लिए लपटों से जूझते हुए जान तक दे डाली। सिविल वनों में आग से जूझते हुए लगबग २० लोग इस साल शहीद हो गए। वहीं वन विभाग वनाग्नि पर राष्ट्रीय- अंतराष्ट्रीय सेमिनार करता रहा। कई वनाधिकारियों ने तो बाकायदा वनाग्नि पर फंडिंग एजेंसियों से भारी बरकम प्रोजेक्ट ले रखे हैं। अधिकारी जंगल में आग बुझाने नहीं प्रोजेक्ट की स्लाडि बनाने के लिए फील्ड पर जाते हैं. ताकि अपने दानदाताओं को गंभीर समस्या के प्रति अपना समपर्ण दिखा सकें। उत्तरप्रदेश के समय तो जो था सो था। राज्य बने के इतने साल बाद वन विभाग के पास ऐसा कोई मैकैन्जिम नहीं है जिससे पता चल सके वनाग्नि से कितनी वनस्पित व छोटे जीव जंतुओं को नुकसान पहुंचा। जबकि आग से रेंगने वाले जतुंओं को भारी नुकसान होता है। यह जानने का भी कोई उपाय नहीं है कि आग का जल स्त्रोतों पर कैसा व कितना प्रभाव पड़ रहा है। राजाजी पार्क में पिछले दिनों बोरिंग खोदकर जानवरों को पानी पिलाने की व्यवस्था करनी पड़ी। कई क्षएत्रों में जल स्ज्ञोत न होने से बाहर से पानी के टैकर भेजने पड़े। वन विभाग द्वारा प्रतिवर्ष कराए जाने वाले वृक्षारोपण अभियानों की कहानी भी बड़ी हास्यास्पद है। बताया जाता है कि उत्तराखंड में अब कहीं भी पेड़ लगाने जगह नहीं बची है। लेकिन पेड़ लगातार लग रहे हैं। इसमें करोड़ों के वारे न्यारे होते हैं। वन विभाग के साथ सैकड़ों की तादाद में सक्रिय एनजीओ भी इस गंगा में हाथ धो रहे हैं। सच्चाई यह है कि शहरी क्षेत्रों में पेड़ों के अंधादुंध कटान हो रहा है। देहरादून, हल्द्वानीउधमसिंहनगर आदि में तो स्थानीय डीएफओ घूस लेकर पेड़ काटने की इजाजत देते हैं। लोग आवासीय व व्यवसायिक निर्माणों के लिए पेड़ काट लेते हैं। सिके एवज में मामूली मुआवजा जमा कर देत ेहैं। यह खे तरह का फैशन चल पड़ा है कि लोग पहले पेड़ काट लेते हैं फ्रि पैसा जमा करा देते हैं। वन अधिकरियों के मुंह पर मलाई लहग चुकी है। अब तक कार्बेट पार्क के अलावा कोई भई पार्क पूर्ण नहीं है। ये पार्क तब तक प्रस्तावित पार्क की श्रेणी में नहीं आते जब तक यहां रह रहे लोगों का मानवीय पुनर्वास या को ईन्यायपूर्ण व्यवस्था कायम नहीं की जाती।कार्बेट की स्थापना १९३६ में हुई थी। जबकि १९५५ में गोविंद पशु विहार की स्थापना के बाद १९७२ में केदारनाथ वन्यजीव विहार और तब से अब तक नौ और पार्क स्थआपित किए गए हैं। लेकिन किसी का भी नोटिफिकेशन नहीं हो पाया है। इसका कारण यह है कि निर्माण व विस्थापन कार्यों के लिे आने वाले पैसे की बंदरबांट। वन अधिकारी चाहते हैं कि पार्क व सेंचुरी निर्माणाधीन ही रहे । यदि कोई स्थाई व्यवस्था कायम हो गई तो उनका खाना कमाना इतना आसान नहीं रहा जाएगा। इसी से राज्य वन प्रबंधन की पोल खुल जाती है। वन संपदा को चूस रहे हैं अधिकारीहाल ही में विभाग के शीर्षस्थ अधिकारी के रूप में एक और प्रमुख वन संरक्षक के पद को मान्यता दी गई है। अब प्रमुख वन्यजीव प्रतिपालक प्रमुख वन संरक्षक (वन्य जीव) कहलाएंगेंविभाग में पहले से एक शीर्षस्थ प्रमुख वन संरक्षक तैनात है। वेतन के हिसाब से इस अधिकारी यानि मुख्य सचिव को हासिल है। इनका मासिक वेतन एक लाख प्रतिमाह से ऊपर है। इसके साथ ही उनको आवास, ड्राईवर, गार्ड, चौकीदार , माली, चपरासी आदि की सुविधाएं भी हासिल हैं। विभाग में अपर प्रमुख वन संरक्षक, मुख्य वन संरक्षक, वन संरक्षक, निदेशक , उपदिेशक वन वर्धनिक,वाइल्ड लाइफ वार्डन व सैकड़ों प्रभागीय वन अधिकारियों के लगभग १२०पद सृजित हैं। इन पर विभाग की आय समेत सरकारी बजट का बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है। जबकि इनकी उत्पादकता वन संरक्षण व वन्य जीवों के हिसाब से कुछ भी नहीं है। बताया जाता है कि एक प्रमुख संरक्षक के बदले १० फारेस्ट गार्ड, एक अपर प्रमुख वन संरक्षक के बदले ८ गार्ड व प्रभागीय वनाधिकारियों के बदले ६ गार्ड रखे जा सकते हैं। जो सीधे-सीधे वन संरक्षण के कायो4ं से जोड़े जा सकते हैं। वन अधिकारी कभी भी पेड़ को नहीं छूते, नही जंगली जानवरों के बारे में कोई व्यवहारिक ज्ञान होता है। वह तो महीने दो महीने में सरकारी गाड़ी से वनों का एख दौरा कर आते हैं और कभी-कभी तो यह दौरे छ: महीने या साल भर में भी नहीं हो पाते। वन विभाग की वास्तव में सेवा करने वाले ३५०० वन रक्षकों की हालत दयनीय बनी हुई है। वन विभाग के जंगलों के अंदर प्रतिनिधित्व करने वाले ये कर्मचारी समाज से अलग-थलग रहकर अपना पूरा जीवन वनों को समर्पित कर देते हैं। लेकिन सुविधा के नाम पर विभाग इनको एख डंडा तक नहीं देता। हालांकि वन रक्षकों को वर्दी, कंबल, टार्च, फस्र्ट ेड किट आदि दिए जाने का प्रावधान है। लेकिन अधिकारी इसमें भी गोलमाल कर जाते हैं। अंग्रेजों के जमाने में जो वन चौकियां बनी थी उनकी हालत अतयंत जर्जर बनी हुई है। इनकी छतें टपकती हैं व इनमें पानी बिजली की सुविधा नहीं है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में काम करने वाले वन रक्षकों की सेवाएं फौड की सेवाओं से कम नहीं होती। बल्कि नेपालव चीन सीमा के सीमांत जंगलों में तैनात वन रक्षक अकेले सेना की टुकड़ी के बराबर काम करते हैं। कई बार तो वर्ष में एख या दो बार घर आना तक दुश्वार हो जाता है। क्योंकि विभाग में रिलीवर देने के लिए स्टाफ की कमी है। औ्र यदि उसके छुट्टी में रहने के दौरान वन तस्करी की कोई घटना होती हौ तो इसका जिम्मेदारउसे ही मान जाता है। यह विभागीय प्रावधान इससे वन अधिकारियों के वन प्रबंधन की संवेदनहीनता प्रदर्शित होती है। एक न रक्षक को साल में जितनी तनख्वाह नहीं मिलती है अधिकारी उतना पैसा एक मीटिंग के बहाने उड़ा जाते हैं। अधिकारियों के राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय सेमिनारों में आने वाले खर्च की बात करना तो फिजूल है। प्रमुख वन संरक्षक अपना र्काभार ग्रहण करने के बाद कम से कम १० विदेशी दौरे कर चुके हैं और उनके मातहत अधिकारी वफादारी से उनका अनुकरण कर रहे हैं।

