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Saturday, November 3, 2012

घी के दिए नहीं मशाल जलाने का है समय


घी के दिए नहीं मशाल जलाने का है समय 
चट्टान के मुहानों पर घास काटती महिला कब तक देती रहेगी पहाड़ों को अपना बलिदान 
उत्तराखंड के बारह साल के इतिहास में पहली बार गैरसैंण में कैबिनेट की बैठक हुई। जहां उत्तराखंड की जनता कभी राजधानी बनने का ख्वाब देखा करती थी। टीवी चैनल रिपीट कर कर के बार बार कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज का बयान दिखा रहे हैं जिसमें वह पहाड़ की जनता से कहते हैं कि राम अयोध्या से लौट आए हैं वह घी के दिए जलाकर दीवाली मनाए,खुशियां मनाए। गैरसैंण मंत्रीमंडल की बैठक में व देहरादून कांग्रेस भवन में जश्न का माहौल है पटाखे छोड़े जा रहे हैं। वहीं टीवी चैनल के  नीचे क्रासर में खबर चल रही है कि उत्तरकाशी में घास काटते हुए महिला की चट्टान से गिरकर मौत।
 एकाएक पहाड़ का वह पूरा मंजर आंखों में हो आया है, जब खुद अपनी मां, काकी व भौजी को खतरनाक पहाड़ी के मुहानों पर घास काटते हुए देख अपनी सांसे थाम लिया करते थे। थोड़ा पैर फिसला या हाथ से पकड़ी घास की मूंठ उपड़(उखड़) गई तो सीधे खाई में गिरकर चिथड़े चिथड़े होने के सिवा कोई विकल्प न था। और वह महिला ऐसी मुश्किल चट्टान पर उस लहराती हुई घास को काटने जाती है जिस तक किसी जानवर तक की पहुंच नहीं हुई रहती। पूरे जंगल की खाक छानने व दिन भर जंगल में भटकने फिरने के बजाय  यह महिलाएं जान हथेली पर लेकर ऐसी चट्टानों में किसी सर्कस वाली की भांति चले जाया करती थी। मुझे याद है पूरी याददाश्त के साथ याद है कि गांव की वही बहू ऐसी चट्टानों की घास को काट लाने का साहस रखती थी जिसके घर में सास से बहुत कलह रहता था। जिसके घर में पेट भर के मोटे अनाज की रोटी तक नहीं मिलती थी।  अच्छी लहराती हुई घास लेकर जंगल से जल्दी घर लौट जाऊं ताकि पेट भर खाना मिल सके व छोटे बच्चे को वक्त पे दूध पिला सके इसी गरज से यह गांव की काकी भौजी ऐसी जानलेवा चट्टानों का रुख किया करती थी। कई बार ऐसी चट्टानों में ही बकरियों के लिए पत्ते वाली घास (झाड़ी)उगा  करती थी जिसे हमारे गांव की लछिम काकी व प्रेमा काकी ही ला पाते थे। पूरा गांव उन्हें रूख्याव (चट्टानों की एक्सपर्ट) नाम से नवाजते थे।
एक वाकिया और सुनाना चाहूंगी, ताकि पहाड़ के हालातों को आप सब भी महसूस कर सकें, कैबिनेट तक पहुंची हमारी महिला नेत्री महसूस सकें जिन्होंने कभी पहाड़ के जीवन को जिया व महसूसा ही नहीं और बन गई महिला सशक्तिकरण मंत्री। वाकिया यूं है कि पिछले दिनों राजधानी स्थित एफआरआई भवन के शानदार एसी कमरे में जब  भ्रूण हत्या पर हुई कार्यशााला चल रही थी जिसमें  दूर दराज के गांवों से दो दिन व एक रात की लंबी बस की यात्रा कर काकी भौजियों को एनजीओ के नेताओं द्वारा पहुंचाया गया था। गद्दीदार कुर्सियों में जो स्वर्ग सरीखी नींद में डूबी थी । मैने पूछा कि कैसा लग रहा है राजधानी में। तो मासूम बच्चे सी मासूमियत लिए तपाक से बोल उठीं कि अहो.. .. .. ..  