बीमार अस्पताल बेहाल मरीज

खास् के लिया तमाम सुविधा आम के लिए सिर्फ दुविधा

डाक्टरी पेशा व्यापार बन चुका है यहां भी अब 'पैसा दो और इलाज कराओ की स्थिति आ गई है। यह बात हर किसी की जुबान से सरेआम सुनी जा सकती है। लेकिन व्यापार के भी कुछ कायदे कानून होते हैं, गुणवत्ता का पैमाना होता है, उपभोग की वस्तुओं के निश्चित दाम होते हैं लेकिन चिकित्सा जगत में सब कुछ अनिश्चितताओं से भरा है। मरीज जो कि सिर्फ एक ग्राहक बन गए हैं, उनको किसी एक उपचार के लिए 3000 फीस देनी होगी या 30 हजार इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। डॉक्टर कोई भी कीमत मांग सकता है। भगवान का दूसरा रूप कहा जाने वाला डॉक्टर अब कसाई बन चुका है। चिकित्सा का व्यापार इतना रहस्यमय, अनिश्चित व खतरों भरा है कि इसके शर्मनाक ढंग से ठगे जाने के बावजूद भी उपभोक्ता शिकायत करने तक कि हिम्मत नहीं कर पाता। चिकित्सा के खुले बाजार में आम आदमी असहाय लाचार व बेबस हो चुका है। आज चिकित्सा क्षेत्र पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण से मुक्त होकर बाजार की तरफ बढ़ रहा है। व्यवस्था के रूप में सरकार और जिम्मेदारी के रूप में डाक्टर अपनी जिम्मेदारियों से हाथ पीछे खींच रहे हैं। पिछले कुछ सालों में सार्वजनिक चिकित्सा क्षेत्र का तेजी से पतन हुआ है। जिसे कुंद करने में चिकित्सकों का ही हाथ है। सच्चाई ये है कि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सक सिर्फ अपनी मार्केटिंग करने आते हैं। बल्कि असली प्रैक्टिस वे अपने निजी क्लीनिकों या फिर किसी प्राईवेट अस्पताल में कर रहे हैं। आदमी की जिंदगी से जुड़े इस पेशे को लोभ और संवेदनहीनता ने बुरी तरह जकड़ लिया है। 'तंदुरूस्ती हजार नियामतÓ यही आम आदमी की मजबूरी है, जिसे डॅाक्टर भुना कर खा रहे हैं कोर्ई आदमी नहीं चाहता कि वह अपने परिजन की जान की कीमत पर पैसे को तवज्जो दे। यहां तक कि लोग लोन लेते हैं, कर्ज उठाते हैं, जेवर बेच देते हैं, इनकी वर्षों की कमाई खातों से रीत जाती है, लेकिन एक डॉक्टर के लिए यह नितांत पेशेवर मामला है। पूरे प्रदेश के जिला, बेस व महिला अस्पतालों का अगर जायजा लें तो यही बात समझ में आ रही है कि यह अस्पताल मरीजों के लिए नर्क बन चुके हैं। पेश है एक रपट राज्य के सबसे बड़े अस्पताल देहरादून की। यहां बात प्रदेश के सुदूर क्षेत्रों में स्थित प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों की नहीं है, जहां डॉक्टर, दवाई, भवन, आधारभूत ढांचा या किसी न किसी चीज का अभाव है ही। बल्कि राजधानी देहरादून की है जहां 70 विधायकों वाली विधानसभा है, जहां मुख्यमंत्री, राज्यपाल व पुलिस के आला अधिकारी बैठते हैं। जहां स्वास्थ्य निदेशालय है। जहां स्वास्थ्य के नाम पर बड़ी बड़ी घोषणाएं होती हैं। जहां जनकल्याणकारी नीतियों के आदमकद होर्डिंग लगे हैं। जहां स्वास्थ्य मंत्री हर दूसरे दिन प्रेस वार्ताएं करते हैं, जहां डाक्टरों का सबसे बड़ा कुनबा है। जहां स्वास्थ्य पर काम करने वाली सैकड़ों स्वयंसेवी संस्थाएं खा-कमा रही हैं और जहां सबसे अधिक मेडीकल कॉलेज हैं।

बीपीएल कार्ड धारक मरीजों के लिए भी राहत

बीपीएल मरीजों के प्रति डॉक्टरों व नर्सों में घनघोर उपेक्षा का भाव है। जब कोई मरीज बताता है कि वह बीपीएल कैटेगरी का है तो डाक्टर मुंह बिचका देते हैं। कई बीपीएल कार्डधारी मरीज तो अपनी पहचान तक छुपा रहे हैं। इसके एवज में उन्हें सरकार द्वारा दी जाने वाली मुफ्त सुविधाएं त्यागनी पड़ती है। किसी तरह मरीज ठीक हो जाए तथा डॉक्टर उनकी उपेक्षा ना करें इसीलिए वे सामान्य मरीज के रूप में भर्ती हो रहे हैं। बात वही है कि गरीब व्यक्ति भी अपने सही ईलाज का आश्वासन चाहता है। सरकारी योजनाओं पर उसका भरोसा नहीं है। जिन बीपीएल मरीजों का उपचार चल रहा है उन्हें नहीं पता कि उनको देखने डॉक्टर साहब फिर कब आएंगे। ये मरीज एक अंधविश्वास या मजबूरी के शिकार हैं और इनके पास सरकारी अस्पताल के अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं है। भर्ती होने के बाद लंबा समय अस्पताल में गुजार लेने के बाद भी न तो उन्हें उनकी बिमारी बतायी जाती है और ना ही ऑपरेशन की कोई डेट दी जाती है और यह भी निश्चित नहीं होता कि दवाईयां सरकार से मिलेंगी या खरीदनी होंगी। सरकार अपनी योजनाओं में बीपीएल मरीजों के लिए मुफ्त चिकित्सा सुविधा की बात कितनी ही करते रहें पर व्यवहार में अपनी जान बचाने के लिए इन मरीजों को रत्ती-रत्ती निचोड़ कर रकम अदा करनी पड़ रही है। न तो इन्हें अस्पताल से दवाईयां मिल रही हैं और न ही ऑपरेशन संबंधी उपकरण। डॉक्टर मरीजों व सरकार को खुले आम अंगूठा दिखा रहे हैं। दून में वीआईपी को छोड़कर जो भी मरीज आते हैं वह उस तबके से होते हैं जो प्राइवेट क्लीनिकों में इलाज कराने में अक्षम होते हैं। वो बात अलग है कि उनमें से कईयों के पास बीपीएल कार्ड नहीं होता। यह तो इस व्यवस्था की खासियत ही है कि जरूरतमंदों का हिस्सा और लोग डकार जाते हैं।

दवा कंपनियों व पैथोलॉजी से है डाक्टरों की गहरी सांठगांठ

शहर के बड़े बड़े मेडिकल स्टोर व पैथोलाजी सेंटर आज डॉक्टरों की ऊपरी कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन गए है। अलग-अलग बहानों से डॉक्टर मरीज को पैथोलॉजी व मेडिकल स्टोरों तक भेजते हैं, जिसके एवज में मेडिकल स्टोर या वह पैथोलॉजी क्लीनिक पूरी ईमानदारी से पूरे दिन भर का कमीशन शाम को उस डाक्टर के घर पहुंचा जाते हैं। यानी की बेईमानी का यह पूरा खेल बड़ी ही ईमानदारी से खेला जाता है। मरीज की नजर में अच्छा बनने के लिए डॉक्टर के पास बीसियों बहाने होते हैं। खुद डॉक्टर सरकारी अस्पतालों की लापरवाहियों की दलील देते हुए उन्हें प्राईवेट में जाने के लिए सलाह देते दिखाई देते हैं फिर सेकेंडरी ओपिनियन लेने के बहाने उन्हें प्राईवेट पैथोलॉजी में भेजते हंै। जिस अस्पताल में तीन-तीन रेडियोलॉजिस्ट हों, 3-3 पैथोलॉजिस्ट हों, वहां सेकेंडरी ओपिनियन के लिए मरीजों को प्राईवेट में भेजना कितना सही है, इस कमीशन के लालच से अगर डॉक्टर दूर हो जाएं तो वह सेकेंडरी क्या अपने ही अस्पताल के तीन तीन पैथोलाजी रेडियोलाजी एक्सपर्टस् से एक्सरे, अल्ट्रासाउंड या फिर किसी भी टेस्ट की जांच कराकर उसकी बिमारी को पुख्ता कर सकते हैं। पहले तो डॉक्टर मरीजों के लिए अनावश्यक टेस्ट लिखते हैं। जो टेस्ट दून अस्पताल में मौजूद हैं उन्हें भी बाहर से कराने के लिए भेज दिया जाता है। एमरजेंसी में आने वाले अधिकांश मरीजों को बाहर ही टेस्ट के लिए भेजा जाता है। डाक्टरों को केवल जेनेरिक दवाईयां ही लिखने का प्रावधान होता है पर खुले आम मरीजों की पर्चियों में एथिकल दवाईयां लिखी देखी जा सकती हैं, या फिर किसी कंपनी विशेष की दवा सुझाने पर डॉक्टरों को अब आकर्षक गिफ्ट मिल रहे हैं। दून में एमआरआई मशीन का अभी संचालन न होने से डॉक्टर एमआरआई टेस्ट को रेफर करके मोटा कमीशन कमाते हैं।