शहर में ले कति नख लागुंछे (शहर में भी क्या कहीं बुरा लगता  है)। उसकी सौ फीसदी नकार के जवाब ने उसकी उस पीड़ा को खोल के रख दिया जिसे वह पहाड़ से पहाड़ी जीवन  में रोजबरोज झेलती है। उसकी नजरों में शहर इसीलिए कभी बुरा नहीं हो सकता था क्योंकि शहर में लोग बैठे रहते थे। उसकी नजर में शहर में रहने वाली औरत का खाना बनाने के सिवा काम ही क्या था, जिसे वह कभी काम के श्रेणी में नहीं रखती थी। यह इसलिए क्योंकि सुबह पौ फटने से उस महिला के काम की शुरूआत हो जाती है और दिन डूबने तक वह अनथक काम में लगी रहती है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या राज्य बनने के इस बारह साल के अरसे में क्या वाकई भाजपा कांग्रेस दोनों की सरकारें बनवास पर गई हुईं थी, क्या वाकई अब पहाड़ के भाग जागने वाले हैं, क्या वाकई पहाड़ की चट्टानों से गिरने को मजबूर इन महिलाओं के भाग अब संवर जाएंगे। सतपाल महाराज व उनकी  महारानी जिन्होंने पिछले हफ्ते हुई अपने  बेटे की शादी में एक रात में ही दो करोड़ की बिजली फूक दी, जिनके बेटे की शादी किसी अद्र्धकुंभ से कम नहीं थी क्या अब वह बताएंगे पहाड़ की गरीब जनता को कि राम अयोध्या आ गए घी के दिए जलाओ। महिला सशक्तिकरण विभाग की कमान संभाले उनकी महारानी पत्नि क्या पहाड़  की इस औरत को घास व चारे के संकट से मुक्ति दिला पाएगी। वहीं दूसरी ओर दूसरी महिला कैबिनेट मंत्री इंदिरा ह्दयेश जिसे हल्द्वानी में  मध्यम वर्ग की शहरी महिलाओं के तीज व करवा चौथ के उत्सवों में जाने से फुरसत नहीं क्या  वह पहाड़ की महिला को उसकी इन जानलेवा चट्टानों से मुक्त कर पाएंगी। हम संसद विधानसभा में किन महिलाओं के आरक्षण व सशक्तिकरण की बात  करते हैं। जो यहां पहुंचकर महिला हितों को भूल जाती हैं,या फिर जिन्हें महिला के जीवन काक ख ग तक  मालूम नहीं।
ं अपनी राजनीति चमकाने या मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का अपने अंक बढ़वाने जिस भी गरज से गैरसैंण में कैबिनेट की यह बैठक हुई है महिलाओं के संदर्भ में कई कई सवाल छोड़ गई है, कि जो राज्य यहां की महिलाओं  की ही लुटी हुई अस्मत पर बना हो, जिस राज्य के लिए यहां की महिला ने अपने नौजवान बेटों की बलि दी हो वहां की महिला को बारह सालों में यहां की सरकार ने क्या यही कम्पनसिएशन दिया कि वह चट्टान से गिरने को विवश हो। वह शराबी पति की मार से प्रताडि़त हो, वह बेरोजगार बेटे का दुख सीने में लेकर चले, वह वहशी दरिंदों के हाथों अपनी  बेटियों की अस्मत लुटते हुए देखे। घी के दिए जला दीवाली मनाने की सलाह देने वाली सरकार जरा माथे पर बिना बल डाले भी सोचे तो जवाब उसके सामने होगा कि आखिर दिया क्या है उसने इन बारह सालों में पहाड़ की महिला को। क्या अपना राजस्व बढ़ाने की कीमत पर गांव मुह्ल्लों में कच्ची शराब की दुकानें, या फिर अस्मत लूटने वाले अनंत कुमार व बुआ सिंह जैसे दरिंदों को प्रमोशन व सम्मान। पहाड़ की जनता यह घी के दिए नहीं   मशाल जलाने का समय है। जागो इन लुटेरे नेता मंत्री व नौकरशाहों को पहचानो।

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