नॉन प्रैक्टिस का पैसा लेते हैं और प्रैक्टिस भी करते हैं

।डॉक्टर सरकारी अस्पतालों में पूरे मनोयोग से मरीजों का इलाज करें इसके लिए उन्हें खाली समय में नॉन प्रैक्टिस के लिए अतिरिक्त भत्ता देने का प्रावधान किया गया लेकिन अधिकांश डॉक्टर चित भी मेरी पट भी मेरी का नियम बनाए हुए हैं। प्रत्येक चिकित्सक को वरिष्ठता के आधार पर 2400 से 5400 तक नॉन प्रैक्टिस अलाउंस मिलता है डॉक्टर इसे तो ले ही लेते हैं साथ में घर में सरकारी आवास में क्लीनिकों व निजी चिकित्सालयों में भी अपनी सेवाएं बेचते हैं। जहां से उन्हें प्रतिमाह हजारों की आमदनी होती है। निजी प्रैक्टिस का नुकसान यह होता है कि कि ये अन्तत: सरकारी अस्पताल के सामान्य मरीजों की अनदेखी करते हैं तथा उपचार में लापरवाही बरतते हैं। चिकित्सकों को 30 हजार से लेकर डेढ़ लाख तक का सैलरी पैकेज मिलता है। इसके अलावा आवासीय सुविधा, यात्रा, स्वंय की चिकित्सा, दवाओं आदि का पूरा लाभ सरकार देती है। बावजूद इसके आधे से ज्यादा चिकित्सक निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं। उन्हें अगर दून अस्पताल में ढूंढे तो वह वहां तो नहीं पर सीएमआई, महंत इन्द्रेश से लेकर शहर के नामी प्राईवेट संस्थानों में पाए जाएंगे। कुछ चिकित्सक 2 लाख से अधिक प्रतिमाह आमद कर रहे हैं। एक बार हाथ में आया पैसा उन्हें और पैसा कमाने को लालायित करता है। इस होड़ में डॉक्टर इस पेशे की मूल आत्मा से भटककर सिर्फ पैसों तक सिमट गए हैं। अब डॉक्टरी की डिग्री लेने वाले डॉक्टर पैसे कमाने के मकसद से ही डॉक्टरी कर रहे हैं। आज से दस साल पहले जब कोई युवा डॉक्टर बनने की चाह से प्रशिक्षण लेता था तो उसके अंदर ढेरों आदर्श होते थे। वह सोचता था कि यह पेशा मानव जाति की सेवा का सबसे अच्छा तरीका है। आज इसीलिए इस पेशे में कोई आता है क्योंकि आम आदमी के लिए अज्ञानता से भरे इस पेशे में खूब मोटी कमाई है। आज वह धीरे धीरे पैसों की अंधी दौड़ में शामिल होता जा रहा है। अधिक से अधिक कमाना ही उसकी फितरत हो गयी है। मरीज के चेहरे मोहरे को देखकर उसकी भाषा बनती है। अधिक कमाने की होड़ में वह व्यक्तिवादी व संवेदनहीन होता जा रहा है। अपने थोड़े से लाभ के लिए दवा कंपनियों को प्रोत्साहन देता है जो उसे खूबसूरत गिफ्ट देते हैं ।आज के अधिकांश डाक्टरों की आंखों पर ऐसी पट्टी बंध चुकी है कि वह एक रोबोट की तरह मशीनीकृत हो चुके हैं। नगरों में अधिकांश ऐसे डाक्टर हैं जो प्राइवेट क्लीनिक में गर्भ की जांच से लेकर भ्रूण हत्या तक के मामलों में सक्रिय रूप से लिप्त हैं। बीमारी की पड़ताल कर इलाज सुझाना अब डाक्टरों का काम नहीं रह गया है। खोखले साबित हो रहे हैं सरकारी दावेक्षेत्रीय अस्पतालों को मजबूत करने का सरकार का दावा भी दून में लगातार बढ़ रही भीड़ को देखकर दम तोड़ता दिखाई दे रहा है। प्रदेश का सबसे बड़ा अस्पताल किस मायने में बड़ा है यह समझ नहीं आता, क्योंकि यहां पर मात्र पथरी से लेकर हार्निया ऐपेंडिक्स(आंत का बढ़ जाना) जैसे छोटे-छोटे आपरेशन ही होते हैं बड़ी बीमारियों के लिए यहां से भी दिल्ली या फिर कहीं अन्य शहरों में ही रेफर किया जाता है। अगर मरीजों की संख्या की बात करें तो गढ़वाल, हरिद्वार व आसपास के क्षेत्रों के वह मरीज यहां आते हैं जिन्हें अपने अपने स्थानों पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती है। पहाड़ से भी अधिकंाश लोग इसी उम्मीद से आते हैं कि दून में अच्छा इलाज मिलेगा। ऐसे में दून अस्पताल की जिम्मेदारी एक बहुत बड़े क्षेत्र के लिए बन जाती है। लेकिन दून अस्पताल का बड़प्पन मरीजों को निराश करने वाला है। बड़ा होने का मतलब अधिक चिकित्सक, सस्ती सुविधाएं, पर्याप्त बैड, व गंभीर बीमारियों के इलाज व ऑपरेशन की सुविधाओं से होता तो कितना सुखद होता। अस्पताल प्रशासन से मरीजों को निजी में अन्यत्र चिकित्सालयों में रेफर करने का उत्पीड़क जवाब होता है। दूर दराज से आने वाले मरीजों के तीमारदारों के लिए अस्पताल में ठहरने की कोई सुविधा नहीं है। गरीब लोगों को या तो धर्मशालाओं या फिर होटलों की खाक छाननी पड़ती है अन्यथा अस्पताल के फर्श में ही आसियाना तलाशना पड़ता है। सरकार तर्क देती है कि परिजनों को मरीज के साथ रहने की जरूरत नहीं है हमारी नर्सें हैं उसके लिए। लेकिन क्या काम के अत्यधिक बोझ के मारे संवेदनहीन सी हो गई इन नर्सों के भरोसे गंभीर मरीजों को छोड़ा जा सकता है? जो प्रत्येक मरीज की सभी छोटी-बड़ी दिक्कतों पर ध्यान देने के लिए कतई नाकाफी हैं। इसलिए वह अपनी जिम्मेदारी डॉक्टर द्वारा लिख दिए ट्रीटमेंट को मशीनी अंदाज में पूरा करना देना भर समझती हैं। प्रावधान है कि 10 मरीजों पर 1 नर्स का होना आवश्यक है पर यहां तो 40-40 मरीजों तक का जिम्मा 2 नर्सों पर टिका है। अब तो नर्सों के भी उतने ही दर्शन होते हैं जितना कि डाक्टरों के।
सुपर स्पेस्लिस्ट सुपर फ्लॉप दून की चिकित्सा सुविधा को बेहतर बनाने के लिए, सरकार ने अस्पताल में डाक्टरों के अलावा 9 सुपर स्पेस्लिस्ट डॉक्टर तैनात किए हैं। अनुभवी चिकित्सकों को कॉनट्रेक्ट बेस पर भारी पैकेज दिया जा रहा है। इन्हें अस्पताल में आए जटिल केसों को निपटाने के लिए रखा गया है पर व्यवहार में ये सुपर स्पेस्लिस्ट अस्पताल के बजट की मलाई तो चाट ही रहे हैं, साथ ही उन्होंने इसे अपनी अतिरिक्त कमाई का शानदार जरिया बना रखा है। यहां से वह मरीजों को बड़े पैमाने पर टेस्टों और पूरे ईलाज के लिए बाहर रेफर कर रहे हैं। अस्पताल की सेवाओं में इनका काम नगण्य है। मोटी रकम लेनेे के बावजूद इनके उदासीन होने के एक कारण यह भी है कि अस्पताल में उस श्रेणी की तकनीक व आपरेशन थिएटर उपलब्ध ही नहीं है, जो इनका फील्ड है।
एमरजेंसी सुविधाओं का नितांत अभाव स्टाफ की कमी से जूझ रहे दून अस्पताल का सबसे बुरा प्रभाव एमरजेंसी व्यवस्था पर पड़ रहा है। मरीजों की संख्या के हिसाब से जहां पर चार आकस्मिक चिकित्सा अधिकारी होने चाहिए थे वहां पर मात्र एक है, और उसी अनुपात में नर्स व वार्ड ब्वाय। जिसका सारा खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ता है। दून अस्पताल में हमेशा ही एमरजेंसी मरीजों का तांता लगा रहता है। बैडों के अभाव में मरीजों के साथ बुरा सलूक किया जाता है उनकी एडमिट पर्ची काट दी जाती है और परिजनों से कहा जाता है कि देख के आओ कोई बैड खाली होगा तो देखेंगे। जो मरीज भरती भी होते हैं वह डॉक्टर व स्टाफ की कमी के कारण लंबे समय तक ईलाज से वंचित रहते हैं ऐेसेे कई केस हैं जिनमें सुबह 8बजे से भरती मरीज को शाम के 2 बजे तक कोई प्राथमिक उपचार ही नहीं मिलता। इससे साफ जाहिर है कि एमरजेंसी के नाम पर आप मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
कितने बेवश हैं मरीज

सरकारी अस्पतालों में मरीज खुद को कितना असहाय व बेवश पाता है इसकी कुछ बानगी दून अस्पताल में देखिए। और यह भी अनुमान लगाइए कि अगर प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल में यह स्थिति है, तो शेष जनपद के अस्पतालों के क्या हाल होंगे?चमोली से आई बीपीएल कार्ड धारक 50 वर्षीय उमा नेगी को चट्टान से गिरने के कारण पैर में दिक्कत आ गई। श्रीनगर में इलाज चला, पर डाक्टर की लापरवाही से आपरेशन बिगड़ गया। तब भी 17,500 की रॉड व सारी दवाईयां बाहर से ही मंगाई थी। यहां दून में आने पर पता लगा कि हड्डी गल चुकी है दुबारा आपरेशन होगा। दूसरी बार 10,000 की रॉड सहित सारी दवाइयाों के लिए बाहर ही जाना पड़ा। कहती हैं यहां व्यवस्थाएं बहुत बुरी हैं। तीन दिन से टॉयलेट साफ नहीं किया है। हड्डी फैक्चर वाले जितने भी मरीज हैं उनको बहुत दिक्कत हो रही है। इतनी गदंगी है कि लोग पैसा देकर प्राइवेट में जा रहे हैं। जीएमएस रोड निवासी रहमान के पैर से मांस गायब है उसके पैर की सर्जरी होनी है पर डॉक्टर महाशय ने 15 दिन से उसकी कोई सुध नहीं ली है। और न ही उसे सर्जरी के डेट दी जा रही है। पिछले डेढ़ महीने से वह यहां पर एडमिट हैं। कहते हैं कि हड्डी वाले मरीजों को बहुत समस्याओं का सामना करना पडता है। अधिकांश के पैर फैक्चर होने के कारण टायलेट में बैठने में दिक्कत होती है। उनके लिए वेस्टर्न टायलट होना चाहिए। नवादा देहरादून से आए बीपीएल कार्डधारक युसूफ का पांव फैक्चर हो गया था। आपरेशन हुआ रॉड डाली गई। 350 डाक्टरीफीस लगी व बाकी के 5500 रूपये लगे। भटवाड़ी उत्तरकाशी से आया 12 वर्षीय शिवम भी अब डाक्टरों की चालाकी समझ चुका है। कहता है कि डाक्टर ने एडमिट किया और कहा कि आठवें दिन आपरेशन होगा लेकिन आठवें दिन असमर्थता जताते हुए हमें कहीं और चले जाने को कहा। तब पापा ने दूसरे डॉक्टरों की खुशामद की। उन्होंने 5000 रूपये मांगे अभी हमने 3000 ही दिए हैं अब कल को मेरे हाथ का आपरेशन होना है। नेपाली मूल का एक मजदूर 3 साल पहले लगी रॉड खुलवाने दून आया तो डॉक्टरों ने उसे एडमिट किया चीर फाड़ की 2200 रूपये का खर्चा आया और अंत में यह कह दिया कि प्लेटें निकल नहीं रही हैं निकल लो यहां से कहीं और से करवा लो। हरिद्वार में दर्जी का काम करने वाले नसीम को फेफड़ों में पानी भरने की शिकायत है। इसी बीमारी से संबंिधत डॉक्टर महाशय ने दून में मौजूद छोटे-छोटे 13 टेस्टों के लिए गांधी रोड स्थित डा. रेनू गोयल के वहां रेफर कर दिया जिसमें कि उस मरीज के 1750 रूपय लगे। चमोली से आई कुसुम देवी जो कि बीपीएल कार्ड धारक हैं का यूटरस का आपरेशन हुआ। एक एक्सरे के अलावा सारे टेस्ट प्राईवेट में शालिनी शूरी के वहां को रेफर कर दिए गए। कुसुम देवी से जब डाक्टर के बताए पैथॉलाजी लैब तक चला न गया तो उनके पति ने रास्ते में पडऩे वाले अशोक एक्सरे कलर लैब से ही वो टेस्ट करा लिए। तब यूटरस का आपरेशन करने वाले डॉ. महाशय ने उन्हें खूब लताड़ा । मरीज के कहने पर कि साहब पता नहीं चला कि वह लैब कहां पर है तब डाक्टर महाशय उन्हें जवाब देते हैं कि शराब की दुकान तो बड़ी जल्दी पता चल जाती है। दरअसल शालिनी शूरी के वहां से मिलने वाले उस मोटे कमीशन से हाथ धो लेनेे के कारण डा. साहब की यह मनोदशा हो गई थी। कमीशन खाने के कई तरीके डॉक्टरों ने ईजाद किए हैं। एक डॉक्टर के छुट्टी में चले जाने से दूसरे डॉक्टर द्वारा मरीज से दोबारा सारे टेस्ट कराए जाते हैं। टॉयलट भी पीपीपी मोड मेंटॉयलेट जैसे जरूरतमंद प्रसाधन भी सरकार देने में आज सक्षम नहीं है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है दून अस्पताल के अंदर टॉयलट को पीपीपी(पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप) मोड़ में देना। जिससे ठेकेदार सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर से लाभ कमा रहे हैं और मरीज अपने इस लोकतंात्रित देश में पैदा होने का रोना रो रहे हैं। सरकारी अस्पताल का कथित शौचालय तो हमेशा ऐसी हालत में रहता है कि मरीज ज्यादा बीमार हो जाए। सवाल ये है कि शौचालय जैसी जरूरी सेवाएं भी सरकारी नियंत्रण में क्यों नहीं चल सकती। कुछ साल पहले पीपीपी मोड जैसी बात नहीं थी सरकारी व्यवस्था में लापरवाही होने पर लोग उसकी शिकायत कर सकते थे लेकिन सरकार ने सेवाएं दुरस्त करने के बजाय उस क्षेत्र को ठेके में देने का विकल्प चुन लिया है।
क्यों चिड़चिड़ी हैं नर्सें

एक नर्स मदर टेरेसा थी जो अपने जीवन का सब कुछ निकृष्टम माने जाने वाले रोगियों को समर्पित कर चुकी थी। यह टेरेसा का आंतरिक समर्पण व विश्वास था कि उसे जीवन की संतुष्टि इसी सेवा भाव से मिल सकती थी। लेकिन दून अस्पताल की चिडचिड़ी नर्सें सेवा के लिए नहीं नौकरी के लिए आई हैं। हालांकि ट्रेनिंग के दौरान नर्सों को मरीजों के साथ संवेदनशीलता व भावना के साथ पेश आने की शिक्षा दी जाती है। लेकिन सरकारी नौकरी हाथ लगते ही सारी शिक्षा उनके जेहन से रफू हो जाती है। इस अस्पताल की 70 नसों में से शायद ही एक आध मिले जिनके बारे में मरीज कह सकें कि इस नर्स का व्यवहार अच्छा हैं। डाक्टरों की देखादेखी नर्सें भी सरकारी तनख्वाह के अलावा एकस्ट्रा आमद चाहती हैं। कुछ नर्सों के हाथ में नोट चेप दो तो उस मरीज की अच्छी खासी मेजबानी हो जाएगी। नर्सों को बीपीएल मरीज तो फूटी आंख नहीं सुहाते। क्योंकि उन्हें लगता है कि इन फटेहाल लोगों से कुछ नहीं निकलेगा। हालांकि सिक्के का दूसरा पहलू भी है जो नर्सों को चिड़चिड़ापन व भ्रष्ट बनाने में मददगार है वह है इनकी संख्या। दरअसल 300 बैडों वाले इस अस्पताल में मात्र 20 सिस्टर व 50 नर्सें हैं। जिस कारण 2-3 नर्सों पर ही 40 बैड़ों से भरे हुए एक वार्ड का जिम्मा होता है। इसीलिए नर्सों ने भी अपनी टैक्टिस ईजाद की और कोई मरीज कितना ही दर्द से क्यों न कराह रहा हो नर्स को चिल्ला चिल्ला कर बुला रहा हो उनके कानों में जूं नहीं रेंगती। उन्होंने अपने कानों को उस आवाज का अभ्यस्त बना लिया है। वो बैठी रहती हैं गप्पे मारती हैं, और रात की ड्यूटी में कुडां लगाकर अंदर सोई रहती हैं। मरीजों के लिए उनका फिक्स सिड्यूल होता है कि पूरे दिन के तीन वक्त जाकर किसी मरीज को सुई लगानी है या फिर किसी को ग्लूकोज चढ़ाना है।
राजस्व वसूलने की मंशा है स्वास्थ्य से भी

भारत में कई लोगों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र सरकारी माल कूड़े में डाल जैसा निवेश है यहां खर्च ही खर्च होता है वापस कुछ नहीं मिलता। इस बात को 1991 में शुरू हुई आर्थिक उदारीकरण की नीतियों ने और हवा दी है। जिसके तहत स्वास्थ्य जैसी जरूरी जरूरत भी भारत में कुछ लोगों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र सरकारी माल कूड़े में डाल जैसा निवेश है यहां खर्च ही खर्च होता है वापस कुछ नहीं मिलता। इस बात को 1991 में शुरू हुई आर्थिक उदारीकरण की नीतियों ने और हवा दी है। लेकिन यदि समाजवाद के संस्कारों वाले चीन व रूस की उत्कृष्ट चिकित्सा सेवाओं को छोड़ भी दें तो पूंजीवाद के धुर समर्थक अमेरिका का उदाहरण आंख खोलने वाला है। भारत के स्वास्थ्य बजट की तुलना में अमेरिका का बजट कहीं अधिक है इससे यह प्रमाणित होता है कि चिकित्सा जैसा क्षेत्र किसी भी अर्थव्यवस्था से परे है। सरकार किसी भी विचारधारा की हो, स्वास्थ्य क्षेत्र में जरूरत के अनुरूप निवेश करना उसका कर्तव्य बनता है। पंचवर्षीय योजनाओं के जनकल्याणकारी आदर्श के दिनों में अस्पताल मरीज तक खुद जाते थे। उस समय लोगों को अस्पताल आने की आदत नहीं थी, लेकिन आज हालत यह है कि अस्पताल कम पड़ रहे हैं और मरीज ज्यादा हो गए हैं। सरकार को इस कल्याणकारी जरूरतमंद क्षेत्र में जितना खर्च करने की जरूरत थी वह भी वह नहीं कर रही है। केवल रस्म अदायगी के लिए होते हैं निरिक्षण

सरकारी अस्पतालों में अधिकारियों द्वारा निरीक्षण के प्रावधान की खुले आम धज्जियां उड़ रही हैं। सीएमएस द्वारा सप्ताह में दो बार निरीक्षण तो होता है सफाई कर्मचारियों से न नर्सों से न ही चिकित्सकों में सीएमएस का कोई डर है। दूसरी तरफ सीएमएस भी इसे एक खानापूर्ति मानकर दौरा करते हैं। उनके आने से मरीजों व व्यवस्थाओं में तिल भर का परिवर्तन नहीं होता। सीएमओ द्वारा भी माह में एक बार भ्रमण किया जाता है लेकिन कोई भी सीएमओ अपने अधीन अस्पतालों से भला क्यों खोट निकालेगा। सरकारी निर्देश हैं इसीलिए जिलाधिकारी भी समय समय पर अस्पतालों का दौरा करते हैं। डीएम के यह दौरे पूर्व निर्धारित होते हैं। जिसके लिए बाकायदा सूचना जारी की जाती है। इस बीच जो डॉक्टर ड्यूटी से नदारद होते हैं उनकी उपस्थिति भर दी जाती है। जिसका डीएम निरीक्षण करते हैं। ऐसा कम ही देखने में आया है कि कोई डीएम मरीजों के पास जाकर उसकी खैरख्वाह पूछता हो। स्वास्थ्य सचिव या मंत्री तब तक ही अस्पतालों का दौरा करते हैं जब कोई बड़ा मामला हो जाए।

बजट 6 करोड़, नहीं मिलती चिलमची

लगभग 6 करोड़ का बजट प्रतिवर्ष पाने वाले दून अस्पताल में सुविधाओं के नाम पर मरीजों के लिए एक चिलमची तक मौजूद नहीं है। हर महीने इस बजट से 3 लाख रूपये सफाई और साढ़े चार लाख रूपये खाने का बजट ठेकेदार को दे दिया जाता है। अस्पताल सामने पडऩे वाले हिस्से में तो झाडू-पोछा लगता दिखाई देता है, लेकिन अस्पताल की सफाई की कलई खोलते हैं बदबू और गंदगी से भभकते टायलेट, जो हफ्तों तक साफ नहीं होते। बाजार से 100-100 रूपये की चिलमची और पेशाब करने का डब्बा मरीजों से बाकायदा मंगाया जाता है। खाने के लिए मिलने वाला बजट हालांकि अपर्याप्त है लेकिन उसे भी सही से इस्तेमाल करने के बजाए कमीशन बनाने का जरिया बना दिया गया है। लिहाजा नाममात्र का खाना मरीजों को दिया जा रहा है। खाना देने की बस औपचारिकता पूरी हो रही है। एक बच्चे से लेकर बड़े तक को एक जैसा खाना मिलता है। डायटीसियन ऋचा कुकरेती कहती हैं कि मैं अभी नई आई हूं। फिर भी मेरा प्रयास है कि मरीजों तक गर्म खाना तय डाइट के अनुसार मिल सके। दूध सहित सभी खाद्यों की गुणवत्ता भी जांची जा सके इसके लिए भी मैं प्रयासरत हूं।
एमआरआई मशीन भी पीपीपी मोड मेंडेढ़ साल पहले दून अस्पताल में आई एमआरआई मशीन अभी तक मरीजों के लिए उपलब्ध नहीं हो पाई है। जबकि दून के डॉक्टरों द्वारा प्रतिदिन कई मरीज शहर के कई प्राईवेट क्लीनिकों में रेफर किए जा रहे हैं। जहां उनसे मनमानी फीस ली जाती है। और उसका 30 से 40 फीसदी कमीशन लिया जाता है उस पैथोलॉजी में रेफर करने वाले डॉक्टरों द्वारा। मरीजों के लिए आई मशीन अस्पताल प्रशासन की दलीलों के नीचे दबी पड़ी हैं। प्रशासन का कहना है कि हमारे पास एमआरआई मशीन का एक्सपर्ट मौजूद नहीं है। ये बड़ी बेतुकी सी बात लगती है जब पावरफुल पद पर बैठने वाले लोग स्टाफ की कमी का रोना रोते हैं। क्या पहले से ही मौजूद 3-3 रेजियोलॉजिस्टों को अतिरिक्त ट्रेनिंग देकर या फिर नया स्टाफ रखकर एमआरआई मशीन का काम शुरू नहीं किया जा सकता। सोचने की बात है कि जिसके प्रयासों से 7 करोड़ की मशीन मंगवाई जा सकती है, डेढ़ साल से प्रतिमाह डेढ़ दो लाख उसका मेंटिनेंस का खर्चा अदा किया जा सकता है, तो क्या एक छोटा सा तकनीकी स्टाफ नहीं उपलब्ध कराया जा सकता। सीएमओ से लेकर स्वास्थ्य मंत्री तक अगर ये सब देखकर मूक बने हैं तो फिर उसके भी कुछ अर्थ जरूर होंगे। दरअसल आपको अपनी पगड़ी मिल ही रही है। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार सच्चाई यह है कि सरकार लंबे समय से इस मशीन को प्राइवेट सेक्टर को देने के मूड़ में थी। और अभी कुछ शर्तों के साथ दिल्ली की किसी महाजन कंपनी को इसका ठेका दे दिया है जिसके तहत सुबह 8बजे से 2 बजे तक यह सरकारी तौर पर चलेगी जिसके एम्स के रेट के बराबर होंगेे। कितनी शर्मनाक बात है कि बाहर का कोई ठेकेदार आकर सरकार से कमा जाता है और आप अपने राजस्व के चक्कर में मरीजों को निशुल्क या कम कीमत पर इलाज मुहैया नहीं करा सकते।
जधानी में पिछले दिनों एतिहासिक कोरेनेशन हास्पिटल का जीर्णोंदार किया गया। शायद नया होने व शहर से अधिक संपर्क में न होने के कारण यह मरीजों की पहुंच से बाहर है। अस्पताल में आधुनिक जांच सुविधाएं, पर्याप्त बैड हैं जिससे कम मरीज आने से डॉक्टर भी उनके मर्ज की गहराई में जाते हैं। लेकिन अविश्वास से ग्रस्त मरीज यहां आने की बजाय प्राईवेट हास्पिटलों का रुख कर रहे हैं। अंग्रेजों द्वारा कलकत्ता से राष्ट्रीय राजधानी को जब दिल्ली लाया गया तभी 1912 में कोरेनेशन हास्पिटल की नींव पड़ी। शुरूआत में इसमें केवल ब्रिटिशों को ही इलाज कराने की अनुमति थी। वीआईपी स्टेटस वाली यह स्थिति 1964 तक बनी रही। 1964 में यूपी सरकार द्वारा लिए जाने के बाद इसे आम लोगों के लिए भी खोल दिया गया। 2008में भाजपा सरकार द्वारा प। दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर अस्पताल के पुनर्लोकार्पण के बाद इसमें 120 बैडों की व्यवस्था की गई। जिसमें 100 जरनल व 20 बैड नेफ्रोडाइलिसिस(गुर्दे खराब के ट्रीटमेंट की मशीन व मरीजों के लिए) के लिए रखे गए। जिनमें से 40 बैड अभी नहीं चल रहे हैं। वर्तमान में यहां पर 24 घंटे की आपातकाल सुविधाओं से लेकर परिवार कल्याण सेवाएं, महिला पुरूष संबंधी सारे आपरेशन, डाट्स का इलाज, हर माह लगने वाले टीके, कानूनी चिकित्सा परीक्षण, मोतियाबिंद का आपरेशन,हड्डी संबंधी सारे इलाज यहां पर उपलब्ध हैं। अस्पताल के सुपरिडेंटेंट ए.एस.रावत कहते हैं अस्पताल में थाइराइड, आंख व छाती के अल्ट्रासांउड की व्यवस्था है जो कि एकमात्र यहीं पर है। इसके अलावा कलर डाप्लर के परीक्षण व आपरेशन के लिए भी अस्पताल विशेषज्ञता रखता है। अस्पताल में स्त्री व रोग बाल रोग के अनुभवी चिकित्सक मौजूद हैं। प्रतिदिन यहां लगभग 400 मरीज आ रहे हैं। भविष्य में सरकार की इस अस्पताल को पब्लिक प्राइवेट पाटर्नरशिप के आधार पर चलाने की योजना है। सरकार व दून प्रशासन अगर मरीजों के प्रति थोड़ा बहुत भी संजीदा होते तो दून में एमरजेंसी में आने वाले मरीजों को यहां जगह खाली नहीं है यह कहकर धमकाने के बजाय कोरेनेशन में सिफ्ट करने की योजना बनाते।

कहां गए स्वास्थ्य मंत्री के औचक दौरे

भाजपा सरकार गठित होने के बाद रमेश पोखरियाल निशंक के स्वास्थ्य मंत्री का ओहदा संभालने पर प्रदेश वासियों में उनके शुरूआती तेवरों को देखकर एक आस जगी थी। स्वास्थ्य मंत्री जहां जाते वहां के अस्पताल में जरूर धमक पड़ते। रोज-रोज स्वास्थ्य मंत्री के औचक निरीक्षणों से स्वास्थ्य विभाग में खलबली मच गई। डाक्टर ड्यूटी के घंटों में अस्पताल में मौजूद रहने लगे सरकार द्वारा दी जाने वाली दवाएं वितरित होने लगी। इस तरह की सक्रियता से स्वास्थ्य विभाग में जान आने लगी थी, लेकिन मंत्री की यह चुस्ती जल्दी ही काफूर हो गई। मंत्री जी के दौरे बंद हो गए। अब वह किसी अस्पताल में नहीं जाते। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि उन्होंने शुरूआती दौरे क्यों किए? क्या सरकारी नौकरी के साथ प्राइवेट क्लीनिकों से चांदी काट रहे डॉक्टरों को संभल जाने मात्र के लिऐ यह ट्रायल मात्र था।

राजधानी के अस्पताल में जिला स्तर की सुविधाएं।

चिकित्सकों, स्टाफ नर्स,पैरामेडिकल स्टाफ,तकनाशियनों की भारी कमी। ट्रामा( विशेष तौर से सिर पर चोट लगने वाले मरीज), ह्दयय रोगियों, फआलिश(ब्रेन स्टोक) , किडनी रोग पीडि़तों , कैैंसर पीडि़तों, गंभीर किस्म के आपरेशनों(सजरी) के लिए मरीजों को हायर सेंटर भेज दिया जाता है। श्रीनगर व हल्द्वानी मेडिकल कालेज से भी मरीज यहां भेजे जाते हैं। जटिल नेत्र सर्जन का इंतजाम नहीं।कार्डियोलाजी विभाग में एक ह्दय रोग विशेषज्ञप्रदेश भ्र में बर्न युनिट केवल दून में। यूनिट में 13 बैड एक सूपर स्पेशलिस्ट।मध्यम दर्जे की प्लास्टिक सर्जरी की व्यवस्था भी नहीं। न्यूरो डिपार्टमेंट-धूल खा रही हैं करोड़ों की मशीनें। अलग से आपरेशन थियेटर नहीं। टाइम न्यूरो सर्जन नहीं।न्यूरो का पैरामेडिकल स्टाफ नहीं।पैथोलॉजी विभाग में आधुनिक उपकरण नहीं। बड़ी जांच के लिए मरीज निजी क्षेत्र में।संविदा पे हैं चिकित्सक> नेफ्रोलाजी यूरोलाजी के सूपर स्पेशल्सिट संविदा पर तैनात अलग से य विभाग नहीं।